Tuesday, October 12, 2021
हिन्दी और मराठी स्त्रियों की आत्मकथाएँ : परम्परा और परिचय
हिन्दी और मराठी स्त्रियों की आत्मकथाएँ: परम्परा और परिचय
2.1 हिन्दी में स्त्री आत्मकथाएँ: परम्परा और परिचय
हिन्दी आत्मकथा का उद्भव रीतिकाल के कवि बनारसीदास जैन की 1641 में ब्रजभाषा में लिखी पद्यात्मक आत्मकथा ‘अर्धकथानक’ से माना जाता है। पंकज चतुर्वेदी ने ‘अर्धकथानक’ का परिचय इस प्रकार दिया है,“’अर्धकथानक’ भारतीय परम्परा की शायद एकमात्र आत्मकथा है। सन् 1641 में मुगल साम्राज्य के सर्वश्रेष्ठ दिनों में इसकी रचना हुई थी। बनारसीदास जैन ने जब यह आत्मकथा लिखी, तब उनकी उम्र 55 वर्ष थी। एक प्राचीन जैन परम्परा को उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया है कि मनुष्य की सम्पूर्ण आयु 110 वर्ष होती है। इसलिए बनारसीदास जैन ने यह सोचकर कि उन्होंने अभी अपना आधा ही जीवन जिया है, आत्मकथा का नाम ‘अर्थकथानक’ रखा। लेकिन चूँकि इस रचना के बाद वे ज्यादा नहीं जिये, इसलिए यह आत्मकथा वस्तुतः उनके जीवन की पूरी ही कथा है।” बनारसीदास जैन की आत्मकथा के बाद दो-ढाई सौ वर्षों तक एक भी आत्मकथा नहीं मिलती है। हिन्दी आत्मकथा का उद्भव साढ़े तीन सौ साल पहले हुआ, फिर भी इस विधा का विकास हिन्दी में उतना नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था। हिन्दी में आत्मकथा को लेकर प्रेमचंद और आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के बीच जो बहस हुई, उसकी चर्चा पहले अध्याय में हुई है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी आत्मकथा विधा का शुरुआती दौर में विरोध हुआ, लेकिन बाद में इस विधा का विकास समय के साथ होता गया। खासकर बांग्ला और मराठी में।
हिन्दी में स्त्री आत्मकथाओं का आरंभ दुःखिनीबाला की आत्मकथा ‘आत्मजीवनी ’ से माना जाता है। प्रज्ञा पाठक ने अपने शोध कार्य के दौरान इस पुस्तक का पता लगाया, उनके अनुसार “ ‘सरला :एक विधवा की आत्मजीवनी’ हिंदी में किसी स्त्री के द्वारा आत्मकथा लिखने का पहला प्रयास है। इसकी लेखिका दुःखिनीबाला कौन है, यह पता नहीं लगता है। इसका प्रकाशन ‘स्त्री दर्पण’ पत्रिका के जुलाई, सन् 1915 से मार्च, सन् 1916 तक के अंकों में धारावाहिक रूप से हुआ था।” इस कृति से हिंदी प्रदेश में चल रहे हैं, स्त्री आंदोलनों के बारे में पता चलता है। गरिमा श्रीवास्तव हिन्दी स्त्री आत्मकथा के आरंभ के बारे में लिखते हुए,‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’ द्वारा सन्1882 ई.में लिखित ‘सीमंतनी उपदेश ’ का उल्लेख करती हैं। उनके अनुसार, “ ‘सीमंतनी उपदेश’ ( सन्1882ई.) जिसकी लेखिका के रूप में ‘एक अज्ञात हिन्दू औरत’ का नाम है, को यद्यपि आत्मकथा नहीं कहा गया है, फिर भी इसमें लेखिका के निजी और आत्मीय प्रसंगों की भरमार है।” इसे आत्मकथा न कहने पर भी, यह बात तो स्पष्ट होती ही है कि हिंदी क्षेत्र की स्त्रियों द्वारा नाम बदलकर ही सही, आज़ादी से पहले से आत्मकथात्मक लेखन किया जा रहा था। इस साल हुए दिल्ली पुस्तक मेले में एक किताब का लोकार्पण हुआ, जिसे आधुनिक हिन्दी की प्रथम आत्मकथा कहा गया। इसकी रिपोर्ट ‘मोहला लाईव्ह’ ब्लाग पर इस तरह छपी है, “हाल में नयी दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, हिंदी आलोचना के शिखर प्रो नामवर सिंह ने अपने विश्वविद्यालय जेएनयू की पीएचडी की छात्रा नैया द्वारा संपादित पुस्तक ‘अबलाओं का इंसाफ’(स्फुरना देवी) का लोकार्पण किया। यहाँ यह बताना जरूरी है की इस पुस्तक का प्रकाशन सन् 1927 में हुआ, जो आधुनिक हिंदी की प्रथम स्त्री-आत्मकथा है।” अगर यह किताब सन् 1927 छपी होगी, तो यह किसी भी महिला द्वारा हिन्दी में पुस्तक रूप में लिखी और प्रकाशित की गई, प्रथम आत्मकथा होगी। सन् 1932 में प्रकाशित ‘हंस आत्मकथा अंक’ में दो स्त्रियों का आत्मकथात्मक लेखन छपा। जिसमें श्रीमती यशोदादेवी का ‘मेरा एक अनुभव’ और प्रेमचंद की पत्नी श्रीमती शिवरानीदेवी का ‘मेरे जीवन का एक अनुभव’ है। सन् 1956 में श्रीमती रमादेवी मुरारका की आत्मकथा ‘मेरी जीवन-कहानी’ प्रकाशित हुई है। यह आत्मकथा कोलकाता के समाजसेवी नेता बसंतलाल मुरारका की धर्मपत्नी की आत्मकथा है। कमलेश सिंह इस आत्मकथा के बारे में लिखती हैं कि,“कम शिक्षित होने के कारण उन्हें अपनी जीवन कहानी लिखने में दूसरों का सहयोग प्राप्त करना पड़ा। पुस्तक का आकार छोटा है, परंतु पूरी पुस्तक प्रेरणादायी है। यह लघु आत्मकथा उनकी समर्थ शक्तियों को पूरी तरह अभिव्यक्त करती हैं। जहाँ पर उन्होंने राजस्थान के रीति-रिवाज और लोगों के आचार-विचार की बात की है, उससे पता चलता है कि वे परिस्थितियों को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से समझने का प्रयत्न करती थीं। उनकी जीवन कहानी से तिथियों और समय का ब्यौरा हमें नहीं मिल पाता।” इस आत्मकथा में स्वतंत्रता आंदोलन और तत्कालीन सुधार आंदोलनों का भी ज़िक्र मिलता हैं। श्रीमती जानकीदेवी बजाज की सन् 1956 में प्रकाशित ‘मेरी जीवन कहानी’ भी रमादेवी मुरारका की आत्मकथा की तरह है। यह आत्मकथा भी स्वंय आत्मकथाकार ने लिपिबद्ध नहीं की। कमलेश सिंह इस आत्मकथा के बारे में लिखती हैं कि, “ ‘मेरी जीवन यात्रा’ श्रीमती जानकी देवी बजाज की संस्मरणात्मक कृति है। जानकीदेवी महात्मा गांधी के पांचवें (दत्तक) पुत्र की धर्मपत्नी थीं। वे निरक्षर थीं, परन्तु उनका यह शौक था कि वे जब-तब अपने संस्मरण लोगों को सुनाया करती थीं। श्री ऋषभदास जी ने वे संस्मरण सुने और उन्हें रोचक प्रतीत हुए तो उन्होंने इन संस्मरणों को लिपिबद्ध करने का विचार किया। जानकीदेवी को संस्मरण कहने के लिए कहा और रांका जी ने उन्हें इस प्रकार लिखा कि उन संस्मरणों की शैली जानकीदेवी की ही शैली बनी रहे, ताकि उनका प्रभाव कम अथवा समाप्त न हो जाये।” आत्मकथा विधा में अन्य विधाओं की तरह कड़क अनुशासन न होने के कारण यह आत्मकथा लिखी गई। इनमें बोलचाल की भाषा जीवंत हो उठी है। इधर कुछ सालों से हिन्दी में स्त्री आत्मकथाओं का सिलसिला शुरु हो गया। जिसमें प्रतिभा अग्रवाल की आत्मकथा दो खण्डों में प्रकाशित हुई, पहले खण्ड का शीर्षक है, ‘दस्तक ज़िन्दगी की’ (सन् 1990) और दूसरे खण्ड का शीर्षक ‘मोड़ ज़िन्दगी का’ (सन् 1996) है। कुसुम असंल की आत्मकथा ‘जो कहा नहीं गया’(सन् 1996), कृष्णा अग्निहोत्री ने दो खण्डों में आत्मकथा लिखी। पहला खण्ड ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ सन् 1996 में इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। आत्मकथा का दूसरा खण्ड ‘और....और...औरत’ सामयिक बुक्स, दिल्ली से 2010 में प्रकाशित हुआ। कौसल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’(सन् 1999), रमणिका गुप्ता की ‘हादसे’ (2005), प्रभा खेतान की ‘अन्या से अनन्या’(2007), मन्नू भंडारी की ‘एक कहानी यह भी’ (2007), मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ (2008) , शीला झुनझुनवाला की ‘कुछ कही कुछ अनकही’(2009), चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की ‘पिंजरे की मैना’ (2010), शुशिला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ (2010) में प्रकाशित हुई। जिस रोशनाई प्रकाशन, 212 सी.एल./ए, अशोक मित्र रोड (सरकस मैदान के पास) कांचरपाड़ा, उत्तर 24 परगना (पश्चिम बंगाल) ने 2002 में बेबी हालदार की 'आलो-आंधारि' छापी थी, उसी ने दिसंबर 2005 में सुशीला राय की आत्मकथा 'एक अनपढ़ कहानी' भी प्रकाशित की थी, लेकिन प्रायः सात साल इसके प्रकाशन को होने आए, यह पुस्तक अभी भी अज्ञात-अलक्षित सी है। यह उत्तरी बिहार के मधुबनी जिले के एक गाँव में पिछड़ी जाति के एक गरीब परिवार में जन्मी सुशीला राय की कहानी है । सुधा अरोरा जी ने स्त्रियों के दो आत्मकथात्मक किताबों का संपादन किया- 1. ‘दहलिज को लांघते हुए’ (मौखिक इतिहास कार्यशाला में सहभागी महिलाओं के आत्मकथ्यों पर आधारित श्रृंखला सन् 2003), 2 ‘पंखों की उड़ान’ (दृश्य श्रव्य कार्यशाला में सहभागी महिला कलाकारों के आत्मकथ्यों पर आधारित श्रृंखला सन् 2003), इन सम्पादित किताबों में महिलाओं के आत्मकथ्य शामिल है। यह कार्य उन्होंने SPARROW (Sound & Picture Archives for Research on Women महिलाओं से संबंधित शोध का ध्वनि एवं चित्रमय अभिलेखागार) के लिए किया। 2005 में राजेन्द्र यादव, अर्चना वर्मा और बलवंत कौर के सम्पादन में ‘देहरि भई विदेस’(लेखिकाओं के आत्मकथांश) आई। जिसमें मीराबाई से लेकर अबतक के बीस स्त्री रचनाकारों के आत्मकथ्य शामिल है।
हिन्दी में स्त्रियों ने पारिवारिक और सामाजिक भय के कारण आत्मकथात्मक उपन्यास भी लिखे हैं। जिनमें प्रमुख रूप से गद्य कविता लिखने वाली दिनेश नंदिनी डालमिया का नाम आता है। जिन्होंनें 1. मुझे माफ करना (सन् 1974), 2. आहों की बैसाखियाँ (सन् 1978), 3.कंदील का धुँआ (सन् 1980), 4. और सूरज डूब गया (सन् 1983) आत्मकथात्मक उपन्यास लिखें। दिनेश नंदिनी डालमिया ने अपने हर आत्मकथात्मक उपन्यास में पात्रों के नाम बदले। । मैत्रेयी पुष्पा का आत्मकथात्मक उपन्यास ‘कस्तूरी कुंडल बसै’(2002) प्रकाशित हुआ है। हिन्दी की ग्यारह स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं का परिचय नीचे दिया जा रहा है। ये आत्मकथाएँ मेरे शोध के आधार ग्रंथ भी हैं।
2.1.1 दस्तक जिन्दगी की – प्रतिभा अग्रवाल (सन् 1990)
संगीत नाटक एकेडमी एवार्ड २००५ से पुरस्कृत प्रतिभा अग्रवाल की आत्मकथाएँ दो भागों में प्रकाशित हुई। प्रथम खंड का शीर्षक हैं, ‘दस्तक जिंदगी की’(सन् 1990), दूसरे खण्ड का शीर्षक है ‘मोड़ जिंदगी का’(सन् 1996)। दो खण्डों को एक ही साथ लिखा गया, किसी वज़ह से दूसरा खण्ड उसी साल प्रकाशित हो नहीं पाया। प्रतिभा जी का जन्म 10 अगस्त सन् 1930 को बनारस में, भारतेंदु भवन में भादों बदी, संवत, सन् 1987 को हुआ था। प्रतिभा अग्रवाल के दादा बाबू राधाकृष्ण दास भारतेन्दुजी के सगे फुफेरे भाई थे। अपने दादा जी और भारतेन्दु के संबंध के बारे में प्रतिभा जी लिखती हैं, “यद्यपि दादाजी को भारतेन्दु जी का सान्निध्य लम्बे अरसे तक नहीं मिला क्योंकि जब वे बीस वर्ष के थे तभी भारतेन्दुजी का देहान्त हो गया तथापि उनका बचपन उस साहित्यिक वातावरण में बीता था, उन्होंने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से बहुत कुछ ग्रहण किया था।” इस तरह प्रतिभा को विरासत में अपने दादा से साहित्य की समझ मिली।
प्रतिभा अग्रवाल जब दस बरस की थीं, तब उनकी माँ का देहान्त हो गया। उनकी माँ छोटे कद की होने पर भी बहुत कर्मठ थी, हर समय काम में लगी हुई रहती थी। माँ से जुड़ी हुई कुछ यादें प्रतिभा जी बताती हैं, “याद है रात में लालटेन की रोशनी में मशीन पर कपड़े सिलाई करती या कढ़ाई करती माँ की, याद है रात में संगीत सम्मेलन आदि में जाने के समय तैयार होते बाबूजी को छोटी-मोटी चीजें पकड़ाती माँ की, याद है टायफाइड के बाद बाबूजी के घर से चले जाने के बाद चोरी-चोरी मुझे नेनुआ की तरकारी और पराठा खिलाती माँ की, छत पर सुबह-सुबह चुड़िहारिन से चूड़ी पहनती माँ की, भेलपुर में जैन उत्सव के दिन भाई-बहनों से घिरी माँ की, पेट में बायगोला के दर्द से चिखती माँ की, यक्ष्मा से पीड़ित बिस्तर पर पड़ी क्षीण होती माँ की और क्षीण होते-होते धीरे-धीरे शेष होते माँ की।” यक्ष्मा की बिमारी से माँ चल बसती है। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी ने किया। सन् 1949 में प्रतिभा जी के दोनों भाईयों का निधन सत्रह दिन के अन्दर हो गया।
वे अपनी पढ़ाई के बारे में लिखती हैं, “नियमित शिक्षा के नाम पर मेरी कुल जमापूंजी है बनारस में अग्रवाल कन्या पाठशाला में अ से छठी कक्षा तक की पढ़ाई, कोलकाता में दसवीं कक्षा में करीब दस महीनों की पढ़ाई और शांतिनिकेतन में सन्46 में तीन-साढ़े महीने इंटरमीडिएट की पढ़ाई।” उन्हें स्कूल की बहुत सारी घटनाएँ याद हैं। पढ़ाई में अच्छी होने के कारण दूसरी लड़कियों को पहाड़ा रटवाने का गौरव उन्हें प्राप्त होता था। बी.ए. और एम.ए की परिक्षाएँ बनारस से दीं। वे कक्षा में गाना भी गाती थीं। उनके रंगमंच से जुड़ने का शुभारंभ भी स्कूल से ही हुआ, “स्कूल के वार्षिकोत्सव में नाचने-गाने में बराबर भाग मिला और इस प्रकार एक तरह से रंगमंच से जुड़ने का शुभारम्भ इसी उम्र में हो गया।”
माँ के जाने के बाद उन्हें माँ का स्नेह उनकी दादी से मिला। भाईयों ने भी बहुत प्यार से अपनी बहन को पाला है। प्रतिभा जी अपनी दादी को घर काम में हाथ बंटाती थीं। दादी जी के बारे में लिखती हैं, “दादीजी धार्मिक प्रवृत्तिवाली थीं जैसा कि उन दिनों सारी औरतें हुआ करती थीं। फिर वे तो छोटी उम्र में ही विधवा हो गयी थीं। सामान्य आचार-विचार मानती थीं।” दादी प्रतिभा के पिता से बच्चों की ओर ध्यान न देने कारण झगड़ा भी करती। दादी ने प्रतिभा जी और उनके भाईयों को हमेशा प्यार ही किया। वे लिखती हैं, “उनकी तीन लड़कियाँ तथा एक बेटा हुआ। कालान्तर में दो बेटियाँ मर गयी, एक जिन्दा रहीं उनके जीवनकाल तक, बाबूजी भी रहे। उन्हें अपने पोते-पोतियों से जितना लगाव था उतना शायद बेटे-बेटी से नहीं। हो सकता है मेरा ऐसा मानना भूल हो। चूंकि हमलोग छोटे थे और हमें सदा उनका स्नेह ही मिला इसलिए यह लगता हो कि वे हमें ही अधिक चाहती थीं, अपने बेटे-बेटी को नहीं पर हमें शायद ऐसा अनुभव हुआ।” दादी का देहांत चौरासी वर्ष की उम्र में हुआ। उन्होंने सुख का तो पता नहीं पर दुख ही अधिक पाया है।
प्रतिभा के पिता ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, पर उन्हें कलाओं का ज्ञान बहुत था। संगीतकारों-गायकों के साथ उनका उठना-बैठना था। वे अपने पिता के बारे में लिखती हैं, “जाने-अनजाने मेरे ऊपर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा बाबूजी का। यद्यपि उनसे हम सब काफी डरते थे पर उससे क्या हुआ। बाबूजी विशेष पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाये थे। ग्यारह वर्ष की उम्र में ही दादाजी की मृत्यु हो गयी थी। कोई देखरेख या नियन्त्रण में रखनेवाला रहा नहीं। मैट्रीक भी शायद पास नहीं किया पर कलात्मक अभिरुचि और परख की क्षमता उनमे पर्याप्त थी।...बराबर संगीत सम्मेलनों मे या संगीतानुष्ठानों में जाया करते थे। उनके साथ कई एक आयोजनों में जाने की याद मुझे भी है।” प्रतिभा अग्रवाल ने भी प्रितिन बागची से बरसों गीत एवं रवीन्द्र संगीत सीखा। अपने पिता से मिले संस्कार और वातावरण ने प्रतिभा जी के मन में संगीत के लिए एक गहरा स्थान बन गया। ‘अनामिका’ का ‘नये हाथ’ नाटक संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुआ था। पुरस्कार-समारोह के अवसर पर उसका पुनः मंचन 19 अगस्त, सन् 1959 में होना था। प्रतिभा जी के पिता को ‘लिवर कैन्सर’ था, जिसका पता जुलाई सन् 1959 में चला था। सब को चिन्ता बाबूजी की हो रही थी और अंत में जिसकी आशंका थी, वही हो गया। 12 अगस्त को बाबूजी चल बसे। 17 अगस्त को प्रतिभा जी दिल्ली के लिए रवाना हो गयीं। 19 को नाटक का मंचन कर 20 को बनारस पहुँचकर बाबूजी का दशकर्म विधान किया। प्रतिभा जी को लगता है कि उनके इस तरह के नाटक प्रेम से लोगों ने उनकी आलोचना की होगी, पर उनके अनुसार “पता नहीं, किसने क्या सोचा, क्या कहा। मेरे मन में कोई दुविधा नहीं थी और यदि आत्मा नाम की वस्तु कहीं रहती है तो बाबूजी की आत्मा मेरे इस आचरण से अवश्य ही तुष्ट हुई होगी।”
प्रतिभा की शादी प्रगतिशील विचारों वाले मदन बाबू से होती है, वे उनसे बारह साल छोटी हैं। लेखिका अपने पति के प्रगतिशील विचारों के बारे में लिखती हैं, “मदन जी का कथनी और करनी में अंतर नहीं रहता था। वे दूसरों से कभी कुछ ऐसे आचरण की अपेक्षा नहीं करते थे जो वे स्वंय न करते हो- वह चाहे सुबह चाय के टेबुल पर बाल बनाकर आना हो, नाश्ते-खाने के समय अखबार या किताब न पढ़ना हो या फिर किसी को कुछ देना हो, किसी का किसी से मिलना-जुलना हो। वे दिल से सुधारवादी थे, स्त्री-पुरुष की समानता के हिमायती थे और इसे उन्होंने व्यवहार में उतारा। बिना दहेज़ के, बिना पर्दे के विवाह किया, अपने घरवालों की अनिच्छा के बावजूद अपनी मर्जी से अपनी पसन्द की लड़की से विवाह किया, विवाह के पन्द्रह दिनों बाद ही उसे स्कूल में भर्ती कराया, अगले साल पढ़ने के लिए शांतिनिकेतन भेज दिया, बाद में अभिनय करने के लिए हर तरह अनुकूल वातावरण बनाया, उसे लोगों से मिलने-जुलने की पूरी स्वतंत्रता थी। यह बहुत बड़ी बात थी, विशेषकर उस जमाने में जब उन्होंने दी थी।” इस तरह का पति पाकर अपने को धन्य मानती है।
प्रतिभा को पढ़ने का भी बहुत शौक था, बचपन में ही उन्होंने बहुत सारी कविताओं को कंठस्थ किया था। “एक सौ से ऊपर कविताएँ याद थीं जिनमें रीतिकालिन देव, पद्माकर, घनानंद, रसखान से प्रारंम्भ करके भारतेन्दु, प्रसाद, पन्त, निराला, हरिऔध, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रसलीन, नवीन, दिनकर, रामनरेश त्रिपाठी आदि सभी की श्रेष्ठ रचनाएँ।” इसके साथ-साथ घर में कुछ किताबें उनके पहुँच से दूर रखी जाती थीं, उन किताबों को पढ़ने की बहुत उत्सुकता होती थी। एक दिन उनके हाथ गलती से कोकशास्त्र लग जाता है। “उन पुस्तकों में एक पुस्तक कोकशास्त्र की थी। बड़ी उत्सुकता के साथ कुछ पन्ने पलटे, हस्तिनी, पद्मिनी नारी के लक्षण पढ़े, कुछ और भी, पर न बात कुछ समझ में आई और न पढ़ने का साहस हुआ।”
सन् 1945 में पहली बार कोलकाता जाती है, तो उसे देखकर कहती हैं, “बनारस से सब कुछ कितना भिन्न है-शहर, बड़ी-बड़ी इमारतें, सड़क पर वाहनों की भागदौड़, सफाई,लोग। उस जमाने में बड़ी संख्या में अंग्रेज कोलकाता में रह रहे थे, मिलीटरी भी थी, उनके बड़े-बड़े स्टोर, अंग्रेजी सिनेमा, थियेटर हॉल। सब अद्भुत लग रहा था और सब से सुखद था पास बैठे व्यक्ति का संसर्ग जो इतनी सहजता और अंतरंगता से मुझे नये वातावरण से परिचित कराता चल रहा था। आम तौर पर छोटे शहर से आनेवाली एक कम-उम्र घरेलू लड़की जो आश्चर्य से अभिभूत हो जाने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त करती है, वैसा विशेष कुछ नहीं लगा था। हाँ, बड़ा अच्छा लग रहा था। नये जीवन, नये वातावरण नये संपर्कों के लिए मैं अंदर ही अंदर प्रस्तुत हो रही थी।”
इस तरह कोलकाता आकर नये जीवन की शुरुआत प्रतिभा जी करती हैं, जिसे उनके पति पूरी सहृदयता से साथ देते हैं।
2.1.2. मोड़ जिन्दगी का - प्रतिभा अग्रवाल (सन् 1996)
15 वर्ष की उम्र में अपने पति के कर्मक्षेत्र कोलकाता आती है। आते ही उनका स्कूल शुरु हो जाता है। मैट्रीक की परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद शांतिनिकेतन जाती हैं, वहाँ के माहौल के बारे प्रतिभा जी लिखती हैं, “सारी चिंताओं से मुक्त होकर ऐसे कलामय और आत्मीय वातावरण में कुछ महीनों का रहना भी कितना कुछ दे सकता है, यह प्रत्यक्ष अनुभव किया। पढ़ाई के साथ-साथ रवीन्द्र संगीत और सितार सीखा।” शांतिनिकेतन में उनकों हजारी प्रसाद द्विवेदी से परिचय हुआ, प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाडी’ पर आधारित ऩाटक में नवाब की भूमिका निभाई। यहीं पर उन्होंने बांग्ला सीखी। सांस की तकलीफ के कारण उन्हें शांतिनिकेतन छोड़ना पड़ा।
सन् 1946 के अगस्त में कोलकाता में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे का ज़िक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है। ‘अभिनव संस्कृति परिषद’ की स्थापना के अवसर पर रामकुमार वर्मा के दो एकांकियों का मंचन हुआ, जिसमें प्रतिभा और उनके पति मदन ने अभिनय किया। प्रदर्शन के दूसरे दिन प्रतिभा जी को हवाई जहाज से बनारस जाना पड़ा क्योंकि पहली संतान पेट में थी। 12 अक्टूबर सन् 1948 को दशहरे के दिन पहली बेटी मीनू(दिव्या) का जन्म हुआ। 20 अक्टूबर सन् 1949 को दूसरी बेटी जीतू(यामा) का जन्म हुआ। सन् 1949 से सन् 1955 तक नाटक के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया। सन् 1955 में ‘अनामिका’ की स्थापना कर इस संस्था के पहले नाटक ‘पंत-प्रवाहिनी’ का मंचन भी किया। पति के स्वास्थ्य को संभालते हुए उन्होंने नाटकों की जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया।
पश्चिम बंगाल के जादवपुर टी.बी. अस्पताल में मदन जी के नाम से एक बहिर्भाग के लिए भवन का निर्माण करवाया। प्रतिभा जी ने विदेश की बहुत सारी यात्राएँ की। वे लंदन, फ्रैंकफर्ट, रोम और मास्को भी घूमी। इन यात्राओं ने उन्हें बहुत कुछ सीखाया। उनके नाट्य शोध संस्थान के निर्माण की पृष्ठभूमि प्रतिभा जी के पति मदन बाबू के स्वर्गवास के पहले ही शुरु हो जाती है, वे इस बारे में लिखती हैं, “कुछ दिन पहले मैंने मदन जी से कहा था कि मुझे हजार-बारह सौ वर्गफीट जगह और पंद्रह सौ रूपये महीने दीजिए, मैं नाटक के क्षेत्र में कुछ और काम करना चाहती हूँ। मेरे मने में था कि एक ऐसा स्थान बनाया जाय जहाँ थियेटरवाले लोग जुटें, विचारों का आदान-प्रदान करें, जहाँ से उन्हें बहुत तरह की सूचनाएँ प्राप्त हो सकें। मदनजी ने कहा था- तुम क्या करना चाहती हो, मुझे विस्तार से बताओ तब मैं व्यवस्था कर दूँगा। पर उस बारे में कोई ठोस कदम उठाने के पहले वे चले गये।” मदन बाबू के देहांत के बाद प्रतिभा जी ने अपने सहयोगियों की मदद से नाट्य शोध संस्थान की स्थापना 19 जुलाई, सन् 1981 को की।
प्रतिभा अग्रवाल ने बांग्ला सीखकर बांग्ला नाटकों का अनुवाद हिन्दी में किया। इन अनुवादों से हिन्दी नाटकाकारों को लाभ ही हुआ। बादल सरकार के नाटकों का अनुवाद भी प्रतिभा अग्रवाल ने ही किया, जिसके फलस्वरूप बादल सरकार के नाटकों को अखिल भारतीय पहचान मिल पाई। प्रतिभा अग्रवाल की संस्था ‘अनामिका’ ने कोलकाता के हिन्दी रंगमंच में क्रांति लाने का काम किया। लड़कियाँ भी मंच पर बेहिचक काम करने लगी थीं।
इस तरह प्रतिभा अग्रवाल की आत्मकथा केवल उनके और उनके परिवार की कहानी बनकर नहीं रह जाती है, बल्कि यह नाटक और रंगमंच का इतिहास भी बताती है। हिन्दी नाटक और रंगमंच के परिवर्तनों से भी हमें रू-ब-रू कराती है। साथ ही साथ अपने समय में होने वाले राजनीतिक, सामाजिक, और धार्मिक स्थितियों का भी वर्णन करती हैं।
2.1.3. बूँद-बाऊडी - पद्मा सचदेव (सन् 1999)
पद्मा सचदेव का जन्म पुरमन्डल गाँव, जम्मू में सन् 1940 में हुआ। अपने गाँव के बारे में पद्मा सचदेव ने लिखा है, “मेरा गाँव पुरमंडल गुप्त गंगा देविका के किनारे बसा महान तीर्थ स्थल है। जम्मू से पूर्वोत्तर दिशा में 39 किलोमीटर दूर शिवालिक की पहाड़ियों की बीच बसे इस रमणीक गाँव में जाने के लिए अब बस सेवा उपलब्ध है। कालांतर से ऋषि-मुनियों का तपोस्थल व राजा-महाराजाओं का धर्मसिद्ध विश्वास तथा आगंतुकों का रोचक स्थान रहा है मेरा गाँव।”
पद्मा सचदेव के पिता काफी पढ़े-लिखे थे। वे मीरपुर के कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में भी हिस्सा लिया था। अपने पिता के बारे में पद्मा सचदेव लिखती हैं, “ हम गांव जाते थे तो हमारी बड़ी आवभगत होती थी। पिताजी जैसा बुद्धिमान, परोपकारी व इतना पढा-लिखा दूसरा व्यक्ति कोई न था। मुझे याद हा वे मेरी उंगली पकड़कर बाजार ले जाते और वहाँ एक दूकान पर बैठकर लोगों को डोगरी कवि दीनू भाई पंत की लंबी कविता ‘शैहर पैहलो पैहल गे’ सुनाते थे।” पिताजी की मृत्यु विभाजन के समय हुए दंगों में हुई थी। उस समय पद्मा जी की उम्र आठ साल थी, और उनके माँ की उम्र बाईस-तेईस साल थी। पिताजी का सर पर से हाथ उठ जाना, उन्हें जिन्दगी भर दुख देता रहा। जब तक पिताजी थे, पद्मा जी को सुरक्षित महसूस करती थीं। पद्मा जी के पिताजी को हिन्दू-मुस्लमान छात्र चाहते थे।
पिता जी की मौत के बाद पद्मा सचदेव की माँ ने घर की बागडोर सम्भाली और एक स्थानीय स्कूल में अध्यापिका बन गयी। माँ के बारे में पद्मा जी लिखती हैं, “माँ की नौकरी लग जाने से अब हम पूरी तरह आत्मनिर्भर थे। पिताजी का बरस तो अपने घर में ही पूरा हो गया। मेरी माँ गाँव में रहना नहीं चाहती थीं। उन्होंने अपने मामाजी को कहा- मैं हर हाल में अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती हूँ। फिर गाँव में कोई भविष्य नहीं था। माँ के मांमाजी ने जम्मू में ट्रान्सफर करवा दी।”
लोकगीतों से अपने पहले परिचय के बारे में लिखती हैं, “लोकगीतों से पहला परिचय बचनूं ने ही करवाया था। वो आती, बाहर आंगन के थड़े पर बैठ जाती। फिर फरमाइश होती तो वो कान पर हाथ रखकर गाती- चन्न माड़ा चढ़ेया ते बेरिया दे ओल्ले/ बेर पटाओ म्हाडा चन्न मुआं बोले/ मिलना जरूर मेरी जान हो। (मेरा चांद बेर के दरख्त के पीछे उगा है। बेर का दरख्त कटवा दो ताकि मेरा चांद मुंह से बोले।) भले ही वो थोड़ी बुद्धू थी, पर गाती सुर में थी। फिर जाने से पहले ताई उसे थोड़ा अनाज़ या कोई कपड़ा देती थी।” इस तरह वे लोकगीत गाना सीखीं, गाँव के मंदिर में किर्तन के समय भी गीत गाती थीं। लोकगीत से कविता लिखने के सफर के बारे में पद्मा लिखती हैं, “अपने गांव पुरमंडल से जब मैं डोगरी लोकगीतों में छंद जोड़ देती थी, कविता वो भी थी पर पूरा गीत लीख लेना, पूरी कविता कहना, जिससे शुरु से अंत तक किसी की साझेदारी न होती, वो अद्भुत था। जब गांव में किसी लड़की की शादी होती तो नया-नया दूल्हा कई लोगों से छन्द का प्रशिक्षण लेकर आता। हमे छन्द सुनाता तो उसको वही छंद गढ़कर मुँह-तोड़ उत्तर खाली मैं दे पाती थी। लेकिन ये तो अद्भूत चमत्कार था। पूरा गीत मैं खुद लिख लेती थी। एक सम्मोहन था जो खिंचकर अपनी आगोश में ले लेता था। दुनिया के किसी प्रेमी से अधिक आतुर।” रेडियो पर भी डोगरी की कविताओं को प्रस्तुत करने लगी जिसके उन्हें पैसे भी मिलने लगे। इन्ही कविताओं के कारण माँ के मामा से मार भी पड़ी। कवि सम्मलनों में भी जाने लगी, वहीं उनकी मुलाकात डोगरी के प्रसिद्ध कवि दीप जी से हुई, और उन्हीं से मोहब्बत भी। अपने दीप के प्रति आकर्षण के बारे में पद्मा जी लिखती हैं, “दीपजी निहायत सादा व्यक्ति हैं। मैं उनकी ओर खिंचने लगी। वो कभी-कभी मुझे मुहब्बत भरी नज़र से देखते। कई बार कवि सम्मेलनों व गोष्टियों में मिलना होता।...मुझसे तकरीबन बारह बरस बड़े थे। लेकिन उनकी शायरी, उनकी मासूमियत, उनका खलूस जादू की तरह मेरे सिर पर चढ़कर बोलने लगे।...माँ का भी ख्याल था। पर मुहब्बत में और कुछ दिखाई नहीं देता। न जिम्मेदारी,न विवेक, न समय, न काल। तो साहब दुनिया का सबसे हसीन हादसा गुज़र गया। पूरी रूह, पूरे जिस्म, पूरी दुनिया पर हावी हो गया।” दीप साहब दारू पीते थे, उन्होंने विवाह के बाद दारू छोड़ने का वचन दिया था। पर उन्होंने कभी दारू नहीं छोड़ी। न अपने वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारियों को निभा पायें। पद्मा सचदेव को आँतड़ो की टी.बी. हुई थी, तीन साल एक ही अस्पताल में गुजारने पड़े, उस समय पति के साथ की बेहद आवश्यकता थी, लेकिन दीप जी का साथ नहीं मिल पाया।
पद्मा सचदेव ने अपने जीवन के तीन महत्त्वपूर्ण वर्ष अठाराह-उन्नीस-बीस अस्पताल में बिताए। पद्मा सचदेव को आँतड़े की टी.बी. बीमारी ने घेर लिया था। पद्मा सचदेव से मायका-ससुराल की ओर से विशेष मदद नहीं मिली। एक खैराती अस्पताल में रखा गया था। यह एक बहुत ही तकलीफदेह समय था, लेकिन पद्मा जैसी जिंदादिल लड़की ने टी.बी.अस्पताल का माहौल ही बदल दिया था। क्योंकि उनके लिए ससुराल के रास्ते बंद हुए थे, और मायके के बारे में सोचती हैं, “मेरी माँ को मेरे वापस आने की चाह रही होगी पर और कोई जगह न थी जो मेरे बिना खाली पड़ी हो।” लेकिन अस्पताल के माहौल को भी उन्होंने जिया। अस्पताल के माहौल के बारे में लिखती हैं, “ मेरे अस्पताल के वो तीन बरस मैंने जी भरक जिये हैं। अपनी तरह की निश्चिन्तता के वो बेहतरीन बरस थे। खाने के लिए लंगर था. पहनने-ओढ़ने के ले अस्पताल के कपड़े, वहीं की छत, वहीं की सुरक्षा।” पद्मा सचदेव को एक अच्छे ड़ॉक्टर हफीजुलाह के रूप में मिले। एक अच्छे डॉक्टर के साथ-साथ एक अच्छे इन्सान भी थे, इसी कारण अपनी आत्मकथा के पहले पृष्ठ पर डॉक्टर साहब का फोटो लगाया है, उनके बारे में पद्मा जी लिखती हैं, “हस्पताल के सुपरिंटेंडेंट मरहूम डॉ.हफीजुल्लाह साहेब ने अपने बच्चों की तरह मुझ पर भी अपने स्नेह और शफकत का हाथ रखा। उनके न रहने पर पूरे कुटुम्ब ने मुझे घर का एक सदस्य मानकर भरपूर प्यार दिया। डॉ.साहेब को मैं भी अब्बाजी कहती थी। ये यादें उन्हीं की याद को समर्पित हैं।” इस तरह पद्मा की हालात डॉक्टर के प्रयत्नों से सुधर गयीं।
अस्पताल में जब तक थी, तब तक रोजी-रोटी की कोई समस्या नहीं थी। लेकिन अस्पताल के बाहर का जीवन पद्मा के लिए संघर्षपूर्ण रहा। पति कहीं नौकरी नहीं करता था, हमेशा दारू के नशे में धूत रहता था। एक शादीशुदा औरत मायके में कैसे रह सकती थी। पति को तलाक देने के बाद उनका जीवन और भी दुष्कर हुआ। रोजी-रोटी के लिए काव्य सम्मलनों में जाने लगी। जम्मू के रेडियों स्टेशन का अनुबंध नहीं मिला। दिल्ली में शिफारिस पर नौकरी मिल जाती है। कुछ दिन अपने रिश्तेदार के यहाँ रहती हैं, बाद में हॉस्टल में रहने लगती हैं। लेकिन अपनी जिन्दादिली को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा, वे लिखती हैं, “मुझमें एक उत्साह था। जीने की राह हमेशा रोटी से होकर निकलती हैं।”
पद्मा सचदेव का दूसरा विवाह जम्मू में उनके साथ काम करने वाले सुरिन्दर सिंह से हुआ। पद्मा जी के दूसरे पति ने अपने घरवालों से कहा, “पद्मा को उसके अतीत के बारे में कभी कोई सवाल न पूछेगा। कभी कोई ये न कहेगा, वो क्या लाई है क्या नहीं।” इस तरह एक अच्छे जीवन साथी को पाकर पद्मा जी बेहद खुश थी। पद्मा के पति अब इनकम टैक्स आफिसर बन गये थे। उनके फिल्मी दुनिया से संबंध थे। पद्मा सचदेव का फिल्मी दुनिया से संबंध जुड़ गया। लता मंगेशकर और उनके बीच बहुत गहरे संबंध थे। अपने आत्मकथा के बहुत सारे पृष्ठ लता मंगेशकर की तारिफ और लता से कितनी नज़दिकियाँ थीं, को बताने में खर्च कर दिये। लेकिन लता और उनके संबंधों में कुछ दिनों बाद खटास आती है। मुंबई में आकर खुली हवा में जिने का अहसास उन्हें होता है। वे मुंबई के बारे में लिखती हैं, “पहली बार मनुष्य होने का अहसास मुझे बंबई में ही हुआ। पुरुष भी मित्र हो सकता है, उससे बात की जा सकती है, ये भी मैंने बंबई में ही जाना। इस शहर ने मेरे लिए सफलता के द्वार खोले थे। यहाँ मैंने बहुत अच्छे दिन बिताये। सम्मान, स्नेह सभी मिला। बंबई की सबसे बड़ी खासीयत है, यहाँ स्त्री को भी मनुष्य समझा जाता है। रात को बारह बजे भी जरूरी जाना पड़े तो अकेली जा सकती है। किसी मोड़ पर भी कोई ठिठककर खड़ा नहीं होता। न कोई घुरकर देखता है। उत्तर भारत में इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। सड़क पर जाओ तो कई जोड़ी आँखें सर्चलाइट की तरह आपका पीछा करती हैं। ये आँखें जोकों की तरह जिस्म पर चिपक जाती हैं। इससे मुझे कोफ्त होती है और नफरत से भर उठने के साथ-साथ अपमान का बोध भी होता है कि स्त्री ने ऐसा क्या किया है, जिससे ये लोग इस तरह का व्यवहार करते हैं।”
पद्मा सचदेव को ‘मेरी कविता मेरे गीत' काव्य संग्रह पर सन् 1971 का 'साहित्य अकादमी' पुरस्कार मिला। बाद में उन्होंने हिन्दी और डोगरी गद्य पर भी वैसा ही अधिकार जमाया जैसा डोगरी कविता पर था। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से भी नवाज़ा। अपने इस जीवन यात्रा में पद्मा जी को धर्मवीर भारती, इस्मत चुगताई, लता मंगेशकर, पुष्पा भारती, शीला झुनझुनवाला, कमला सिंधवी जैसे प्यारे मित्र मिले।
2.1.4.जो कहा नहीं गया- कुसुम असंल (सन् 1996)
कुसुम अंसल अपनी आत्मकथा के बारे में लिखती हैं, “ मेरी ये जीवनी हमारे परिवार का कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है, ये मात्र मेरे जीवन का सारतत्व हैं।” कुसुम अंसल ने अपनी आत्मकथा को 15 शीर्षकों में विभाजित किया, वे इस प्रकार हैं - 1. घर से घर तक, 2. उलझा मन ताने-बानों में, 3. प्रेम एक इच्छा है, 4. अभिनय का सच, 5. किसने देखा है पुनर्जन्म, 6. वर्तमान के इस पल में, 7. ‘तितलियाँ’ से ‘पंचवटी’ तक, 8. कौन-सा सम्बन्ध, 9.मेरी उपलब्धियाँ, 10. थाड़ा-सा आकाश,11.किराये के हाथ, 12.संवाद, 13. रमण केन्द्र, 14. सुदूर नक्षत्र, 15. भविष्य की ओर। इस आत्मकथा के अंत में एक परिशिष्ट भी जुड़ा हुआ है, जिसका शीर्षक है- अलीगढ़, मेरी जमीन।
कुसुम अंसल का जन्म 1 अगस्त सन् 1940 में हुआ। कुसुम अंसल जब दस महीने की थीं, तब उनके माँ की मृत्यु हुई। उनके पिता ने दूसरी शादी की। कुसुम अंसल की निसंतान बुआ ने उनको गोद लिया। कुसुम अंसल की हवेली का नाम ‘साकेत’ था। यह बहुत बड़ी हवेली थी। जिसमें कुसुम अंसल के माता-पिता, उनके भाई विनोद, प्रमोद, बुआ-फूफा, उनके पापा के मौसेरे भाई, बाबाजी और बुआ के बेटे दीपक रहते थे। घर में कपड़े से लेकर खाने-पीने तक सबकुछ सादा था। सबकुछ बाबाजी के अनुशासन में था। बच्चों की पढ़ाई स्कूल के अलावा घर पर भी होती थी। ‘चरित्रोत्थान’ के लिए बाबाजी बच्चों को पास वाले गुरुकुल में ले जाते थे। इस गुरुकुल में ब्रह्मचारी लोग रहा करते थे। यहाँ पर भौतिक-ऐहिक सुखों को त्यागने की बात की जाती थी। इन सब बातों का हवेली पर लागू किया जाता था। जिसके चलते खाना-पीना और कपड़े-लते एकदम सादे होते थे। साल में एक बार नुमाईश देखने को मिलती थी, जो कुसुम अंसल के जीवन को जीवित रखती थी।
कुसुम अंसल को 10 साल की उम्र में अपने माता-पिता को छोड़कर अपने बुआ और फुफा के साथ आगरा जाना पड़ा। अब बुआ और फुफा ही उनके माँ-बाप थे। वे उनका स्नेह पाकर खुश हो गई थीं, पर भाईयों के प्यार से वंचित रहना पड़ रहा था। उनके ये नये पिता पढ़ने-लिखने वाले थे। अतः उन्होंने कुसुम अंसल को कभी घर का काम करने नहीं दिया। उन्हें पढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। वे खुद-ही कभी-कभी कविता पढ़कर सुनाते थे। इससे कुसुम अंसल की रूचि पढ़ने में बढ़ने लगी थी। वे एक मेधावी छात्र के रूप में उभरकर आने लगी थीं। जब तक वे आगरा में थी, तब तक उनके पास खुला आसमान था। इसी समय उन्होंने बहुत नाटक भी देख डालें।
कुसुम अंसल की आगरा वाली अम्मा ने विवाह के चौबीस साल बाद ‘साधना’ को जन्म दिया। कुसुम अंसल को कुछ ही सालों बाद उनके पिता ने अलीगढ़ बुला लिया। उनका तर्क था, अब उनके यहाँ बेटी हो गई, हमे अपनी बेटी वापस कर दो। इस तरह कुसुम अंसल खुले आसमान से निकलकर साकेत के कठोर अनुशासन में आ गई। उन्हें डॉक्टर बनना था, पर पिता ने बनने नहीं दिया। बी.ए. में दाखिला लिया। अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य पढ़ने लगी थीं। उन्हें कॉलेज और किताबों ने व्यस्त रखा। दोनों भाई इंजिनियरींग की पढ़ाई करने लंदन गये हुए थे। कुसुम अंसल की सौतेली माँ को अपने रूप पर गर्व था। यह उन दोनों के बीच की दूरी का कारण है। मम्मी को वे अच्छी नहीं लगती थी, पापा के पास उनके लिए समय नहीं था। इस कारण वे भीतर-ही-भीतर सीकुड़ती जा रही थीं। वे अपनी इच्छाओं को मार रही थीं। वे इस बारे में लिखती हैं, “ अब आकर अपनी इच्छाओं के उदित होने से मुझे कष्ट होने लगा था; इच्छाओं के आवेग को रोकने के लिए मैंने अपने पढ़ने की मेंज के ऊपर एक नन्हा-सा काला बिन्दु बना लिया था- मन में जब भी कोई इच्छा जागती, मैं भागकर इस बिन्दु के आगे खड़ी हो जाती, प्रयास करती अपने इस आवेग पर काबू पा सकूँ।” इनकी इच्छाएँ भी बहुत बड़ी नहीं होती थीं। ‘कॉलेज ट्रीप पर जाना है’ या ‘यूथ फेस्टीवल में भाग लेना है’ इतनी छोटी इच्छाएँ भी परिवार की गरिमा के चलते पूरी हो नहीं पाती थीं। ‘साकेत’ का वातावरण उनकी इच्छाओं को मार रहा था। बाहरी दुनिया का रहस्यमयी माहौल यहाँ आकर समाप्त हो जाता था। वे संसार के प्रति सज़ग हो जाती हैं। वे दूसरों का अध्ययन करने लगती हैं। वे अपने अस्तित्व के बारे में लिखती हैं, “....मेरा अपनापन इतना छोटा हो गया था, इतना धूमिल-सा हो गया था कि मैं मजबूर होकर अपने ही अस्तित्व से कतराने लगी थी।” इसके परिणाम स्वरूप वे हवन-संध्या, ध्यान-व्रत करने लगीं और स्वामी जी से उपदेश लेने लगीं। कॉलेज जाने के लिए सूती साड़ी और रबड़ की चप्पल पहनती थीं। यह बात लंदन से पढ़कर आये भाईयों को अपने परिवार के आत्मसम्मान के विरूद्ध लगी थी। इस कारण उन्हें नए कपड़े, नयी चप्पलें खरीदकर दी गई थीं। इस घटना ने उनके ‘स्व’ को जगा दिया था। वे लिखती हैं, “....मुझे उस घटना के बाद ऐसा लगा था जैसे किसी ने झकझोर कर मेरे भीतर के ‘स्व’ को उठाकर खड़ा कर दिया है, एक ऐसी सतह पर खड़ा कर दिया है जहाँ खड़े होकर मुझे अपनी पहचान बनानी है.....एक ऐसी पहचान जो मेरे आत्मसम्मान को जगा सके।” कुसुम अंसल को घर पर हर तरह की किताबें पढ़ने को मिलती थीं। उनके घर में उनके पिता और भाई किताब पढ़ते थे और नई किताबों पर चर्चा भी होती थी। इसका लाभ कुसुम अंसल को होता है।
कुसुम अंसल अलीगढ़ विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ रही थीं। इस समय उनके विवाह की तैयारियाँ चल रही थीं। इनके साधारण रूप के चलते इनके माता-पिता को अच्छे वर ढूँढ़ने में कठिनाई होती थी। इन सब के बीच वे अपना लेखन कार्य भी जारी रखती हैं, यही वह काम है, जो अकेलेपन से उन्हें राहत देता है। विश्वविद्यालयीन पढ़ाई उनके लिए मुक्ति का द्वार थी, वे इस विषय में लिखती हैं, “उन दिनों यूनिवर्सिटी की क्लासें, लेक्चर, पढ़ाई ही मेरीं मुक्तता थी अतः मैं उन अमूल्य पलों को बहुत संजीदगी से जी रही थी- ये ही तो पल थे जो मैंने अपने लिए जिये थे- मात्र अपने लिए” कुसुम अंसल के क्लास का एक मेधावी छात्र जिसके इर्द-गिर्द क्लास की अन्य लड़कियाँ मंडराती थी। लड़का एक मध्यवर्गीय घर से था और कुसुम एक अमीर बाप की लड़की थी। दोनों के बीच फासले पहले से तैयार थे। उसके साथ कुसुम जी का प्रेम-संबंध स्थापित हो गया । वार्तालाप बहुत नियमित थे, किताबों का आदान-प्रदान होता था, दोनों के बीच चुप्पी थी। इसी तरह समय बीतता गया। परिक्षाएँ समाप्त हो गईं। प्रैक्टिकल बाकी थे, कुसुम जी को उसके एक मित्र ने चिट्ठी लाकर दी। चिट्ठी को देखकर जो रोमांच उनके मन में आया था, वह उसे पढ़कर गायब हो गया। उनके प्रेमी ने पत्र में पाँच सौ रूपये की माँग की थी। कुसुम जी की प्रतिक्रिया इस तरह थी, “ मैं रोमांचित हो उठी, काँपती रही, क्या होगा उसमें, कोई मशवरा, स्थिति का कोई निदान? आश्चर्य, वैसा कुछ नहीं था, उसमें लिखा था, उसे मुझसे सहायता चाहिए – कि पाँच सौ रूपये की आवश्यकता है। कोरा, भावनाविहीन पत्र मुझे एक परिहास लगा, मेरी कोमल भावनाओं को चकनाचूर करने वाला एक दस्तावेज़।” उन्होंने अपने पॉकेट मनी और भाईदूज में मिले पैसे जोड़कर पाँच सौ रूपये अपने प्रेमी को दिये। इसके साथ ही उनके अन्दर जो विश्वास उन दिनों इस प्रेम के चलते पनपा था, अब वह प्रश्न चिन्ह बनकर उभरा। कुछ सालों बाद कुसुम अंसल का प्रेमी जीवेश ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट’ अहमदाबाद, में मिलता है। कुसुम जी उसे सवाल करती हैं, तो जवाब में जीवेश कहता है, “मैं चाहता था तुम यही समझो, सच को भ्रम समझकर टूट जाने दो, क्योंकि उस समय का सच यही था कि तुम अलीगढ़ के सबसे बड़े परिवार की एकमात्र बेटी थी कि जिसकी परछाई तक छूना मेरे वश की बात नहीं थी, उस समय उम्र ऐसी थी कि कोई दलील काम नहीं आती, अतः सय्यदैन और मैंने वह नाटक खेला था।” जीवेश भावुकता में नहीं बहा, वह जमीनी सच्चाईयों से वाकिफ था। इसलिए उसने स्थिति को बड़ी खूबी से सम्भाला।
जब वे आगरा वाले पापा के पास थीं ,तब उन्होंने मुंबई की यात्रा भी की थी। जैसे ही साकेत में रहने लगी, सारे बंधन अपने-आप लद गये। वे अपने दोनों बड़े भाईयों की तरह मनोविज्ञान की पढ़ाई करने लंदन जाना चाहती थीं। पर घरवालों ने मना कर दिया। वे लिंग भेद का शिकार हो गईं। एम.ए. प्रथम श्रेणी में पास करने पर भी घरवालों ने कोई बधाई नहीं दी, घरवालों के स्वर में कुसुम जी के पढ़ाई के प्रति एक नकारात्मक रवैया था। घरवालों का कहना था, “ वैसे ही कोई लड़का नहीं मिलता, अब इसने एम.ए. पास कर लिया है, वह भी फर्स्ट डिवीजन में।” कुसुम जी से न पढ़ाई में उनकी इच्छा पूछी गई, न उनके शादी के बारे में। दिल्ली के सुशील अंसल के साथ उनका विवाह तय होता है, कुसुम जी अपने भावी पति के बारे में कुछ नहीं जानती, वे लिखती हैं, “अपने भावी पति के विषय में मेरी जानकारी कुछ भी नहीं थी.....सब कुछ था रहस्यमय सा, अनजान सा, ‘अननोन’ और मैं संकोच के परदों के बंद उस अजनबी को अपना बनाकर... ‘द नोन’ जानकर स्वीकारने की स्थितियों में कदम रख रही थी। ” कुसुम अंसल के मायके और ससुराल में सांस्कृतिक अंतर था। जिससे उनका सामना जल्द हो गया। कुसुम के अलीगढ़ की सहेलियों ने जिन बर्तनों में खाना खाया था, सास की नज़र में वे बर्तन म्लेच्छों द्वारा खाना खाने से अशुद्ध हो गये थे। कुसुम जी के पति चाहते थे, ससुराल के अनुसार पत्नी बदले, उसके अनुसार ही अपने आप को ढाले। कुसुम अंसल के कुछ ओर ही सपने थे। उनके पति पर अपनी कम्पनी और भाईयों की जिम्मेदारी थी, जिसके चलते कुसुम जी का मन निराशा से भर जाता था। वे अपने इन उदास दिनों के बारे में लिखती हैं, “मेरे वह सुनहरे दिन मेरे सैन्सिटिव मन में, जिसमें कभी कविता बहा करती थी, गुलाब के फूल महका करते थे, अब काँटों का एक घना जंगल उग आया था, परिणाम स्वरूप मैं गहरे कुएँ जैसे डिप्रेशन में चली जाती थी।” कुसुम अंसल का पूर्ण पुरूष का स्वप्न केवल स्वप्न बनकर रह जाता है। उनके अंतर्रात्मा से आवाज़ आती है, “ मेरी अन्तर्रात्मा में अनुगूँज उठती थी- ‘सब स्वप्न निरर्थक हैं, इस संसार में पूर्ण-पुरुष जन्म नहीं लेते....क्या होता है पूर्ण पुरुष?’ मात्र एक धुंधली आकृति, मनगंढ़त, जिसका कोई आकार नहीं होता। ” यह ड्रिपेशन की स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रही। उन दिनों भारत-पाक युद्ध छीड़ा हुआ था, जिसके चलते सरेआम ‘ब्लैकआउट’ होता था, तभी सुशील जी उन्हें गोरखपुर रहने के लिए बुलाते हैं। यह निमंत्रण उनके निराश जीवन में एक आशा के ताज़े झोंके की भाँति आता है। यह शहर दिल्ली की अपेक्षा काफी छोटा है, पर दिल्ली की घुटन से मुक्ति देता है। कुसुम जी अपने खोये हुए अस्तित्व को पुनः पाती है। यहाँ उन्हें मिसेस सचदेवा के आत्मविश्वासपूर्ण व्यक्तित्व ने अभिभूत किया। इसी कारण उनके जीवन के सुख-दुख विषयक जो धारणाएँ थी, वे बदली। वे इस विषय में लिखती हैं, “मुझे लगता है जीवन सुख कोई स्थिति नहीं है, बस एक फिलिंग है, जो उड़ते हुए रबड़ के गुब्बारे की तरह दूर होता जाता है, इसलिए वह सुख, जब जहाँ, जिससे मिले उसे झपट लो और मुट्ठी में बंद कर लो.... कसकर फिसलने मत दो।” आगरा के पापा जिन्होंने कुसुम जी को अध्ययनशील बनाया और साहित्य में रूचि जगाई, उनकी मृत्यु की खबर सुनकर जर्रा-जर्रा बिखर जाने का आभास हुआ।
गोरखपुर में दो बेटियों का मातृत्व उन्हें मिल चुका था। इसके साथ बेटे प्रणव को जन्म देने के बाद इनकी खुशी का ठिकाना न था। बेटे के जन्म की खुशी को इस तरह व्यक्त करती हैं, “ जब आँख खोली तो लगा, कोई गंधर्व गीत गा रहा है, वह एक पूर्ण हो आने का पल था – विपरीतताओं के मध्य एक सुख का पल था। सुशील ने मेरी आँखों में झाँककर ‘थैंक्स’ कहा था, मुझे लगा था उनके लिए कुछ कर पाने का शायद यही एक प्रयास था जो मैं निभा सकी थी।” पितृसत्ता की महत्ता व बेटी की प्रति पूर्वग्रह की पंरपरागत धारणा ही यहाँ व्यक्त हुई है।
कुसुम जी के पति अपने इमारतें बनाने के व्यवसाय में व्यस्त रहने लगे। लोगों के घर तो वे बनवाते थे, पर अपना घर बनाने की फुरसत उन्हें नहीं थी। इसी दौरान कुसुम जी डिप्रेशन का शिकार होती हैं, वे इससे बाहर निकलने के लिए ‘ईप्टा’ के रंगमंच से जुड़ जाती हैं। इससे जुड़कर उन्हें अपने जीवन की सार्थकता महसुस हुई। वे लिखती हैं, “रंगमंच का यह वातावरण मुझे बहुत अपना लगता था, शायद इसलिए भी कि मुझे लगता मेरा अस्तित्व, मेरी साँसें उतनी बेमानी नहीं हैं जितना मेरी स्थिति मेरे लिए बना रही थी। यहाँ की यह सृष्टि मुझे छूती ही नहीं थी, तल्लीन भी बनाती थी। एकाएक ऐसा लगा था कि जैसे बेकार हाथ से छूटता जीवन, ‘त्रिवेणी सभागार’ की दिवारों के साथ टिककर खड़ा हो गया है और पहली बार उसके पैरों ने धरती को छूआ है-” नाटक के फोटों देखकर सास ने घर में हंगामा खड़ा किया। अपने बेटे को उकसाने का प्रयास भी किया। कुसुम जी अपनी ओर से सफाई देती रही। कुसुम जी के अंदर अपने प्रति आसक्ति, नवअर्जित स्वाधीनता और विद्रोह अचानक उठ खड़ा होता है।
शाहजहाँपुर से आए पत्रकार शायर सलमान के प्रोत्साहन से ‘अतीत के आंचल’ का लेखन कार्य पूरा किया और स्टार पब्लिकेशन ने उसे ‘उदास आँखें’ शीर्षक से छापा। इस उपन्यास पर पाठकों के बहुत सारे पत्र आये। इसी तरह कविता की पुस्तक ‘मौन के दो पल’ देवेन्द्र सत्यार्थी की भूमिका के साथ सलमान की सहायता से छपी। घरवालों को इनके लेखन में कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसी समय उन्हें हिन्दी साहित्य के खेमों और राजनीति का पता चला। हिन्दी के साहित्यकार कुसुम अंसल को एक धनाढ्य महिला मानते थे, इसलिए उनसे आर्थिक लाभ भी पाना चाहते थे।
कुसुम जी ने अपने बच्चों के साथ यूरोप की यात्राओं पर गयीं। अपने पति के साथ बगदाद भी गई। बगदाद में सुशील जी को इमारतें बनाने का काम मिला था। पति के काम के प्रति समर्पण को देखकर अपने आपको पति के सामने छोटा महसूस करने लगती हैं। वे लिखती हैं, “ आज एकाएक मुझे अपने आप अपना वजूद छोटा लगने लगा, सुशील की रचना-प्रक्रिया के मध्य मैं केवल अपने मानसिक सुख-दुख, अकेलेपन और फैंटसी को ही लिए बैठी थी। जबकि सुशील सृजन के रहस्य को पूरी तरह प्रतिबद्ध होकर जी रहे थे।” कुसुम जी का व्यवहार अपने बच्चों के प्रति मित्रवत ही था। वे अपने बच्चों को अपने जीवन अनुभवों के बारे में बताती। अर्चना का विवाह हो गया। अल्पना आर्कीटेक्चर की पढ़ाई में व्यस्त रहती है और प्रणव गोल्फ खेलने में।
कुसुम जी की कृतियों पर सिरीयल और फिल्में भी बनीं। दूरदर्शन के लिए ‘तितलियाँ’ सिरियल नादिरा जहिर के निर्देशन में बनी। लेखिका को अमीर होने के कारण सीरियल निर्माण का खर्चा भी उठाना पड़ा तथा अपने पात्रों और कहानी के साथ की छेड़खानी को भी सहना पड़ा। सीरियल के ‘अतिरिक्त संवाद कुसुम अंसल’ लिखने का श्रेय कुसुम अंसल को दिया जाता है। यही बात बासु भट्टाचार्य ‘एक और पंचवटी’ उपन्यास पर फिल्म बनाते समय दोहराते हैं। कुसुम अंसल फिल्म बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती है, पर फलस्वरूप उन्हें फिल्म में सहयोगी संवाद लेखिका बताया जाता है। ‘पंचवटी’ फिल्म का सारा श्रेय बासु भट्टाचार्य को जाता है। इस तरह दो बार कुसुम असंल को सब्जबाग दिखाकर उनका आर्थिक शोषण किया गया। लेकिन उनके पति ने इन सब खर्चें का न जवाब माँगा न कहीं ज़िक्र किया। उनके उपन्यास ‘एक और पंचवटी’ का पंजाबी में अनुवाद हुआ और पाठकों के पत्रों ने उन्हें अपनी मातृभाषा पंजाबी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। दोनों बेटियों की शादी के बाद की रिक्तता को पूर्ण करने के लिए उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की। अपने नाते-रिश्तोदारों के समय-समय पर किए विश्वासघातों के कारण कुसुम अंसल भाग्यवादी बन जाती है। अध्यात्म और ज्योतिष में समाधान ढूंढ़ने लगती हैं। अंत में अपनी बीती जिन्दगी का सार बता देती हैं, “मेरे आसपास सभी कुछ बदल रहा है, परिवर्तनशीलता है सब, बस मेरा अपनापन उतना ही तटस्थ खड़ा है जितना कभी साकेत की दीवारों के भीतर था। मेरी जीवन-यात्रा में अनेक पड़ाव आये, अवसर, सुअवसर, सभी की निरन्तरता से गुज़रते मैं प्रयासरत रही कि अपनेपन को, माँ के अस्तित्व की तरह non-being होने से बचा लूँ। शारद इसीलिए मैं किसी महारानी, बेगमात, या सफल इन्डस्ट्रिलिस्टों की बीवियों की कतार में शामिल नहीं हुई। ‘मिसेज अंसल’ हो जाना मेरी नियती थी और कुछ नहीं, परन्तु अपने जीवन में मैं वह भी कितना बनी? ‘मात्र बेचारी हिन्दी की लेखिका’ बस और कुछ नहीं” लेखिका अपने माँ की तरह बिना अस्तित्व के नहीं रहना चाहती हैं, वे अपनी अलग पहचान चाहती हैं। कुसुम जी का जीवन बचपन में एक सीमित दायरे में था। शादी के बाद कुछ करना चाहा, सास को इनका लिखना-नाटक करना पसंद नहीं आया। पति अपने व्यवसाय और जिम्मेदारीयों को निभाने में व्यस्त थे। इस कारण उन्होंने अपने अवसाद को कम करने के लिए रंगमंच और लेखन का रास्ता चुना। कुसुम जी साहित्य की राजनीति से अनभिज्ञ थीं, इस कारण उनके रचनाओं की ओर आलोचकों ने ध्यान नहीं दिया। धनाढ्य होने का लाभ साहित्यकारों के साथ-साथ सीरियल और फिल्म वालों ने भी लिया। इसी कारण जीवन में मिली उदासीनता को वे अंत में स्वीकार करते हुए लिखती हैं, “तो मुझे विचार करना होगा, मेरी जीवन-यात्रा की ये टुकड़े-टुकड़े मिली उदासीनता ही मेरा सत्य की ओर जाने का मार्ग है या कुछ और?” इस आत्मकथा के अंत में ‘अलीगढ़, मेरी जमीन’ शीर्षक से दो पृष्ठों का एक परिशिष्ट जुड़ा हुआ है। यह अलीगढ़ का ऐतिहासिक परिचय है।
2.1.5 लगता नहीं है दिल मेरा – कृष्णा अग्निहोत्री (सन् 1996)
कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा के दो भाग है। पहला भाग ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ सन् 1996 में इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। आत्मकथा का दूसरा भाग ‘और....और...औरत’ सामयिक बुक्स, दिल्ली से 2010 में प्रकाशित हुआ। कृष्णा अग्निहोत्री का जन्म 8 अक्तूबर, सन् 1934 को नसीराबाद(राजस्थान) में हुआ। इनके माताजी का नाम हीरामणी और पिताजी का नाम रामचंद्र तिवारी है।
यह एक जीवन भर संघर्ष करने वाली स्त्री की आत्मकथा है। इनका संघर्ष जीवन और लेखन के स्तर पर भी था। बचपन में इनको पिता का प्यार मिला पर माँ का प्यार उतना नहीं मिल पाया। कृष्णा जी माँ के साथ अपने संबंधों के बारे में लिखती हैं, “.... यही सिलसिला ताउम्र आज तक है। माँ दुख देती है, साथ छोड़ देती है और दुखी होने पर उलटे रोष तो प्रगट करती है पर मुझे नहीं मनाती। माँ मुझे प्यार नहीं करती पर मैं अम्मा को हृदय से प्यार करती हूँ।... जीवन पर्यन्त माँ के स्नेह व प्रेम के लिए मैं तरसती आई हूँ...वे यदि पल भर को भी मुझे प्यार देती हैं तो मैं गद्गद् हो जाती हूँ।” इतना होने पर भी कृष्णा जी अपने माँ से अन्त तक प्यार करती रही और उनकी माँ अपने बेटे का पक्ष लेती रही। पिता का स्वभाव कृष्णा जी के माँ के विपरीत था। कृष्णा जी के पिता कृष्णा जी को बहुत चाहते थे। पिता के बारे में लिखती हैं, “.....व्यस्तता के भार से झुके रहने पर भी उन्होंने मेरे चौथी पास होने पर पूरी पाठशाला में मोतीचूर के लड्डू बाँटे थे। कितना हौंसला व प्यार था अपनी जेठी बेटी के लिए, कि मात्र चौथी पास करने पर उन्होंने इतनी प्रसन्नता व्यक्त की।”
कृष्णा जी ने उन प्रसंगों का भी उल्लेख किया है, जिसमें बड़ों द्वारा छोटी लड़कियों का यौन शोषण किया जाता था। पहला प्रसंग अवतार सिंह के बारे में है। सतरह-अठाराह साल का अवतार सिंह कृष्णा जी का पड़ोसी था, जिसने एक बार कृष्णाजी को गोदी में बिठाकर चुमा था। इस प्रसंग पर कृष्णा जी लिखती हैं,“आज सोचती हूँ कि लड़की का कोमल भोला बचपन भी क्या पुरुष से सहन नहीं होता, वह उसे भी अपने गन्दे सुख हेतु चीर देने को आतुर रहता है।” दूसरा प्रसंग लालकुंवर का है , जो पुलसिया नौकरी भी करता, और भैंस व दूध का बंदोबस्त करता है। बच्चों को कहानियाँ सुनाता है। जिससे बच्चें उसके साथ घुल-मिल जाते थे। लेकिन लालकुंवर की नियत ठीक नहीं थी। कृष्णा जी की लिखती हैं, “....वह दूध पिला कर हमें सुला देता और हमारे हाथों में अपने गुप्तांग को पकड़ा देता। एक बार अर्द्ध निद्रा में मैंने उसे झटका था, बात बहुत शोचनीय थी, जब उसने शकुन्तला को दूसरे कमरे में ले जाकर और कुछ करना चाहा....वह चिल्लाई...मैंने लालकुंवर को उस पर झुका देखा तो लालकुंवर के बाल पकड़ कर खींचना शुरु कर दिये और चिल्लाई। तब भी हममें यह सब माँ या पिता को बताने का साहस नहीं था.. कुछ दिन हम लालकुंवर से नाराज रहे.. बस पुनः भूल गये सब, वह भी सावधान हो गया और हमें बेहुदगी नहीं देखनी पड़ी।” तीसरा प्रसंग रिस्ते के चाचा ‘भ.’ के बारे में हे जो कृष्णा जी के साथ जबरदस्ती करना चाहता था। कुछ हद तक करता भी है। इन घटनाओं ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। वे लिखती है, “इस सबको यदि मैं खुलकर स्पष्ट माँ-पिता या मामी से बतला देती तो मेरे साथ भविष्य में मानसिक बलात्कार तो न होता परन्तु शायद ऐसे समय मैं आत्मपीड़न ही में छुप जाती रही हूँ। मैंने किसी से कुछ नहीं कहा परन्तु भ.मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गये। सीढ़ियों से उतरते समय वे बहुधा मेरे फड़फड़ाते जिस्म को दो क्षण को भी दबोच लेते।” इन घटनाओं के परिणामस्वरूप कृष्णा जी अपने नातीन के बारे में ज्यादा चिंतित दिखाई देती हैं।
शिव जो कृष्णा जी से प्यार करता था और कृष्णा जी को शिव अच्छा लगता था। कृष्णा और शिव के पिता की तरफ से भी कोई समस्या नहीं थी। लेकिन कृष्णा जी की माँ और बुआ ने शिव कान्यकुब्ज ब्राह्मण न होने कारण मना कर दिया। कृष्णा जी की शादी कानपुर के मास्टर श्यामलाल के बड़े बेटे सत्यदेव अग्नहोत्री के साथ सन् 1949 में बड़े धुमधाम से हुई। सत्यदेव अग्नहोत्री बनारस में डिप्टी कलेक्टर थे। शादी के बाद कृष्णा जी के शोषण और अपमान का सिलसिला शुरू हुआ, जो उनके जीवन भर चलता रहा। पति ने पहले दिन से ही शोषण आरंभ कर दिया था। रेलवे में ही कृष्णा जी से बिना बातचीत किए सबकुछ कर डाला। कृष्णा जी लिखती हैं, “इन्होंने न कोई प्रश्न किया न पूछा बस बोले तो यही, “...कुछ मोटी लग रही हो।”.....मैंने हैरत से अपनी आँख ऊँची की। मेरी उम्र उस समय यही थी कि मेरी प्रशंसा ही होगी....लेकिन कुछ पलों में ही मुझे लगा कि सामने वाला व्यक्ति अपने गुणों, पद, विद्वता एवं रूप के विषय में अत्याधिक जागरुक है। मैं बातूनी हूँ परन्तु बात का अवसर नहीं मिला। उन्होंने बिना वार्तालाप, जान-पहचान या स्नेह के मेरे साथ वह सब कर डाला जो अच्छा तो नहीं ही लगा था। उसे सैक्स विकृति ही कहेंगे। ” इस तरह की सैक्स विकृति और मारपीट का सिलसिला जबतक पति-पत्नी साथ थे तब तक चलता रहा। अलग होने के बाद भी कृष्णा जी के पति ने इस तरह का एक-दो बार बलात्कार किया। मारपीट के बाद बलात्कार रोज़ ही होने लगा। कृष्णा जी पति के साथ के शारीरिक संबंधों को बलात्कार ही कहती हैं। वे लिखती हैं, “और हो गई धुनाई। रूई सी धुनाई, इसके बाद बलात्कार की पुनरावृत्ति। अब तो कुछ-कुछ यही समझ आ रहा था कि इसी सब में जीना है।” कृष्णा जी ने अपने भावी पति के बारे में जो सपने संजोए थे, वे चकनाचूर हो गये। एक पति के बारे में स्त्री के क्या सपने होते हैं, इस विषय में उन्होंने लिखा हैं, “एक पति की कल्पना स्त्री के लिए किसी आशियाने में बैठे प्यार से भीगे जीवनसाथी की ही होती है जिसकी प्रत्येक नस व अंग से जीवन अमृत धारा बहती हो जो हल्की-सी ठोकर लगते ही सहलाता, थामता....सिहरता... संभालता साथ चलता हो।” लेकिन ऐसा कुछ भी कृष्णा जी के साथ घटित नहीं हुआ है। न पहले पति ने ऐसा व्यवहार किया न दूसरे। बाहर के लोग तो कृष्णा जी को एक सुंदर शरीर से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे। राजेन्द्र अवस्थी भी कृष्णा जी को तलाक लेने के लिए कहते हैं, जिससे वे मिल-जुल सकते हैं। कृष्णा जी को यह सब रखैल बनाने जैसे लगता है। जवाब मैं वे कहती हैं, “मैं रखैल बनकर कभी नहीं रह सकती और आवेश के क्षणों में सुख के लिए मेरी भावना से कोई भी खिलवाड़ करे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।” कृष्णा जी हमेशा एक स्थिर और अपनेपन से भरे संबंध की राह देखते सारी जिन्दगी गुजार देती हैं। कृष्णा जी के पति के अनेक स्त्रियों के साथ संबंध थे। इसके कारण अनेक बार बड़े आफिसरों से कृष्णा जी के पति को डाँट भी मिली। कृष्णा जी यह बात अपने सांस को बतायी तो सांस अपने बेटे के करतुतों का समर्थन ही करने लगी। इन सब से बच निकलने का कहीं पर भी रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था।
इस बीच कृष्णा जी ने अपना पढ़ना-लिखना जारी रखा। बनारस से हिन्दी साहित्य में अपनी बहन चन्द्रा की सहायता से बी.ए. और एम.ए किया। उनके पति कृष्णा जी के पढ़ाई के खिलाफ थे। लेकिन कृष्णा जी ने मार खाकर भी पढ़ाई को पूरा किया। जो आगे चलकर उनके जीवन जीने का आधार बना। इनके पति के अत्यधिक शराबी, वुमनाइजिंग हैबिट्स के कारण सरकार ने सस्पेंड का नोटिस भेजा था। इस तरह की नोटिस इनके पति के नाम से आयी और हर बार कृष्णाजी ने मुख्यमंत्री, मंत्री और बड़े साहबों के सामने अच्छे बर्ताव का निवेदन देकर नौकरी को बचाया था। पति के इस तरह के बर्ताव के कारण तबादला कभी कानपुर, तो कभी इलाहाबाद, तो कभी बनारस होता था। कृष्णाजी को अंग्रेजी न आने के कारण और ठीक तरह के लुक के न होने के कारण इनके पति इन्हें क्लब नहीं ले जाते थे। लेकिन अपने सीनियर अफसरों के कहने से कृष्णा जी को लेकर सत्यदेव क्लब जाने लगे। पर वहाँ उनका कभी मन नहीं लगा। इलाहाबाद में इन्हें साहित्यिक माहौल मिला और पंत जी से मुलाकात भी हुई।
गर्भवती होने पर काम करने और ठीक तरह से आराम न करने के कारण के सातवें माह में कृष्णा जी को बेटा पैदा हुआ। लेकिन उत्तर प्रदेश की सर्दी और ठीक तरह से देखभाल न करने कारण नवजात बालक को नीमोनिया हुआ और उसी में वह चल बसा। गर्ववती स्त्री के साथ ठीक बर्ताव किया जाता तो सात महिने में बच्चा पैदा नहीं होता और मरता भी नहीं। इस घटना से सबक लेकर अगली बार कृष्णा जी के पिता उन्हें खण्डवा ले गये, जहाँ उनकी अच्छी तरह से देखभाल हुई। बच्ची पैदा होते ही बीमार रहने लगी। लेकिन कृष्णा जी के पिता की ठीक देखभाल के कारण बच्ची बच गई।
सत्यदेव अग्रिहोत्री की नौकरी अपनी आदतों के कारण जाती है। कृष्णा जी भी रोज़ की मारपीट व प्रताड़ना से तंग आकर मायके चली जाती है। मायके उसका स्वागत वैसा नहीं होता है, जैसा उन्होंने सोचा था। पिता के शब्द बाणों से आहत होती है। पिता से एक सिनेमा टाकीज नाम करने के लिए कहती हैं। पर उनकी माँ अपने बेटे के जायदाद में किसी को हिस्सा देना नहीं चाहती है। पति और पिता से आहत कृष्णा जी कहानी लेखिका बनने की सोचती है, तो हिन्दी के सम्पादक उसे प्यार का सब्जबाग दिखाने लगते हैं। इसमें राजेन्द्र अवस्थी, हिंमाशु जोशी आदि हैं। राजेन्द्र अवस्थी और कृष्णाजी को लेकर हिन्दी साहित्य जगत में काफी अफवाहें भी फैलीं।
आई.पी.एस पति की यातनाओं की आग में झुलस कर मायके भागी कृष्णा अग्निहोत्री मजिस्ट्रेट श्रीकांत जोग के मोहजाल में फँस गईं। कृष्णा के पिता के दोस्त ने उन्हें सावधान करते हुए कहा कि जोग का चरित्र निम्न कोटी का है और अपने व्यवहार से उन्होंने अपनी पत्नी को पागल करार दिया है। पागलखाने के डाक्टर ने भी जोग से दूर रहने की सलाह दी। लेकिन वे जोग के जाल में फँसती चली गई। दाम्पत्य सुख की कल्पना और पति नामक पुरूष की छत्रछाया में रहकर सुरक्षित जीवन की चाह ने उनके विवेक को कुंठित कर दिया था। अपनी इस मनोदशा को वे आँखों पर परदा पड़ जाने के समान मानती हैं –“ मुझे जोग साहब का सौन्दर्य, मजिस्ट्रेट की पोस्ट की डिगनिटी तो दिख रही थी परन्तु उनके घर की गरीबी व चार बच्चों को मैं नज़र अन्दाज क्यों कर रही थी। जिस व्यक्ति के चार बच्चे हों....आर्थिक स्थिति अति साधारण हो वहाँ कोई भी औरत कितना समझौता कर सकती है। मैं जब अग्नि के परिवार में सब भुगत चुकी थी तब भी मेरी आँखें कैसे इस कटु यथार्थ से मुंद गई पता नहीं।”
शादी हो गई। अग्निहोत्री ने तलाक पेपर पर हस्ताक्षर भी किये। जोग ने इच्छित स्त्री का शरीर पाने के बाद अपना असली रूप दिखाया। जोग अपनी पत्नी को भी साथ रखना चाहता था, और कृष्णा जी को पत्नी का भी दर्जा नहीं देना चाहता है। इसलिए कृष्णा जी ने आर्थिक निर्भरता पाने के लिए प्रयत्न शुरु किये। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री मंडलोई के सहयोग से गृहविज्ञान कला महाविद्यालय, खंडवा में हिन्दी व्याख्याता की नौकरी मिली। लेकिन कुछ ही समय बाद नये मुख्यमंत्री डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया।
इसके बाद उनके कई जगह तबादले होते रहें। उन्हें गर्ल्स डिग्री कालेज, खंडवा में हिन्दी व्याख्याता के रूप में नौकरी मिली। दूसरे कॉलेजों में पुरूषों द्वारा अपमान सहना पड़ा, पर इस कॉलेज में स्त्रियों द्वारा भी अपमान सहना पड़ा।
सगे भाई हरी ने सहायता करने के बदले उन्हें गालियाँ देकर बारिश में घर से निकाल दिया। माँ खामोश रही। इस अन्याय का जरा भी विरोध नहीं किया। नारी-प्रताड़ना का हृदय कँपा देने वाला उदाहरण है –“ एक लड़की से उसका मायका छीन लिया गया। उसे बेघर कर किसी अदृश्य-अनजानी राह पर निश्चिंत होकर धकेल दिया।” उन्हें अपनी बेटी और दामाद से वह सहायता या अपनापन नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। संपादन और प्रकाशन की दुनिया के कटु अनुभवों को उन्होंने व्यक्त किया है। साहित्य की दुनिया की गुटबाजी के बारे में लिखा। नामवर जी के स्त्री साहित्य संबंधी विचारों की भी आलोचना हुई।
इनकी आत्मकथा का दूसरा भाग ‘और...और..औरत’ 2010 में छपा।
2.1.6 और...और...औरत – कृष्णा अग्निहोत्री (सन् 2010)
कृष्णाजी अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग के बारे में लिखती है, “मुझे हर्ष है कि आत्मकथा की व्यथाओं को कई परंपरावादी व्यक्तियों ने भी सराहा। आत्मकथा में केवल रहस्य या अश्लील प्रेमकथाएँ लिखना नहीं चाहा, वहाँ मेरी रोज़ की लड़ाई है, जीवन में रोमांस ही तो सब कुछ नहीं। अर्थ, संयम, दैनदिन की अनिवार्य आवश्यकताओं का भी संघर्ष है।” दूसरी घोषणा अपने चरित्र के बारे में करती हैं, “कोई भी पुरुष मुझसे सौदा करके, मुझे नहीं पा सका। इसका मुझे नाज़ तो है लेकिन उच्छृंखलता या व्यभिचार मेरी दृष्टि में गलत होते हैं, प्यार अलग अनुभूति है।”
जन्म वर्ष सन् 1934 के हिसाब जी की वर्तमान आयु 76 वर्ष की है। जोग से धोखा खाने के बाद भी प्यार करने की आदत उन्होंने नहीं छोड़ी । पत्रकार प्रताप से ‘प्लेटोनिक’ प्यार कर फिर धोखा खाया। प्रताप ने एक-दो बार उनकी सुंदरता की तारीफ कर दी और कृष्णाजी को लगा ‘अनेक रंगीन गुलाब मेरे भीतर खिल रहे हैं।’ वह प्यार जल्द ही खत्म हुआ। प्रताप विदुर थे , उन्होंने दूसरा विवाह किया। कृष्णा जी का प्रताप के प्रति एकतरफा लगाव बरकरार रहा।
वे इस आत्मकथा के इस भाग में नारी की सेक्स भावना को स्वाभाविक ठहराती हैं, “ कई लोग स्त्री की सेक्स चाहत को अनैतिक कहते हैं परंतु प्रकृति प्रदत्त भावनाओं के प्रभाव को मनुष्य कैसे नकार सकता है जबकि जानवर तक उससे परे नहीं हो पाते” कृष्णा जी अपने आंतरिक सत्य को सार्वजनिक करने में जरा भी संकोच नहीं करती हैं- “ परंतु इस नंगे सत्य से इन्कार नहीं कर सकती कि भीतर बैठी औरत को सदा एक ऐसे पुरुष की प्रतीक्षा रही, जो उसे प्रेमी-सा सहलाए और उसे आलिंगनबद्ध कर इतना व्याकुल कर दे कि मेरी औरत समर्पण के लिए बाध्य हो जाए।” कृष्णा जी बुढापे में चाहती है कि उनके सौन्दर्य की कोई तारीफ करें। गोवा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रोहिताश्व चतुर्वेदी के प्रेम प्रस्ताव का ज़िक्र आत्मकथा में किया है। इसके साथ कृष्ण राघव खंडवा आकर कृष्णा जी के उपन्यास ‘टपरेवाले’ पर फिल्म बनाना चाहता है। वह खंडवा आता है। वहाँ पर फिल्म की चर्चा के साथ-साथ और भी चर्चाए होती है। अंत में राघव चार लाख की बैंक गैरन्टी माँग फिल्म की हवा निकाल देता है। इस प्रकरण से भी कृष्णा जी बहुत जग हँसाई हुई। पाठकों के पत्रों और प्रेम ने भी इन्हें परेशान किया था। पाठक अपने पसंदीदा लेखक से करीबी संबंध बनाना चाहते है।
उम्र बढ़ती है, रिश्ते-नाते एक-एक कर बिखरने लगते हैं तो प्राणों के अंतिम पाहुन’ (मृत्यु) की पदचाप भी सुनाई देने लगती है। इस एहसास को उन्होंने एक दो बार आत्मकथा के दूसरे भाग में अभिव्यक्त किया है –“कुछ अंधेरे अकेलेपन में मृत्यु की आँखे घूरती हैं। जानती हूँ कि कभी भी वो अपने लंबे हाथों से मुझे दबोच लेगी और मेरा अस्तित्व विलीन हो जाएगा। बस कुछ लोगों के चेहरे व उसकी साँसों में वह रह जाएगा।”
बेटी नीहार का घर उनके घरके सामने ही है, इसलिए जरूरत पड़ने पर वह मदद करने जाती है। कृष्णा जी नीहार की बेटी वैदेही से बहुत अधिक स्नेह रखती है। वह बहुत जहीन व संघर्षशील है। वह मुंबई में पूर्णतः आत्मनिर्भर जिन्दगी जी रही है। वह अपनी नानी को अपने साथ रखना चाहती है, लेकिन कृष्णाजी अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से लाचार हैं – “मेरे पैर ठीक नहीं। हार्ट में मशीन लगी है। दो बार लकवे का अटैक आ चुका है।”
कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा पुरुष अहं और स्वार्थ से पीड़ीत नारी की काँटो भरी जिन्दगी की दास्तान है। इसमें ऐसी नारी का व्यक्तित्व उभरता है जो हर प्रकाशवान वस्तु को सितारा समझ लेती है और पास जाते ही नग्न यथार्थ आ जाता है।
धोखा खाकर फिर धोखा खाती है। अपने शून्य को भरने के प्रयास में उसे और अधिक असीम कर लेती है।
2.1.7 कस्तूरी कुण्डल बसै – मैत्रेयी पुष्पा ( सन् 2002)
मैत्रेयी पुष्पा ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को आत्मकथा या आत्मकथात्मक उपन्यास कहे, इस द्वंद्वं में पड़ी हुई दिखाई देती हैं।मैत्रेयी के अनुसार, “इसे उपन्यास कहूँ या आपबीती...?” इससे स्पष्ट होता है कि यह कृति पूर्ण रूप से आत्मकथा नहीं है। क्योंकि यह मैत्रेयी और उनकी माँ की कहानी है। इस आत्मकथा में कुछ प्रसंग मैत्रेयी के जन्म से पूर्व के हैं। मैत्रेयी के शब्दों में कहे तो, “यह है हमारी कहानी। मेरी और मेरी माँ की कहानी। आपसी प्रेम, घृणा लगाव, और दुराव की अनुभूतियों से रची कथा में बहुत सी बातें ऐसी हैं, जो मेरे जन्म के पहले ही घटित हो चुकी थीं, मगर उन बातों को टुकड़ों-टुकड़ों में माताजी ने जब-तब बता डाला, जब-तब उन्हें अपनी बेटी को स्त्री-जीवन के बारे में नए सिरे से समझाना पड़ा। अपनी बाल्यावस्था की बहुत सी घटनाएँ याद रहीं, बहुत सी विस्मृत हो गईं और बहुत सी ऐसी थीं, जिनका छोर तो अपने पास था, मगर वे किसी दिशा की ओर नहीं ले जाती थीं।” मैत्रेयी ने स्वंय स्वीकारा है कि जहाँ-जहाँ कथा के सूत्र नहीं जुड़ पा रहे थे, वहाँ-वहाँ कल्पना का सहारा लिया गया, इस कारण भी इसे आत्मकथात्मक उपन्यास कहा गया है। रोहिणी अग्रवाल इसे औपन्यासिक आत्मकथा कहती हैं, आत्मकथा में एक सीमित दायरे में रहकर लेखन करना पड़ता है, आत्मकथाकार को क्षितिज तो दिखाई देते हैं , पर उस पार जाने की अनुमति नहीं होती है। वह अपनी ससीम सीमाओं से घिरा हुआ होता है। रोहिणी अग्रवाल ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को औपन्यासिक आत्मकथा बनाने का कारण बताते हुए लिखती हैं,“क्या यही वज़ह नहीं कि‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ आत्मकथा नहीं, औपन्यासिक आत्मकथा है – ससीम को असीम में, खंगालने-पछीटने को संवारने में, अनुभव को स्वप्न में ढालने की सर्जनात्मक इच्छा से सराबोर जहाँ ‘मैं’ मनुष्य और मनुष्यता बन कर अजर-अमर हो उठता है। यही वह संधिस्थल है जो आत्मकथावाचक को भोक्ता की अपेक्षा रचयिता का दर्जा और दृष्टि देकर एक साथ, समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक बना डालता है। शायद यही वज़ह है कि ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ मैत्रेयी भोक्ता के पगुराए आनंद में डुबकिया लगाने की अपेक्षा सन्नद्ध एवं सचेतन ‘योद्धा ’ के रूप में दिखाई पड़ती हैं- कहीं ताडंव की ताल पर खुल्लमखुल्ला विद्रोह, कहीं विश्रांति के मंद स्वरों में बह कर जीवन की पतवार किन्हीं सबल हाथों में सौंप देने की इच्छा।” बात तो स्पष्ट हो चुकी है कि औपन्यासिक आत्मकथा लेखक को लेखन में आत्मकथा की अपेक्षा ज्यादा छूट देती है।
‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को आत्मकथा मानने के मधुरेश के अपने तर्क है। उनके अनुसार मैत्रेयी पुष्पा ने ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को औपन्यासिक आत्मकथा मानने का कारण भविष्य में इसके किसी पात्र या घटना को लेकर उपन्यास लिखें और अपने बचाव का तर्क भी दे सकें। उपन्यास में यह संभावना होती है। लेकिन घोषित रूप में लिखा गया, आत्मवृत्त इसकी छूट नहीं देता है। वे मैत्रेयी पुष्पा के उन तर्कों का भी जवाब देते हैं, जिसके चलते ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को आत्मकथा नहीं कहती है। क्योंकि मैत्रेयी ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ में बहुत सी जगहों को कल्पना के द्वारा भरती हैं। इस बारे में लिखती हैं कि, “सारे होमवर्क के बावजूद किसी जीवनी या संस्मरण में जो भी लिखा जाता है, वह एकदम वही नहीं होता जो संबद्ध व्यक्ति या फिर स्वंय लेखक के साथ घटित हुआ है। जब आप अपने से अलग और बाहर अन्य व्यक्तियों को उनके ब्यौरों और संवादों के साथ अपनी रचना में उतारते हैं वहीं से अनुमान, कल्पना और किंवदंती की सीमायें शुरू हो जाती हैं। यानी वहां आप बहुत-कुछ एक घुसपैठिए होते हैं। जीवनी में भी बहुत से प्रसंगों, घटनाओं और व्यक्तियों की व्याख्या अनुमान और कल्पना पर आधारित होती है। उसमें आये संवाद तो प्रायः हमेशा ही कल्पित होते हैं। इसीलिए बड़े फलक वाले जीवनी के लिए फिक्शनल बायोग्राफी कहे जाने का चलन शुरू हुआ उसमें लेखक का बचाव तो है ही, शायद इस तथ्य को रेखांकित करने की विनम्रता भी शामिल हैं कि यहाँ जो कुछ जिस रूप में है उससे भिन्न उसके किसी आत्म रूप की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है। लेकिन फिर भी उसे संबद्ध लेखक की प्रामाणिक जीवनी या संस्करण की तरह ही पढ़ा जाता है और जरूरत पड़ने पर इसे साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल भी किया जाता है। इसत तरह ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ही है। उनके जीवन के संदर्भ में उसके प्रकट अधूरेपन के कारण उसे आत्मवृत्त भी कह सकते हैं।....कोई कारण नहीं है कि ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को उपन्यास माना जाये, यह मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ही है। जिन रचनात्मक प्रविधियों और उपकरणों के कारण वे इसे ऐसा कहने में संकोच बरतती हैं। वे तो वस्तुतः जीवन को सीधे आधार बनाकर लिखी गयी हर रचना में होती हैं। इसी तरह वे यहाँ भी हैं।” मधुरेश के जिन तर्कों के आधार पर ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ को आत्मकथा बताते हैं, उसमें एक खतरा यह भी है, इसमें कितना यथार्थ और कितनी कल्पना है , कह पाना मुश्किल हो जाता है।
‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ यह केवल मैत्रेयी की आत्मकथा न होकर उसकी माँ कस्तूरी की जीवनी भी है। इस औपन्यासिक आत्मकथा की नायिका कस्तूरी ही है। कस्तूरी के चरित्र-चित्रण के विषय में रोहिणी अग्रवाल लिखती हैं, “...मैत्रेयी की माँ – जो निस्संदेह पहले पन्ने से ही शक्ति और विद्रोह के प्रतीक रूप से गढ़ी हुई है। (उपन्यास के दबाव?) लेकिन जिसे अकारण महिमांडित करते चले जाना भी लेखिका का ध्येय नहीं। चूंकि माँ भी मूलतः स्त्री होती है, अतः स्त्री के रूप में उसकी इच्छाओं, कुण्ठाओं, कमजोरियों, अंतर्विरोधों का ब्यौरेवार चित्रण भी करना भी वे नहीं भूलती (आत्मकथा का खरापन) जो भावी समाज में देवी (स्त्री) को मनुष्य रूप में प्रस्तुत कर संवाद एवं सम्बंध की संभावनाओं को आधार प्रदान करती है।” निस्संदेह मैत्रेयी ने अपनी माँ का जो चित्र उभारा है, वह एक संघर्षशील स्त्री का, जो पुरुषसत्तात्मक मानसिकता को ठेंगा दिखाती हुई, और अपने गंतव्य तक पहुँचते हुई दिखाई देती है। पर मैत्रेयी ने अपनी माँ को अपनी सारी मानवीय कमजोरियों के साथ चित्रित किया है। उसे देवी बनाने का प्रयत्न नहीं किया। कस्तूरी दो भाईयों के बीच की बहन है। उसके पिता लगान के डर से घर छोड़कर भाग चुके हैं। कस्तूरी के बचपन में किसान अंग्रेजी राज की लगान प्रथा से बहुत त्रस्त थे। जिसके चलते कईयों को अपने घर की बेटी और बर्तन का भी सौदा करना पड़ा। कस्तूरी के पिता की तरह कई लोग तो घर छोड़कर हमेशा के लिए भाग गए। कस्तूरी की भी शादी आठ सौ रूपये लेकर की जाती है। कस्तूरी अपने स्वभाव से विद्रोही थी। जिसका परिचय ससुराल वालों को कुछ ही दिनों में मिलता है। ससुराल में मुँह दिखाई की रस्म के समय कस्तूरी अपना घूँघट किसी को उठाने नहीं देती है। उसके ससुराल की औरतें जो उसका स्वागत करने आई थीं, उसमें से एक बूढ़ी ने फटकारते हुए कहा , “ओ आठ सौ की घोड़ी; तू मुँह नहीं दिखाती, तेरी यह मजाल!” कस्तूरी ने सोचा घोड़ी घूँघट नहीं मारा करती और झट से घूँघट उतार फेंका। सभी स्त्रियाँ सन्न रह गई। मायके समान ही ससुराल में भी भयंकर गरीबी थी। कस्तूरी ने बेटे को जन्म दिया था,पर वह बच नहीं पाया। जमीदार की पत्नी से कस्तूरी घुल-मिल कर बात करने लगी तो उसका पति शक करने लगा था। कस्तूरी के पति हीरालाल का देहांत मोतिझिरा की बीमारी से होता है। वे मरने से पहले कस्तूरी की गोद में अठारह महिने की बच्ची को छोड़ जाते हैं। पिता ने अपनी बेटी को ‘मैत्रेयी’ नाम दिया, तो गाँववाले उसे ‘पुष्पा’ कहने लगे थे। इस तरह लेखिका मैत्रेयी पुष्पा बन गई।
पति के मृत्यु पर आम स्त्रियों की तरह कस्तूरी रोई नहीं। क्योंकि उसे पता था, अब बुढ़े ससूर और दुध पिती बच्ची को उसे ही संभालना है। इस कारण मैत्रेयी को लोगों ने ‘कठकरेज लुगाई’ कहा। माँ ने आकर समझाया तो कस्तूरी के पास इसका जवाब मौजूद था, “यह मेरे बस का नहीं चाची, क्योंकि अब मैं अपनी जिन्दगी और बेटी की नन्ही जान को लेकर जो सोच पाती हूँ। मुझे लोग धिक्कार रहे हैं, जानती हूँ। धिक्कार किसे अच्छी लगती है? पर कैसे समझाऊँ कि मेरे सामने आनेवाले दिन बाघ की तरह मुँह फाड़े खड़े हैं। मैं आनेवाली घड़ियों से छूटकारा पाकर बच जाऊँगी? हर हाल में सामना करना होगा....” कस्तूरी के सामने अपनी बच्ची का भविष्य था। इसलिए वह पति के शोक को उस तरह ले नहीं पाई, जिस तरह आम तौर पर औरतें रो-रोकर दुनिया को अपने दर्द के बारे में बताती है। यहाँ कस्तूरी के सामने रोने से भी बड़े सवाल अपनी और अपने बेटी को सँवारने को लेकर थे। इसीलिए उसने अपने हाथ में स्कूल का झोला लिया। यह बात सारे गाँववालों को नागवार गुजरी। लेकिन कस्तूरी अपने फैसले पर अड़ी रही। उस समय की हवा में स्त्री शिक्षा को लेकर नेताओं के स्वर गूँज रहे थे। इसी के प्रभाव स्वरूप कस्तूरी गाँव से ढाई कोस दूर तहसील स्तर के कस्बे इगलास में आ-जाकर पढ़ाई करने लगती है। यह भारत की ग्रामीण स्त्री की छवी को तोड़ने वाला कदम था। जो उस वक्त किसी को हज़म नहीं हुआ। उस समय कस्तूरी के ससुर अपनी पोती मैत्रेयी को लेकर चिंतित थे। उन्हें लगता था, कि कस्तूरी का भाई मैत्रेयी की जान लेकर सारी जायजाद हड़पना चाहता है। वह अपने ससुर को आस्वस्त करते हुए कहती है, “मेरा भरोसा करो दादाजी। मैं अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करूँगी कि मेरे तुम्हारे बाद वह अपने दुश्मनों का मुकाबला करे।” इसके बाद ससुर ने जैसे कस्तूरी का पाँव ही खोल दिए। वह पढ़ने लगी। लेकिन अपने ही लोगों ने कस्तूरी के पाँव खींचने शुरू कर दिये। पहला विरोधी स्वर उसकी माँ का ही था, वे इस पागलपन की खबर पाकर अपना कपाल पीट लेती है और धोबिन के हाथ संदेशा भेजती है, “ कस्तूरी, तूझे दूसरे खसम की सार लगी है तो खसम कर जा, तिरिया चरित्तर क्यों पसार रही है” कस्तूरी की माँ के अनुसार दूसरी शादी पर लोग दो-चार दिन हँसेंगे पर इस तरह मीराबाई बनने से अच्छा ही है। इन बातों के कारण कस्तूरी को अपनी माँ सबसे बड़ी दुश्मन लगी। वह दूसरी शादी का मतलब गुलामी समझती है, धोबिन के हाथों संदेश भेजती है, “कह देना धोबिन भाभी, दूसरा खसम करना मतलब कि फिर से गुलामी में जाना। और कस्तूरी किसी गुलाम-मिट्टी की नहीं बनी। चाची को लाज लगती है तो खुद कुँआ-पोखर में डूब मरे। लजवन्तियों के लिए ये ही जगहें बनाई गई हैं। मुझे तंग न करे आगे से?” इसके बाद कस्तूरी की पढ़ाई का सिलसिला शुरु होता है। मायके से रिश्ता काट लेती है। दुध मुँही बच्ची को घर छोड़ देती है। उसके पास अपाहिज ससुर के लिए करूणा नहीं है। खेत और घर के लाभ-हानी को नजर अंदाज़ कर डाला। कस्तूरी नंगे पाँव रास्ता नापते हुए स्कूल जाती है, उसकी सारी दौलत कापियाँ और किताबें ही बन गई थीं। इस तरह वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती ही चली जाती है। अपनी बड़ी होती बच्ची के भविष्य को लेकर भी वह चिंतित रहती है। गाँव की खेरापतिन के साथ मैत्रेयी का ‘चन्दना-गीत’ गाना कस्तूरी को नागवार गुजरता है। कस्तूरी पढ़-लिखकर झांसी जिले में ग्रामसेविका नियुक्त हो जाती है। कस्तूरी को स्कूल मास्टर मैत्रेयी के गैरहाजिरी की शिकायत करता है। वह इस बात से काफी दुखी होती है। वह अपनी बेटी के मन के भटकाव का कारण परिवेश को मानती है। क्योंकि कस्तूरी के अनुसार लड़की पढ़ाई से नहीं रास्ते से डरती है। गाँववालें कस्तूरी को मैत्रेयी का ठीक ढंग से देखभाल न करने के कारण डाँटते भी हैं। कुछ स्त्रियाँ कहती हैं, “- यह रांड़ क्या हुई, सांड़ हो गई। न छोरी पर ममता, न बूढ़े ससुर का रहम। ‘पढ़ाई-पढ़ाई’ का भजन करती हुई दोनों को रौंद रही है। अरे तू डाँव-डाँव डोलेगी तो बच्चा की ऐसी ही गत बनेगी। बनी है महाथमा गाँधी की चेली” इन कटु आलोचनाओं से डरकर मैत्रेयी ने अपना रास्ता कभी नहीं छोड़ा। जिसके फलस्वरूप वह झांसी जिले में ग्रामसेविका नियुक्त होती है। अब कस्तूरी रूपी ‘राँड़’ गाँववालों की नज़र में देवी बन जाती है। सब तरफ खुशनुमा माहौल था। रिश्तेदार उससे मिलने आते हैं। कस्तूरी अपनी गाय बेचे जाने पर दुखी है।
कस्तूरी दूसरे गाँव जाने के लिए बर्तन-भांडे भरती है, तो दूसरी ओर मैत्रेयी इन सब से दुखी है। वह रोये जा रही है। कस्तूरी अपनी बेटी को समाज कल्याण बोर्ड की संयोजिका के घर रखकर नौकरी की जगह चली जाती है। कस्तूरी की बेटी यहाँ सुरक्षित नहीं थी। संयोजिका ने उसे नौकरानी बनाकर रखा था। मैत्रेयी इस काम से तंग आकर गाँव के परिचिता कशमीरा बीबी के यहाँ भाग जाती है। कस्तूरी को मैत्रेयी का इस तरह संयोजिका का घर छोड़कर भाग जाना अच्छा नहीं लगा। कस्तूरी को मैत्रेयी का साल बरबाद होने का सबसे बड़ा अफसोस हो रहा था। तीन महिनें बाद वह मैत्रेयी से मिलती है, तो कहती है, “ऐसे भागने से तेरा क्या बनेगा? कोई बुरी नज़र न डाले, इसलिए ही मैंने तेरे बाल काट दिए थे। कान-नाक के छेद मूँदने को कहा था, जेवर भी आदमी की बुरी निगाह को न्योता देते हैं। सामना करना सीखना होगा, ऐसे ही जैसे हम विधवा औरतें किया करती हैं। यह बात गाँठ में बाँध ले कि मर्द की जात से होशियार रहकर चलना होता है, भले वह साठ साल का बूढ़ा हो। ” माँ के सामने मैत्रेयी की एक न चली फिर भी रोते-रोते कहा कि अंधेरे में कौनसी होशियारी चलती। खूबाराम चाचा और खेरापतिन दादी ने कस्तूरी को डाँटा। उनके अनुसार कस्तूरी अपनी प्रगति तो कर रही है, पर बेटी का सत्यानाश। वह बेटी की उम्र का लिहाज़ न करते हुए, उसे अपनी तरह की बनाना चाहती है। खेरापतिन दादी ने मिसाल देते हुए समझाया, “बचना कैसे होता है, यह सोचने की भी अवस्था होती है। तू तो पढ़ी-लिखी है कस्तूरी, इतना तो जानती होगी कि शेर का बच्चा भी कुछ दिन तक अपनी माँ का लाया शिकार ही खाता है। बेटी, तेरी तरक्की ने तुझे ऐसा चकाचौंध कर डाला कि सबके सीस पर मुकट देख रही है।” इस घटना के बाद कस्तूरी मैत्रेयी को लेकर अलीगढ़ जाती है। यहाँ वह पूरी सावधानी बरतती है। अलीगढ़ में कस्तूरी के गाँव के ही राजेश्वर रहते थे। कस्तूरी भी राजेश्वर के घर सात-आठ दिन रहकर यहाँ का माहौल देख लेती है। कस्तूरी के जाने के बाद वहीं परेशानी फिर मैत्रेयी के साथ शुरु हो जाती है। यहाँ बूढ़े मामाजी मैत्रेयी को परेशान करते हैं। शिकायत करने पर भाभी भी उनका ही साथ देती हैं। मैत्रेयी वहाँ से भागकर अपने माँ के पास खिल्ली चली जाती है। वहाँ एक दादा के यहाँ रहने लगती है। यहाँ उसे सबका प्यार मिलता है। बहन, बेटी सबका दर्जा उसे मिलता है। सारे परिवार की लाडली मैत्रेयी रोज़ डी.बी. कालेज, मोंठ मे पढ़ने जाती-आती है। कस्तूरी को मैत्रेयी का लड़कों के साथ बातचीत करना अच्छा नहीं लगता है। वह दादाजी के यहाँ आना-जाना बन्द करने को कहती है। कस्तूरी को पता चलता है कि मैत्रेयी जगतसिंह के साइकल पर सामने बैठकर स्कूल गई थी। मैत्रेयी को यह समझ में नहीं आता है कि यह सारी बातें उसे कैसे पता चलती है। तब गौरा जो कस्तूरी की साथीन है, कहती है, “लाली, संशय की आँखें सब जगह होती हैं। माताजी तुम पर शक करती हैं। गुफा में छिप जाओ, कुआँ में डूब जाओ कि आसमान में उड़ जाओ, संशय तुम्हें कही बख्शेगा नहीं।” इसके बाद मैत्रेयी अपने व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश करने लगी। माँ चाहती है कि लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। अपने इन्द्रियों को अपने काबू में रखें। लेकिन बी.ए. पढ़ने वाली मैत्रेयी शादी करना चाहती है। वह विवाह करके रात-दिन के खतरे से निजात पाकर वैवाहिक जीवन जीना चाहती है। वह अपनी स्वाभाविक इच्छाओं को मारना नहीं चाहती है। सत्रह साल की लड़की शादी करना चाहती है। जो उसकी माँ को कतई मंजूर नहीं था। मैत्रेयी अपने इच्छाओं के बारे में अपनी माँ से कहती हैं, “मेरी स्वाभाविक इच्छाओं को कठोर उपवास में मत बदलो। मैं अपनी इन्द्रियों को कसते-कसते दूसरों की हवस का शिकार हुई जाती हूँ।” कस्तूरी को मैत्रेयी का गृहस्थ जीवन के बारे में सोचना नागवर गुजरता है। वह चाहती है कि मैत्रेयी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। कस्तूरी को लगता है,“क्या यह लड़की नहीं जानती कि साधारण गृहस्थी से उन्हें चिढ़ रही है। वहाँ इसके सिवा नया क्या है कि खाना-सोना और वंशवृद्धि करना। यही जिन्दगी वांछनीय थी तो मैत्रेयी ने कस्तूरी की कोख से जन्म क्यों लिया?” यह तकरार का सिलसिला चलता रहा। अंत में कस्तूरी को हार माननी पड़ी। वह मैत्रेयी के लिए वर ढूँढ़ने में लगी। उधर मैत्रेयी अपने भावी पति के सपनों में खो जाती है। मैत्रेयी के लिए वर ढूँढ़ना एक विधवा के लिए सरल कार्य नहीं था। जिसका परिचय जल्द ही कस्तूरी को होता है। कस्तूरी नौकरी के कारण आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई थी, पर लोग उसे एक औरत या विधवा ही मानते थे। इसीलिए कस्तूरी का इस तरह अकेले आकर शादी की बात करना अच्छा नहीं लगता था। लडकेवालों ने उसे फटकारते हुए कहा, “रोज़ रोज़ आ जाती है। तूने यह घर खाला का घर समझ लिया है? झोली उठाया और चल दी। हमारी कोई इज्ज़त नहीं है क्या, कि शादी-ब्याह जैसा मामला लुगाई तै करे। जा यहाँ से , कोई मर्द-मानस हो तो भेजना। बिरादरी के लोग मखौल उड़ाते है।” इस तरह के अपमान से कस्तूरी पानी-पानी हो जाती है। स्त्री की तरह रो भी नहीं पाती। इन सबके लिए वह उसके स्त्री होने को ही जिम्मेदार ठहराती है। इन सबसे छूटकारा पाने के लिए कुछ दिनों बाद कस्तूरी जाति-धर्म की रूढ़ियों-परम्पराओं के प्रति विद्रोह करते हुए कहती है, “ मैं जात-पात को नहीं मानती, तुझे पता है......तेरी शादी को लेकर यह आखिरी बात है मेरी” मैत्रेयी अपने साथियों-प्रेमियों को याद करती है। उसे लगता है, इन सबको गाली देने वाली कस्तूरी आज क्यों इन में से किसी से ब्याह करने के लिए कह रही है। माँ के इस स्वार्थ युक्त दृष्टिकोण पर प्रहार करते हुए , मैत्रेयी कहती है, “ वे जहर बुझे तीर, वे जीवन के तूफानी कहर। प्रगति पथ के धावक बनकर हमें राहत देनेवाले हैं? रीति-रस्मों की सूची तैयार करनेवालों, जीवन के नियम बनानेवालों और इज्ज़त–मर्यादा की जय में खड़े होनेवालों की उन चरित्रहीन चेहरों की जरूरत पेश आई, ताज्जुब है।” लेकिन कस्तूरी को अपनी ही जाति का वर चाहिए था। कस्तूरी का यह अंतर्विरोध कुछ ही समय में दिखाई देने लगता है। आखिर में हसनगढ़ गाँव की ननद विद्या बीबी के प्रयासों के कारण मैत्रेयी के लिए उन्हीं की जाति का एक डाक्टर लड़का मिलता है।
खर्च को बचाने के लिए गाँव में ही विवाह किया। कस्तूरी को इस ब्याह में कुछ बातें पसंद नहीं आई, फिर भी चुप रहना पड़ा। कुछ अवरोधों के बाद मैत्रेयी की शादी हो जाती है। सुहागरात के समय मैत्रेयी का व्यवहार आम भारतीय स्त्री की तरह नहीं था। ना घूँघट ना सिकुड कर बैठना, इस तरह का दृश्य वहाँ नहीं था। मैत्रेयी अपने पति को यौन सुख देने के लिए विपरीत की भूमिका अपनाती है। उन्हीं के शब्दों में , “ सारी पर्देदारियों से मुक्त होकर जो आदिम दृश्य बना, उसमें थल नही जल-ही-जल की तरंगे उलटी थीं।” रात में रस भोग के बाद पति के मन में संदेह घर कर जाता है। वह आम भारतीय पुरुष की तरह चाहता था कि सुहागरात में पहल वह करें, लेकिन हुआ उलटा ही। इसका अर्थ वह यह निकालता है कि मैत्रेयी को इन बातों का विवाहपूर्व अनुभव है। पति उसे एक दासी के रूप में देखना चाहता है। मैत्रेयी अपने पूरे अधिकारों के साथ पत्नी बनना चाहती हैं, इसीलिए वह रात में अपने पति की उदासीनता देखकर कह पाती हैं, “ए सीधे लेटो और मेरी ओर मूँह करो। पहले बताओ कि ब्याह क्यों किया? हमने पार लगा दिया तो नखरे पसारने लगे ? समझे रहना कि मुझे नखरे-वखरे अच्छे नहीं लगते।” शादी के बाद मायके के बुलाये पर मायके अपने गहने के साथ जाना चाहती है, वह ससुराल वालों से अपने गहनों की माँग करती है। इस बात को लेकर कहा सुनी होती है। ससुराल वाले नाराज हो जाते हैं। छह महिने तक ससुराल से कोई मैत्रेयी को लेने नहीं आता है। मैत्रेयी का पत्र पाकर उसका पति मैत्रेयी से मिलने आता है। रात के समय कस्तूरी का इनको मिलने नहीं देती है, कस्तूरी के सो जाने पर मिलने पर वह हंगामा करती है। दिन में दोनों को अकेला नहीं छोड़ती है। इससे नाराज होकर मैत्रेयी लिखती है, “कह क्यों नहीं देती है कि लड़की तेरे भाग्य में प्यार का अधिकार जब-जब आएगा, मैं चील का-सा झपटा मारकर छीन ले जाऊँगी। मुझे ऊँचाइयों का सदा शौक रहा है।” इस तरह के माहौल में कुछ समय बिताने के बाद मैत्रेयी का पति चला जाता है। मैत्रेयी गर्भवती हो जाती है। माँ की बीमारी के समय डाक्टर के मना करने के बावजूद वह अपनी माँ से मिलने जाती है। कस्तूरी के बीमारी का कारण मुख्यमंत्री का वह निर्णय है, जिसके तहत ‘महिला मंगल योजना’ को समाप्त करना था। इसके खिलाफ कस्तूरी अपने सहकर्मियों से मिलकर आंदोलन करती है। डाक्टरी सलाह पर उन्हें अस्पताल भेजा जाता है। कुछ समय बाद सहकर्मी साथ छोड़ देते हैं।
मैत्रेयी ने बेटी को जन्म दिया था, जिसकी खुशी किसीने नहीं मनाई। लिंग-भेद की प्रचलित धारणा का यहाँ भी दिखाई देती है। मैत्रेयी मादा बनने की सजा को व्यक्त करती है, वे लिखती हैं, “ मनुष्य के रूप में अगर सबसे कठिन, चुनौती भरी जिन्दगी को पाया है तो स्त्री ने। या कुदरत को ही उससे बैर था? या सृष्टि के कर्ता-धर्ता की ही कोई साजीश...मादा बनाने के बाद मादा होने की सजा का नाम औरत धर दिया । क्योंकि साथ में दिमाग-दिल और विवेक भी दे दिया।”
इस तरह यह आत्मकथा माँ और बेटी के रिश्तों के अंतर्द्वन्द्वों को चित्रण करने में सफल हुई है। कस्तूरी जिसका वैवाहिक जीवन कुछ समय तक चल पाया। एक विवाहित स्त्री को जितना सुख मिलना चाहिए, वह सुख उसे मिल नहीं पाया। पति के मृत्यु के बाद उसे अनेक प्रकार के संघर्षों का सामना करना पड़ा। इन सबका उस पर यह असर पड़ा कि वह पुरुष से अलग होने को ही नारी की मुक्ति मान बैठती है। इसके परिणाम स्वरूप अपनी बेटी को वह अपने पैरो पर खड़ा होते हुए देखना चाहती है, वह किसी भी पुरुष की बूरी छाया से अपनी बेटी को बचाना चाहती है। लेकिन बेटी का स्वभाव अपनी माँ के सपनों से विद्रोह करता दिखाई देता है। मैत्रेयी सपनों मे जिने वाली लड़की है। वह प्यार के, अपने साथी के रंगीन सपने देखती है। जो कस्तूरी को कतई मंजूर नहीं था। इस आत्मकथा में माँ बेटी का रिश्ता प्रेम-घृणा-प्रेम का है। इस आत्मकथा का दूसरा भाग ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ 2008 में प्रकाशित हुआ।
2.1.8 गुड़िया भीतर गुड़िया – मैत्रेयी पुष्पा (सन् 2008)
हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विजय बहादुर सिंह ने ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ के बारे में लिखा है “यह आत्मकथा उसी राह का दस्तावेज़ी इतिहास है जिसमें एक स्त्री पुरुषवर्चस्वी स्त्री विरोधी घर परिवार और दाम्पत्य के अन्यायों को दर्ज करती हुई, प्रतिवाद के रास्ते चल देती है। वह उन नयी परम्पराओं की मांग भी करती है जो उसकी स्वाधीनताओं के सौन्दर्य की रक्षा कर सकें।” मैत्रेयी पुष्पा की यह आत्मकथा स्त्रियों के लिए परिवार के भीतर और बाहर जनतांत्रिक माहौल की माँग करती है। ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में माँ-बेटी के संस्कारों का संघर्ष दिखाई देता है। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में मैत्रेयी का संघर्ष उसके पति, दाम्पत्य जीवन, पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता, संपादकों-लेखकों के रवैये आदि से दिखाई देता है। पत्नी और लेखिका की दोहरी भूमिका निभाते समय आनेवाली समस्याओं को रेखांकित किया है।
मैत्रेयी अपने पति डॉ. शर्मा के साथ दिल्ली आती है। उनके पति ‘एम्स’ में काम करते हैं। यहाँ पर मैत्रेयी एक बार पार्टी में डॉ. सिद्धार्थ के साथ नाचती है। मैत्रेयी इसे अपनी इच्छा का नतीज़ा कहती है। नाचकर अपने नाम के साथ लगे ‘गँवार’ शब्द का सामना करना चाहती थी। जिसका इस्तेमाल करके शहरी लोग उसका अपमान करते थे। इस नाच को लेकर उनका अपने पति से झगड़ा होता है। इस पार्टी के बाद लोगों में मैत्रेयी और डॉ.सिद्धार्थ के संबंधों को लेकर चर्चा भी होती है। इस बात से मैत्रेयी के पति काफी खफा होते हैं। मैत्रेयी डॉ. सिद्धार्थ के द्वारा अपने वैवाहिक जीवन के लोहे के कपाट तोड़ना चाहती हैं। वे सिद्धार्थ के बारे में कहती हैं, “तुम नहीं सुन पाओगे कि डॉ. सिद्धार्थ ने मेरे भावात्मक खालीपन में प्रवेश किया। मेरे अधसोए वजूद को संकेत मिला कि यह प्यारी-सी पहल और दिलकश पहचान सभी पुरुषों के पास नहीं होती। अब यहाँ प्रेम का व्यवहार ही मादक अनुभव का सन्दर्भ बनेगा कि कोई क्यों किसी की चाहत को अस्वीकार करने बजाय संजो लेता है।” लेकिन इस बात को मैत्रेयी का पति समझ नहीं पाता है। वे नाचने के लिए नहीं ऊठी थीं। वे तो अपने सम्मान के लिए नाची थीं। डॉ. सिद्धार्थ की ओर मैत्रेयी के आकर्षण का कारण डॉ.सिद्धार्थ के वे गुण थे, जिसके बारे में वे बताती हैं, “डॉ. सिद्धार्थ मौसमों की रंगतों, हवा की सुगन्धों में रचे-बसे लोकगीतों को अर्थ जानते हैं, यही था मेरे जुड़ाव का कारण।” डॉ.शर्मा मैत्रेयी को आधुनिक बनाना चाहते हैं, पर अपने नियमों पर। वे सजी-सँवरी एक सुघड़ पत्नी चाहते हैं। लेकिन मैत्रेयी इस तरह आधुनिक नहीं बनना चाहती है। मैत्रेयी एम.ए के बाद पीएच.डी करने की सोचती है, डॉ. अग्रवाल जो गाईड ढूँढ़ देने का वादा करती है, पर वादा पूरा कर नहीं पाती है। इसके बदले वह ‘लिंग्विस्टिक’ के कोर्स में प्रवेश लेने की सलाह देती है। इस कोर्स के लिए साक्षात्कार के लिए पत्र आता है, तो उनका पति उसे छुपा देता है। पति के इस बात से वे नाराज रहने लगती हैं, तब डॉ.शर्मा कहते हैं, “जानता हूँ, मुझसे नाराज हो, पर इतना जरूर कहूँगा, मैं जो करता हूँ, तुम्हारे भले के लिए करता हूँ। तुम परेशान होती फिरोगी, मुझे चैन नहीं आएगा।” मैत्रेयी के पति पूरी तरह खलनायक नहीं है। वे कई मौकों पर मैत्रेयी का साथ भी देते हैं। पर जब ऐसा नहीं होता है, तो वह अपने पति को ‘ जलकुक्कड’ भी कहती हैं। मैत्रेयी करवा चौथ के व्रत का उपहास उड़ाते हुए दिखाई देती है।
मैत्रेयी आत्मकथा में अपने आपको एक संघर्षशील स्त्री के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। जो पुरुषसत्तात्मक दबाव का सामना करती है। मैत्रेयी का जीवन अंतर्विरोधों से भरा पड़ा हुआ है। एक तरफ तलाक की बात करती हैं और गृहस्थी का सोने का पिंजरा भी छोड़ने से कतराती है। डॉ. शर्मा, राजेन्द्र यादव की अच्छी खातिरदारी करते हैं। वे उनसे चिढ़ते है, फिर भी घर आने पर खाना बनाकर खुद ही खिलाते हैं। राजेन्द्र यादव और मैत्रेयी पुष्पा के संबंधों को लेकर दिल्ली में बहुत बड़ा बवंडर उठा था। जिसका खंडन मैत्रेयी अपनी आत्मकथा में करती है। 45 की उम्र में लेखन कार्य को फिर से आरंभ करने वाली मैत्रेयी को उनकी बेटियों ने लेखन कार्य के लिए प्रोत्साहित किया। 8 अप्रैल सन् 1990 को ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में मैत्रेयी की कहानी ‘आक्षेप’ प्रकाशित हुई। ‘हंस’ में भी दो कहानियाँ अस्वीकृत हुईं। तीसरी कहानी ‘सेंध’ ग्रामीण जीवन पर आधारित थी। राजेन्द्र यादव और उनकी पत्नी मन्नू भंडारी स्वंय पत्रिका का अंक देने के लिए मैत्रेयी के घर आते हैं, इस विषय में वे लिखती हैं, “ जिस सम्पादक ने मेरा रचनात्मक वजूद पाँच बार धूल में रगड़ा था, वे ही हंस का वह अंक लेकर मन्नू भंडारी के साथ मेरे घर आए, जिसमें मेरी कहानी ‘जमीन अपनी अपनी’ के नाम से छपी थी।” मैत्रेयी पुष्पा को लेखन की प्रेरणा रेणु जी से मिली। वे इस बात को स्वीकारती भी है। मैत्रेयी पर अपने उपन्यास की अच्छी समीक्षा लिखने के लिए रिश्वत के रूप में मिठाई के डिब्बे दिये जाने के आरोप भी लगे।
मैत्रेयी ने अपने बन्धनों को तोड़ा तभी वह लिख पाई। अगर वे ऐसा नहीं करती तो एक गृहणी बन कर रह जाती। इस विषय में वे लिखती हैं, “यदि मैंने अपने भीतर सुकुमारता को तोड़ न दिया होता तो सचमुच मैं आज मन-मोहिनी गुड़िया का अनुरूप रूप होती.... लेकिन मैं सोचकर आश्वस्त होती हूँ कि गुड़िया की छवि तोड़ डालने से ज्यादा मुझे कहीं मुक्ति नहीं । हाँ, इस टूटन का रूप आगनपाखी के राख हो जाने जैसा है।” मैत्रेयी पुष्पा अपने माँ के बारे में लिखती हैं, “ माँ का मन रहा , कोई कृति उनको भी समर्पित की जाए, उन्हें बहुत खुशी होगी। उन्होंने यह बात मुझसे कही नहीं मगर अनकहे को समझ लेना ही हम माँ-बेटी का आपसी रिश्ता रहा है। और समझने के बाद भी माँ की इच्छा के विरूद्ध जाना मुझे पीड़ादाई आनंद देता रहा है। आज सोचती हूँ, मेरी बेटियों ने मुझसे जितने लगाव-जुड़ाव का सम्बन्ध निभाया, मैंने उतने ही अलगाव पर अपनी माँ को रखा। मैंने समझा, उस बचपन का प्रतिशोध ले रही हूँ, जिसको इन्होंने अनाथ कर दिया, बहाना पढ़ाई का रहा।” यहाँ पर मैत्रेयी का अपने माँ के प्रति इस तरह का रवैया कुछ समझने नहीं आता। स्त्री-विमर्श पर लिखने वाली 45-50 की उम्र की लेखिका एक संघर्षशील महिला के प्रति इस तरह का नज़रिया रखती हैं। पढ़कर आश्चर्य होता है। इस तरह के कई अंतर्विरोध इस आत्मकथा में दिखाई देते हैं।
मैत्रेयी कहीं-कहीं अपनी ही तारीफ करती नज़र आती हैं। जैसे उनका उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी’ की सामग्री जुटाने के प्रसंग को वह एक साहस कथा की तरह वर्णन करती है। मैत्रेयी पुष्पा और डॉ. शर्मा के दाम्पत्य जीवन में एक प्रकार की सुझबुझ थी, लाख झगड़े हो पर वे एक दूसरे को मना लेते थे। मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा पुरुषवादी सोच के खिलाफ आवाज़ उठाने का ही काम नहीं करती हैं, बल्कि वे स्त्री को बराबर का हक्क देने की भी माँग करती हैं। समाज स्त्री को केवल एक गुड़िया बनाकर रखना चाहता है, लेकिन इस गुड़िया के भीतर एक गुड़िया है, जो बाहर आना चाहती है, उसी की छटपटाहट के दर्शन इस आत्मकथा में होते हैं।
2.1.9 हादसे - रमणिका गुप्ता (सन् 2005)
रमणिका गुप्ता का जन्म 22 अप्रैल, सन् 1930 में पंजाब के क्षत्रिय परिवार में हुआ था। रमणिका गुप्ता ने एम.ए. और बी.एड. तक पढ़ाई की। रमणिका जी अपने सामंती परिवार के बारे में लिखती हैं कि, “हमारा परिवार सामन्ती परिवार था पर आधुनिकता में अपने समय के अनुसार सबसे आगे था, जैसा कि हर सामन्ती परिवार दिखावा करता है, होड़ लगाता है। घर में परदा-प्रथा लागू थी, हालाँकि मेरे पिता और मेरी माँ ने लीक से हटकर घर के लोगों में परदा करवाना समाप्त करवा दिया था। मेरी माँ (साहबों की मेमो की तरह) मेरे पिता के साथ दौरे पर जाया करती थीं, फिर भी परिवार में लड़कियों को सिर ढकना लाज़िमी था। ताँगे में भी चारों तरफ परदा लगा दिया जाता था।” इस तरह के सामन्ती परिवार में पैदा हुई, रमणिका गुप्ता सामंती नियमों और रूढ़ियों को तोड़ते हुए बचपन से ही एक विद्रोही की उपाधि प्राप्त कर चुकी थीं। जिस समय लड़कियों के खेल घर की सीमाओं में ही बंद थे, उस समय रमणिका गुप्ता लड़को के साथ, गिल्लि-डंडा, क्रिकेट, हाँकी, कबड्डी की बाजी तथा लड़कों के साथ बैठना भी इनके शौक में शुमार था। यह जब साइकिल लेकर निकल जाती तो घर पर हंगामा मच जाता। सर न ढकने पर उन से कहा गया था, “सर नहीं ढकना तो हमसे या तो बीस क़दम आगे चलो या बीस क़दम पीछे ताकि लोग न जाने कि तुम हमारे साथ हो।” रमणिका जी बीस क़दम आगे चलना शुरु किया और एक विद्रोही की उपाधि उन्हें अपने ही घर से मिली।
वे बचपन से विद्रोही थीं। आर्य समाज के विचारों का उन पर प्रभाव था, जिसके कारण वे मूर्ति-पूजा का विरोध करती थीं। मूर्ति-पूजा का विरोध करने पर विक्टोरिया स्कूल व कालेज के प्रिंसिपल मिस सेन ने उनको डाँटा, पर उन्होंने इस विषय पर बहस करना छोड़ा नहीं। वे विविध विषयों पर बहसें करती थीं, उन्हें बहस करने में मज़ा आता था, वे खेलकूद नाटक, आदि में भी हिस्सा लेती थीं। वे लिखती हैं, “ऐसी बहसें करने में मुझे बड़ा मजा आता था। लगभग 14 वर्ष की उम्र से ही मैं स्कूल व कॉलेज में होनेवाले वाद-विवाद, खेलकूद, नाटक तथा कविता के कार्यक्रमों में भाग लेती थी और सबसे आगे रहती थी। उस समय भी मैं अपने निर्णय खुद लेती थी और उनका अच्छा बुरा फल भोगने को तैयार रहती थी।” उन्होंने आज़ाद हिन्द सैना के नेताओं पर जब मुकदमा चला तब अपने विक्टोरिया कॉलेज में हड़ताल करवा दीं। जो आंशिक रूप से कामयाब रही।
ऐसी विद्रोही प्रवृत्ति की रमणिका गुप्ता के प्रेम विद्रोह के कारण उनके घर में भूचाल आ गया था। गाँधी जी की हत्या का समाचार सुनकर सभी लोग दुखी थे और उनके मामा, उनका परिवार और उनके कार्यालय के लोग सब ट्रक से दिल्ली के लिए रवाना हुए, उनमें मामा के अधिनस्थ काम करने वाले वेदप्रकाश गुप्ता भी थे, जिनसे उनका परिचय हुआ और घर आकर रमणिका गुप्ता ने अपने प्यार और विवाह करने के बारे में बताया। घरवाले नहीं माने, पिताजी ने कहा, तुम प्रेम विवाह करोगी तो तुम्हारी माँ जहर खा लेगी, तब इस पर रमणिका का जवाब था, “मेरी माँ और आप जिन्दगी का सुख देख चुके हैं, भोग चुके हैं, मुझे अभी जिन्दगी देखनी बाकी है इसलिए जहर मैं नहीं खाऊँगी, बीवीजी(माँ) खाएँ।” लेकिन इतनी आसानी से उनका विवाह नहीं हुआ, काफी बहसें हुईं। अंत में सब मान गये और रमणिका जी का विवाह वेदप्रकाश गुप्ता के साथ हुआ।
सन् 1960 में परिवार के साथ धनबाद आ गईं। रमणिका जी के पति का तबादला मद्रास से धनबाद सहायक श्रमायुक्त(केन्द्रीय) के पद पर हो गया था। धनबाद में आने के बाद किये कार्यों के बार में रमणिका गुप्ता लिखती हैं कि, “धनबाद में मैं अपना नृत्य का कार्यक्रम तो चालू नहीं रख सकी लेकिन मैंने अपने बचपन की राजनीतिक डगर को खोज निकाला। शुरुआत तो मैंने कवि गोष्ठियों और नृत्य कार्यकर्मों व नाटकों से की पर साथ में मैंने समाज के कमज़ोर वर्गों को आर्थिक विकास से जोड़ने की मुहिम के तहत समाज कल्याण की कई योजनाओं में रूचि लेनी शुरु कर दी। चीन और पाकिस्तान की लड़ाई में मेरे योगदान की चर्चा धनबाद शहर के अलावा साहित्यिक, सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर पूरे बिहार में फैल गई थी, विशेषकर सीविल डिफेंस की ट्रेनिंग लेना, उसमें डिस्टिक्शन प्राप्त करना, रायफल तथा गाड़ी चलाना एवं चैरीटी-शो, कविता पाठ, टैबल्यू तथा नृत्य के कार्यक्रम देकर सैनिकों के लिए चन्दा जमा कराना।” इस तरह सामाजिक और राजनीतिक कार्य करते हुए उन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, कोयला खदान के मजदूरों और स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए बिताया, जिसके चलते उनके अपने पारिवारिक जीवन में कई तूफान आये। उन पर गोलियाँ भी चली, फिर भी वे रूकी नहीं, वे लिखती हैं, “..हजारीबाग लौटते हुए मेरी गाड़ी पर गोली चली पर हम लोग बचकर निकल आए। पहली बार यह घटना बरही और हजारीबाग के बीच रास्ते में घटी और दूसरी बार धनबाद से लौटते हुए बेगोदर के बाद टाटीझरिया से पहले। गोली गाड़ी के बम्पर में लगी। मेरा सप्ताह में एक बार रात को कार से हजारीबाग आना-जाना बरकरार रहा। धमकियों के बावजूद भी मेरा आना-जाना रुका नहीं। मैं जानती थी कि मारी तो मैं फ्लैट में भी जा सकती हूँ फिर आना-जाना क्यों बन्द किया जाए? काम क्यों रुके? ये घटनाएँ तब की है जब मैं सन् 1974 से सन् 1979 की बीच बिहार विधान-परिषद की सदस्या थी।” राजनीति में आनेवाली स्त्री को कलेवा कहते है, जिसको जब चाहे कोई भी खा सकता है। ऐसे माहौल में उन्हें काम करना पड़ा जहाँ जान और इज्ज़त दोनों को गँवाने पड़ सकते थे। रमणिका गुप्ता ने राजनीति में बहुत कुछ सहा है, उन्होंने अपना शरीर तक राजनीति में दाँव पर लगा दिया। वे इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं मानती है। वे लिखती हैं, “वैसे राजनीति में मुझे कई नेताओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध को लेकर काफी मदभेद हो जाता रहा है। मैंने भी डटकर उन परिस्थितियों का मुकाबला किया। मैंने कभी अपने यौन-शोषण का आरोप किसी पर नहीं लगाया चूँकि मैं या तो उसमें भागीदार रही या विरोध में डटी रही। कुछ हुआ भी तो मैंने अपनो को हतोत्साहित नहीं होने दिया।” रमणिका गुप्ता ने अपना शरीर तक राजनीति के नाम कर दिया था।
रमणिका गुप्ता बिहार की पूर्व विधायक एवं विधान परिषद की पूर्व सदस्या रही है। कई देशों की यात्राएँ की और विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित है। राजनीति में आनेवाली स्त्री के लिए इनकी आत्मकथा जरुर पथ-प्रदर्शक काम करेगी।
2.1.10 अन्या से अनन्या – प्रभा खेतान (सन् 2007)
प्रभा खेतान का जन्म सन् 1941 में कोलकाता के मारवाड़ी परिवार में हुआ। प्रभा खेतान के माता का नाम पुरनी देवी खेतान और पिता का नाम लादूरामजी खेतान है। प्रभा जी अपने माता-पिता की अंतिम सन्तान थीं। प्रभा जी के पिता गांधीवादी थे। स्त्री शिक्षा के पक्ष में थे। अपनी लड़कियो को पढ़ाना चाहते थे। प्रभा जी की माता शुरुआत में तो स्त्री शिक्षा के खिलाफ थीं, वे अपनी लड़कियो को घर का कामकाज सिखाना चाहती थीं, जिससे शादी के बाद कोई परेशानी न हो। लेकिन समय के साथ उनके विचारों में बदलाव आता है। प्रभा खेतान का बचपन आज़ादी के नारों के बीच गुज़रा। बचपन में प्रभा खेतान ने साम्प्रदायिक दंगे भी देखे। प्रभा जी रंगरूप और स्वभाव में अपने भाई-बहनों से अलग थीं। प्रभा खेतान दिखने में काली थी। सबसे छोटी संतान को जितना प्यार किसी भी परिवार में मिलता है, उतना प्यार प्रभा जी के हिस्से में नहीं आया। प्रभा जी का बचपन दाई माँ की गोद में गुज़रा। दाई माँ ही उसके लिए सबकुछ थी। सबेरे स्नान से लेकर रात के खाने तक सबकुछ वही करती थी। दाई माँ वह व्यक्ति थी जो प्रभा जी को हर संकट से बचाकर निकालती थी। प्रभा खेतान कहती है, “दाई माँ मेरा सहारा, मेरा आश्रय थी। अम्मा के क्रोध, भाई-बहनों का तुफानी वेग, गरजते बादल, कड़कती बिजलियाँ, दाई माँ इन सबसे मुझे बचाकर रखती। ” प्रभाजी के जीवन में अकेलापन बचपन से ही है। उनके अपने बहन-भाई, भांजा-भांजी उनके साथ न ठीक तरह से खेलते थे न ठीक तरह से बर्ताव करते थे। प्रभा जी गली के गरीब लड़के खेदरवा के साथ खेलती थी। उसके गुड्डे के साथ अपनी गुड़िया की शादी करना चाहती है। कभी-कभी तो वह अकेले ही गौरेया से बातें करती। वे गौरया से खुद ही सवाल करती और खुद ही जवाब देती हैं। प्रभा जी को अपनी माँ से ज्यादा दाई माँ की यादे आती हैं। प्रभा जी अपने बचपन और माँ के बारे में कहती हैं- “कैसा अनाथ बचपन था। अम्मा ने कभी मुझे गोद में लेकर चूमा नहीं। मैं चुपचाप घंटों उनके कमरे के दरवाजे पर खड़ी रहती। शायद अम्मा मुझे भीतर बुला लें। शायद....हाँ, शायद अपनी रजाई में सुला ले। मगर नहीं, एक शाश्वत दूरी बनी रही हमेशा हम दोनों के बीच। अम्मा मेरी बातों को समझ नहीं पाती थी।”
प्रभा जी को स्कूल में मारवाड़ी लड़की होने के कारण भी परेशानियाँ उठानी पड़ी। प्रभा जी के टीचर मारवाड़ी लड़कियों को पसंद नहीं करते थे। इसलिए प्रभा जी ने गाना नहीं सीखा। प्रभा जी स्कूल में गैर बंगाली लड़कियों के साथ रहती थीं। घर आकर प्रभा जी को साड़ी पहननी पड़ती थी। प्रभा जी को अपनी माँ से विद्रोह का स्वभाव विरासत में मिला था। वे लिखती हैं- “किसी भी पढ़ी-लिखी स्वावलंबी स्त्री को देखती तो अम्मा यही कहा करती, “तुम लोग जरुर रूपया कमाना, अपने पैरों पर खड़ी होना। आखिर हमें क्या मिला? बस बच्चे पैदा करती रही।” अम्मा ने कभी नहीं कहा मेरा तरह बनो। जन्म से विद्रोही थी और विरासत में मुझे उनका विद्रोही स्वभाव मिला” प्रभा खेतान के पिता को व्यापार में नुकसान हुआ। इसलिए सेठिया के साथ वर्किंग पाटनरशिप स्वीकार करनी पड़ी। सेठिया से लेन-देन को लेकर प्रभा खेतान के पिता का झगड़ा होता था। इसी झगड़े के कारण सेठिया ने प्रभा खेतान के पिता को जहर देकर मार डाला। यह बात सबको पता थी, मगर अखबार में कुछ और ही छपा था। प्रभा जी के चाचा सेठिया के खिलाफ मुकदमा लड़ना चाहते थे। लेकिन प्रभा जी की माँ के सामने अपने बच्चों का भविष्य था। उनके लिए पैसा चाहिए था। इसलिए उन्होंने मुकदमा लड़ने से मना कर दिया। कुछ पैसा प्रभा के पिता छोड़कर गये थे और कुछ प्रभा जी के माँ के गहने थे। उन्हें बेचकर दूसरे बैंक में पैसा जमा कर दिया। दिवाली के बाद घर के बगल में मकान बनाना शुरु किया।
घर का कारोबार बड़े भैया ने संभाला । प्रभा जी की माँ को गीता और प्रभाजी की चिन्ता लगी रहती। खासकर प्रभा जी की । गीता तो दिखने में अच्छी थी। प्रभा जी की माँ को प्रभा जी का चेहरा, शरीर, लम्बे बाल, उम्र से पहले शुरु हुए पीरियड्स अच्छे नहीं लगते। समय से पहले पीरियड होने के कारण प्रभा खेतान को बहुत अपराध बोध सहना पड़ा। उन्हें उस समय कुछ पता नहीं था कि उनसे क्या गलती हुई लेकिन उनको लग रहा था कि कुछ गलत जरूर हुआ है। एक दिन दिनभर एक कमरे में बंद रहना पड़ा। माँ तो इनके असमय आये हुए पीरियड़ के कारण चिढ़ती थी। प्रभा खेतान का एकमात्र सहारा दाई माँ थी। इस समय भी किसी तरह बचा ले जाती, पर उनके सवालों का ठीक तरह से जवाब दे नहीं पाती। प्रभा खेतान को अपने काले होने का भी बुरा लगता है। उन्हें लगता था, जादुई परी उन्हें सिन्ड्रोला बना दे। प्रभा खेतान को अपनी अम्मा की गोद में सोने का कोई प्रसंग याद नहीं आया। उन्हें दाई माँ ही याद आती है, क्योंकि बचपन में दाई माँ ही उनके लिए सबकुछ थी। बिमारी में रात भर जागने वाली दाई माँ ही थी। डॉ. गांगुली के पास ले जाने की विनंती करने वाली दाई माँ ही थी। इसलिए प्रभा खेतान को दाई माँ बहुत याद आती है।
प्रभा खेतान अब बड़ी होने लगीं। अब उनका मन दाई माँ से हटकर किताबों और सहेलियों में लगने लगा था। फिर भी दाई माँ का प्यार प्रभा जी की चोटी किए और तलवों में तेल लगाए बिना नहीं मानता था। अब प्रभा खेतान ने बाहर की दुनिया में कदम रखा था। प्रभा खेतान अकेली मारवाड़ी लड़की थीं, जिसने प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया था। जहाँ लड़के-लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते थे। प्रेसिडेंसी कॉलेज में मारवाड़ी होने के कारण प्रभा खेतान को अपमान सहना पड़ा। उस समय मारवाड़ियों को ‘मेडो’ कहा जाता था। उनसे कहा जाता था कि उनके कारण बंगाल बरबाद हुआ है। इन्हीं में से कुछ दोस्त भी बन गए, फिर भी प्रभा खेतान के प्रति ईर्ष्या का भाव कुछ सहपाठियों के मन में था। इसका कारण प्रभा खेतान का ‘खेतान हाऊस’ से होना था। मारवाड़ियों के खाने-पीने, ओढ़ने का मज़ाक बनाया जाता था। मारवाड़ियों ने भी बंगाल में आकर बंगाल को पूरी तरह अपनाया नहीं था। कॉलेज में प्रभा खेतान को खुली दुनिया मिली थी। वे अपनी अम्मा, स्कूल की हेड मिस्ट्रेस बसु और मन्नू भंडारी की तरह नहीं होना चाहती हैं। क्योंकि इन औरतों को प्रभा खेतान ने प्यार के लिए तरसते देखा, रोते हुए देखा।
प्रभा खेतान को कॉलेज का माहौल अच्छा लगा। एक तरफ कम्युनिस्ट लड़के जो साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद से लड़ना चाहते हैं, तो दूसरी ओर वे छात्र हैं, जो गंदे भारत से पलायन करना चाहते हैं। एक तिसरा मोर्चा अध्यापकों का है, जो कम्युनिस्टों के खिलाफ हैं और हमेशा पढ़ाई की बातें करते हैं। ऐसे माहौल ने प्रभा खेतान को बहुत सिखाया। इसी समय उनके घर में क्रांति की जगह औद्योगिक क्रांति की बात चलती। इस घर की बहस में कभी-कभार प्रभा खेतान कम्युनिस्टों की बात करती तो , उन्हें डाँट खानी पड़ती । प्रभा खेतान को एस. एफ. का एक छात्र अच्छा लगता है, जो हमेशा क्रांति की बात करता था।
प्रभा खेतान को डॉ. चटर्जी के रूप में एक अच्छे गुरू मिले थे। उन्होंने प्रभा खेतान की ज्ञान पिपासा को बढ़ाया। प्रभा को अच्छी-अच्छी किताबों के नाम बताए। कोई समस्या होती, तो स्टॉफ रूम से लेकर घर तक के द्वार खुले थे। गुरू दक्षिणा माँगते हुए कहा,“..... स्त्री होना कोई अपराध नहीं पर नारीत्व की आसूँ भरी नियती स्वीकारना बहुत बड़ा अपराध है। अपनी नियती को बदल सको तो वह एकलव्य की गुरुदक्षिणा होगी।” प्रभा खेतान पुरुष का यह रूप अवाक् देखती रह गई।
सन् 1965 ई. में एम.ए. फाइनल की परीक्षा थी। अब कॉलेज की बातें और दोस्त पीछे छूट चुके थे। अब प्रभा खेतान का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना था। प्रभा खेतान के सिर में कुछ दिनों से दर्द था। इसलिए उनकी बहन गीता ने आँखों का चेकअप करवा लेने के लिए कहा और डॉ.सराफ से एप्वाइंटमेंट भी ले ली थी। डॉ. सराफ को पहली बार देखकर प्रभा खेतान को लगा, “पहली बार जब मैंने उन्हें देखा तो पता नहीं क्यों मुझे लगा कि इस व्यक्ति का मेरे जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान होगा।” प्रभा खेतान को जो लगा वही हुआ। वे डॉ. सराफ को अपना दिल दे बैठी। उनकी अब तक की जिन्दगी में प्रभा खेतान को डॉ. सराफ के बाहों में सुरक्षितता महसूस हुई। कुछ ही समय में दोनों एक हो गए। प्रभा खेतान इन संबंधों को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन डॉ. सराफ ऐसा करने से मना करते हैं। वे शादीशुदा और पाँच बच्चों के पिता भी थे। डॉ. सराफ के विवाहेत्तर संबंध थे। वे अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं थे। क्योंकि उनकी शादी उनके मर्जी से नहीं हुई थी। डॉ. सराफ अन्य संबंधो के बारे में कमज़ोर नहीं हुए थे, लेकिन प्रभा खेतान के संबंधों को लेकर कमज़ोर दिखाई देते हैं। डॉ. सराफ समाज से डरते हैं। लेकिन प्रभा खेतान प्यार में पूरी तरह डूब चुकी थीं। उन्हें अपने अब तक के जीवन में डॉ. सराफ की बाहों में सबसे ज्यादा प्यार मिला था और सुरक्षित महसूस कर रही थी। डॉ. सराफ प्रभा खेतान की नादानी का फायदा नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए दूर रहने की बात प्रभा जी से कह चुके थे। लेकिन प्रभा खेतान एक दम जिद्दी थी। उन्हें भविष्य की कोई चिंता नहीं थी। इस बारे में प्रभा खेतान भी जानती थी, इसलिए लिखती हैं, “….मुझे पता था जिस राह पर में चल पड़ी हूँ वह गलत-सही जो भी हो पर वहाँ से वापस मुड़ना सम्भव नहीं। इसे ही प्रेम कहते हैं और मुझे अपने प्यार पर पूरा भरोसा था।” इस तरह प्रभा खेतान का डॉ. सराफ से मिलना चलता रहा। प्रभा खेतान का प्यार केवल देह तक नहीं था, लेकिन देह को छोड़कर भी नहीं था।
डॉ. सराफ से पहले भी किसी ने प्रभा खेतान के देह से संबंध रखा था। यह बचपन की घटना है, घर के ही किसी सदस्य ने उनके साथ दुष्कर्म किया था। दाई माँ ने उस समय चुप रहने के लिए कहा था। कभी-कभी डॉ. सराफ प्रभा खेतान के पास होते हुए भी कहीं खो जाते थे। डॉ. सराफ अपनी खोल में सिमटे रहना चाहते हैं और प्रभा खेतान इस संबंध को कोई नाम दे नहीं पा रही थी। प्रभा खेतान के लिए प्यार का मतलब प्यार था, वे समाज, परिवार सबकी सीमाओं को लांघते हुए प्यार कर रही थी। कभी-कभी अपने प्यार के बारे में किसी को बताने की इच्छा होती थी, पर ऐसे प्यार के बारे में किसी को क्या बताए। अपनी बहन गीता और सहेलियों को बताया तो उनका उत्तर सुनकर प्रभा खेतान को दुख ही हुआ। पर वह इस प्रेम मार्ग से डगमगाई नहीं।
कुछ दिनों के बाद डॉ.सराफ के प्रेम के बारे में उनकी पत्नी और रिश्तेदारों को पत्ता चल जाता है। लेकिन दोनों का मिलना वैसे ही रहा जैसे पहले चलता था। प्रभा खेतान ने अपने प्यार की चर्चा दाई माँ से कि तो वह देखते ही रह गई। प्रभा खेतान के आने-जाने पर किसी की नज़र नहीं थी। सब अपने काम में व्यस्त थे। गीता कभी-कभार देख लेती थी। इसी बीच प्रभा खेतान के पेट में गर्भ रह जाता है। दोनों एक-दूसरे को दोष देते हैं। बच्चा गिराया जाता है। प्रभा खेतान एकदम बेखौफ होकर डॉक्टर साहब से दिन के उजाले में मिलना चाहती है और डॉक्टर साहब के परिवार का एक हिस्सा बनना चाहती है। डॉक्टर साहब से रोज़ मिलने का बहाना न बनाना पड़े इसलिए प्रभा खेतान डॉ. सराफ के यहाँ 300 रूपये वेतन पर सेक्रेटरी काम करने लगती है। उस समय प्रभा खेतान के लिए 300 रूपये काफी थे, वे ज्यादा महत्वाकांक्षी भी नहीं थी। प्रभा खेतान ने एम.ए. अच्छे नंबरों से पास किया। यह वह समय था, जब कोलकाता में छात्रों द्वारा क्रांति की बातें हो रही थीं। हर तरफ चर्चाएँ चल रही थीं, तो दूसरी तरफ छात्रों का एक ऐसा वर्ग था , जो विदेश जाने की तैयारी करने लगा था या इन क्रांति की बातों से दूर रहना चाहता था।
एक दिन डॉ. सराफ के पत्नी की सहेली प्रभा खेतान का अस्पताल में आकर अपमान करती हैं, जिसे प्रभा खेतान सह नहीं पाती है। वे दुखी होकर पाँडीचेरी के अरविंद आश्रम चली जाती हैं, वहाँ उनका मन नहीं लगता। डॉ. सराफ फोन पर उनको मनाने का भरसक प्रयास करते हैं। प्रभा खेतान कोलकाता वापस आती है। कुछ ही दिनों में प्रभा खेतान को लायन्स क्लब के यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत अमेरिका जाने का मौका मिलता है। डॉ.सराफ ने ही प्रभा खेतान का नाम मनोनित किया था। वे लायन्स क्लब एक मानक सदस्य थे। सन् 1966 में प्रभा खेतान पहली बार विदेशी जमीन पर पैर रखती है।
प्रभा खेतान अमेरिका में डॉ. ड्यूपांट के यहाँ नौकरी करती हैं। डॉ. ड्यूपांट डॉ. सराफ के दोस्त थे। प्रभा खेतान को डॉ. ड्यूपांट की 70 वर्षीय सेक्रेटरी आयलीन के साथ रहती है। आयलीन वाचाल है, लेकिन दिल की अच्छी है। आयलीन के घर में चार कुत्ते हैं। कुत्तों के कारण प्रभा खेतान और आयलिन में नोक-झोंक होती है। फिर भी दोनों साथ-साथ रहने लगती हैं। डॉ. ड्यूपांट की पत्नी प्रभा खेतान के साथ अच्छा बर्ताव करती है। मिसेज ड्यूपांट ने आयलीन को अपने पति पर नज़र रखने के लिए रखा था। डॉ. ड्यूपांट के हॉलीवूड की अभिनेत्री क्लारा ब्राउन के साथ संबंध थे। इस संबंध के कारण ही डॉ. ड्यूपांट को हॉलीवूड के ग्राहक मिलते थे। प्रभा खेतान को भारतीय और अमेरिकन स्त्री के दर्द में कोई फरक नज़र नहीं आता। मरील मिसेज ड्यूपांट के लिए वार्डरोब मैनेज करती है। वह हँसोड़ और ज़िन्दादिल स्त्री है। मरील तलाकशुदा है। मरील ही प्रभा खेतान को डॉ. ड्यूपांट और क्लारा ब्राउन के संबंधों के बारे में बताती है। मरील प्रभा खेतान को बेवरली हिल हेल्थ क्लब ले जाती है, जिसे मिसेज डायना त्रातस्की चलाती है। यहाँ पर प्रभा खेतान ब्युटी थेरपी का कोर्स करती है।
प्रभा खेतान अपने जीवन और प्रेम के बारे में आइलीन को बताती है। आइलीन को यह संबंध अच्छे नहीं लगते। वह प्रभा खेतान को समझाती है। अपने भतीजे जेफ से मिलवाती है, लेकिन प्रभा खेतान जेफ से ना कह देती है। जेफ प्रभा खेतान से प्यार करता है। नए साल की पहली तारीख को आइलीन की मृत्यु ल्यूकोमिया से हो जाती है। प्रभा खेतान कुछ समय के लिए मरील के यहाँ रहती हैं। प्रभा खेतान के परिवार वाले और डॉक्टर सराफ चाहते हैं कि प्रभा खेतान कुछ दिन अमेरिका में रहे और कहीं काम ढूँढ़ ले। लेकिन प्रभा खेतान भारत वापस आती है।
अमेरिका की पहली यात्रा से लौटकर प्रभा खेतान ने फिगरेट नाम से हेल्थ क्लब खोला था। सन् 1970 में इसी हेल्थ क्लब से 25-30 हजार महीने की आय हो जाती थी। यह उनके लिए बड़ी आर्थिक उपलब्धी थी। लेकिन धीरे-धीरे यह काम उबाऊ लगने लगता है। डॉ.साहब की पत्नी दुखी थी और प्रभा खेतान भी। दोनों का हाल एक जैसा ही था। प्रभा खेतान डॉ. सराफ के यहाँ जब पार्टी होती थी, तो वे खाना बनाती थीं। डॉ.सराफ के व्यक्तित्व में परिवर्तन आता है। प्रभा खेतान से मिलने वाले पर नज़र रखने लगते हैं।
डॉ. सराफ उनकी हर फाइल देखते थे, कमाई का हिसाब रखते थे। डॉ. सराफ प्रभा खेतान के अभिभावक बन गए थे। उनको प्रभा खेतान की जरूरत थी। वे अपने बेटे नीरज को गोद लेने की बात प्रभा खेतान से करते हैं। प्रभा खेतान जानती थी कि जिन लोगों ने पच्चीस साल में कभी उन्हें स्वीकार नहीं किया, वे अब क्या स्वीकारेंगे? प्रभा खेतान को शादी न होने का उतना दुख नहीं है, इसके बारे में वे लिखती हैं, “शादी न होने का मुझे उतना दुख नहीं है। मेरा सबसे बड़ा दुख है कि एक विवाहित पुरुष से मेरे नाम का जुड़ा होना, लोग मुझे आपकी रखैल कहते हैं।” प्रभा खेतान शादी करना चाहती है, पर डॉ.सराफ के साथ के संबंध को लेकर जो दाग उनपर लगा था, क्या होने वाला पति उसे स्वीकारेगा। इस विषय में डॉ. सर्राफ और उनके मित्रों राय नकारात्मक आती है। शादी वाली बात इस तरह टलती गई।
बंगाल में माहौल खराब हो जाता है, जिसका फिगरेट पर भी असर पड़ता है। डॉ. सर्राफ को धमकी वाले फोन आता है, दस लाख रूपये की माँग की जाती है। सन् 1968-72 तक बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। धीरे-धीरे प्रभा खेतान और डॉ. सर्राफ के संबंधों से प्यार गायब हो रहा था, वे बहुत कम मिल पा रहे थे। प्रभा खेतान प्रतिक्षा करती ही रह जाती है। कभी-कभी उनको लगता है, वे क्यों लोगों के लिए जीती है, अपने लिए क्यों नहीं जीती। मारवाड़ी समाज प्रभा खेतान को एक अलग ही नज़र से देखता था। प्रभा खेतान इन सबसे बचने के लिए निर्यात का व्यापार करना चाहती हैं। जिससे वे देश-विदेश घूम सकें। उन्होंने बड़ी मुश्किल से कपड़े का व्यापार शुरू किया था। शुरूआत में दिक्कतें आईं, लेकिन धीरे-धीरे हल निकलता गया। मिस्टर बासु के साथ प्रभा खेतान ने कम्पनी शुरू की थी। विदेशी व्यापारियों से मिलने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। डॉ.सर्राफ से इस व्यापार को लेकर हर समय झगड़ा होता था।
प्रभा खेतान को बाहरी दुनिया में आकर अच्छा लगने लगता था। वे लिखती हैं, “ बाहरी दुनिया में कदम रखते ही मेरी कार्य-क्षमता दुगुनी हो गई। एक असह्य यथार्थ से पलायन कर रही थी, मैं केवल डॉक्टर साहब की होकर नहीं रह गई थी। लोगों से मैं कहना चाहतॉ, डॉक्टर से अलग भी मेरी कोई हैसियत है। मैं भी कुछ हूँ।” इस समय वर्ग संघर्ष समझने आने लगा था। इस समय व्यापारी थी, अपनी प्रगति करना चाहती थी। वे लिखती हैं, “ स्त्री के रूप में चाहे दलित और शोषित थी मगर व्यापार की दुनिया में व्यापारी पुरूषों के मूल्य-बोध ही स्वीकार रही थी।” एक तरफ प्रभा खेतान व्यापार में प्रगति कर रही थीं, तो दूसरी तरफ प्रभा खेतान और डॉ. सर्राफ के बीच दूरियाँ बढ़ने लगी थीं। प्रभा खेतान के काम से कभी-कभी डॉक्टर चिढ़ते थे। उन्हें प्रभा खेतान का व्यापारियों के साथ हँसकर बात करना पसंद नहीं था। वे सिर्फ पुरूष को ही मालिक मानते थे। इसलिए प्रभा खेतान की प्रगति उनसे देखी नहीं जाती। प्रभा खेतान उन्हें छोड़ नहीं पा रही थीं। प्रभा खेतान को अपनी इस कमज़ोरी पर गुस्सा आता था। प्रभा खेतान का बयालीस की उम्र में मोनोपॉस हो जाता है, जिससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है।
प्रभा खेतान तीन स्तरों पर आगे बढ़ रही थीं – व्यापर, सृजन और निजी जीवन। लेकिन तीनों समान रूप से आगे बढ़ नहीं पा रहे थे। निजी जिन्दगी में तनाव दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा था। डॉ. सर्राफ लायंस क्लब के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव में गवर्नर पद की उम्मीदवारी हेतु खड़े हुए थे। चुनाव के एक दिन पहले शाम को पार्टी दी गई। प्रभा खेतान ही पार्टी की सारी व्यवस्था कर रही थी। डॉ. सर्राफ की पत्नी पीहर बरहज गई हुई थीं। प्रभा खेतान को पार्टी में आई हुई स्त्रियाँ समझाती हैं, पार्टी में उनकी नहीं डॉ.सर्राफ की पत्नी की आवश्यकता है। इस तरह हर जगह उनका अपमान होता रहा है।
डॉ. सर्राफ चाहते थे कि प्रभा खेतान व्यापार छोड़ दे और उनका बेटा नीरज इस व्यापार को संभाले। पर प्रभा खेतान इस प्रस्ताव को ठुकराती हैं। वे जानती थी कि इसी व्यापार की व्यस्तताओं के कारण आजतक जी पाई हैं। वे लिखती हैं, “ऑफिस के ये आठ-दस घंटे, यह व्यस्तता और भागदौड़ इसी के सहारे तो मैं जी पा रही हूँ। मेरे पास मेरा काम नहीं होता तो न जाने मैं क्या करती। कैसे अपने खाली क्षणों को भरती।” प्रभा खेतान ने अपनी पहचान डॉ. सर्राफ के परिवार में बनानी चाही, पर वे इसमें कभी कामयाब हो नहीं पायी। वे दूसरी औरत बनकर ही रह गयी। अब इन बातों की उन्हें आदत हो गई थी। वे अब डॉ. सर्राफ से उलझना नहीं चाहती हैं। इसलिए कहती हैं,....गम और भी है दुनिया मे मुहब्बत के सिवा...। प्रभा खेतान कोलकाता चेम्बर ऑफ कॉमर्स की पहली महिला अध्यक्ष बनी।
प्रभा खेतान ने बंगाली समाज और मारवाड़ी समाज के बारे में भी लिखा हैं। इन दोनों समाजों के संबंध कभी सहज नहीं हो पाए। दोनों की एक दूसरे के प्रति कुछ धारणाएँ बनी हुई थी। बंगाल में जहाँ सुधारवाद की मार्क्सवादी हवा बह रही थी, वहीं मारवाड़ी समाज यथास्थितिवादी बना रहा। बंगाल में मारवाड़ी लोग अल्पसंख्यक थे। वे अपने तक ही सीमित होकर रह गए। प्रभा खेतान लिखती हैं, “आम मारवाड़ी की इससे भयानक उपेक्षा हुई। आम मारवाड़ी स्थानीय बंगाली समाज से मिलने, उनके साथ एक तार होने के बदले एक अजीब तरह की घेट्टो मानसिकता से आक्रांन्त रहा। रोज़ी-रोटी के लिए बंगाल में रहना जरूरी था मगर बंगाली से वह भयभीत भी था।” बंगाली लोग मारवाड़ियों को लुटेरे कहते थे। मारवाड़ी ने अगर बंगाली लड़की से शादी की तो उसे बिरादरी के बाहर निकाल दिया जाता था। वह मुख्यधारा से कट जाता था। बंगाल में सौ साल रहने के बावजूद मारवाड़ी स्वंय को प्रवासी ही कहता है।
जब लोग उन्हें जिन्दगी के उद्देश्य और आदर्श के बारे में पूछते हैं, वे बताती हैं, “लेकिन मैंने शुरू से ही गलत नक्शा थाम रखा है, तब क्या मैं कभी अपने गन्तव्य स्थल पर पहुँच ही नहीं पाऊँगी? चाहे जितनी मेहनत करूँ, चाहे जितनी अपनी गति तेज़ कर लूँ, क्या मेरे जीवन का नक्शा नहीं बदलेगा? अपनी तमाम ईमानदारी, अपनी कुल आशावादिता के बावजूद क्या मुझे मेरी मंजिल का पता नहीं मालूम पड़ेगा?”
एक समय ऐसा आता है, जब प्रभा खेतान डॉक्टर को छोड़ना चाहती हैं, पर छोड़ नहीं पाती हैं। डॉक्टर को प्रभा खेतान का व्यापारी जीवन नहीं भा रहा था। उनका मन किसी और स्त्री में अटक गया था। डॉक्टर को प्रभा खेतान में पारम्पारिक स्त्री का रूप नहीं दिखाई दे रहा था। इसलिए वे कहते हैं, “ कहाँ गई तुम्हारी कविताएँ? क्यों खतम हो गए वे सब रोमांटिक सपने? तुम बेहद दबंग हो, पुरूषों की तरह सोचने लगी...इस व्यापार की दुनिया ने तुम्हें बदलकर रख दिया। इतनी व्यवहार-कुशल, नपी तुली बातें क्यों करती हो?” इस तरह प्रभा खेतान में पहली वाली प्रभा खेतान न पाकर डॉक्टर शिकायत करने लगते हैं। प्रभा खेतान जो अबतक डॉक्टर सर्राफ पर विश्वास करती थीं, डॉक्टर के प्रति उनके मन में सवालों का बवंडर खड़ा होता हैं। डॉक्टर के इस व्यवहार से तंग आकर एक व्यक्ति से एक-दो बार शारीरिक संबंध भी रखती हैं। लेकिन मन नहीं मिल पाता है। ऐसा केवल डॉक्टर से बदला लेने के लिए किया गया था। उनको कुछ समय बाद इस बात का पश्चतावा होता हैं। यह क्षणों का आवेग था। इसमें उनका कोई अपराध नहीं था। प्रभा खेतान प्यार को देह आधारित नहीं मानती हैं। वे लिखती हैं, “...प्रेम कभी देह आधारित नहीं हुआ करता, देह की भूमिका गौण है। फ्रॉयड महाराज इसे चाहे जिस ग्रन्थि का नाम दें मगर मन एक है। जिसे चेतन-अचेतन में भी विभक्त नहीं किया जा सकता। यह मन ही समर्पण की आज्ञा देता है।” प्रभा खेतान ने कभी अपने प्यार को देह तक ही सीमित नहीं रखा, वे देह को भी चाहती थी, पर उस पुरूष के शरीर के माध्यम से अपने देह और मन को जानना भी। वे प्रेम से ज्यादा महत्व उन्होंने एक-दूसरें के प्रति मानवीय लगाव और करूणा को दिया।
प्रभा खेतान ने आत्मकथा विधा के बारे में भी लिखा है। आत्मकथाकार अपनी आत्मकथा में जो बताना चाहता है, उसे उसी रूप में लेने और न लेने का पूरा स्वातंत्र्य पाठक के पास होता है। वे लिखती है, “वैसे आत्मकथा लिखना तो स्ट्रीप्टीस का नाच है। आप चौराहे पर एक-एक कर कपड़े उतारते जाते हैं। लिखनेवाले के मन में आत्मप्रदर्शन का भाव किसी-न-किसी रूप में मौजूद रहता है, मन के किसी कोने में हल्की-सी चाहत रहती है कि लोग उसे गलत नहीं समझें कि जो कुछ भी वह लिख रही है उसे सही परिप्रेक्ष्य में लिया जाए, पर दर्शक वृन्द अपना-अपना निर्णय लेने में स्वतंत्र हैं। उनका मन, वे इस नाच को देखें या फिर पलटकर चले जाएँ।” प्रभा खेतान ने स्पष्ट कर दिया है कि आत्मकथाकार किसी-न-किसी रूप में आत्मप्रर्दशन करता ही है। आत्मकथा को महत्व रेखांकित करते हुए, वे आत्मकथा को उपन्यास से अधिक महत्व देती है। वे आत्मकथा का जीवन उपन्यास से अधिक मानती हैं।
डॉक्टर सर्राफ को प्रोस्टेट कैंसर हुआ था। वे अमेरिका से ईलाज करवाकर आते हैं। अमेरिका के डॉक्टरों के अनुसार कैंसर पूरे शरीर में फैल गया था, और वे महिने दो महिने के मेहमान थे। प्रभा खेतान को अकेले मिलकर दो साल जीने की बात करते हैं। वे चाहते हैं, इन दो सालों में सारी वसीहत ठीक करके परलोक सीधारा जाए। वे प्रभा खेतान को साईबाबा से दो साल माँगने के लिए भी कहते हैं। यह कहते हुए वे प्रभा खेतान की गोद में मुँह छुपाकर फूट-फूटकर रोते हैं। डॉक्टर की पत्नी और अन्य लोग भी प्रभा खेतान को कहते हैं कि अब आप ही इन्हें सम्भाल सकती है। डॉक्टर भी कहते हैं कि मुझे छोड़कर कहीं मत जाना। यह वाक्य सुनकर प्रभा खेतान का मन रोने लगता है। वे इस अचानक आये हुए परिवर्तन पर लिखती हैं, “अचानक एक गैर-जरूरी रिश्ता न केवल डॉक्टर साहब के लिए बल्कि पूरे परिवार के लिए बड़ा जरूरी हो गया था” प्रभा खेतान जब अकेले रहेना की सोच रही थीं, तब उन्हें इस अचानक आई हुई जिम्मेदारी को निभाना पड़ा। वे डॉक्टर के लिए रात-रात जागती थीं। किमो थेरेपी के कारण डॉक्टर कुछ समय के लिए ठीक हुये। इसे चमत्कार ही कहा जाएगा।
प्रभा खेतान अपने काम से मिलान जा रही थीं। तो उन्हें डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट पकड़ा दी और उसे कैंसर अस्पताल के डॉक्टर कैमियानी से मिलने के लिए कहा। कैमियानी ने रीपोर्ट देखने के बाद कहा है कि बीमारी कभी भी खराब रूप ले सकती है, क्योंकि फेफड़ों में कैंसर का दाग स्पष्ट दिखाई दे रहा है। प्रभा खेतान को डॉक्टर से मिलने से पहले मिलान शहर रंगीन लग रहा था, लेकिन अब सबकुछ एकरंगी दिखाई देने लगता है। उनका व्यापारी मित्रों के साथ भी मन नहीं लगता है। अतीत की बहुत सारी बातें याद आती हैं। वे कुछ दिनों बाद भारत लौट आती हैं। डॉक्टर साहब को कुछ नहीं बताती। डॉक्टर को इलाज के लिए मुम्बई भेजा गया। वहाँ उनका देहान्त हो जाता है। जनवरी सन् 1993 में डॉक्टर साहब का देहांत हुआ। इस समय प्रभा खेतान की उम्र पचास साल थी। डॉक्टर साहब जाते-जाते अपनी तलाकशुदा बेटी उषा की शादी की जिम्मेदारी प्रभा खेतान पर सौंप जाते हैं। अर्थी के समय भी प्रभा खेतान को अंत में डॉक्टर साहब के दर्शन करने को मिलते हैं। प्रभा खेतान अपने प्यार को पर्याप्त नहीं मानती हैं। वे अपने प्यार के बारे में लिखती हैं,“.....हमारा प्यार हमारी जिंदगी का चाहे जितना बड़ा हिस्सा हो किन्तु पर्याप्त नहीं था। प्यार को कार्य रूप में परिणत करने के लिए जिस साहस की जरूरत पड़ती है हमारे पास वह नहीं था। हम दोनों बड़े बुझदिल इंसान थे।” डॉक्टर साहब को याद करते हुए लोगों ने उनकी पत्नी और बच्चों को छोड़कर जाने का ज़िक्र तो किया, पर प्रभा खेतान का कहीं नाम नहीं लिया गया। यहीं पर आत्मकथा समाप्त होती है।
2.1.11 एक कहानी यह भी – मन्नू भंडारी (सन् 2007)
मन्नू भंडारी की आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ सन् 2007 में प्रकाशित हुई। मन्नू भंडारी अपनी आत्मकथा को आत्मकथ्य कहती हैं, उनके अनुसार, “यह मेरी आत्मकथा कतई नहीं है, इसीलिए इसका शीर्षक भी ‘एक कहानी यह भी’ ही रखा। जिस तरह कहानी जिंदगी का एक अंश मात्र ही होती है, एक पक्ष, एक पहलू, उसी तरह यह भी मेरी जिन्दगी का एक अंश मात्र ही होती है, जो मुख्यतः मेरे लेखन और मेरी लेखकीय यात्रा पर केन्द्रित है। बचपन और किशोरावस्था के मेरे सम्पर्क-सम्बन्ध (जिसमें माँ-पिता, भाई-बहिन, मित्र-अध्यापक आदि हैं) और परिवेश तो है ही, जिसमें मेरे लेखकीय व्यक्तित्व की नींव पड़ी थी।” आत्मकथा में कहा किसी का पूरा जीवन व्यक्त हो पाता है। यह मन्नू भंडारी जी की ईमानदारी का एक नमूना मात्र है। इस आत्मकथा में इसका प्रतय बार-बार पाठक को होगा। मन्नू जी अपनी आत्मकथा का आरंभ अपने बचपन की यादों से करती हैं, यही वह परिवेश हैं जहाँ उनको पढ़ने-लिखने की लत लग गई थी। वे अपने बचपन के बारे में बताती हैं, “ जन्मी तो मध्यप्रदेश के भानपुरा गाँव में थी, लेकिन मेरी यादों का सिललिला शुरु होता है अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के उस दो-मंजिला मकान से , जिसकी ऊपरी मंज़िल में पिता का साम्राज्य था। वहाँ निहायत अव्यवस्थित ढंग से फैली-बिखरी पुस्तकों-पत्रिकाओं और अख़बारों के बीच वे या तो कुछ पढ़ते रहते थे या फिर ‘डिक्टेशन’ देते रहते थे। नीचे हम सब भाई-बहिनों के साथ रहती थीं। हमारी बेपढ़ी-लिखी व्यक्तित्वहीन माँ- सवेरे से शाम तक हम सबकी इच्छाओं और पिताजी की आज्ञाओं का पालन करने के लिए सदैव तत्पर। अजमेर से पहले पिताजी इन्दौर में थे, जहाँ उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी, सम्मान था, नाम था। कांग्रेस के साथ-साथ वे समाज-सुधार के कामों से भी जुड़े हुए थे।....ये उनकी खुशहाली के दिन थे और उन दिनों उनकी दरियादिली के चर्चे भी कम नहीं थे। एक ओर वे बेहद कोमल और संवेदनशील व्यक्ति थे तो दूसरी ओर बेहद क्रोधी और अहंवादी।” मन्नू जी ने अपने पिता के दोनों पक्षों को बखूबी रेखांकित किया है। उनके पिता आर्य समाजी थे, पर वे हवन-यज्ञ या मन्त्रोच्चार से दूर थे। मन्नू जी अपने पिता के क्रांतिकारी कार्यों के बारे में लिखती हैं, “आर्यसमाजियों वाले हवन-यज्ञ और मन्त्रोच्चार भी कभी नहीं हुए हमारे यहाँ। पिताजी ने उनका समाज-सुधारवाला पक्ष ही अपनाया था। आज से क़रीब अड़सठ साल पहले बिना घूँघट-पर्दे के की गई बहिन की शादी काफ़ी क्रान्तिकारी कदम था। लड़कियों को लड़कों की तरह पढ़ाना... बाल-विवाह और अन्य सामाजिक कुरीतियों का विरोध.... आडम्बरों और ढकोसलों की छुट्टी, बचपन से यही सब देखा हमने।” इन सबका असर मन्नू जी पड़ा है। उनके पिता का वात्सल्य से भरा रूप तब दिखाई देता जब उनके कोश का कोई नया भाग छपकर आता या कोई बहुत बड़ा ‘आर्डर’ आता। यह दिन उनके घर के लिए त्यौहार का दिन होता। मन्नू जी के पिता को इन्दौर से अजमेर आने पर अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश के अधूरे काम को आगे बढ़ाना था, इस काम में यश और प्रतिष्ठा तो थी पर पैसा नहीं था। उनके पिता की आर्थिक हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती ही जाती है, जिसके लिए वे अपने पिता की आदतों को जिम्मेदार ठहराती हैं, इस विषय में मन्नू जी लिखती हैं, “सिकुड़ती आर्थिक स्थिति के कारण और अधिक विस्फारित उनका अहं उन्हें इस बात तक की अनुमति नहीं देता था कि वे कम-से-कम अपने बच्चों को तो अपनी आर्थिक विवशताओं का भागीदार बनाएँ। नवाबी आदतें, अधूरी महत्त्वाकांक्षाएँ, हमेशा शीर्ष पर रहने के बाद हाशिए पर सरकते चल जाने की यातना क्रोध बनकर हमेशा माँ को कँपाती-थरथराती रहती थी। अपनों के हाथों विश्वासघात की जाने कैसी गहरी चोटें होंगी वे, जिन्होंने आँख मूँदकर सबका विश्वास करनेवाले पिता को बाद के दिनों में इतना शक्की बना दिया था कि जब-तब हम लोग भी उसकी चपेट में आ जाते।”
पिता ने मन्नू जी के मन में एक हिन भाव बचपन में ही भर दी थी, वे इस विषय में लिखती हैं, “मैं काली हूँ बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिताजी की कमज़ोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी, खूब गोरी, स्वस्थ्य और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और फिर उसकी प्रशंसा ने ही क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीनभाव की ग्रन्थि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई ?...शायद अचतेन की किसी पर्त के नीचे दबी इसी हीन भावना के चलते ही मैं अपनी किसी भी उपलब्धि पर भरोसा नहीं कर पाती... सब कुछ मुझे तुक्का ही लगता है।” पिता के स्वभाव की यह सारी बातें मन्नू जी की जिंदगी भर किसी-न-किसी रूप में पीछा करती ही रही है। पिता की इन बातों से वे पूरी तरह मुक्त हो नहीं पाई। पिता का यह अन्तर्विरोधों भरा व्यक्तित्व हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करता रहा पर वे उनपर कभी क़लम नहीं चला पाईं। पिता के विपरीत उनकी माँ थी, वे अपने माँ के बारे में लिखती हैं , “पिता के ठीक विपरीत थीं हमारी बेपढ़ी-लिखी माँ। धरती से कुछ ज्य़ादा ही धैर्य और सहनशक्ति थी शायद उनमें। पिताजी की हर ज्य़ादती को अपना प्राप्य और बच्चों की हर उचित-अनुचित फ़रमायश और ज़िद को अपना फ़र्ज़ समझकर बड़े ही सहज भाव से स्वीकार करती थीं वे। उन्होंने ज़िन्दगी भर अपने लिए कुछ माँगा नहीं, चाहा नहीं...केवल दिया ही दिया। हम भाई-बहिनों का सारा लगाव (शायद सहानुभूति से उपजा) माँ के साथ था, लेकिन निहायत असहाय मजबूरी में लिपटा उनका यह त्याग कभी मेरा आदर्श नहीं बन सका...न उनका त्याग, न उनकी सहिष्णुता।” मन्नू जी को अपनी माँ के व्यक्तित्व ने कभी प्रेरित नहीं किया। पिता के विचार, व्यवहार और उनके प्रति के बर्ताव का असर उनपर जीवनभर रहा।
मन्नू जी के साहित्य से परिचय के दिनों में प्रथम परिचय अनूदित शरत-साहित्य एवं प्रेमचंद की किताबें सो होता है। इनकी पढ़ाई एवं साहित्य और जीवन के प्रति समझ विकसित करने में हिन्दी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्हीं के कहने पर अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा का साहित्य पढ़ा। वे इन उपन्यासों के बारे में लिखती हैं, “सुनीता(उपन्यास) बहुत अच्छा लगा था। अज्ञेय जी का उपन्यास शेखर: एक जीवनी पढ़ा ज़रूर, पर उस समय वह मेरी समझ के सीमित दायरे में समा नहीं पाया था। कुछ सालों के बाद नदी के द्वीप पढ़ा तो उसने मन को इस क़दर बाँधा कि उसकी झोंक में शेखर को फिर से पढ़ गई...इस बार कुछ समझ के साथ। यह शायद मूल्यों के मंथन का युग था...पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सही-ग़लत की बनी-बनाई धारणाओं के आगे प्रश्नचिन्ह ही नहीं लग रहे थे. उन्हें ध्वस्त भी किया जा रहा था।” इन सब उपन्यासों को लेकर शीला अग्रवाल से लम्बी बहसें भी मन्नू जी ने की। यशपाल के क्रान्तिकारी जीवन के प्रभाव के कारण उनको अपना प्रिय लेखक मानती थीं। शीला जी का साथ मन्नूजी को अपने पिता द्वारा खिंची लक्ष्मण रेखा को लाँघने को कहता है। अपने क्रोधी पिता से भी उन्होंने टक्कर ली, उन्हीं के शब्दों , “ जब रगों में लहू की जगह लावा बहता हो तो सारे निषेध, सारी वर्जनाएँ और सारा भय कैसे ध्वस्त हो जाता है, यह तभी जाना और अपने क्रोध से सबको थरथरा देनेवाले पिताजी से टक्कर लेने का जो सिलसिला तब शुरु हुआ था, राजेन्द्र से शादी की, तब तक वह चलता ही रहा।” यही विद्रोही स्वभाव अपने पिता के लिए गर्व से सर ऊँचा करने का कारण भी बना। स्कूल में लड़कियों का नेतृत्व और शहर के मुख्य बाज़ार के चौराहै पर भरी सभा में भाषण दिया। इन कार्यों से उनके पिता काफी प्रसन्न थे।
जल्द ही शीला अग्रवाल का साथ छूट गया । शीला अग्रवाल को छात्राओं को भड़काने के आरोप में कॉलेज से निकाल दिया गया। अब मन्नू जी के लिए अजमेर में कोई आकर्षण नहीं रहा। वे अपने बड़े भाई-बहिनों के पास कोलकाता चली जाती हैं। कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ाई न होने का उन्हें दुख है। मन्नू जी ने निजी तौर पर अपनी एम.ए तक की पढ़ाई पूरी की। अजमेर में शीला जी ने उनका मार्गदर्शन किया था तो कोलकाता में बड़ी बहिन सुशीला के प्यार की छत्रछाया थी, इसका ज़िक्र करना वे नहीं भूलती हैं, “...सुशीला ने जब-तब मेरे अस्तित्व को ही बचाया। अपने सारे दुख-दर्द, हारी-बीमारी, नौकरी के साथ बच्ची को पालने के संकट, नसें चटका देनेवाले मानसिक आघात और भावनात्मक झटके, तब से लेकर आज तक, मैं उसी के सहारे झेलती आई हूँ।”
मन्नू जी को दो लोगों का व्यवहार अधिक प्रिय लगा। इन दोनों पर वे चाहकर भी कोई कहानी लिख नहीं पाई। एक है – मन्नू जी को ‘बालीगंज शिक्षा सदन’ नामक स्कूल में एम.ए के बाद नौकरी मिल गई थी, इस स्कूल की प्रिंसिपल पुष्पमयी बोस और दूसरी है- शीला अग्रवाल। इन दोनों का मन्नू जी के व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। कहानी लिखने के लिए तटस्थ होना जरूरी है, लेकिन जिन्हें हम चाहते हैं, उनके प्रति तटस्थ होना मुश्किल काम है। इसी कारण वे अपने दोनों प्रेरणादायी व्यक्तित्व के संबंध में एक भी कहानी लिख नहीं पाईं। ‘बालीगंज शिक्षा सदन’ स्कूल में बिताये हुये दिन, मन्नू जी के जीवन के अहम दिन थे। जिन्दगी के सबसे अहम मोड़ इसी स्कूल में आए। इन दिनों के विषय में लिखती हैं, “बालीगंज शिक्षा सदन में गुज़ारे नौ वर्ष मेरी ज़िन्दगी के बहुत महत्त्वपूर्ण वर्ष रहे हैं। ज़िन्दगी के सभी महत्त्वपूर्ण मोड़ यहीं तो आए। यहीं मैंने अपनी पहली कहानी लिखी और साहित्य के क्षेत्र में क़दम रखा...इसी स्कूल की लाइब्रेरी के लिए किताबें मँगवाने के सिलसिले में राजेन्द्र से परिचय हुआ....विवाह हुआ और गृहस्थी में प्रवेश किया। यहीं काम करते हुए बिटिया का जन्म हुआ। ज़िन्दगी के सभी महत्त्वपूर्ण मोड़ यहीं आए।”
अपनी प्रथम कहानी ‘मैं हार गई’ के छपने की घटना भी उनके जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। “अपनी पहली कहानी को पत्रिका में छपा हुआ देखना भीतर तक थरथरा देनेवाले रोमांचक अनुभव से गुज़रना था। वैसा, थ्रिल, वैसा रोमांच तो उसके बाद मैंने फिर कभी महसूस ही नहीं किया, जबकि, कई बड़े-बड़े और महत्त्वपूर्ण अवसर आए।” कहानी छपने के बाद मन्नू जी में एक प्रकार का जोश भर गया और वे कहानियाँ लिखने लगी और वे छपने भी लगी। इसी दौरान उनका परिचय स्कूल की लायब्ररी के लिए किताबें मँगवाने के लिए सूची बनवाते समय औपचारिक रूप से राजेन्द्र यादव से होता है, जिसकी परिणति शादी होती है। मन्नू जी ने सन् 1957 में इलाहबाद में हुए प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में भाग लिया, वहाँ जो सीखने को मिला उसका असर उनके रचना संसार पर पड़ा। उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में भी लिखा है, वे किसी घटना या पात्र या आइडिया को उसी समय मूर्त रूप नहीं देती हैं, वे लिखती हैं, “...कोई भी घटना, पात्र या आइडिया क्लिक करते ही डायरी के पन्ने के साथ-साथ मन के किसी पन्ने पर भी अँक तो जाता है, पर रचना का रूप शायद वह उसी समय नहीं ले पाता। क्यों? हो सकता है, वह किसी बड़े सन्दर्भ के साथ जुड़ जाने की प्रतीक्षा करता हो। पर जुड़े कैसे... क्या प्रक्रिया होती है उसके जुड़ने की? शायद जो मन के पन्नों पर उतरता है, वह समय के साथ-साथ भीतर और भीतर उतरता चलता है और पता नहीं उसमें कौन-कौन से रसायन मिलते रहते हैं कि यह भीतरी ‘मैं’ न जाने कितने बाहरी ‘मैं’ के साथ जुड़ता चलता है। ये सारे बाहरी ‘मैं’ उस भीतरी ‘मैं’ में निरन्तर कुछ न कुछ जोड़ते-घटाते रहते हैं। बाहर भीतर की यह यात्रा...एक-दूसरे में तब्दील होने की यह प्रक्रिया कब और कैसे घटित होती है, इसका कोई स्पष्ट बोध तो मुझे भी नहीं रहता। बोध तो उस समय होता है जब बाहरी-भीतरी अनेक ‘मैं’ का यह बोझ मेरी रचनात्मकता को बुरी तरह कुरेद-उकसाकर एक रचना को जन्म देता है।” रचना-प्रक्रिया से गुज़रने का हर लेखक का अपना-अपना अनुभव होता है। मन्नू जी के अपने भीतरी ‘मैं’ का बाहरी अनेक ‘मैं’ जुड़ते चले जाने की क्रिया ही उनकी रचना-प्रक्रिया है। उनके लिए किसी साहित्य के रचनात्मक सफलता के अपने अलग मानदंड है, उनके लिए उनकी रचना कितने लोगों ने पढ़ी यह मायने नहीं रखता है, उनके लिए, “उसने रचना को कैसे ग्रहण किया... मेरे पात्रों के साथ, उनकी संवेदना के साथ उसकी संवेदना एकमेव हुई या नहीं, जिन स्थितियों और समस्याओं को मैंने उठाया, उन्होंने उसे झकझोरा या नहीं....कुछ सोचने को मजबूर किया या नहीं....इसे ही कसौटी मानती हूँ मैं अपनी रचना की सफलता-सार्थकता की।” इसी कारण कम साहित्य लिखकर भी मन्नू जी का साहित्य स्तरीय भी और लोकप्रिय भी है। वे इतने कम साहित्य से संतुष्ट भी हैं।
मन्नू जी और राजेन्द्र यादव का वैवाहिक जीवन अधिक समय तक नहीं चला। राजेन्द्र यादव का मीता से प्रेम-प्रसंग शादी के बाद भी चलता रहा, इस बात से मन्नू जी उनसे खफा रहती हैं। राजेन्द्र यादव के कुछ पत्र और डायरियाँ मन्नू जी के हाथ लगते हैं, जिसे पढ़कर वे अलग होने का निर्णय लेती हैं। लेकिन राजेन्द्र यादव के गिड़गिड़ाने से अपने निर्णय को बदल देती हैं। इस घटना के बाद भी कई ऐसे मौके आए, जब मन्नू जी ने राजेन्द्र यादव की ‘समानान्तर’ जिंदगी वाले फार्मूले से तंग आकर अलग होने का निर्णय लिया, लेकिन वे अलग हो नहीं पाई, इसके कई कारण थे, वे लिखतीं हैं, “तब बार-बार मन में यही उठता था कि क्यों नहीं मैं ही इन समानान्तर ज़िन्दगियों की छतें भी समानान्तर करके पहलेवाली ज़िन्दगी में लौट जाऊँ? पर अपने प्रति हज़ार-हज़ार धिक्कार उठने के बावजूद मैं ऐसा कोई निर्णय नहीं ले पाई। क्या मेरी जिन रगों में एक समय ख़ून की जगह लावा बहा करता था, अब पानी बहने लगा है? या कि दो वर्ष की मित्रता में मैं राजेन्द्र से इतने गहरे के जुड़ गई थी कि उनको नकार देना मुझे अपने आपको नकार देने जैसा लगने लगा था...या कि पिताजी की इच्छा के विरूद्ध अपनी इच्छा से की हुई इस शादी को मैं किसी भी क़ीमत पर असफल नहीं होने देना चाहती थी – चुनौती ही थी यह मेरे लिए एक तरह से, वरना मेरा उदाहरण दे-देकर शुरू की गई एक सही स्वस्थ परम्परा को ग़लत सिद्ध करने की कोशिश तो की ही जाती। या यह भी हो सकता है कि मुझे उम्मीद थी कि मेरा समर्पण एक न एक दिन राजेन्द्र को ज़रूर बदल देगा और बाद में तो टिंकू भी एक बहुत बड़ा कारण हो गई थी। मैं नहीं जानती कि क्या कारण था...शायद सभी का मिला-जुला रूप रहा होगा,” मन्नू जी ने दूसरों लेखकों की तरह किसी बैसाखी का सहारा लेखक रूप में स्थापित होने के लिए नहीं लिया। राजेन्द्र यादव के किसी सम्पर्क का लाभ नहीं उठाया। राजेन्द्र यादव को ही ‘हंस’ चलाने के लिए मन्नू जी के एक–दो सम्पर्कों से लाभ हुआ। वे अपने बलबूत्ते पर आगे बढ़ी। वे लिखती हैं, “अपनी रचनाओं की समीक्षा के लिए...पुरस्कारों के लिए या अन्य किसी उपलब्धि के लिए कभी इनके नाम की बैसाखी मैंने नहीं लगाई...और बैसाखी तो तब लगाती जब मैं इन बातों के लिए प्रयत्न करती... समीक्षा छप गई, छप गई...नहीं छपी, नहीं छपी। इसे मेरा बड़बोलापन न समझा जाए तो कहूँगी कि सन् 70 से (आपका बंटी का धारावाहिक रूप से छपना) सन् 82 (महाभोज़ का मंचन) तक मेरे अपने नाम की काफ़ी धूम थी (और बिलकुल अपने बलबूते पर)। नाटक, फिल्म जिस दिशा में कद़म बढाया सफलता ही मिली...यश ही फैला! दो बार जर्मनी से निमन्त्रण मिला लेकिन वह भी बिलकुल-बिलकुल अपने बलबूते पर।”
राजेन्द्र यादव वैचारिक धरातल पर नारी मुक्ति की बातें करते नज़र आते हैं, पर अपनी पत्नी के प्रति उनका रवैय्या भिन्न था। पैसे मन्नू जी कमाती थीं, और गुलछर्रे राजेन्द्र यादव उड़ाते थे। नौकरी के कई ऑफर आए, पर नौकरी कहीं पर भी नहीं की। मोहन राकेश ने मन्नू जी को लेखक से शादी करने से आगाह भी किया था। लेकिन वे अपनी बात पर अड़ी रहीं।
मन्नूजी ने राजेन्द्र यादव के स्त्रियों के प्रति झुकाव को उनके अपंगत्व को कारण माना। “राजेन्द्र की इस वृत्ति को मूल ढूँढ़ा जा सकता है इनकी अपंगता के आरम्भिक दिनों में। अपनी नाज़ुक किशोरावस्था में स्वस्थ और सुन्दर होने के बावजूद बैसाखियाँ संभालते ही कैसे इनके मन यह विश्वास खंडित हो गया होगा कि लड़कियाँ कभी इनकी ओर आकृष्ट भी होंगी....लड़कियों की ज़िन्दगी में इनके लिए कहीं कोई जगह भी होगी...कि कभी ये लड़कियों के प्रेम-पात्र भी बनेंगे। और तब कैसे इन्होंने संकल्प किया होगा कि (संकल्प और – दृढ़ इच्छा-शक्ति की तो राजेन्द्र प्रतिमूर्ति हैं) अपनी इस कमी की पूर्ति वे दूसरी दिशा से करेंगे। आत्म-विश्वास तो टूटा पर अपनी अपंगता के इस बोझ से अपनी प्रतिभा को टूटने-बिखरने नहीं देंगे...उसका भरपूर विकास करके अपना एक विशिष्ट स्थान बनाएँगे...सबको बता देंगे कि वे क्या हैं? उनके इस ‘क्या’ (लेखक) के प्रभामंडल से आकृष्ट होकर जैसे-जैसे लड़कियों का उनके निकट आने का ...आगे-पीछे घूमने का सिलसिला शुरू हुआ, उनका टूटा आत्मविश्वास बढ़ने लगा... उनका यह ‘क्या’ और निखरने लगा(इसीलिए लड़कियों से सम्बन्ध इनके लेखक की अनिवार्यता हैं), लेकिन लड़कियों के निश्छल, निस्वार्थ समर्पण ने इनके भीतर प्यार की ऊष्मा नहीं जगाई...जगया विजय का दर्प!”
आत्मकथा में आपातकाल और दिल्ली के सिख विरोधी दंगों की तसविरें भी दिखाई देती हैं। राजेन्द्र यादव को सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से एक हज़ार प्रतिमाह की फेलोशिप पाँच वर्ष के लिए आफर की थी, इसे उन्होंने अस्वीकार किया। मन्नूजी को पद्मश्री का प्रस्ताव आया, उन्होंने भी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। सिख विरोधी दंगों के समय दंगा पीड़ीत लोगों की मदद मन्नू जी ने की।
इस आत्मकथा से मन्नूजी के लेखन के प्रेरणा स्रोतों का भी पता चलता है। एक इंच मुस्कान, महाभोज, आपका बंटी आदि कृतियों के बारे में इस आत्मकथा में लिखा है। उनके फिल्म, दूरदर्शन और रंगमंच के जुड़ने के व्यावसायिक कारण नहीं थे। पैसों के लिए अपने लेखन के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अपनी आत्मकथा में मन्नूजी ने छोटे से लेकर बड़े का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उनकी जीवन और लेखन में मदद की है। राजेन्द्र यादव से अलग होने को वे मुक्त होना कहती हैं। उन्हीं के शब्दों में कहे तो, “पर इसमें कोई संदेह कि अगर मैं राजेन्द्र के साथ रही तो उनके प्रति अपने गहरे लगाव के कारण रही और यदि अलग हुई तो अपनी मुक्ति के लिए। इसलिए राजेन्द्र के ऊपर मेरा न कोई ऋण है और न ही मैं किसी प्रकार के ऋण-शोध की अपेक्षा करती हूँ।” जिस दिन मन्नू जी के अंदर की स्त्री जग गई, उस दिन उन्होंने अलग होने का निर्णय लिया। यह आत्मकथा पूर्ण न होते हुए भी, इसमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं का ज़िक्र हुआ ही है।
2.1.12 कुछ कही कुछ अनकही – शीला झुनझुनवाला (सन् 2009)
शीला झुनझुनवाला का जन्म सन् 1927 में उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ। इनकी आत्मकथा ‘कुछ कही कुछ अनकही’ 10 अध्यायों में बटी है, जिसके अपने स्वतंत्र शीर्षक और उप-शीर्षक भी हैं।
शीला झुनझुनवाला के पिताजी से घर में सब लोग डरते थे। शीला झुनझुनवाला के भाई भी पिता जी से डरते थे, उनको कुछ पिताजी से कहना हो तो वे शीला जी से कहलवाते थे। शीलाजी के पिताजी शाम के समय सबकी हाजरी लेते थे। सबसे पूछते थे, दिन भर क्या किया। शीला जी के पिता लड़कों से अपने पैर दबवाते थे, जिसके बदल में उनको चवन्नी मिलती, इस चवन्नी के लिए शीला जी को लगता है, वे लड़का क्यों नहीं हुईं। “दिन भर के बाद पिताजी थके-मांदे होते थे तो उनके थके-मांदे पांवों को दबाने के लिए भाइयों की पुकार होती। कभी कोई, कभी कोई उनके पैर दबाता। लड़कियों से पैर छुआए नहीं जाते थे, इसलिए मैं इस ‘एक्सरसाइज’ से बच जाती थी। पर एक अफसोस रहता था मुझे, जो चवन्नी उन लोगों को मिलती थी, वह मुझे नहीं मिलती थी। तब सोचती थी, काश मैं लड़का होती।”
माँ के रामायण पाठ से शीला जी काफी प्रभावित थी, माँ के मुँह से सुनी रामायण की चौपाईयाँ उन्हें लोरियों से भी मिठी लगती हैं। वे अपने माँ के बारे में लिखती हैं, “माँ का स्वर बहुत मीठा था। उतनी ही सुंदर वे स्वंय थीं। गोरा रंग, पतली सुए-सी नाक, बड़ी-बड़ी आँखें, पतली-दुबली काया और शांत सौम्य व्यक्तित्व। जोर से बोलते तो मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं। बड़े शांत वातावरण में रामायण की चौपाइयों का पाठ वे प्रतिदिन किया करती थीं। मेरा बाल-मन सब कुछ छोड़कर उनके पास बैठकर उनका मुँह निहारने को करता रहता था। उनके रूप से अधिक उनके मुख से निकले बोलों पर मेरा ध्यान अटका रहता था। मन करता था, वे चौपाइयाँ गाती रहें और मैं उन्हें सुनती रहूँ। लोरियों से भी अधिक मीठी मुझे उनकी वे चौपाइयाँ लगती थीं।” इस तरह रामायण का इतना प्रभाव शीला जी पर पड़ा की वे जेठ-बैसाख की दोपहरी में भी रामायण का पाठ किये बिना पानी भी नहीं पीती थीं।
शीला जी के जीवन में रामायण और गंगा का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे इस संदर्भ में लिखती हैं, “रामायण और गंगा-इनसे अगल करके यदि मैं अपने बचपन को देखूँ तो उसमें कुछ शेष नहीं रहता। जिस समय में लड़कियाँ गुड़्डे-गुड़ियों का खेल खेलती हैं, उस उमर में मैं रामायण और गंगा से जुड़ी रही, न कोई संगी-साथी, न बचपन की कोई सहेली। बचपन का नटखटपन, ऊधम, शोर, छेड़छाड़-मैंने जानी ही नहीं।”
शीला जी को स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने और जेल जाने के कारण गरम स्वभाववाली ताईजी ने डाँटते हुए कहा, “घर की, कुनबे की नाक कटाकर रख दी, जो काम लड़कों ने नहीं किया, वह इस बित्ते-भर की छोकरी ने कर दिया।” घरवालों ने स्कूल जाना बंद कर दिया, लेकिन किसी तरह अनुनय-विनय करके स्कूल जाने की आज्ञा मिली।
बालिका विद्यालय में इंटर तक पढ़ाई की, बी.ए. तक की पढ़ाई उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर से की। कॉलेज के अपने पहले दिन के अनुभव के बारे में शीला जी बताती हैं, “एक संकुचित वातावरण से निकलकर आकाश को छूने का प्रयत्न एक लंबी-ऊँची छलांग ही तो है। क्राइस्ट चर्च कॉलेज कंपाउंड में जब पहले दिन घुसी तो देखा, लड़कों का हुजूम। एक साथ इतने लड़के एक जगह देखना, उस लड़की के लिए, जिसने भाइयों के सिवाय कभी किसी से बात न की हो, बहुत ‘नर्वस’ करनेवाली बात थी। मैं तो इतनी नर्वस हुई कि मेरी सैंडल की एड़ी ही टूट गई। किसी तरह कॉमन रूम तक पहुँची। फाटक से कॉमन रूम की दूरी तक ऐसा लग रहा था जैसे, सैकड़ों आँखें मेरे ही ऊपर टंगी हैं। कहाँ यह आलम था कि कभी अकेले होटल या रेस्तरां भी नहीं गई और कहाँ बिच्छुओं की तरह डंक मारती इतनी नज़रे!”
शीला जी की माँ की सहेली का लड़का रोज़ कॉलेज जाते समय साइकिल लिये आधे रास्ते में खड़ा रहता, पहले दिन रास्ते में बात की, तो वह रोज़ ही आधे रास्ते में साइकिल लेकर तैयार रहने लगा, शीला जी इस लड़के को टालना भी चाहती थी और संबंध भी खराब नहीं करना चाहती थी। इसीलिए रक्षा बंधन के त्यौहार के दिन उन्होंने तिलक लगाकर राखी बाँध दी। शीला जी लिखती हैं, “मैं चाहती तो उन्हें सीधे-सीधे भी कह सकती थी, पर एक रिश्ते को बेदर्दी से खत्म करने की जगह, उसे एक खूबसूरत मोड़ देना मैंने ज्यादा अच्छा समझा।”
इस तरह रिश्तों को निभाने वाली शीला जी ने पड़ोस में रहने वाली अम्मा और उनके बेटे की बीमारी में सेवा कर अपने रिश्ते को निभाया। शीला जी के पड़ोस में टी.पी. झुनझुनवाला और उनकी माँ रहती थी। ठाकुर प्रसाद जब बीमार थे, तब उनकी सेवा शीला जी ने की। यहीं से उनके मन के तार जुड़ते गये और यह प्यार विवाह में बदल गया। लेकिन इनमें काफी अड़चने भी आईं। दोनों राजी थे और उनके इरादे भी पक्के थे। इसीलिए दोनों के घरवाले भी देर-सवेर मान गये।
टी.पी.झुनझुनवाला इनकम टैक्स आफिसर बन गये थे। पहली पोस्टींग कोलकाता में थी। कोलकाता से इनका तबादला मुम्बई में होता है। शीला जी ने विवाह के बाद आत्मकथा में अपने पति के ही कार्यों का और स्वभाव का ही गुणगान ज्यादा किया है। मुंबई में इनके घर पर साहित्यिक गोष्ठियाँ होती थीं। फिल्मी कलाकारों से भी मुलाकातें होती थीं। शीला जी ने सन् 1960 से सन् 1965 तक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ प्रकाशन समूह के ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक पत्रिका के महिला पृष्ठों का संपादन किया। दिल्ली से निकलने वाली महिला पत्रिका ‘अंगजा’ का संपादन किया। तदुपरांत दिल्ली में हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की पत्रिका ‘कादम्बिनी’ में संयुक्त संपादक, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ की प्रधान संपादक और अंग्रेजी पत्रिका ‘मनी मैटर्स’ पत्रिका की कार्यकारी संपादक के पद पर कार्यरत थीं।
शीला जी ने विविध सामाजिक कार्य करने के लिए टी.पी.झुनझुनवाला फाउंडेशन की स्थापना की। उनको समाज और साहित्य की सेवा के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा गया। शीला जी की आत्मकथा से लगता है कि वे अपने दाम्पत्य जीवन में सुखी थीं।
2.1.13. पिंजरे की मैना – चंद्रकिरण सौनरेक्सा (सन् 2010)
सन् 2010 में चंद्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा ‘पिंजरे की मैना’ प्रकाशित हुई। यह आत्मकथा चंद्रकिरण जी के का पछत्तर साल के साहित्यिक जीवन और छियासी साल की जीवन-यात्रा का वास्तविक दस्तावेज़ है। आत्मकथा के आरंभ में पूर्वजों का परिचय दिया है। चंद्रकिरण सौनरेक्सा ने अपने पिता से जो वंशकथा सुनी थी, उसी को इस आत्मकथा की शुरूआत में बताया है। इस वंशकथा में पड़बाबा से लेकर दादा और उसके बाद पिता तक की कथा है। इनके दादा और पिता दोनों आर्य समाजी थे। पिता के आर्यसमाजी होने के कारण चंद्रकिरण जी की पढ़ाई पर पिता की ओर से कोई रोक-टोक नहीं थी। माँ की ओर से रोक-टोक होती थी। पिता ने हमेशा चंद्रकिरण जी को प्रोत्साहित किया। वे अपने पिता के सन्तान वत्सल होने के बारे में लिखती हैं, “अपने बाबूजी जैसा सन्तान वत्सल पिता मैंने आज भी, अपनी इतनी लंबी ज़िंदगी में नहीं देखा। उस ज़माने में, चाहे लड़के हों या लड़कियाँ बाप से बस डरना भर जानते थे। साथ बैठकर खेलना; बीमारी में सेवा करना, माँ की प्रताड़ना से बचाना-ये सब उस समय आम बातें नहीं थीं। और मुझ पर तो बाबूजी की विशेष ही छत्रछाया रहती थी। मैं उनकी सबसे छोटी अंतिम संतान जो थी।” चंद्रकिरण अपने पिता के तीसरे पत्नि की संतान थी। चंद्रकिरण की माँ का नाम जानकी था। चंद्रकिरण जी को दो सौतेले भाई और एक बहन थी। जिनके साथ उनका और उनकी माँ का व्यवहार अत्यंत प्रेमपूर्वक था। चंद्रकिरण के सबसे बड़े भाई शामलाल थियेटर का शौकिन थे। इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था। मँझला भाई एक दुकान में काम करता था, जो भुलक्कड़ था। दीदी का नाम चंद्रावल था, इसी नाम के आधार पर चंद्रकिरण नाम रखा गया। बचपन में चंद्रकिरण जी को सब किरन ही कहते थे, एक पंजाबीन नौकरानी ने निक्की कहना शुरू किया और चंद्रकिरण जी को सब निक्की ही कहने लगे।
बचपन की यादों का पिटारा चंद्रकिरण जी ने अपनी आत्मकथा में खोला है। बचपन में चंद्रकिरण जी काफी शरारती थीं। माँ की हर एक बात को पकड़ लेती थी। माँ ने एक दिन गुस्से में आकर कुएँ में कुद जाने की बात कही और चंद्रकिरण जी कुँए में कुदने चली गईं। महरी ने जब देखा तो, उसे रोका। यह दूसरी घटना थी। पहली बार इसी तरह हौज में डुबते-ड़ुबते बची थी। स्कूल में पहले तो जाने से मना करने वाली और एक साल तक घर पर ही पढ़ाई करनेवाली चंद्रकिरण जी आगे चलकर पढ़ाई में झंड़े गाड़ते हुए नज़र आती हैं। एक साल में दो साल की पढ़ाई करती है। इस कारण उन्हें बड़ी-बड़ी लड़कियों के साथ भी बैठना पड़ता है। चंद्रकिरण ने अपनी पढ़ाई से अध्यापकों और अपने घरवालों को भी चौंकाया। माँ की मृत्यु के बाद स्कूल की पढ़ाई छूट गई पर उन्होंने पढ़ाई को पूर्णविराम कभी नहीं दिया। उन्होंने घर बैठे दूसरों की किताबों के सहारे साहित्य रत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने पढ़ाई में रूचि होने के कारण उन दिनों छुपकर देवदास और हातिमताई भी पढ़ डाली।
कोलकाता से निकलने वाला बाल मासिक पत्र ‘विजय’ के लिए चन्द्रकिरण जी ने ‘अछूत’ कहानी प्रकाशनार्थ भेजी और प्रकाशित भी हुई। इस कारण उनकी सब तारीफ करने लगे। चंद्रकिरण जी की माँ की बीमारी के समय ही चंद्रकिरण जी के विवाह की बात चल रही थी। सगाई की बाद माँ का देहान्त हो गया। चंद्रकिरण के पिता जी चाहते थे, कुछ समय बाद शादी की तारीख पक्की की जाए, लेकिन लड़के वाले जल्दबाजी में थे। जिसके चलते इस सगाई को तोड़ना पड़ा और जो लेन-देन हुई थी, वह एक-दूसरे को वापिस की गई।
लेखिका ने लगातार अपना रचनात्मक कार्य जारी रखा। ‘माया’, ‘चाँद’ आदि पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ छपती रहीं। वे पारिश्रमिक का पैसा अपने भाई के डर से लेना नहीं चाहती थीं, इस कारण उन्होंने वैसा पत्र भी संपादक के नाम लिखा। ‘अकिला’ कहानी उन्होंने ‘रुपाभ’ को भी भेजी। उस समय पंत जी और नरेन्द्र शर्मा जी इसे निकाल रहे थे। इस कहानी को स्वीकृति भी मिली। इसके बाद उन्होंने तीन कहानियाँ भेजी, लेकिन किसी कारणवश ‘रूपाभ’ बंद हो गई और वे कहानियाँ कोलकाता निकलने वाली पत्रिका ‘विचार’ के लिए भेजी गई। चंद्रकिरण जी की शादी हरिवंशराय बच्चन से होते-हो ते रह गई। उनके बड़े भाई साहब शामलाल को लगा कि हरिवंशराय एक शायर और शराब पर लिखते हैं, इसका मतलब वे स्वंय शराबी हैं। इस कारण यह बात आगे बढ़ नहीं पाई। ‘विचार’ में उनकी एक कहानी प्रकाशित भी हुई। कुछ दिनों बाद ‘विचार’ के उपसंपादक कांतिचन्द्र का लम्बा पत्र लेखिका को मिलता है। इसके साथ और भी पत्र आए, और साथ उनका परिचय भी। कांतिचन्द्र वकील के बेटे थे, भगवती बाबू के साथ ‘विचार’ में काम करते थे, उनका एक कहानी संग्रह ‘चौराहा’ छप चुका था। बड़े भाई शामलाल का तबादला दिल्ली में हुआ। चंद्रकिरण भी अपने भाई के साथ दिल्ली चली गई। कांतिचन्द्र के पत्र शामलाल को दिखाए जा चुके थे। इस तरह कांतिचंद्र से उनका रिश्ता तय होता है।
ऐसा अनेक स्त्रियों के साथ हुआ है कि प्रेमी के रूप में अच्छा लगने वाला पुरूष पति बनने के बाद बुरा हो जाता है। जो बातें प्रेमी होते हुए कहता है, वह पति बनने के बाद कहाँ गायब हो जाती है, पता ही नहीं चलता है। विवाह के बाद अपनी पत्नी को दासी बनाकर रखना चाहता है। चंद्रकिरण जी के साथ भी यही सब हुआ। पत्र में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कांतिचन्द्र और वास्तव के कांतिचन्द्र में जमीन आसमान का फ़र्क था। कांतिचन्द्र जी अदूरदर्शी, अव्यवहारिक, ईर्ष्यालु एवं क्रोधी स्वभाव के थे, जिसके परिणाम स्वरूप चंद्रकिरण जी मन में पति की छवि मलिन होती गई। अनेक यातनाओं को सहना पड़ा। उनके पति ने कभी उनके लेखन को प्रोत्साहित नहीं किया, उलटे उनसे ईर्ष्या ही की। वे इस विषय में लिखती हैं, “घर में तो सब कुछ इसी तरह चलता रहता था, पर मेरी सृजनात्मक प्रक्रिया हर चट्टान से टकराती हुई, निर्बन्ध चलती रहती थी। उसकी उर्जा का तेज़ कभी कम नहीं हुआ। कम से कम समय में बिना किसी अतिरिक्त सुविधा के मेरी लेखनी, कोरे काग़ज पर, कहानियों को आकार देती थी।” इसी कारण ‘हंस’ के सम्पादक अमृतराय ने चंद्रकिरण जी को पत्र लिखा, इस पर कांतिचन्द्र की प्रतिक्रिया थी, “ये साले संपादक भी लड़कियों को बड़े मीठे-मीठे पत्र लिखते हैं। अभी कोई पुरुष लेखक अपनी रचना भेजता तो उत्तर ही पंद्रह दिन बाद मिलता – या मिलता ही नहीं।“ और ‘यह’ रसोई के सामने खड़े थे – क्रोध-ईर्ष्या की मिली-जुली तस्वीर बन कर- “तुमने भी तो कहानी भेजते समय पत्र में कुछ न कुछ तो लिखा ही होगा जरूर...उसके चूत़ड़ों में घी मला होगा।” इस बात से क्रोधित होकर चंद्रकिरण जी ने अलग होने का निर्णय लिया। उन्हें लगा कि तीन साल का साथ, जब विश्वास का आधार बन नहीं पाया, तो आगे क्या होगा। यही सोचकर अपनी बच्ची के साथ मेरठ जाकर रहने का निर्णय लिया। लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाई। इसमें भावनाओं और रिश्तों के स्तर पर बहुत सारी अड़चने आने लगीं। अलग होने का ख्याल ख्याल ही बनकर रह गया, जिसका उन्हें अंत तक पछतावा होता है। वे लिखती हैं, “रात भर मेरी पलक नहीं झपकी – मेरठ जाने का मेरा इरादा ख्यालों में जैसे आया था, वैसे ही ख्यालों में गुम हो गया। पर भविष्य में, अपने आप को कल शाम की स्थिति तक जाने का अवसर न प्रदान करने के लिए, मैंने दूसरा निश्चय किया – कहानी लिखूँगी, पर इन्हीं को पकड़ा दूँगी- फिर ‘यह’ चाहे जहाँ प्रकाशन के लिये भेजें – मेरा कोई सीधा संपर्क आदर्शवादी, पतिव्रता पत्नी का निर्णय था – जिसकी कीमत मेरे पूरे साहित्यिक-जीवन ने चुकाई- और लगभग गुमनामी के कगार पर खड़ी –अभिशप्त सरस्वती के वरदान सी – मैं खड़ी हूँ।”
लेखिकाओं को लेखन कार्य के लिए एकांत नहीं मिलता है। उन्हें अपना लेखन कार्य गृहस्थी को संभालते हुए ही करना पड़ता है। सबेरे पाँच बजे उठकर उनकी दिनचर्या शुरू होती है, घर का काम, बच्चों को सँभालना, सबके लिए नाश्ता तैयार करना, यह सब होने के बाद स्कूल जाना। इतना काम करते हुए भी, लेखन के लिए समय निकालना। यह सब चंद्रकिरण जी ने किया। चंद्रकिरण जी अपने लेखन के बार में लिखती हैं, “सो मेरे साथ, सरस्वती का ऐसा वरद्हस्त था कि मुझे अपना लिखने के लिये न एकांत चाहिए था, न कोई विशेष वातावरण। चूल्हे-अँगीठी पर दाल चढ़ाकर, वही बैठे-बैठे भी दो-चार पृष्ठ लिख लेती। दोबारा व्यवस्थित करने का समय न मिलता, तो कहानी का पहला ड्राफ्ट ही पत्रों में भेज देती। बुक-पोस्ट कर देती; और वह कभी गुम नहीं हुआ। हमेशा गंतव्य स्थान पर पहुँचा, और कहानी छपी भी।” चंद्रकिरण जी को घर के काम के साथ हर दिन आये नये मेहमानों का भी खाना बनाना पड़ता था। इनके पति अपने मित्रों को घर में पनाह देने, बेवज़ह मेहमान नवाज़ी करने में बड़े उदार थे। इसी कारण बहुत सारें मित्रों ने इन्हें ठगा भी है। पति के मित्रों की मेहमान नवाज़ी का सारा बोझ भी पत्नी पर ही पड़ता। चंद्रकिरण अपने पति के असंतुलित व्यवहार का चित्र प्रस्तुत करती हैं, “ पर अब तक यह साफ हो गया था मेरे सामने कि हालाँकि जानबूझकर ‘ये’ किसी को भी तकलीफ नहीं देते; न देना चाहते हैं; पर कहीं न कहीं संतुलन की कमी जरूर रही – अपने शौक और मित्रों के लिए कुछ करना अच्छी बात हैं; पर जिसकी वज़ह से यह सब घर-संसार चल रहा हो -उसकी सुख-सुविधा की अनदेखी- इस सीमा तक-अन्य सब सह सकते थे, पर माँ समान अपनी बहिन के दिल पर लगनी ही थी।” कभी-कभी हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार जैनेन्द्रकुमार, डॉ. रामविलास शर्मा, शिवदानसिंह चौहान, सुमित्रानंदन पंत आदि भी बतौर मेहमान आया करते थे। एक बार सुभद्राकुमारी चौहान आई हुई थीं। अचानक अतिथियों को भोजन कराने का आदेश देनेवाले पति और बिना किसी प्रतिवाद के उस पर अमल करनेवाली पत्नी, दोनों की उन्होंने भर्त्सना की और कहा – “किरण भई! यह सब तुम ही जो कर लोगी। मुझ से अगर लक्ष्मण जी (उनके वकील पति) इस तरह की कोई बात कहते तो दोस्तों के सामने ही जाकर मना कर देती या अंदर से ही इतनी ज़ोर से मना करती कि दुबारा ऐसा फिर कभी नहीं होता। अव्वल तो तुम्हारे जीजा जी, इस तरह एकाएक हर एक को खाने की दावत देते ही नहीं हैं। मर्द की दो ज़रा-सी जुबान हिली; यहाँ औरत के लिए ढेर सा काम तैयार।”
कांतिचन्द्र जी अपना हाथ फिल्मी दुनिया में अजमाने के लिए मुम्बई भी गये, लेकिन वहाँ उनको सफलता हासिल नहीं हुई। पी.सी.एस में उन्हें सफलता हासिल होती है, और बदायूँ में डिप्टी कलेक्टर के पोस्ट पर नियुक्ति होती है। गर्ल्स होस्टल में रहनेवाली सावित्री के साथ अनैतिक संबंधों के चलते उनकी नौकरी जाती है। इस समय पंत और माथुर जी की मदद से चंद्रकिरण जी को ‘महिला एवं बाल विभाग’ में स्क्रिप्ट राईटर की नौकरी मिलती है। तीन सौ मासिक वेतन के वार्षिक अनुबंध पर हस्ताक्षर हो गए और इस नौकरी ने सौनरेक्सा परिवार को संकटग्रस्त होने से बचाया।
घरेलू मित्र और मददगार रईस शैदा हसन ने लेखिका से इश्क फरमाने की कोशिश की तो उन्होंने फटकार लगाते हुए कहा, “…असल में तुम्हारे दिल में इस समय जो मेरे लिये जज़बात है वह इश्क नहीं – फकत हमदर्दी है, जो एक मुसीबतजदा और से किसी भी मर्द की हो जाती है। बुरा मत मानना – तुम्हारी बीबी है, बच्चे हैं- क्या तुम उनसे बेवफाई नहीं कर रहे? सचमुच आज का दिन बड़ा ही मनहूस है।” शैदा का प्रेम निवेदन चंद्रकिरण जी को कुण्ठा से बाहर भी निकालता है। यह दिन एक तरफ मनहूस था, तो दूसरी ओर चंद्रकिरण जी को आत्मविश्वास से भर भी देता है। वे लिखती हैं, “कांति जी के आये दिन के प्रेम-प्रसंगों के कारण मैं सोचने लगी थी कि मेरे व्यक्तित्व में, गोरे रंग और प्रभावशाली हाव-भाव की कमी है, जो ‘ये’ सुंदर स्त्री की ओर आकर्षित हो जाते हैं। शैदा के प्रेम-निवेदन ने मुझे,मेरी इस हीन ग्रंथि, से मुक्त होने में मदद की –मैं असुन्दर नहीं हूँ, पैंतीस वर्ष की आयु में-शैदा सदृश्य आकर्षक व्यक्ति को, अपनी ओर आकृष्ट करने की शक्ति है।”
चन्द्रकिरण जी की निर्भिकता का परिचय तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के लखनऊ आकाशवाणी को दी गई भेंट के अवसर पर मिलता है। इंदिरा जी के यह पूछने पर कि क्या आप लोग यहाँ संतुष्ट है ? सौनरेक्सा जी ने वार्षिक कान्ट्रैक्ट पर काम कर रहे कलाकारों को मिल रहे कम वेतन की ओर उनका ध्यान खींचा- ‘क्या तीन सौ रूपये इनकी कला का उचित सम्मानजनक मूल्यांकन है?’ चन्द्रकिरण जी के साहस से सभी डर गये लेकिन उसका अनुकूल परिणाम निकला। सरकार ने ए-ग्रेड आर्टिस्टों का वेतन एकदम चार सौ पचास रूपए कर दिया और वार्षिक वृद्धि दस से बढ़ाकर पन्द्रह रूपए कर दी। साथी कलाकारों ने चन्द्रकिरण जी के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।
सन् 1960 में हिन्दी सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन मद्रास में हो रहा था। पति-पत्नी दोनों उसमें शरीक हुए। कांतिचन्द्र को वहाँ से मुम्बई जाना था। पत्नी के माँगने पर भी उन्होंने दस रूपए नहीं दिए। लखनऊ पहुँचने पर चौथे दिन चन्द्ररकिरण जी को पति का श्राप भरा अत्याधिक कटु पत्र मिला –“ तुम्हें मैंने मद्रास में दस रूपये नहीं दिये, तो तुम जरूर रास्ते भर मुझे कोसती गयी होगी। तुम्हारा कोसना सफल हुआ। बम्बई स्टेशन पर मेरा बक्सा तोला गया और मुझे पन्द्रह रूपये जुर्माना देना पड़ा। पर कोसना तुम्हें ही नहीं आता, मुझे भी आता है। मैं अभिशाप देता हूँ कि तुम जीवन भर भीख माँगोगी; तुम्हारे लड़के बेयरे बन कर, होटलों की जूठन खायेंगे औक तुम्हारी लड़कियाँ कोठों पर बैठेंगी। मैं अब लखनऊ आऊँगा तो कहीं और ठहरूँगा। तुम्हारे हाथ का खाना तो दूर कभी पानी भी नहीं पियूँगा।–कांति” क्या पति-पत्नी में बच्चों का भी विभाजन होता है? यह घटना पति की असंतुलित मनःस्थिति का प्रतीक है। कोई भी पिता अपने बच्चों के लिए इतनी गंदी कामना नहीं करेगा। आश्चर्य होता है इस तरह का यातनामय जीवन जीते हुए चन्द्रकिरण जी ने प्रभावशाली लेखन कर दिया।
अपनी आत्मकथा में बार-बार लेखिका ने संकटों के पार जाने में ईश्वरीय सहायता की बात की है और उस दैवी शक्ति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए अपना आस्तिक भाव प्रकट किया है। पुस्तक समाप्त करते हुए वे फिर इस विश्वास को दुहराती हैं – “मैं जन्म से आस्तिक हूँ, आज भी कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। नास्तिक होने और उस विश्वास के साथ जीने के लिये बहुत बड़े साहस व ईमानदारी की जरूरत होती है। वह मुझमें इस जन्म में तो नहीं है, अगला जनम हो, तो उसमें भी होगा यह विश्वास नहीं है।” उपर्युक्त उद्धरण लेखिका की अकृत्रिम सच्चाई का प्रमाण है। वे ओढी हुई या आयातित आधुनिकता का मुखौटा लगाकर अपने पाठकों को गलत संकेत नहीं देना चाहती हैं। बड़े से बड़े संकट में आस्तिकता डूबते को तिनके का सहारा सिद्ध होती है। इसी तथ्य की ओर उनका इंगित है। हर संकट की घड़ी में उन्हें हल्की-सी रोशनी की किरन नज़र आ जाती थी और जीवन की गाड़ी आगे बढ़ जाती थी। पति ने उनके संघर्ष में यदि उन्हें सहयोग दिया होता तो उन्हें अधिक लिखकर भी गुमनामी के अंघेरे में नहीं जाना पड़ता। विषम परिस्थितियों में भी लेखन और परिवार दोनों उत्तरदायित्व वहन करते हुए श्रीमती चन्द्रकिरण सौनरेक्सा जिस जीवन–इतिहास को रच गई हैं, वह एक मध्यवर्गी नारी की महत्तम उपलब्धि है। सन् 2001में दिल्ली की हिन्दी अकादमी ने ‘स्त्री-सशक्तीकरण वर्ष’ में बीसवीं शताब्दी की सर्वश्रेष्ठ महिला कथाकार के रूप में एक लाख रूपए का पुरस्कार देकर उनकी साहित्य-सेवा को यथोचित सम्मान दिया। इस घटना को लेखिका ने ‘शब्दातित आनंद ’ कहा है। नारी-विमर्श की आधुनिक शब्दावली का प्रयोग न करते हुए नारी जीवन की पीड़ा को कहानियों के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली एक लेखिका के रूप में साहित्येतिहास उन्हें कभी विस्मृत नहीं कर पाएगा।
2.1.14 शिकंजे का दर्द – सुशीला टाकभौरे (सन् 2011)
मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बानापुरा (पुराना नाम बरहानपुरा) गाँव में एक दलित परिवार में सुशीला का जन्म हुआ। यहाँ रेलवे स्टेशन और बस स्टैन्ड दोनों हैं। “रेलवे स्टेशन के दूसरी तरफ ‘फेल’ में मजदूर वर्ग के पिछड़े लोगों की बस्तियाँ थीं। हम लोग पिछड़ों से भी पिछड़े थे। उँच-नीच, जातिभेद की भावना सब तरफ व्याप्त थी। तब गाँव में बहुत छुआछूत थी। अछूत भंगी हरिजनों के घर-गाँव के बाहर रहते थे, हिन्दू महाजनों की बस्ती से दूर, कच्चे खपरैल घर।” सुशीला की नानी नगर परिषद में सफाई कर्मचारी थी। उसके दामाद रामप्रसाद घावरी अपनी पत्नी पन्नाबाई के साथ अपनी सास के साथ घर जवांई बनकर रहने लगे। 9 जुलाई सन् 1954 को सुशीला का जन्म हुआ। इस समय को पुनःनिर्मित करते हुए लिखती हैं, “मुझे देखकर सब हँसे थे। माँ बहन-भाई खुश हुए या नहीं पता नहीं। मगर मुझे रोती देखकर सब हँसे थे। माँ ने तब अतिरिक्त प्यार के साथ मुझे स्वीकार किया होगा। माँ के प्यार को दया नहीं कह सकते। उन्हें मेरे उज्जवल भविष्य के प्रति विश्वास होगा या उन्हें खुद पर विश्वास होगा कि वे मेरे भविष्य को जरूर संवार देगी।”
उस समय लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने का रिवाज़ नहीं था। पाल पोसकर लड़की को बड़ा कर उसकी शादी कर देना ही पर्याप्त माना जाता था। दलित समाज तो लड़का-लड़की किसी को पढ़ाने में रूचि नहीं रखता था। उसकी सोच थी –‘बच्चों को पढ़ाकर का होयगो? अपनी जात तो वही रहेगी। काम, रोज़गार तो अपनी जात के ही करनो पड़ेगो फिर क्यों बच्चों को परेशान करें?’ सुशीला के सौभाग्य से माता, पिता और नानी शिक्षा के प्रति जागरूक थें। वर्गभेद और जातिभेद की कट्टरता सम्पूर्ण परिवेश में व्याप्त थीं, फिर भी माँ ने अपने बच्चों को पढ़ाया।
लेखिका ने एक नहीं कई शिकंजों की बात की है। “उन शिकंजों की जकड़न से जूझते हुए मैं किस तरह बढ़ सकी? यह मेरी एक लम्बी कथा है। शिकंजे तब भी थे, आज भी हैं। दर्द तब भी था, आज भी है। शिकंजे के दर्द की कथा चल रही है जिन्दगी के साथ-साथ” स्कूल में शिक्षक और छात्र सभी छुआछूत का पालन करते थे। कक्षा में सबसे पीछे टाट पट्टी पर नहीं, फर्श पर बैठना पड़ता था। दलित छात्र अपने हाथ से पानी लेकर पी नहीं सकता था। इसके लिए उसे दूसरे की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता था।
बाल्यावस्था की चर्चा करते हुए उन्हें माँ, नानी और बहन के साथ रामलीला भजन और कव्वाली सुनने जाने की बात याद है । गाँव के ब्राह्मण पंडित नानी माँ को दीन-हीन जीवन जीने के आदर्श और सदाचार का उपदेश देते रहते थे। हिन्दू धर्म की अनुदारता पर लेखिका का आक्रोश जातीय अपमान की गहन अनुभूति से शब्दों में फूट पड़ा है –“हिन्दू धर्म में नदी, पहाड़, पेड़, पौधे, जानवर सभी को महत्व और सम्मान दिया जाता है लेकिन अछूत मनुष्यों को कोई स्थान नहीं, कोई सम्मान नहीं। हिन्दू धर्म के आडम्बर में मिट्टी से बने पुतलों को भी भगवान की तरह पूजा जाता है मगर इन्सानों को इन्सान नहीं मानते । यह हिन्दू धर्म की विडम्बना है, हिन्दू संस्कृति का कलंक है। लोग इसे ही धर्म कहते हैं।”
दलितों में भी वर्ण-व्यवस्था प्रचलित है, उँच-नीच का भेदभाव है। बचपन की यादों में ही इसकी चर्चा है- “रोजी रोटी कमाने के लिए मेहनत मजदूरी का काम करने गरीब पिछड़े वर्ग के लोग भी आते थे परन्तु वे जाति भेद के आधार पर स्वंय को बड़ा या ऊँचा मानते। पिता और भाईयों का छुआ वे कभी खाते पीते नहीं थे। काम करते समय भी दूरी बनाये रखते थे।” वर्ण व्यवस्था के अभिशाप ने सुशीला के शंकर भैय्या के उच्च-शिक्षा के सपने को तोड़ दिया। शंकर ने होशंगाबाद के नर्मदा महाविद्यालय में विज्ञान-शाखा की पढ़ाई हेतु प्रवेश लिया था – रैगिंग से तंग आकर साहसी शंकर ने परम्परा तोड़ते हुए उन छात्रों की पिटाई कर दी। प्राध्यापक-प्राचार्य सभी उसके खिलाफ हो गए। एक होनहार नवयुवक को मजदूर बनने के लिए विवश होना पड़ा। भंगी-समाज तरह-तरह के अंधविश्वासों से जकड़ा हुआ था। दासता की बेड़ियों को उतार फेंकने के बदले वह गुलाम बनानेवाले शक्तिओं के हाथ का खिलौना बना हुआ था। इस दयनीय दशा पर लेखिका की टिप्पणी है- “देश को आज़ाद हुए बीस वर्ष हो चुके थे फिर भी हम मानसिक रूप से गुलाम थे। समाज में प्रगति-परिवर्तन की लहर चलने के बाद भी, वैज्ञानिक प्रगति होने के बाद भी, विश्व के प्रगतिशील देशों से संबंध जुड़ने के बाद भी हम अंधविश्वास में भटक रहे थे। हमें प्रगतिशील बनाने के लिए न तो सवर्णों को जरूरत थी, न ही देश के शिक्षित समझदार कर्णधारों को और न ही देश की सत्ता के मालिक नेताओं को। वे हमें गुमराह करके ही हम पर शासन करना चाहते थे।”
जिस समाज की लडकियाँ छठवीं-आठवीं से आगे नहीं पढ़ पाती थीं, उसी समाज की सुशीला ने दसवीं हाईस्कूल और ग्यारहवीं हायर सेकेन्डरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर कीर्तिमान स्थापित किया। इस लक्ष्य को प्राप्त करनेवाली अपनी जाति में पूरे होशंगाबाद जिले में वह एकमात्र लड़की थी। तब इस लड़की को सम्मानित करने की बात किसी के ध्यान में नहीं आई। “तब हमारे गाँव में यब बात विचार करने की नहीं थी। विचार करने की यह बात थी कि उस वातावरण में रहकर मैं कैसे मैट्रिक कर सकी? आगे की पढ़ाई कैसे कर सकी?” इस लक्ष्य की पूर्ति में माँ की भूमिका का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। हायर सेकेन्डरी उत्तीर्ण होने के बाद ‘कुसुम महाविद्यालय’ में प्रवेश लिया। वहाँ की एक छात्रा प्रेमलता का प्रेम प्रकरण सर्वत्र चर्चित हो उठा। माँ ने अपने बेटी को आगाह किया कि वह इस तरह की झंझट से दूर रहे। बेटी ने माँ को उत्तर दिया , “ मैं तो बूढ़ी ही जनमी हूँ” आज वे सोचती हैं, ऐसा उन्होंने क्यों कहा ? “मगर मैंने ऐसा क्यों कहा, यह भी मुझे पता नहीं था। छोटी उम्र में सिर के कुछ बाल सफेद हो जाना कोई अचम्भे की बात नहीं थी। मैं अपने कथन के कारण की खोज स्वंय कई दिनों तक करती रही थी। उन दिनों मैं बहुत गंभीर रहती थी, शायद इसीलिए ऐसा कहा हो।” कालेज के प्राचार्य ने मार्गदर्शन के लिए घर आने को कहा। सहेली नर्मदा के द्वारा सावधान करने पर वह सतर्क हो गई। उसे माँ की नसीहत याद थी- “ बड़े लोगों की बातें भी बड़ी रहती है। चाहे जितनी बड़ी बात हो जाए, कोई मुँह नहीं खोलता। लोग उनकी बात करने से डरते हैं। मगर किसी गरीब की ऐसी कोई बात हो जाये तो लोग मुंह पर भी और पीठ पीछे भी थू-थू करते हैं। गरीब की सम्पत्ति उसकी इज्ज़त है, खासकर बेटियों की इज्ज़त।” स्कूल में कुछ हादसों का इन्होंने डटकर मुकाबला किया, पर इसका ज़िक्र घरवालों के सामने पढ़ाई छूट जाने के डर से नहीं किया।
पति जो उनसे काफी बड़े थे, सुशीला जी को जब देखने आये थे, तब आधुनिक व्यक्ति की तरह बातें करने लगे थे। सुशीला जी से एकांत में पूछा था. “आपको शादी की बात पसंद है न? बाद में नहीं कहना कि पसन्द नहीं है।” शादी के बाद आधुनिकता का यह मुलम्मा उतर गया और मध्यकालीन सामंती मनोवृत्ति वाला स्वरूप सामने आ गया। वे अपनी पत्नी के साथ गुलाम की तरह बर्ताव करते हैं। सुशीला जी अपने पति के स्वभाव के बारे में लिखती हैं, “स्कूल से या बाहर से आने के बाद कभी-कभी टाकभौरे जी मेरे सामने पैर लम्बे कर देते। मेरा ध्यान न रहने पर हाथ से इशारा करके जूते उतारने के लिए कहते। मैं चुपचाप उनके पैरों के पास बैठकर जूते के फीते खोलती, जूते उतारती, मोजे उतारती। यह बात मुझे अजीव लगती। थी।” पति, ननद और सास ने भी इनका शोषण किया। दहेज कम मिलने के कारण इन्हें हमेशा ताने सहने पड़े।
दलित जाति में पैदा होने से जीवन दुष्कर हो जाता ही है, पर मौत के बाद भी लोग संवेदना प्रकट करने नहीं आते है। इसका अनुभव सुशीला जी को अपनी सास के मृत्यु के बाद हुआ। वे इस हृदय विदारक प्रसंग के बारे में लिखती हैं, “ जहाँ हम एक साल से रह रहे थे, उस मोहल्ले के लोग मुझसे एक शब्द नहीं बोले थे। इतनी बड़ी दुखद–घटना होने के बाद भी संवेदना-सहानुभूति का भाव नहीं बता सके। किसी ने अपने बच्चों को भी वहाँ झांकने नहीं दिया। ऐसा असामाजिक व्यवहार? ऐसा अमानवीय, हृदयहीन व्यवहार? क्या हम इन्सान नहीं?” जाति के पता चलने पर कमरा भी किराये पर नहीं मिला। जाति का यह दंश उन्हें काँलेज में अध्यापन करते समय साथी अध्यापकों को द्वारा मिला। कचरे की गाड़ी वाला जो घर-घर जाकर कचरा लेकर जाती है, उसका भी सुशीला जी के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार था।
अपनी अस्मिता की पहचान होने और आत्मविश्वास प्राप्त करते ही सुशीला टाकभौरे को अपनी राह मिल गई। रूढ़ियाँ, परंपराओं से टकराने का साहस अपने अन्दर पैदा कर वह लेखन, दलित-आन्दोलन और नारी-जागरण की गतिविधियों से जुड़कर सक्रिय हो उठी। अपने लेखन को वे अपनी और समाज की जरूरत मानती हैं। सामाजिक ,आर्थिक सभी तरह के शिंकजे के दर्द के बीच उर्जा और पहचान देने का काम लेखन ने किया है। इसी लेखन ने लेखिका के जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया है। रुढियों के विरूद्ध जाकर अपनी दो बेटियों की शादियाँ बिना दहेज की हैं। साहित्य सम्मेलनों के माध्यम से इंग्लैंड और श्रीलंका की यात्राएँ की और आंबेडकरी विचारधारा और दलित-चेतना के संदेश को पहुँचाने में सफल रहीं। सुशीला टाकभौरे मनुवादी नजरिये पर ही प्रहार नहीं करती, तो दलितों के दोषों एवं उनमें ‘वाल्मीकि’ की पूजा करने की भी आलोचना करती है। वे मानती हैं कि दलित मुक्ति गांधीवाद की माला जपने से संभव नहीं है। इसके लिए उन्हें अंबेडकर द्वारा बताए गए मार्ग शिक्षा, संघर्ष, एकता-पर चलना होगा। ‘शिकंजे का दर्द’ दलित नारी की शोषण मुक्ति की संघर्ष गाथा है, यह दलित स्त्री जीवन का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
2.2 मराठी की स्त्री आत्मकथाएँ : परम्परा और परिचय
आत्मकथा विधा प्राचीन मराठी साहित्य में दिखाई नहीं देती है। भारतीय साहित्य परम्परा में स्वयं के बारे में कहना-लिखना उचित नहीं माना जाता था। स्वयं के बारे में चार लोगों के बीच कुछ कहना असभ्यता का लक्षण माना जाता था। यह विधा अंग्रेजों के आगमन के साथ भारत में आई है। सन् 1870 से 71 में लिखी गयी दादोबा पांडुरंग की आत्मकथा को मराठी की पहली आत्मकथा कहा जाता है। हिन्दी की अपेक्षा मराठी का आत्मकथा साहित्य समृद्ध है। मरठी में केवल स्त्रियों की आत्मकथाओं की संख्या लगभग तीन सौ है। मराठी में स्त्री के आत्मपरक लेखन की शुरुआत संत नामदेव की भतीजी नागरी के आत्मकथनपरक आठ अभंगों(मराठी भक्तिकाव्य का एक प्रकार) से मानी जाती है। यह मध्यकालीन मराठी स्त्री द्वारा रचित पहला आत्मकथात्मक लेखन है। इसके बाद संत बहिणाबाई ने अपनी जीवन कथा को विस्तृत रूप से अभंगो में व्यक्त किया । इस काव्यात्मक आत्मकथा में घटनाओं की पूरी जानकारी मिलती है। लेकिन मध्यकाल में इस परंपरा का विकास हो नहीं पाया। विमल भालेराव ने मराठी में स्त्री आत्मकथा के आरंभ के विषय में लिखा है, “मराठी साहित्य में स्त्री को बहुत देर से प्रवेश मिला है। आत्मकथा अन्य विधाओं की अपेक्षा बहुत विलंब से नामरूप को आयी। इस कारण स्त्री आत्मकथा का जन्म भी देरी से ही हुआ। ऐसा समझा जाता है कि रमाबाई रानडे की ‘आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी’(हमारे जीवन की कुछ यादें) तक यानी सन् 1910 तक स्त्रियों ने आत्मकथाएँ नहीं लिखी है । छठें और सातवें सदी में ओवी(स्त्रियों द्वारा गाया जानेवाला गीत, जो बच्चे के जन्म, चक्की पर अनाज़ पिसते समय गाया जाता है।), गीत, म्हणी(कहावतें), उखाणे( इस काव्य प्रकार में पति का नाम एक विशिष्ट प्रकार की तुकबंदी द्वारा लिया जाता है, खासकर विवाह के अवसर पर) इस तरह के स्त्री साहित्य में हुए आत्म प्रकटीकरण से इनको आंशिक आत्मकथा समझा जाता है। लेकिन उन्हें आत्मकथा नहीं कह सकते हैं, आत्मकथा के निकषों पर उन्हें जाँचा भी नहीं जा सकता है। आत्मकथा विधा के कुछ तत्व उसमें खोजे जा सकते हैं, क्योंकि स्त्रियों ने इसके माध्यम से अपनी व्यथा-वेदना, हर्ष-आनंद को स्वर दिया है। यहाँ कल्पना को स्थान नहीं है। संत कवयित्री जनाबाई और बहिणाबाई के अभंगों में आत्मकथात्मक निवेदन दिखाई देते हैं। पर आत्मकथा विधा को ध्यान में रखकर उनका लेखन नहीं हुआ है। वे केवल भक्ति के लिए लिखे गये अभंग थे। विठ्ठल भक्ति उसकी प्रेरणा थी। विद्वानों ने उसमें आत्मकथा के तत्वों को खोजा। उस समय गद्य साहित्य रूढ़ नहीं था। ओवी, गीत, अभंग आदि पद्यात्मक माध्यमों का प्रयोग विचारों को प्रकट करने के लिए किया जाता था। इसलिए जनाबाई और बहिणाबाई ने आत्मप्रकटीकरण के लिए अभंग को चुना। जनाबाई के अभंगों में आये हुए आत्मकथात्मक बातों से संत जनाबाई को मराठी की पहिली स्त्री आत्मकथाकार मानना पड़ेगा।” विमल भालेराव के कथन से बात स्पष्ट होती है कि मराठी में छठी-सातवीं शती से स्त्री द्वारा पद्यात्मक आत्मकथात्मक लेखन हो रहा था। लेकिन आत्मकथा विधा के निकषों पर वे खरी नहीं उतरती है। 15 वीं शती के बहिणाबाई के आत्मकथन पर लेखन के बाद एक लंबा अंतराल मराठी में स्त्री आत्मकथात्मक लेखन में आता है।
19 वीं सदी में स्त्री शिक्षा के आरंभ के कारण स्त्री अपने जीवन और समाज को खुलकर अभिव्यक्त करने लगी। शुरुआत में कथा-उपन्यासों द्वारा अपने जीवन को अभिव्यक्त करने लगी। सन् 1910 में न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे की पत्नी रमाबाई रानडे की आत्मकथा ‘आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी’(हमारे जीवन की कुछ यादें) प्रकाशित हुई। यह आत्मकथा मराठी साहित्य के आधुनिक काल की पहली स्त्री आत्मकथा है। आत्मकथा भारतीय साहित्य की विधा न होने के कारण शुरुआती आत्मकथाओं का रूप आत्मकथाओं से थोड़ा भिन्न दिखाई देता है। 20वीं सदी के शुरुआत की स्त्रियों की आत्मकथाएँ पति चरित्र बनकर रह गई हैं। पति चरित्र के साथ अंशतः स्त्रियों की स्थिति भी उजागर हुई है। लक्ष्मीबाई तिलक की आत्मकथा ‘स्मृतिचित्रे’ को मराठी के आलोचक ‘मराठी स्त्री आत्मकथा का गहना’ कहते हैं। 19 वीं सदी के महाराष्ट्र की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थिति में आए परिवर्तन को इस आत्मकथा द्वारा जाना जा सकता है। मराठी में विविध क्षेत्रों से जुड़ी हुई स्त्रियों ने आत्मकथाएँ लिखीं। इस कारण मराठी में स्त्री आत्मकथाओं की संख्या अधिक है। मराठी की स्त्री आत्मकथाओं का वर्गीकरण इस प्रकार किया है- 1. आरंभिक आत्मकथाएँ, 2. कलाक्षेत्र, 3. समाजिक और राजनीतिक क्षेत्र, 4. लेखन क्षेत्र, 5. दलित स्त्री की आत्मकथाएँ, 6. प्रसिद्ध पुरुषों की पत्नियों की आत्मकथाएँ, 7. इतर आत्मकथाएँ।
2.2.1 आरंभिक आत्मकथाएँ
भारतीय संस्कृति में पति का स्थान ईश्वर के समान माना जाता है। ‘पति पत्नी के लिए सबकुछ है’ यह पाठ हमारे समाज में बचपन से लड़कियों को पढ़ाया जाता है। आज की पढ़ी-लिखी स्त्री भी इन संस्कारों को पूरी तरह से नहीं भूली है। आज भी पढ़ी-लिखी स्त्री को वह सबकुछ करते हुए देखा जा सकता है, जो एक अनपढ़ स्त्री अपने पति के लिए करती है। इनके लिए पति ही दुनिया होती है। पति गुरु ,मार्गदर्शक सबकुछ होता है। आरंभिक स्त्री आत्मकथाओं में स्त्रियों ने अपने जीवन के बारे में कम और पति की गौरव गाथा ज्यादा लिखी है। इसमें कुछ स्त्री की शिकायते भी हैं, मगर दबी हुई आवाज में ही। इन आत्मकथाओं के विषय में विमल भालेराव का कहना है, “पति का चित्र बनाते समय अपना जितना चित्र बना सकते है, उतना ही बनाया। अपने चित्र का स्वतंत्र रूप से विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।” ऐसी आत्मकथाओं में पति के दोषों का भी गुणगान मिलता है। इन आत्मकथाओं को पढ़कर ऐसा लगता है, किसी भक्त ने अपने आराध्य का चित्रण किया है। अत्यंत भावुक होकर इस वर्ग की आत्मकथाएँ लिखी गई हैं।
ये आत्मकथाएँ पति-चरित्र होने पर भी, हमें इन आत्मकथाओं से तत्कालीन समाज में स्त्री का स्थान, उसकी भूमिका, उसके अनुभव, बदलती परिस्थितियों में स्त्री का बदलता रूप आदि की जानकारी मिलती हैं।
श्रुती श्री. बडगबालकर ने इस वर्ग की आत्मकथाओं का अध्ययन करते समय तीन महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया है-
I. पतिनिष्ठा : इन आत्मकथाओं में पति का महत्व, उनका विशिष्ट व्यक्तित्व ,उनका प्रेम, उनका कार्य आदि की चर्चा की गई है।
II. पति के मृत्यु के बाद हिस्से में आया हुआ जीवन - इसमें केशवपन (मुंडन), विधवा का जीवन आदि का वर्णन किया गया है।
III. धर्म का प्रभाव : सामान्यतः पति के लिए लिखि गई आत्मकथाओं का विचार इसी दृष्टिकोन से किया गया है।
उपर्युक्त तीनों विशेषताएँ इस वर्ग की लगभग सभी आत्मकथाओं में कमोबेश मिलती हैं।
इस वर्ग में की आत्मकथाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
(1) आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी (हमारे जीवन की कुछ यादें) ( सन् 1910)
“सन् 1910 में न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे की पत्नी श्रीमती रमाबाई रानडे की आत्मकथा ‘आमच्या आयुष्यातील काही आठवणी’ प्रकाशित हुई। यह मराठी साहित्य के आधुनिक काल की पहली स्त्री आत्मकथा है।” इस आत्मकथा को लिखने के लिए रमाबाई को उनकी बेटी सखुबाई ने प्रोत्साहित किया। सखुबाई अपनी माँ को पति-शोक से बाहर निकालना चाहती थीं। रमाबाई पति के साथ बिताए जीवन को याद कर दुखी होती थीं। रमाबाई की बेटी सखुबाई ने इन यादों को लिपिबद्ध करने की सलाह दी। जिससे माँ का मन लगा रहेगा। रमाबाई रानडे ने यह बात मानी और आत्मकथा लिखना शुरू किया।
इसे पूर्णतः आत्मकथा नहीं कह सकते। इस आत्मकथा को रमाबाई रानडे ने अपने पति महादेव रानडे के पूर्वोजों के परिचय से आरंभ किया। इस आत्मकथा में महादेव रानडे की मृत्यु तक के अनुभवों को अभिव्यक्त किया गया है। इसके बाद के जीवन के बारे में रमाबाई रानडे ने कुछ नहीं लिखा। इससे पता चलता है कि रमाबाई रानडे का आत्मकथा लिखने का क्या उद्देश्य था। वे अपने जीवन के बारे में बताने के लिए इन यादों को संजोती नहीं है। रमाबाई पति के मृत्यु के पश्चात शोकग्रस्त थीं। ऐसी अवस्था में अपने पति संबंधी जो घटनाएँ, बातें याद आई उसे रमाबाई ने लिपिबद्ध किया। ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने अपने बारे में कुछ नहीं लिखा, क्योंकि आत्मकथा विधा ही ऐसी विधा है, जिसमें लिखनेवाले का जीवन विषयक दृष्टिकोण अनायास ही अभिव्यक्त होता है। रमाबाई ने अपने बचपन, अपने से बड़े महादेव गोविंद रानडे से हुई शादी आदि के विषय में लिखा
पति भक्ति में पूर्णता डूबी हुई रमाबाई आत्मकथा में दिखाई देती हैं। इस आत्मकथा से रमाबाई ने स्त्री अधिकारों के लिए किये आन्दोलन, महादेव रानडे ने किए सुधारणा आन्दोलन, पुणे और मुम्बई की तत्कालीन परिस्थिति आदि के बारे में जानकारी मिलती है। इस आत्मकथा के विषय में अरूणा ढेरे ने लिखा है- “मराठी साहित्य के आधुनिक काल की यह पहली स्त्री आत्मकथा है। इसमें सम्पूर्ण जीवन कथा कही नहीं गई है, फिर भी अत्यंत संवेदनशील और प्रगल्भ जीवनदृष्टि का परिचय देनेवाली है और स्त्री जीवन की मर्यादायों को प्रकट करते हुए मर्यादाओं से स्त्री को उपर उठाने वाली शक्ति का दर्शन होता है।”
(2) यशोदाबाई आगरकरांच्या आठवणी (यशोदाबाई आगरकर की यादें)- यशोदाबाई आगरकर
यह आत्मकथा ‘स्त्री’ मासिक प्रत्रिका में क्रमशः सन् 1938 में प्रकाशित हुई और पुस्तक रूप में सन् 1996 में।
यशोदाबाई ने अपने पति गोपाल गणेश आगरकर की मृत्यु के 43 साल बाद इन यादों को बताया और इसे लिपिबद्ध अकोला काँग्रेस कमेटी के कार्यकर्ता श्री. मुनी ने किया। इसके एक साल बाद यशोदाबाई की मृत्यु हुई। इस आत्मकथा में यशोदाबाई ने अपनी बातों को सीधे-सीधे बताया है। यही इस आत्मकथा का शिल्पगत सौंदर्य है। रमाबाई रानडे की तरह यशोदाबाई ने भी पति के मृत्यु के बाद का अपना जीवन रेखांकित नहीं करवाया। इस आत्मकथा के विषय में अरुणा ढेरे लिखती हैं- “इनकी यादें यशोदाबाई जैसी किसी स्त्री या व्यक्ति ने बताई हुई नहीं है, तो आगरकर जैसे बड़े समाज-सुधारक की पत्नी ने बताई यादें हैं। अर्थात् इनमें पत्नी महत्त्वपूर्ण नहीं है।”
इस आत्मकथा में आगरकर का व्यक्तित्व अत्यंत स्पष्ट दिखाई पड़ता है। स्त्री सुधारणा विषयी आगरकर जो विचार खुले आम प्रकट करते थे, उसकी प्रतिती घर में होती थी। आगरकर अपनी पत्नी को पढ़ाना चाहते थे, लेकिन इसके लिए भी कभी जबरदस्ती नहीं की। यशोदाबाई ने स्त्री जीवन के अनुभवों को खुलकर कहा। इनमें ससुराल-मायके के संबंध, अच्छ-बुरे अनुभव, छोटी लड़की से माँ बनने तक अलग-अलग भूमिकाओं के बारे में दिल खोलकर बताया। यशोदाबाई धीरे-धीरे आगरकर के विचारों को समझने लगी थीं। यशोदाबाई के मन और बुद्धि का योग्य विकास होने से पूर्व ही आगरकर की मृत्यु हुई।
(3) आत्मचरित्र आणि चरित्र (आत्मकथा और जीवनी) - काशीबाई कानिटकर (संपादन- सरोजिनी वैद्य) (सन् 1980)
इस आत्मकथा का प्रकाशन सन् 1980 में हुआ। इसका रचनाकाल सन् 1921 से सन् 1947 तक है। सन् 1861 से स्वतंत्रता के समय तक के अनुभव इसमें लिपिबद्ध हुए हैं। इस आत्मकथा की संपादिका ने मूल आत्मकथा के साथ जीवनी को जोड़कर इसे पूरा किया है।
काशीबाई कानिटकर एक प्रभावशाली लेखिका थीं। तत्कालीन परिस्थितियों में एक विचारशील लेखिका होना बड़ी बात थी। इनकी विचारशीलता जिस तरह इनके साहित्य में दिखाई देती है, वही उनकी आत्मकथा में भी दिखाई देती है। काशीबाई के मन में आत्मकथा लिखने की कोई निश्चित रूपरेखा नहीं थी। उन्होंने अपनी आत्मकथा को प्रकरणों में विभाजित किया। प्रकरणों को शीर्षक भी दिया है, जैसे- चहा ग्रामण्य, नगर-नेवाश्याचे दिवस, लहाणपनच्या काही आठवणी आदि। काशीबाई की स्मृति और लेखन अच्छा होने के कारण यह आत्मकथा अत्यंत पठनीय हो पाई है।
काशीबाई में बचपन में जो अल्हड़पन था, वह शादी के बाद पारंपारिक स्त्री का रूप धारण कर लेता है। काशीबाई को सुंदर न होने के कारण शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाएँ सहनी पड़ी। धीरे-धीरे काशीबाई इन सबसे दूर होते हुए, किताबों और सामाजिक कार्यों में रूचि लेने लगती हैं। रमाबाई रानडे के साथ सेवासदन में कार्य करती हैं। स्त्री के मतदान अधिकार के लिए संघर्ष भी करती हैं। मराठी के प्रख्यात साहित्यकार हरिभाऊ आपटे के साथ इनके अच्छे संबंध थे। इस पर काशीबाई ने आत्मकथा में एक स्वतंत्र प्रकरण लिखा।
काशीबाई की आत्मकथा का महत्व तत्कालीन स्त्री समस्याओं के चित्रण के कारण बढ़ जाता है। वे स्त्री समस्यायों और स्त्री सुधारणा आंदोलनों से अवगत थीं। उन्होंने स्त्री उत्थान के लिए कार्य भी किया। काशीबाई के लेखन का भी उतना ही महत्व है, जितना उनके सामाजिक कार्य का।
(4) स्मृतिचित्रे-( स्मृतिचित्र) लक्ष्मीबाई तिलक (सन् 1934)
इस आत्मकथा ने मराठी साहित्य में स्त्री आत्मकथाओं को एक नई पहचान और स्त्री आत्मकथाओं की तरफ देखने की नयी दृष्टि प्रदान की। इस विषय में विमल भालेराव का कहना है-“ पति के लिए लिखी होने पर भी अपनी प्रतिमा को स्पष्ट रेखांकित करने वाली ‘स्मृतिचित्रे’ मराठी की पहली स्त्री आत्मकथा है। ” इस आत्मकथा के प्रथम भाग का प्रकाशन सन् 1934 में हुआ और चौथा सन् 1936 में। इस आत्मकथा को लक्ष्मीबाई के बेटे देवदत्त ने संपादित किया। इस में 19 वीं सदी के तीन दशक और बीसवीं सदी के तीन दशकों का कालखण्ड चित्रित हुआ है। इस कालखण्ड का सामाजिक परिवेश ‘स्मृतिचित्रे’ में दिखाई देता है। अरुणा ढेरे ‘स्मृतिचित्रे’ को अन्य आत्मकथा की तरह केवल पति चरित्र नहीं मानती हैं। उनका कहना है-“यह आत्मकथा ‘तिलक भक्त की’ या ‘पति को परमेश्वर मानने वाली स्त्री की’ नहीं है। तिलक के सहवास में फुलने वाली, खुद को विकसित करते रहने वाली, एक स्वतंत्र ,खिलाड़ी वृत्ती के स्त्री का कथन है।”
लक्ष्मीबाई और तिलक का व्यक्तित्व सामान्य होने पर भी नाट्यमय और चित्र-विचित्र प्रसंगों से भरा हुआ है। लक्ष्मीबाई के जीवन की सबसे बड़ी और जीवन को नया मोड़ देने वाली घटना, अपने पति तिलक का खिश्चन धर्म स्वीकारना था। तिलक के धर्मान्तरण के कारण लक्ष्मीबाई के जीवन में आया हुआ बदलाव, पारिवारिक और सामाजिक जीवन आदि को लक्ष्मीबाई ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में लिखा। इसको लिखते समय अपने गुस्से का हर अंश उन्होंने लिखा है। एक अंश भी वे भूल नहीं पाई। इस आत्मकथा में लक्ष्मीबाई का चरित्र व्यावहारिक, वास्तविकता को जानने वाली और आने वाली समस्याओं का अत्यंत सामर्थ्यपूर्वक सामना करने वाली स्त्री का है।
इस आत्मकथा में एक तरफ बहारदार दाम्पत्य जीवन है, तो दूसरी तरफ इस सुखी दाम्पत्य जीवन में अचानक घटी घटनाओं के कारण आई हुई कटुता को भी अनदेखा नहीं कर सकते
(5) आमची अकरा वर्षे (हमारे ग्यारह बरस )- लीलाबाई पटवर्धन - (सन् 1945)
कवि माधव त्र्यंबक पटवर्धन (माधव ज्यूलियन) की पत्नी लीलाबाई पटवर्धन ने अपने ग्यारह साल के वैवाहिक जीवन को इस आत्मकथा में लिपिबद्ध किया है। इस आत्मकथा का प्रकाशन सन् 1945 में हुआ। इस आत्मकथा के संबंध में लीलाबाई लिखती हैं, “ माधवराव कह रहे थे, मैं अपना चरित्र खुद लिखने वाला हूँ। मेरे बाद कोई मेरे बारे में बेजवाबदार होकर लिखने से अच्छा है, मैं ही अपनी वास्तविकता लिखूँ। मुझसे अगर ऐसा हो न सका, तो तुम यह काम अवश्य करो।” अपने पति की आज्ञा का पालन करते हुए लीलाबाई पटवर्धन ने ‘आमची अकरा वर्ष’ आत्मकथा लिखी। माधवराव का सच्चा चित्र लोगों के सामने लाने का यह उनका प्रयत्न है। इस कारण लीलाबाई का चित्र धुंधला दिखाई देता है। इस आत्मकथा के विषय में अरूणा ढेरे लिखती हैं- “यह आत्मकथा एक सुजान और असामान्य वैवाहिक जीवन का गंभीर आलेख है। इसमें माधवराव का पिछला जीवन, उनके स्नेही, उनके आसपास का साहित्यिक वातावरण आदि की छाया दिखाई पड़ती है। सबसे अधिक चित्रण इसमें इनके वैवाहिक जीवन को लेकर हुई आलोचना का हुआ है। माधवराव को न समझ पाने के कारण लोगों ने उनका अपमान किया। इसे भी इसमें रेखांकित किया गया। लीलाबाई ने इस अपमानित जीवन को जिते हुए समझदारी से वैवाहिक जीवन जिया और कर्तव्य पालन के रूप में आत्मकथा भी लिखी।”
इस ‘पति के लिए’ लिखी गई आत्मकथाओं के वर्ग में और भी कुछ आत्मकथाएँ आती हैं-
1. राधाबाई केदार - वेचलेले पाणी
2.राधाबाई आपटे - ढळला रे ढळला दिन सख्या
3. पार्वतीबाई आठवले - माझी कहानी (सन् 1928)
4. पार्वतीबाई - माझे पुराण (सन् 1944)
5. कमलाबाई देशपांडे - स्मरण साखळी (सन् 1943)
6. मालतीबाई मकासरे - तीव्र जाणीव (सन् 1917)
7.अन्नपूर्णाबाई रानडे - स्मृतितरगं (सन् 1947)
उपर्युक्त आरंभिक आत्मकथाएँ ‘पति के लिए’ लिखी गई होने पर भी, इन आत्मकथाओं से तत्कालीन समाज में स्त्रियों का स्थान, पुरुष जाति की तरफ स्त्री का दृष्टिकोण, रीति रिवाज़, स्त्रियों का अपने अधिकारों के लिए किया गया संघर्ष, इस संघर्ष के लिए पुरुषों की सहायता आदि की जानकारी मिलती है। अरुणा ढेरे ने इन आत्मकथाओं की भाषा का अध्ययन किया है। पति के लिए जिन संबोधनों का प्रयोग इन आत्मकथाओं मे किया गया है, उसके आधार पर उन्होंने कहा है, “ रमाबाई रानडे अपने पति रानडे का उल्लेख सर्वत्र ‘स्वतः’(स्वंय) करती है। पार्वतीबाई आठवले ‘आमचे पुरुष’(हमारा पुरुष) लिखती है। तो लीलाबाई पटवर्धन ‘माधवराव’ कहती है। ” संबोधनों में आया हुआ बदलाव स्त्री में आई नई चेतना को दर्शाता है। इस तरह हम देखते हैं कि समय के साथ-साथ स्त्री जीवन में बदलाव आए और पति विषयक संबोधनों में भी।
2.2.2 कला क्षेत्र
(1) जाऊ मी सिनेमात? (जाऊँ मैं सिनेमा में?) - शांता आपटे (सन् 1940)
शांता आपटे ने आत्मकथा में फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवों को लिपिबद्ध किया है। फिल्मों में काम करने के इच्छुक लोगों के पत्र शांताबाई को मिलते थे। वे शांताबाई से मार्गदर्शन चाहते थे। इन सभी पत्रों का उत्तर शांताबाई आपटे ने अपनी आत्मकथा ‘जाऊ मी सिनेमात?’ में दिया है। इस आत्मकथा में शांताबाई का निजी जीवन कम ही आया है। शांताबाई ने फिल्म इंडस्ट्री का मुखौटा उतारकर उसका असली चेहरा दिखाया है। फिल्म इंडस्ट्री का आकर्षण हम सबको है। इसे मायानगरी भी कहा जाता है। इस मायानगरी की वास्तविकता को शांताबाई व्यक्त करती है। शांताबाई के आत्मकथा के लेखन का एक उद्देश्य था। वे चाहती थीं कि भोले-भाले लोग इस मायानगरी के चक्कर में पड़कर अपना जीवन बर्बाद न करें। शांताबाई के अनुसार हमें इस मायानगरी का असली चेहरा जानकर ही इस में कदम रखना चाहिए । इस आत्मकथा में शांताबाई अपने बचपन, निजी जीवन के संबंद्ध के बारे मे कुछ भी नहीं लिखती है। उत्कृष्ट अभिनेत्री और उत्कृष्ट गायिका बनने की यात्रा के दौरान के अनुभवों को इस आत्मकथा में अभिव्यक्त किया गया है।
(2) माझी नृत्य साधना (मेरी नृत्य साधना) - रोहिणी भाटे (सन् 1950)
इस आत्मकथा में केवल रोहिणी भाटे की ‘नृत्य साधना’ का ही उल्लेख हुआ है। इस आत्मकथा में इनके निजी जीवन के विषय में कुछ भी जानकारी नहीं मिलती। इन्होंने नृत्य में महारथ हासिल करने के अनुभवों के साथ इस कला के विषय में लिखा। इन्होंने नृत्य से संबंधित ‘मौज’, ‘नवभारत’, ‘अभिरूचि’, ‘सत्यकथा’, ‘अनिल’ आदि पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित किये। रोहिणी जी को शुरुआत में नृत्य के पाठ अनुकरण करके पढ़ने पढ़े। उन्होंने सोहनलाल, उदयशंकर, शर्मा आदि के कार्यक्रमों को देखकर एकलव्य की तरह घर पर नृत्य का अभ्यास आरंभ किया। 3 मई सन् 1946 को सोहनलाल के यहाँ नृत्य के पाठ पढ़ने की विधिवत शुरुआत हुई। सोहनलाल की कथक परम्परा को उन्होंने आगे बढ़ाया। ‘कथक’ मूल विषय होते हुए भी उन्होंने ‘नृत्य’ को ही मूल विषय कहा। इस आत्मकथा में अपनी प्रशंसा या आलोचकों के प्रति घृणा दिखाई नहीं देती। कला और कलाकारों को समाज जिस उपेक्षा भाव से देखता है, उसका दुख इस आत्मकथा में व्यक्त हुआ है। रोहिणी जी का पहला नृत्य कार्यक्रम 15 अक्तूबर सन् 1942 में हुआ। इस आत्मकथा में नृत्य से संबंधित पारिभाषिक शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। इस आत्मकथा में हम ऐसे व्यक्तित्व को देखते हैं जो प्रवाह के विरूद्ध जाकर अपने आत्मविश्वास और परिश्रम के आधार नाम कमाता है। इस आत्मकथा में ‘नृत्य’ से संबंधित जानकारी भी मिलती है।
(3) सांगते मी ऐका (कहती हूँ सुनो) - हंसा वाडकर (सन् 1966)
हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘सांगते मी ऐका’(कहती हूँ सुनो) मराठी पत्रिका ‘माणूस’ के ‘दिवाली अंक’(सन् 1966)में प्रकाशित हुई थी। इस आत्मकथा के विषय में मेधा सिधये ने लिखा है, “फिल्म इंडस्ट्री में काम करनेवाली स्त्री को कितने दाहक अनुभव आ सकते है, इसका विलक्षण, धैर्यपूर्ण और स्पष्ट चित्रण स्त्री आत्मकथा में पहली बार किया जाने के कारण इस आत्मकथा ने बहुत ही खलबली मचायी।” इस आत्मकथा के लिखने का उद्देश्य मायानगरी के आकर्षक मुखौटे के पीछे के असली चेहरे को दिखाना है। जिस तरह के अनुभव हंसा वाडकर को आए हैं, वैसे किसी और के हिस्से में न आए।
हंसा वाडकर को अपने घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बचपन से ही फिल्मों में काम करना पड़ा। उनको फिल्मों से नाम और पैसा मिला, साथ-ही-साथ बदनामी भी मिली। इस कारण वे नशा भी करने लगीं। समाज और पति दोनों की दृष्टि में हंसा वाडकर फिल्मों में काम करने के कारण घृणित थी। इतना होने पर भी उनके पति को हंसा वाडकर के पैसों से कोई ऐतराज नहीं था।
ऐसा भी नहीं है कि हंसा वाडकर को अच्छे अनुभव नहीं आए हो। उनके मन में ‘प्रभात फिल्मस’ और व्ही. शांताराम के प्रति आदर भाव है। राजा भाऊ नेने, बाबूराव पेंढारकर के संस्कारों के कारण उनके स्वभाव में नम्रता दिखाई देती है। पति के साथ संबंध अच्छे न होने पर भी, हंसा वाडकर ने पति के गुणों की दिल खोलकर प्रशंसा की। एक प्रतिभाशाली लेकिन अभागे कलाकार के बर्बाद जीवन की यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। इनके अनुभवों के बारे में मेधा सिधये लिखती हैं, “पुरुषी अहंकार, संशयी वृत्ती, सिर्फ पैसों पर नज़र रखनेवाला उनका पति और अन्य रिश्तेदार, उनकी इज्ज़त लुटने के लिए आतुर, लुटनेवाले विकृत पुरुष ,इन सब अत्यंत दाहक, कटु, मन विदीर्ण करनेवाले अनुभवों ने हंसाबाई को जीवन के कुछ जहरीले पहलूँ दिखाए। उनके स्त्रित्व को, इंन्सानियत को, सुरंग लगा दिया गया। उनकी यह दिल हिला देनेवाली कहानी है।” स्वर्गीय स्मिता पाटिल और अमोल पालेकर की अविस्मरणीय फिल्म ‘भूमिका’ इसी आत्मकथा के आधार पर बनी थी। जिसका निर्देशन प्रतिष्ठित फिल्मकार श्याम बेनेगल ने किया था, जो सन् 1977 में प्रदर्शित हुई थी।
(4) स्नेहांकिता – स्नेहांकिता प्रधान (सन् 1973)
स्नेहांकिता प्रधान की आत्मकथा ‘स्नेहांकिता’ सन् 1973 ई. में प्रकाशित हुई। इस आत्मकथा के चर्चा में आने का कारण स्नेहप्रभा प्रधान और डॉ. शिरोडकर(डॉक) के प्रेम संबंध का यथार्थ चित्रण था। बचपन से प्यार के लिए तरसने वाली स्नेहप्रभा को फिल्मों ने पैसा तो दिया, लेकिन प्यार नहीं। उनके पति की नज़र स्नेहप्रभा प्रधान के पैसों पर ही थी। उनका पति होनेवाले बच्चे से भी नफरत करता है। इस अकेलेपन के मोड़पर उनको डॉ. शिरोडकर का साथ मिलता है। ‘बेटा’ संबोधन से शुरु हुआ उनका संबंध शारीरिक संबंध तक चला जाता है। स्नेहप्रभा अपना जीवन डॉ. शिरोडकर को सौंपती है, लेकिन डॉक्टर उन्हें एक स्त्री शरीर के रूप में ही देखते हैं। इस कारण यह आत्मकथा स्नेहप्रभा प्रधान के भोले मन की ‘शोकांकिता’ बन जाती है।
(5) चंदेरी दुनियेत (फिल्मी दुनिया में) लीला चिटणीस (सन् 1981)
‘लीला चिटणीस की आत्मकथा ‘चंदेरी दुनियेत’ (फिल्मी दुनिया में) सन् 1981 ई. में
प्रकाशित हुई। इस आत्मकथा में फिल्म इंडस्ट्री के अनुभवों के साथ-साथ लीला चिटणीस का पारिवारिक जीवन भी चित्रित्र हुआ है। अन्य अभिनेत्रियों की आत्मकथाओं की तरह इस आत्मकथा ने भी फिल्मी दुनिया के मुखौटों को उतारा गया है। लीला चिटणीस का जीवन बड़ा नाटकीय और अकेलपन से भरा हुआ लगता है। उन्होंने 17 साल की उम्र में प्रेम विवाह किया। पहले पति से चार बच्चे थे। फिल्मी दुनिया में आने के बाद अपने पति से तलाक ले लिया। विनायक से नजदीकियाँ बढ़ने लगीं। लेकिन वास्तविकता यह है कि फिल्मी दुनिया मे कोई भी संबंध स्थिर नहीं होता । लीला चिटणीस के भी अनेक पुरुषों से संबंध बने, टूटे फिर वे नये संबंध की तलाश में निकलती थीं। अपने बच्चों को नौकरों के हवाले करना पड़ता था। बच्चों के सुखी पारिवारिक जीवन को देखकर वे खुश होती हैं। इस आत्मकथा में फिल्म स्टुडियों के छोटे-बड़े कलाकारों का, मजदूरों और माहौल का चित्रण अत्यंत जीवंत हुआ है।
(6) मी दुर्गा खोटे (मैं दुर्गा खोटे) दुर्गा खोटे(सन् 1982)
दुर्गा खोटे की आत्मकथा ‘मी दुर्गा खोटे’(मैं दुर्गा खोटे) सन्1982ई. में प्रकाशित हुई। दुर्गाबाई का जन्म अंगेजपरस्त अमीर घराने में हुआ था। उनका ससुराल भी अमीर था। लेकिन शेअर बाज़ार में पैसा डूबने के कारण ससुराल को गरीबी के दिन देखने पड़े। दुर्गाबाई अपने पति और बच्चे के साथ मायके में रहने लगीं। इन परिस्थितियों से बाहर निकलने के लिए दुर्गाबाई ने फिल्मी दुनिया का रास्ता चुना। इस निर्णय के कारण समाज ने उनकी कटु आलोचना की, फिर भी व्ही. शांताराम जी का निमंत्रण स्वीकारा। उन्हें कभी फिल्मी दुनिया में असफलता का मुँह देखना नहीं पड़ा। वे एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ती गईं।हमने अबतक देखा है कि फिल्मी दुनिया से जुड़ी हुई स्त्रियों के पास पैसा तो होता है, पर उसके साथ अस्थिर पारिवारिक जीवन और अकेलापन भी । यह समस्या दुर्गाबाई के जीवन में भी थी। पति और माँ के साथ के संबंधों में दरार पड़ गई। दुर्गाबाई के पति की अचानक मृत्यु हुई। उसके बाद उनके जीवन में रशीद आए। रशीद ने दुर्गाबाई के बच्चों को संभाला तथा दुर्गाबाई से शादी की। लेकिन यह विवाह भी असफल हुआ। दुर्गाबाई कई बार विदेशों की यात्राओं पर गयीं। उन्हें पुरस्कार, मान-सम्मान मिला, पर अपना कोई नहीं मिला। यह आत्मकथा एक तृप्त अभिनेत्री और असफल गृहीणी की है।
(7) माझ्या संगीत जीवनाची वाटचाल(मेरे संगीत जीवन का सफर) मालतीबाई पांडे (सन् 1989)
मालतीबाई पांडे की आत्मकथा ‘माझ्या संगीत जीवनाची वाटचाल’ (मेरे संगीत जीवन का सफ़र) सन् 1989 ई. में प्रकाशित हुई।मालतीबाई पांडे की माँ अच्छा गाती थीं। मालतीबाई पांडे ने बचपन से ही गायन शुरु किया। सन् 1945 ई. से उन्होंने संगीत के कार्यक्रम करना आरंभ किये। कलाकार और जनता के बीच के प्रेम और द्वेष के अनुभवों को इस आत्मकथा रेखांकित किया गया हैं। मालती जी ने फिल्मों में भी आवाज़ दी। इस आत्मकथा में फिल्मी दुनिया के भी अनुभवों व्यक्त किया है। मालतीबाई पांडे ने मराठी में ‘भावगीतों’ को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने भावगीतों के जन्म के बारे में लिखा है। उन्होंने, एक कलाकार का जीवन और पारिवारिक जीवन किस तरह तनाव पूर्ण होता है, इसका भी उल्लेख किया है। वे लिखतीं हैं, “परिवार के बंधन में उलझने के बाद ‘परिवार या कला’ किसे प्राथमिकता दे ऐसी विचित्र असमंजस की स्थिति स्त्री कलाकारों के हिस्से में आती है। इस तनाव से निर्माण होता गया, संघर्ष, उस स्त्री के पूरे जीवन को हिलाकर रख देता है। कलाकार का मन रोने लगता है।” इस आत्मकथा में संगीत के इतिहास की जानकारी मिलती है। एक स्त्री को गृहीणी और कलाकार की दोहरी भूमिका निभाते समय किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इसे चित्रित्र किया गया है।
इन आत्मकथाओं के अलावा कुछ और स्त्री कलाकारों की आत्मकथाएँ भी प्रकाशित हुई- 1. ‘कशाला उद्याची बात’- शांता हुबलीकर (सन् 1990), 2. ‘रंगले मी झुंझले मी’ -इंदिरा लाटकर(सन् 1977), 3.‘माझी जीवनयात्रा’- लील पेंढारकर,4 ‘जगले जशी’- लालन सारंग (सन् 1992), 5. ‘अशी मी जयश्री’- जयश्री गडकर(सन् 1986) 6. ‘मी आणि माझे कथाकथन’ - मुग्धा चिटणिस, 7. ‘किती रंगला खेल’ -माणिक वर्मा(सन् 1992), 8. ‘बाई मी भाग्याची’- ललिता जोगलेकर(सन् 1993), 9. ‘कुंपणावरची कोरांटी’- विमला घैसास(सन् 1995), 10. ‘सुवासिनी’- सीमा देव(सन् 1998), 11. ‘तुमची ज्योत्स्ना भोले’- ज्यात्स्ना भोले(सन् 1998)।
इन आत्मकथाओं को पढ़कर इतना तो साफतौर पर कहा ही जा सकता है कि इन स्त्री कलाकारों को अपना कला द्वारा पैसा और नाम तो मिला, लेकिन साथ ही बदनामी और अकेलापन भी। इनका पारिवारिक जीवन सुखमय नहीं था। इनके जीवन में कोई स्थिरता नहीं थी, वे अपने स्थायित्व की तलाश में निरंतर संघर्षरत रहीं। इन स्त्रियों के दर्द को जानने वाला या अपने पन से सर पर हाथ रखने वाला कोई नहीं मिला। इन स्त्रियों को पुरुष बदलने पर भी प्यार नहीं मिल पाया। ज्यादातर लोगों की नज़र इनके पैसे पर होती थी। इन आत्मकथाओं से साफ जाहिर होता है कि, फिल्मों में काम करने वाली स्त्रियों के प्रति समाज का रूख-रवैया कैसा होता है और इनका जीवन स्तर किस प्रकार विसंगतिपूर्ण होता है। यह आत्मकथाएँ उन स्त्रियोँ का इतिहास है, जो दोहरी भूमिका निभाती है। इन स्त्रियों को केवल ‘पुरुष’ मिले, ऐसे पुरुष जो इन स्त्रियों को केवल भोगना चाहते हैं। इनके प्रति किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी निभाने से वे कतराते हैं। इन पुरुषों से अधिकांश स्त्री कलाकारों का पारिवारिक रिश्ता बन नहीं पाया। हंसा वाडकर की आत्मकथा पर बनी फिल्म ‘भूमिका’ की नायिका के बारे में अरूण बंछोर अपने ब्लाग पर लिखते हैं, “यह एक स्त्री के कांटों पर चलने की कहानी थी। एक औरत के बार-बार हतप्रभ होने का वृत्तांत। बार-बार ठगे जाने की कराह। यह एक स्त्री की कहानी थी जिसकी नींद उड़ी हुई है, जो उनींदी है और जो ठौर की तलाश में है। जो नीमहोशी में चली जा रही है। यह मर्दों की दुनिया में एक स्त्री का भटकाव था जहां बार बार मोहभंग होता था। स्वप्न टूटता था। उषा ने कलाओं को साधा था - गाने और अभिनय और नृत्य की कलाएं। लेकिन मर्दों से निपटने की कला उसे नहीं आती थी। यह उसकी त्रासदी है। लेकिन यह तो भारतीय स्त्री की त्रासदी भी है। तो ‘भूमिका’ एक दस्तावेज़ है। ” अरूण बंछोर का उपर्युक्त कथन केवल हंसा वाडकर तक ही सीमित नहीं रहता, तो यह ज्यादात्तर स्त्री कलाकारों के दर्द को उजागर करता है।
2.2.3 शिक्षा क्षेत्र
(1.) गोदातरंग- सुधा अत्रे (1969)
सुधा अत्रे मराठी साहित्यकार आचार्य अत्रे की पत्नी और शिरीष पै की माँ हैं। शिक्षा क्षेत्र में उन्होंने अच्छा कार्य किया, पर वे वैवाहिक जीवन से खुश नहीं थी।
सुधा जी का जन्म सन् 1899 को हुआ। सन् 1916 में विल्सन कॉलेज में प्रवेश लिया और वहाँ से उन्होंने बी.ए. की उपाधी प्राप्त की। सन् 1929 में आ. अत्रे से विवाह हुआ, उस समय वे पढ़ाई के लिए इंग्लंड जाना चाहती थी। आ. अत्रे से विवाह के लिए प्रस्ताव आने पर वे विवाह के लिए तैयार हो गयी। आ. अत्रे की बुद्धिमता का आकर्षण था और उस समय उनके व्याख्यान और ‘झेंडुची फुले’ काव्य संकलन की काफी चर्चा थी। आ. अत्रे के इस मनभावन रूप को देखकर उन्होंने विदेश जाने की बात मन से निकाल दी। पर उन्होंने इस मनभावन रूप से पहला झटका सुहागरात के समय लगा। पलंग एक स्त्री के फोटो का हार डाला हुआ था। सुधाताई को लगा यह फोटो उनके पहली पत्नी होगा। पर वह फोटो अत्रे की प्रेमिका वनमाला का था। विवाह के बाद आ. अत्रे वनमाला के साथ रहने लगे। सन् 1955 में वनमाला आ.अत्रे को छोड़कर चली जाने के बाद सुधा अपने पति के साथ रहने लगी। सुधा जी ने ‘क्षमा करना स्त्री का सच्चा धर्म है’ का पालन करते हुए, उन्होंने अपने पति को माफ किया था। इन सब परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी लडकी शिरीष पै को अच्छे संस्कार दिए।
उन्होंने अपनी बेटी को ही नहीं, बल्कि ट्रेनिंग कॉलेज की छात्राओँ को भी माँ का प्यार दिया। नासिक के ट्रेनिंग कॉलेज में एक अच्छी अध्यापिका और सुपरिंटेंडेंट के रूप जानी जाती थी। शिक्षाक्षेत्र को एक व्यवसाय की दृष्टि से उन्होंने कभी नहीं देखा। सुधा जी की आत्मकथा में लड़कियों के मनोविज्ञान को जानने वाली, प्रेममय पर अनुशासन प्रिय, लड़िकयों के सर्वांगीण विकास के लिए संघर्ष करनेवाली और जाति भेद को दूर करने का प्रयत्न करने वाली स्त्री का दर्शन होता है।
इस तरह यह आत्मकथा सुधा अत्रे के पारिवारिक और शिक्षा क्षेत्र से संबंधित जीवन की कथा कहती है।
(2.) हे गीत जीवनाचे (यह गीत जीवन का) सुमतीबाई शहा
गुंजोटी गाँव में सुमतीबाई शहा की प्राथमिक शिक्षा हुई। यहीं पर उनके मन में अध्यात्मिकता के बीज बोये गये। उनमे विवेकानंद के चरित्र के कारण ब्रह्मचर्य की आकर्षण निर्माण हुआ। अगर स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य का पालन करें तो वे कठिन से कठिन कार्य को कर सकती हैं – ये बातें उनके पिता कहते थे। यही बातें उनके कानों गूँजा करती थीं। इसी कारण उन्होंने उन्नीस साल की उम्र ब्रह्मचर्य व्रत को मुनी शांतिसागर महाराज और मुनी समंतभद्रजी महाराज के सामने लिया।
बाल विधवा बुआ और छोटे चाचा वालचंद्र देवचंद्र शहा के समर्थन से छोटी उम्र से ही स्त्री शिक्षा के लिए कार्य करने लगी थीं। स्वयं उन्हें पढाई करते समय कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा था। डॉ. राधाकृष्णन, प. मदनमोहन मालवीय के साथ उन्होंने स्त्री शिक्षा पर बात की। ये विद्वान स्त्री-पुरुषों को समान अधिकारों की बात तो करते हैं, पर व्यावहारिक शिक्षा में स्त्री-पुरुषों की प्रकृति और प्रवृति पर विचार करने पर भी कहते हैं। सुमतीबाई स्त्री शिक्षा के पक्ष में तो थी, पर वे भी चाहती थी कि स्त्रियाँ आदर्श गृहणी बने। वे चाहती थी कि स्त्रियाँ आधा समय बाहर काम करें, पर ज्यादा समय घर को ही दें। सुमतीबाई के विचार सह शिक्षा के अनुकूल थे।
सन् 1952 में सुमतीबाई ने भारत महिला शिक्षण मंडल की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य भारत के हर कोने में स्त्री शिक्षा का प्रसार करना और अंग्रेजी और संस्कृत की शिक्षा देना था।
उनके स्त्री शिक्षा संबंधी विचारों में कुछ कमियाँ होने के बावजूद स्त्री शिक्षा के लिए बढाया हुआ, उनका यह कदम वाकई प्रेरणादायी है।
2.2.4 सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र
(1) कोसबाडच्या टेकडीवरून(कोसबाड की पहाड़ी से) अनुताई वाघ (सन् 1980)
अनुताई वाघ का बालविवाह हुआ था और वे बचपन में ही विधवा हो गई। दुर्गाताई नेने जो पेशे से अध्यापिका थीं, अनुताई को अपने साथ अकोला ले गई। वहाँ के ‘राष्ट्रीय कन्या पाठशाला’ में अनुताई की शिक्षा आरंभ हो गई। आगे उनकी पढ़ाई जलगाँव,इगतपुरी,नाशिक आदि जगहों पर हुई। अनुताई छात्रावास में रहती थी। अनुताई छात्रावास के जिन्दगी के अनुभवों से भी रू-ब-रू कराती हैं। छात्रावास में धर्म और अस्पृश्यता का कितना प्रभाव था, इसका भी वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है।
कॉलेज की ट्रेनिंग समाप्त होने पर, अनुताई का असली जीवन शुरु होता है। अनुताई की जान- पहचान सरलादेवी साराभाई, मृदला साराभाई, ताराबाई मोड़क आदि से थी। अनुताई ने आदिवासियों के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया । इस आत्मकथा में महाराष्ट्र के आदिवासी जीवन का दर्शन अनायास ही होता है। अनुताई अपने साथ काम करने वाले पुरुषों को भाई न मानकर मित्र मानती थीं। परिवार न होने कारण समाज की दृष्टि उनके प्रति भिन्न थी। इसका उल्लेख उन्होंन कम ही किया है।
(2) कुणा एकिचे अंतरंग (किसी एक स्त्री का अंतरंग) मंगला भागवत (सन् 1993)
मंगला भागवत का जन्म सन् 1922 में हुआ। उनका बचपन इचलकरंजी में बीता। मायके में उन्हें उषा कहा जाता था और शादी के बाद उन्हें मंगला कहा जाने लगा। इस आत्मकथा में संयुक्त परिवार के गुण-दोषों को भी बताया गया है। मंगला जी के माँ की मृत्यु के बाद, उनका पालन-पोषण उनके चाचा-चाची ने किया। चाचा विचारों से प्रगतिशील थे। उनके विचारों का प्रभाव मंगलाजी पर भी पड़ा।
इंटर के बाद उनका विवाह माधव भागवत के साथ सन् 1942 में हुआ। मंगला जी ने मन से कम्युनिस्ट पार्टी का कार्य किया। इनके पति को राजनीति पसंद नहीं थी। इस कारण दोनों में काफी वाद-विवाद होता था। लेकिन मंगला जी कभी रूकी नहीं। उन्होंने समाजकार्य भी जारी रखा और अपने पति के व्यवसाय में हाथ बटाना भी। उन्होंने सन् 1955 में ‘शिशु विहार’ संस्था आरंभ की, यही संस्था बाद में ‘महिला संघ’ के नाम से जानी जाने लगी। इससे लोग जुड़ते गये। इस संस्था में शिक्षा के अलावा अनेक लोकोपयोगी कार्य होते रहे हैं। समाज सेवा करने के कारण उनका पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण रहा है। यह आत्मकथा एक कर्तृत्ववान स्त्री की है।
(3) न संपलेली वाट (राह जो न समाप्त हुई..) – कमल भागवत (सन् 1996)
कमल भागवत के पिता भाऊसाहेब तुलपुले काँग्रेस से जुड़े हुए थे। इस कारण बचपन से ही कमलबाई को एक विशिष्ट माहौल मिला। कॉलेज जीवन से ही कमलाबाई काँग्रेस के रास्ते चलने लगी थी। आगे अपने मर्जी से कम्युनिस्ट पार्टी में चली गई। कमलबाई का विवाह उनके भाई के मित्र किशा भागवत से हुआ। इनका रजिस्टर मैरेज हुआ। विवाह के विषय में कमलाबाई की भूमिका एकदम बागी किस्म की थी। विवाह में उन्होंने खादी के कपड़े पहने थे। न गहने पहने थे, न मंगलसूत्र। एक-दो साल तक अपने मायके का नाम ही अपने नाम के साथ जोड़ती थीं। इससे भी बड़ा क्रांतिकारी निर्णय बच्चा न होने देने का निर्णय था, जो उन्होंने महज 24 साल की उम्र में लिया था। उस समय उनके पति की उम्र 27 साल थी। पति ने भी संतती नियमन का खुद आपरेशन करवाया। इसके लिए कमलबाई और उनके ससूर ने भी हस्ताक्षर किये।
विदेश यात्रा का अवसर मिलने पर भी वे विदेश नहीं गयीं। वे अपने विचारों से क्रांतिकारी थीं। कम्युनिस्टों होने पर किसी कम्युनिस्ट राष्ट्र की यात्रा करनी चाहिए, ऐसी धारणा कम्युनिस्टों में है, इसका कमलबाई पुरजोर विरोध करती है। कमलबाई जीवन भर अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्ध रही हैं। इनके स्वभाव और समतोल विचारों के कारण यह आत्मकथा चित्ताकर्षक बन पड़ी है।
(4) जीवन संघर्ष – कमलाबाई अष्टपुत्रे (सन् 1999)
यह आत्मकथा एक सच्चे कार्यकर्ता स्त्री की है। कमलाबाई गाँधीवादी विचारों से प्रभावित होने पर भी, वे किसी विचारधारा की सीमाओं में कभी बँधी नहीं हैं। उन्होंने समाजवाद को भी अच्छी तरह समझा था। पति-पत्नी दोनों काँग्रेस जुड़े थे। धुले में इनकी जोड़ी को आदर्श जोड़ी माना जाता था। पर शादी के बाद अपेक्षा भंग होने के कारण दोनों में अनबन होने लगी थी। अपनी बेटी वसुंधरा से दोनों प्यार करते थे। इसलिए कमलाबाई अपने पति रामकृष्ण अष्टपुत्रे के साथ रहना चाहती थीं। वे तलाक के लिए तैयार नहीं थी। पर कमलाबाई के पति ने एकतर्फा तलाक हासिल किया और सुशिला नामक स्त्री से विवाह किया।
इस तनावपूर्ण जीवन से उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समय निकाला। कमालाबाई जब येरवाडा के जेल में थीं, तब उनकी बेटी बहुत छोटी थी। उन्होंने जेल में जन-जागृति का कार्य किया। उन्होंने जेल प्रशासन के अन्याय के खिलाप भी आवाज़ उठाई। इसी समय उनके पति नाशिक के जेल में थे। इस कारण इनकी छोटी बेटी का बड़ा हाल हुआ। जेल से निकलने के बाद कमलाबाई ने अपनी बेटी को प्राथमिकता दी। इसके साथ अपना समाज कार्य भी जारी रखा। वे ‘अखिल भारतीय महिला परिषद’के वार्षिक सभा की अध्यक्षा थीं। कमलाबाई ने अपने जीवन में अनेक लोगों की मदद की। आयर्लैंड की यात्रा में उनकी दोस्ती एक भारतीय डॉक्टर से हुई। डॉक्टर पटना के रहने वाले थे। डॉक्टर का उल्लेख ‘क्ष’ नाम से आत्मकथा में मिलता है।
कमलाबाई के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये, फिर भी वे अपना समाज-कार्य करती रही। जितनी असफलताएँ आई, उतने ही उत्साह से समाज-कार्य किया। उन्होंने दुखद प्रसंगों का कम ही उल्लेख किया। यह एक जिद्दी स्त्री सामाजिक कार्यकर्ता की आत्मकथा है।
2.2.5 लेखन क्षेत्र
(1) द्रोपदीची थाळी ( द्रोपदी की थाली) - गिरिजाबाई केळकर (सन् 1959)
गिरिजाबाई केळकर 20 वीं शती के पूर्वाद्ध की एक लेखिका तथा पहली महिला नाटककार हैं। वे सन् 1927 में मुंबई में हुए मराठी नाट्यसंमेलन की पहली स्त्री अध्यक्ष बनी। इन सभी दृष्टि से गिरिजाबाई केळकर की आत्मकथा महत्त्वपूर्ण है। एक पतिव्रता स्त्री का दर्शन इस आत्मकथा में होता है। गिरजाबाई का जन्म सन् 1886 में हुआ। पंद्रह साल की उम्र में उनका विवाह अट्ठाईस साल के तिजराव केळकर से हुआ। गिरिजाबाई के ससुराल वाले समझते थे, पढ़ी-लिखी होने के कारण गिरिजाबाई को खाना बनाना नहीं आता होगा। लेकिन गिरिजाबाई ने अपने काम से सबका मन जीत लिया। गिरिजाबाई अच्छी लेखिका के साथ-साथ अच्छी गृहिणी भी थीं। गिरिजाबाई आस्तिक थीं। पर उनके विचार स्वतंत्र थे और वे स्पष्टतावादी थीं। “गंगा स्नान के समय गिरिजाबाई वेणीदान को स्पष्ट नकार देती हैं। उनकी सहेलियाँ कहती हैं, वेणीदान नहीं किया तो, पंड़े नदी को स्पर्श करने नहीं देंगे। इस पर गिरिजाबाई कहती है कि गंगा क्या उनके बाप की है? स्नान तो मैं करूँगी। उस समय बीस साल की उम्र में अपने सहेलियों के सामने क्यों न हो ऐसा कहने और कृति करने की हिम्मत दिखाने वाली गिरिजाबाई कड़क और निश्चयी थीं। ” गिरिजाबाई ने समाज सेवा के साथ-साथ साहित्य सेवा का कार्य भी किया। देवलाली में रहते हुए उन्होंने ‘पुरुषांचे बंड’ (पुरुषों का विद्रोह) नाटक लिखा। इस नाटक का मंचन जलगाँव में चिटणिस ने किया था। इनका पारिवारिक और साहित्यिक जीवन सफल रहा। वे वक्तृत्व कला में भी माहिर थीं। उन्होंने अकोला के साहित्य सम्मेलन में पहला भाषण दिया था। सन् 1919 में ‘भगिनी मंडल’ नामक स्त्री संस्था की स्थापना जलगाँव में की। महाराष्ट्र के खानदेश की यह स्त्रियों की पहली संस्था है। सफलता-असफलता की सिढियाँ चढते हुए और अपने परिवार से प्रेम करते हुए, गिरिजाबाई ने बहुत संतुष्ट जीवन बिताया।
(2) सांजवात – आनंदीबाई शिर्के (सन् 1972)
आनंदीबाई आत्मकथा लेखन का हेतु स्पष्ट करते हुए कहती हैं कि , “ मैंने अपनी आत्मकथा अपने बच्चों के लिए लिखी। उनको अपनी माँ कैसी थी? यह बताना हेतु था।” आनंदीबाई बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध की ख्यात लेखिका हैं। इस आत्मकथा में ‘मराठा’ जाति की स्त्री का चित्रण हुआ है। यह आत्मकथा ‘मराठा स्त्री’ के स्थिति को बताती है। आनंदीबाई का जन्म 3 जून, सन् 1892 में हुआ। आनंदीबाई कोकणस्थ ब्राह्मण शिवराम शिर्के से प्यार करती थीं। आनंदीबाई और शिवराम की जाति वालों ने इन दोनों को बहुत धमकाया, उनका बहिष्कार भी किया। इसका आनंदीबाई को बहुत दुख हुआ। समय के साथ सब बदल गया , पर आनंदीबाई के दिल में यह दर्द हमेशा के लिए रह गया।
आनंदीबाई ने नर्सिंग की शिक्षा उस समय ली, जब लोग नर्सिंग के महत्व को तो समझते थे, पर अपनी लड़की नर्स बने, यह उन्हें कतई पसंद नहीं था। आनंदीबाई के पिता को भी यह बात पसंद नहीं थी कि उनकी लड़की नर्स बने। इनके पिता ने भी आनंदीबाई के नर्स बनने के निर्णय का विरोध किया।
सामाजिक कार्यकर्ता महर्षी विठ्ठल रामजी शिंदे के अछूत्तोद्धार और सहभोजन के कार्य में आनंदीबाई ने हिस्सा लिया। पढ़ाई के बाद आनंदीबाई अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थीं। दहेज़ देकर शादी करने के खिलाफ थी। इससे आनंदीबाई अविवाहित रहना पसंद करती थीं। उस समय की पुरूष-प्रधान संस्कृति का दर्शन इस आत्मकथा में होता है। इस आत्मकथा में स्त्रियों की स्थिति का भी वर्णन किया है। उस समय ‘मराठा’ जाति में परदा प्रथा थी। ऐसे समय में आनंदीबाई ने जो साहित्य और समाज के लिए कार्य किया, वह प्रशंसनीय है।
आनंदीबाई ने गुज़रात के भी कुछ संस्मरण आत्मकथा में दिए हैं। इस आत्मकथा में गुज़रात के शिक्षा क्षेत्र, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन का चित्र मिलता है। सन् 1856 में गुज़रात में जो अकाल पड़ा था, इस अकाल में लोगों ने अपनी बेटिओं को भी बेचा था। इसकी जानकारी भी इस आत्मकथा से मिलती है।
आनंदीबाई ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में भी बताया है। सन् 1928 में आनंदीबाई का पहला कहानी संग्रह ‘कथाकुंज' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की भूमिका मराठी के ख्यात साहित्यकार श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर ने लिखी थी। इनकी कहानियाँ ‘स्त्री’ प्रत्रिका में प्रकाशित होती थी। इनके साहित्य से लगता है कि आनंदीबाई कुछ विचारशील, संयमी , परिश्रमी, कुछ बातों में जिद्दी पर प्रगल्भ एवं चिंतनशील थीं। उन्हें लगता था कि जब तक हम कुछ कमाने न लगे तबतक हमें विवाह नहीं करना चाहिए।
आनंदीबाई सन् 1936 के जलगाँव साहित्य सम्मेलन की स्वागताध्यक्षा बनी थीं। वे सन् 1938 के पुणे में आयोजित अखिल भारतीय मराठा महिला परिषद के पहिले सम्मेलन की अध्यक्षा थीं। आकाशवाणी से भी उन्होंने भाषण दिए। गुज़राती किताबों का मराठी में अनुवाद भी किया। उन्होंने इतिहास पर भी अपनी कलम चलाई। इससे आनंदीबाई का व्यक्तित्व कितना बहुआयामी था, यह समझ में आता है। इस आत्मकथा में पुराने मराठी शब्दों, मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग किया है।
(3) सहवास – मालती दांडेकर (सन् 1977)
इस आत्मकथा में सन् 1920 से सन् 1970 के मालती दांडेकर का जीवन रेखांकित हुआ है। मालतीबाई के बचपन का नाम अंबू निजसरे था। मालतीबाई की पढ़ाई सन् 1920 से सन् 1929 तक धुले में हुई। मालतीबाई को लेखन के संस्कार अपनी माता से मिले। यह उस समय बहुत बड़ी बात थी। सन् 1929 में मालतीबाई का विवाह माधव दांडेकर से हुआ। मालतीबाई का पारिवारिक जीवन सफल रहा। मालतीबाई के पति के स्वभाव में सांमजस्ता के बहुत सारे उदाहरण इस आत्मकथा में मिलते हैं। माधवराव धूले से दूर सांगली के पास अपनी माँ के साथ रहते थे। वे यहाँ पर संस्थानिकों के युवराजों को पढ़ाते थे। विवाह के बाद मालतीबाई इसी घर में आई। मालतीबाई का खाना खाते समय अपने पति से बात करना , उनकी सास को बुरा लगा। उनकी सास को यह मर्यादा हीनता का लक्षण लगा। आडोस-पड़ोस में इसकी चर्चा होने लगी । लेकिन माधवराव ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा, माँ घर में हम तीन ही लोग है तो, एक दूसरे से बात तो करनी ही पड़ेगी। माधवराव ने मालतीबाई की पसंदी और नापंसदी के बारे पूछा। माधवराव मालतीबाई के लिए ‘स्त्री’ पत्रिका मंगवाने लगे। पत्रिका मालतीबाई के नाम से आने लगी थी, इससे मालतीबाई और भी खुश हो गई। उन्होंने इसी पत्रिका में लिखना भी शुरु किया। इसी पत्रिका से उनकी पहचान एक लेखिका के रूप में होने लगी। मालतीबाई अंग्रेजी भी पढ़ना चाहती थीं, पर माधवराव के पास उतना समय नहीं था। इसलिए मालतीबाई ने टालस्टाय का उपन्यास ‘ऐना कैरेनिया’ शब्दकोश के सहारे पढ़ा। यह बात जब उनके पति को पता चली तो उन्होंने इस प्रयास की सरहाना की। मालतीबाई के सास पढ़ने-लिखने को लेकर अक्सर उनका अपमान करती थीं। वे कहती थीं, “यह क्या है? पुरुषों जैसा रहन-सहन.... हमेशा पढ़ना-लिखना, इसका मतलब क्या है?....स्त्री जाति को शोभा देता है?” अपनी सास के तानों से भी मालतीबाई का उत्साह कम नहीं हुआ। जब विचार उनके मस्तिष्क में हलचल मचाने लगते हैं, तब उनके घर में कोई न कोई आता था। बच्चे रोते थे, इन सब समस्याओं के होते हुए भी मालतीबाई ने लिखने के लिए समय निकाला। माधवराव को अपनी माँ के मालतीबाई के पढ़ने-लिखने का बारे में विचार पता चलने पर उन्होंने मालतीबाई से अपनी माँ की उम्र का लिहाज करते हुए कुछ समय तक पढ़ने-लिखने से मना किया था। लेकिन मालतीबाई ने कभी पढ़ना-लिखना बंद नहीं किया। पारिवारिक जीवन में कभी-कभी अनबन भी होती थी। पैसा बहुत कम था, लेकिन पढ़ने-लिखते रहने के कारण पैसों की कमी कभी महसूस नहीं हुई। मालतीबाई को अपने जवान बेटे के मृत्यु का दुख भी झेलना पड़ा। पति को पक्षघात हुआ। मालतीबाई को कैन्सर हुआ। वे भाईयों द्वारा बहनों को डॉक्टर बनाने की जिम्मेदारी लेने से बहुत खुश हुई।
मालतीबाई के लेखन में मराठी के नये शब्दों का प्रयोग दिखाई देता है। मालतीबाई अपनी रचना प्रक्रिया, पारिवारिक सुख के बारे में दिल खोलकर बोलती हुई नज़र आती है। पर खुद के जीवन और स्त्री-जीवन पर बोलती नहीं है। इनकी आत्मकथा में जीवन के सफल एवं संपूर्ण होने का आंतरिक संतुष्टि मिलती है।
यह एक संतुष्ट लेखिका और गृहिणी की आत्मकथा है।
(4) मृद्गंध – इंदिरा संत (सन् 1986)
इस आत्मकथा में स्थूलरूप से सन् 1930 से सन् 1975 तक के अनुभवों को रेखांकित किया गया है। इंदिराबाई का बचपन बेलगाँव (कर्नाटक) के आसपास के गाँवों मे बीता। उनका बचपन मध्यवर्गीय माता-पिता की छाया में बीता। पिता की मृत्यु के बाद चाचा परिवार के मुखिया बनें। उन्होंने इंदिराबाई को पढ़ने के लिए पुणे भेजा। इंदिराबाई ने छात्रावास में रहकर पढ़ाई की। वहाँ उन्हें संत जी से प्यार हुआ। इंदिराबाई के घर वालों का इनके प्यार को विरोध किया, फिर भी इंदिराबाई ने संत जी के साथ विवाह किया। पति-पत्नी का सहजीवन प्यार और समरसता से परिपूर्ण था। ऐसा लगता है कि दोनों ने एक-दूसरे को संभाला। इंदिराबाई का प्रेम के बारे में जब घर वालों को पता चला, तब इंदिराबाई ने अपने घर वालों को समझाया कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया। चाचा ने उनकी परीक्षा लालटेन पर हाथ रख कर ली। हाथ जल गया, पर इंदिराबाई अपने निर्णय पर अटल रहीं। उनके हाथ पर बने प्यार के निशान की याद हमेशा उनकी पति को रही। मृत्यु के समय इंदिराबाई के पति ने वह हाथ अपने आँखों पर रखा। इनका ग्यारह साल का दाम्पत्य जीवन था। आर्थिक स्थिति कमज़ोर होते हुए भी, इन दोनों ने साहित्य और संगीत का स्वाद लेते हुए, संपन्न जीवन जिया।
स्त्री जीवन और अर्थाजन पर यह आत्मकथा बहुत कुछ कह जाती है। नौकरी करने वाली स्त्री के हिस्से में आनेवाली समस्याओं का भी इसमें उल्लेख किया गया है। अपनी कमाई का वह सुख भोग नहीं सकी, उसकी कमाई पर पूरे परिवार का हक्क होता है। उसको नौकरी के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ती है। नौकरी करनेवाली स्त्री घर का काम ठीक तरह से कर नहीं पाती है। इसलिए उसे परिवार और समाज की आलोचना का सामना करना पड़ता है। इंदिराबाई को जब अपनी पहली तन्ख्वाह पैंतिस रूपये मिली, तो उनके मन को एक अलग ही स्वतंत्रता स्पर्श कर गयी। यह आत्मकथा स्त्री स्वातंत्र्य और अर्थार्जन के बारे में बहुत कुछ कह जाती है। इंदिराबाई ने अपनी सौतेली माँ के बारे में कम ही लिखा है। वे अपने रिश्तेदारों को कड़वे करेले की बेल कहती थीं। सुभाषचंद्र बोस, बालगंधर्व, वि.स.खांडेकर, बां.भ.बोरकर आदि से हुई भेटों का इंदिराबाई के मन पर अच्छा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
यह आत्मकथा कवयित्री का निजी जीवन कहनेवाली, काव्य की रचना-प्रक्रिया को बतानेवाली और अपने विचारों को पाठकों के सामने रखनेवाली है।
(5) आठवले तसे(जैसे याद आया) – दुर्गा भागवत (सन् 1991)
यह दुर्गा भागवत की आत्मकथा है। दुर्गा भागवत का जन्म 10 फरवरी सन् 1910 को हुआ। दुर्गा भागवत मराठी लेखिका, लोक संस्कृति और लोकसाहित्य , समाजशास्त्र, नृतत्वशास्त्र एवं बौद्धधर्म की अभ्यासक और लेखन-विचार स्वतंत्रता की पुरस्कर्ता थी। इनकी स्कूली शिक्षा मुंबई, अहमदनगर, नाशिक, धारवाड, पुणे में हुई। दुर्गा भागवत ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था। अपने कॉलेज में हुए सरोजिनी नायडू के भाषण के बारे में दुर्गा भागवत लिखती हैं, “कॉलेज को राष्ट्रीय आंदोलन का रंग लगा वह सरोजिनी नायडू के कॉलेज आने से। नायडू जी के प्रसन्न व्यक्तिमत्व और उनके अंग्रेजी के मिठ्ठास से हम मोहित हुए।” उनका भाषण सुनकर छात्रों के साथ दुर्गा भागवत के मन में भी जोश का संचार हुआ। दुर्गा भागवत ने सन् 1930 में जतींद्रनाथ दास की अनशन के कारण हुई मौत के बाद कॉलेज में हुई हड़ताल में हिस्सा लिया।
दुर्गा भागवत अपने कॉलेज की पढ़ाई के बारे में लिखती हैं, “मैं सन् 1927 में झेवियर कॉलेज गयी। सन् 1929 आंदोलनों में गया। सन् 1932 में बी.ए. हुई। देढ़ साल का एम.ए. का बुद्धिस्ट ज्यूरिसप्रूडन्स उर्फ गौतम बुद्ध के संघ के नियम पर एक प्रबंध लिखना था। वह जांच कर आने तक दो साल बीत गये और सन् 1935 में मुझे एम.ए. की उपाधि मिली।” एम.ए. के प्रबंध लिखने के लिए जब मुंबई विश्वविद्यालय के ग्रंथालय में बैठकर वात्स्यायन का कामसूत्र पढ़ने लगी तब लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी , इसके बारे में दुर्गा जी ने लिखा है, “उसके बाद वात्स्यायन का कामसूत्र पढ़ा।..धीरे-धीरे ग्रंथालय की इस विषय से संबंधित किताबें मेरे टेबल पर आने लगी। मेरे आगे किताबों का अंबार लग गया। आने जाने वाले रुककर देखते थे, हँसते और आगे जाते। मजाक किया जाने लगा। मैं आने-जाने लगी तो नज़रे मेरी ओर मुड़ने लगी थी।” लोगों को लगा था अविवाहित लड़की इस तरह की किताबें पढ़कर पागल हो गयी है। लेकिन कुछ दिनों बाद लोगों को लगा की दुर्गा जी बदलने वाली नहीं है, तो वे उब गये और उनकी ओर देखना बंद किया। दुर्गा जी ने अपना काम धीरे-धीरे जारी रखा और अपना प्रबंध पूरा किया।
दुर्गा जी ने पीएच.डी के लिए मध्यप्रदेश के जंगल में जाकर सामग्री इकट्ठा की। सन् 1936-38 के बीच तीन बार मध्यप्रदेश के जंगल में जाकर सामग्री संकलन किया था। पूराने प्रबंधों से अच्छी और ज्यादा सामग्री मिली थी। बहुत सारे फोटो थे और तीन भाषाओं का ज्ञान भी संग्रह किया था। लेकिन उनके शोध-निर्देशक ने और सामग्री संकलन करने के लिए कहा। उनको लगता था विश्वविद्यालय पैसा दे रहा है, तो काम अच्छा होना चाहिए। इस कारण दुर्गाबाई को मध्यप्रदेश के जंगल में अपनी जान जोखिम में डालकर दुबारा सामग्री संकलन करना पड़ा। इस सामग्री संकलन में उनकी मदद बाबूकाका ने की। वे पहले मध्यप्रदेश के वनविभाग में सेवारत थे। इस सामग्री संकलन के दौरान कुछ दुर्घटनाएँ हुई। अंत में सामग्री संकलन हुआ।
दुर्गा जी ने अपने लेखनी द्वारा साहित्य की सेवा भी की, अपनी पहली कहानी और ऋतुचक्र पर लिखे लेख के बारे में बताते हुए लिखती हैं, “ साने गुरुजी की इच्छा के कारण और रावसाहेब के कहने पर मेरी पहली कहानी ‘वाळूतील पाउले’ साधना में पहली बार छपी। बाद में ‘मुंबईत वसंतागमं’ और ‘वात्सल्य’ यह दो लेख छप गये। इसके बाद ‘ऋतुचक्र’ शुरु हो गया। ज्येष्ठ माह पर लिखा लेख पहले आया।..जेष्ठ पर लिखा लेख अनेक लोगों को पसंद आया। पु.शि.रेगे ने पत्र लिखा, ‘यह लेख देखकर आपसे ईर्ष्या होने लगी।’ वसंत बापट ने पूछा,’जेष्ठ अच्छा है। आप कविता करती थी क्या?’ और मैंने साफ-साफ ‘नहीं’ कहा। ऋतुचक्र के कारण मुझे लेखक के रूप में जाना जानने लगा।” दुर्गा जी ने लोकसाहित्य का गहरा अध्ययन किया था। ललित निबंध के क्षेत्र में मौलिकता, शुद्ध भारतीयता, सनातन की खोज इन कारणों से नये मानदंड निर्माण किये।
आपातकाल में अपनी अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का समर्थन किया, जिसके कारण उन्हें कारागृह में भी जाना पड़ा। जयप्रकाश नारायण से भी मिलने सिर्फ मुंबई के जसलोक अस्पताल ही नहीं तो उनके पटना के घर भी गयी थीं। इस तरह दुर्गा भागवत ने अपना सारा जीवन संशोधन, लेखन और देशसेवा के लिए अर्पित किया।
(6) माझ्या खुणा माझ्या मला (मेरे निशान मेरे अपने)– सरोजिनी बाबर
(सन् 1994)
सरोजिनी बाबर के पिता शिक्षक थे। उनके पिता के विचार प्रगतिशील थे। वे कहते थे कि लड़कियों को भी लड़कों की तरह पढ़ना-लिखना चाहिए। इसी कारण सरोजिनी जी को शिक्षा के क्षेत्र में घर से बहुत प्रोत्साहान मिला। उनके पिताजी का उठना-बैठना काँग्रेस के लोगों के साथ था। जिसका लाभ सरोजीनी को हुआ। उनकी इन लोगों के साथ जान-पहचान बढ़ती गयीं। उनके स्कूल-कॉलेज का माहौल स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित था। सरोजिनी जी ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। इनको एक-दो बार जेल भी जाना पड़ा। सरोजिनी अविवाहित रही।
सरोजिनी बाबर अपना पिंड ही साहित्यकार का मानती हैं, पिता के कहने पर वे राजनीति में गयी थी। सरोजिनी के पिता लेखक थे और इस कारण उनके यहाँ मराठी के बड़े साहित्यकारों का आना-जाना लगा रहता था।जिसका लाभ सरोजिनी को बचपन से ही मिला। सरोजिनी इस कारण अपने आपको भाग्यशाली मानते हुए लिखती हैं कि, “इस संदर्भ में मैं भाग्यशाली कहने लायक छात्र हूँ । क्योंकि हमारे अण्णा लेखक होने के कारण घर में आचार्य प्र.के. अत्रे, कवि गिरीश, कवि यशवंत, वि.द.घाटे, आनंदीबाई शिर्के, खं.सा. दौंडकर, अनंत काणेकर, के. नारायण काळे, बा.ग.जगताप ऐसे दिग्गजों का आना-जाना हमेशा लगा रहता था।” इन्हीं बड़े साहित्यकारों के सानिध्य मिलने के कारण साहित्यिक दुनिया से परिचित होने के अवसर उन्हें बचपन से ही मिला है। पिता के लेखक होने का भी उन्हें लाभ हुआ है।
बापूसाहेब माटे, साने गुरूजी आदि बड़े लोगों ने उनके शिक्षा, लेखन और कार्य की प्रशंसा की। वसंतदादा पाटिल, यशवंतराव चव्हाण आदि नेताओं ने उनको आग्रह से चुनाव में खड़ा किया। विधायक बनने पर उनको अनेक जगह बोलने का अवसर मिला। अच्छा बोलने के कारण उनकी प्रशंसा लोगों ने की।
लोक साहित्य संग्रहीत और प्रकाशित किया और ग्रामिण पृष्ठभूमि होने पर भी शिक्षा लेकर, समाज कार्य, राजनीति, साहित्य आदि सभी क्षेत्रों में आत्मविश्वास के साथ कार्य किया।
(7) वडिलांच्या सेवेशी (पिता की सेवा में) – शिरीष पै (सन् 1987)
इस आत्मकथा में सन् 1935 से सन् 1980 का समय रेखांकित किया गया है। यह आत्मकथा चार भागों में बटी हुई है- पप्पा, आई(माँ), व्यंकटेश (पति) और मी (मैं)। इन चार भागों में शिरीष पै ने पिता, माँ, पति और स्वंय की यादों को शब्दबद्ध किया हैं। इस आत्मकथा में शिरीष पै से लेखिका बनने तक का सफर तय हुआ है। इस लेखन से एक परिवार का चित्र बनता है। प्रसिद्ध नाटककार, पत्रकार आचार्य अत्रे, उनकी पत्नी और दो लड़कियाँ ऐसा चतुर्भुज परिवार था। माँ-पिता में हमेशा झगड़ा होता था। शिरीष पै ने अपने बचपन में अपने माता-पिता को लड़ते-झगड़ते देखा। माँ का तबादला नाशिक के गव्हर्मेंट गर्ल्स हाईस्कूल में हुआ था, वहाँ वे प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त हुई थी। पिता फिल्म बनाने के लिये मुंबई जाते हैं। इस कारण माता-पिता में निर्माण हुए फासले के बारे में शिरीष लिखती हैं, “उनमें और मेरी माँ एक विचित्र फासला निर्माण हुआ था। मैं उस समय बारह साल की थी। मेरी उम्र भी बड़ी चमत्मकारीक थी। और उसी समय हमारा छोटा-सा परिवार टूट गया।” इसके बाद उनकी माँ और उनका घर से बाहर निकलना दुश्वार हुआ था। लोग कुछ न कुछ बोल देते थे। इसीलिए उनकी माँ ने अपने को घर और काम तक ही बाँधे रखा। शिरीष ने अपने सहपाठियों से पिता की फिल्मों के कारण चिढ़ाने पर झगड़े भी किये। इन सबके बावजूद शिरीष को एक अच्छे माता-पिता मिले, जिन्होंने उनका और उनकी पढ़ाई का पूरा ख्याल रखा।
इसी समय यानी उम्र के 15 वर्ष बितने बाद शिरीष गंभीर रूप से कविता करने लगी थी। मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’ का प्रभाव इनकी शुरुआत की कविताओं पर दिखाई पड़ता है। ‘साकेत’ की तर्ज पर इन्होंने कविता करना आरंभ किया था। नाटको में भी अभिनय किया। वक्तृत्व प्रतियोगिता में ईनाम भी मिला।
शिरीष के पिता को लगता था, उनकी बेटी अच्छा पढ़कर, बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैड जाए। शिरीष पै को मुंबई में पढ़ाई के दौरान व्यंकटेश पै से प्यार होता है और विवाह भी। इस समय शिरीषबाई के विचार विद्रोही थे। उनका विवाह संस्था पर विश्वास नहीं था। उनकी मंगलसूत्र भी पहनने की इच्छा नहीं थी। फिर भी पिता के इच्छानूसार विवाह किया। विवाह के बाद शिरीषबाई की अपने पति के साथ हमेशा अनबन होती थी। इस स्थिति में उन्होंने लेखन कार्य किया। ‘नवयुग’ पत्रिका में ‘लालन बैरागीण’ और ‘हेही दिवस जातील’ यह दो उपन्यास क्रमशः प्रकाशित हुए। शिरीष जी के साहित्यिक जीवन को समृद्ध बनाने के लिए वसंत बापट, मंगेश पाडगांवकर और विजय तेंडुलकर ने मदद की। शिरीष जी इनके ऋणों से मुक्त होना नहीं चाहती है।
इनकी जीवन कहानी के अनेक पहलु है और कहानी बहुत उलझी हुई है। यह आत्मकथा एक लेखिका के संघर्षमय जीवन की झलक मात्र है।
(8) मला उद्धवस्त व्हायचंय (मुझे ध्वस्त होना है) - मलिका अमर शेख (सन् 1984)
यह आत्मकथा उम्र के तीस साल पूरे होने के पहले ही लिखी गई है। मलिका महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध कलाकार शाहिर अमर शेख की पुत्री है। पिता की देखरेख में मलिका का बचपन खुशहाली में बिता। घर में दो बहने और माता-पिता थे। मलिका पिता के साथ सभा, नाटक ,फिल्म पदर्शन आदि देखने जाती थी। मलिका को बचपन से लगता था कि वह अन्य लड़कियों से अलग है। मलिका बचपन से ही साहित्य प्रेमी थी।
जब मलिका शेख और दलित पैंथर के कार्यकर्ता कवि नामदेव ढसाल की भेंट हुई थी , तब नामदेव ढसाल अपने आंदोलनों और कविता के कारण पत्र-पत्रिकाओं में छाए हुए थे। दोनों का प्रेम विवाह हुआ। इनका विवाह किसी भी धार्मिक पद्धती से नहीं हुआ। मलिका को यह मान्य भी नहीं था। रजिस्टर विवाह के लिए मलिका की उम्र कम थी। दोनों ने एक-दूसरें के गले में हार डाले और विवाह हो गया ।
दोनों की पारिवारिक परिस्थितियाँ एकदम भिन्न थी। नामदेव ढसाल झोपड़ी में रहते थे। लेकिन उन्होंने मलिका की किराए के फ्लैट में रहने की व्यवस्था की। मलिका के मायके में घर काम के लिए नौकरानी थी, लेकिन यहाँ सारे काम स्वंय को ही करने पड़ते थे। लेकिन मलिका इस कारण कभी नाराज नहीं हुई। नामदेव ढसाल की पत्नी होने के कारण उनकी हर कोई सराहना करता था। इसी सराहना में मलिका डूब गई थीं। सास-ससुर भी मलिका के साथ प्रेमपूर्ण बर्ताव करते थे। सभा-कार्यक्रमों में दोनों मिलकर जाते थे। कभी बारीश में भीगते थे। पर यह खुशहाली भरे पल उनके जीवन में ज्यादा दिनों तक नहीं रहे। नामदेव ढसाल के साथ उनके कार्यकर्ता बहुत थे। उनके खाने-पीने की व्यवस्था पर बहुत खर्चा करना पड़ता था। इस कारण मलिका ने अपने गहने तक बेच डालें और कुछ समय बाद घर के बर्तन भी गिरवी रखने पड़े थे। मलिका जी को लगता था नामदेव ढसास समाज के लिए बहुत बड़ा कार्य कर रहे हैं, इसके लिए इतना त्याग तो करना ही पड़ेगा।
इन सारी बातों से स्पष्ट होता है कि मलिका जी को कम उम्र में सोचने के लिए समय ही नहीं मिला। नामदेव ढसाल के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनसे प्रेम करने वाली मलिका जी उनके लहरी स्वभाव के कारण उत्यंत दुखी हुई। नामदेव ढसाल के दूसरे स्त्री के साथ संबंधों के बारे में जब पता चला तो वे अंदर से बूरी तरह टूट गई। नामदेव ढसाल को दारू, वेश्या गमन, गांजा, चरस, अफिम आदि आदते थी। इस कारण मलिका उनसे दूर रहने लगी। नामदेव ढसाल के गुप्तरोग मलिका जी को भी हुए। उनमें बहुत बार झगड़ा भी हुआ। फिर भी साथ-साथ रहते थे। एक समय ऐसा आया जब मलिका जी को लगा कि अब आत्महत्या करले। कुछ समय बाद उनके व्यक्तित्व में परिवर्तन हुआ।
यह कम उम्र में बहुत ही संघर्षमय जीवन जिनेवाली एक धैर्यशील स्त्री की आत्मकथा है।
(9) माझ्या आयुष्यची गोष्ट (मेरे जीवन की कथा) –गिरिजा कीर (2001)
गिरिजा कीर मराठी की एक प्रसिद्ध लेखिका है। जिनके नाम से 85 किताबें हैं। साक्षात्कार, यात्रा वृत्तांत, उपन्यास, कहानी, बालसाहित्य आदि साहित्य विधाओं में उन्होंने लिखा। उनके इस लेखन को पुरस्कारों द्वारा नवाज़ा भी गया। इन्होंने महाराष्ट्र, गुज़रात और कर्नाटक में ‘कथा सम्राज्ञी’ के रूप में भ्रमण भी किया है। उनके शब्दों में ही उनका परिचय - ‘वह कहानी लिखनेवाली और कहनेवाली औरत है।’ जीवन के अंतिम पड़ाव की तरफ बढ़ते समय उन्हें लगा, अपने सुख-दुख, अपने हिस्से में आए हुए दर्द पर लिखना चाहिए और इसी के फलस्वरूप उनके हाथ से आत्मकथा लिखी गयी।
गिरिजा जी ने अपनी आत्मकथा को स्कूल के दिन, कॉलेज के दिन, बीच के दिन और ढलते हुए दिन इन चार भागों में विभाजीत किया है। छात्र जीवन में 42 के आंदोलन का स्पर्श जिस मध्यवर्गीय पीढ़ी को हुआ, उसका प्रतिनिधित्व करती हैं। यह वही लोग हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को देखा। उसका सबेरा देखा और आज आधी शती से ज्यादा वर्षों से अपने देश के विविध क्षेत्रों की सफलता-असफलता देखती आयी है। यही वह पीढ़ी है, जिसने संयुक्त परिवारों को टूटते हुए देखा है। संबंधो में की उत्कटता, उत्स्फूर्तता और गरमी कम होती जा रही है। पड़ोसी तो मिले पर साथी नहीं मिले। इसी पीढ़ी के अनुभवों को इस आत्मकथा में अभिव्यक्त किया है।
गिरिजा जी नारायणराव मुदवेडकर इनामदार की लड़की है। गिरिजा जी बचपन में जिज्ञासु, हजरजबाबी भी और उन्हें अपनी होशियार होने का ज्ञान था। गिरिजा जी के पिता ने तीन विवाह किये, पर एक भी पत्नी बच नहीं पायी। गिरिजा जी का बचपन का नाम रमा था। गिरिजा अपने पिता के तीसरे पत्नी के तीन बच्चों में से एक थीं। उनकी माँ का असमय निधन हो गया था। गिरिजा जी अपनी विधवा बुआ माटु के अनुशासन में पली-बढ़ीं। गिरिजा जी के पिता की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी, फिर भी उन्होंने अपनी लड़की को किसी बात कमी महसूस होने नहीं दी। साहित्य को समझने से पहले कथा किसे कहते हैं ? और वह कैसे कही जाती है? इसके संस्कार बचपन में ही पिता ने अपनी बेटी को दिये। जिसका लाभ उन्हें अपनी जिन्दगी भर हुआ। चातुर्मास के दौरान उन्हें राधा-कृष्ण के मंदिर में निजामपूरकर का कीर्तन सुनने को मिला। स्कूल के हस्तलिखित पत्रिका में पहली कहानी लिखी। अध्यापक को उनकी कहानी पढ़कर लगा कि वह किसी की चुराई हुई है। क्सास में पुछ गए इस सवाल का उन्होंने डटकर जवाब दिया। गिरिजा जी ने खुद कहानी लिखी थी। इसलिए उनको किसी बात का डर नहीं था। गिरिजा जी ने अपमान और दुख दोनो को सहा पर कभी हार नहीं मानी। मुरुड के चितले सर को लगता था , गिरिजा एकदिन मराठी साहित्य में नाम करेगी। उनकी भविष्यवाणी सच निकली।
गिरिजा जी कोल्हापुर की थी, किंतु उनके जीवन में मुरुड का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान हैं, उन्होंने यहाँ आकर ही पहली बार समुन्दर देखा। मुरुड ने उन्हें संस्कार दिये। वे अपने मुरुड प्यार के बारे में कहती है, “मैं कोल्हापूर की होने पर भी मेरे जीवन में मुरुड का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। मैं असल में कोल्हापूर की,(यानी हमारी चार पीढ़ी, लगभग सौ बरस का समय) पैदा हुई धारवाड में और गढ़ी गई मुरुड में। समझने की उम्र में जो संस्कार हुए, वे मुरुड की मिट्टी के।” मुरुड के प्रकृति सौंदर्य नें इनके मन में चैतन्य का निर्माण किया। वहाँ के घने हरे वृक्षों और समुन्दर ने उनके मन को मोह लिया। उनको घंटों एक जगह बैठकर सोचने की आदत यहीं पर लगी। गिरिजा जी अपने लेखन की सबसे बड़ी प्रेरणा मुरुड के समुन्दर को मानती हैं, वे लिखती हैं, “मेरे लिखने के पीछे मुरुड के समुन्दर की बहुत बड़ी प्रेरणा है। आगे-आगे आनेवाली लहरे महत्वकांक्षा, यश और आत्मविश्वास का प्रतिक लगती थी, तो पीछे जानेवाली लहरे हार, अपयश, मानहानी हजम करने की शक्ति। समुन्दर के पेट में कितना कुछ छिपा होगा! उसने कितना हज़म किया होगा, उसने कितना सहा होगा। मुझे वह मानव मन का दूसरा रूप लगता था। समुन्दर से मेरा संवाद चलता था। मेरे अकेलेपन का, अनाथ होकर जीने में समुन्दर का साथ मुझे बहुत बड़ा आधार देकर गया। मैं खुलकर से गाने लगी, हँसने लगी, स्वंय से संवाद करने लगी। मुरुड के समुन्दर ने मेरी कलम को शब्द दिये, विचारों को दिशा दी और मेरे भीतर की काव्यत्मकता को जगाया।” गिरिजा जी को मुरुड के इस समुन्दर से दूर होते हुए बहुत दुख हुआ।
बी.ए. द्वितीय वर्ष में पढ़ते समय गिरिजा का परिचय उमाकांत किर से होता है। उमाकांत किर काँलेज का सुंदर युवक और साहित्य की समझ रखने वाला कवि था। इस परिचय ने उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया। बी.ए. होने के छह महिने बाद इन दोनों का विवाह हुआ। यह आंतरजातिय विवाह था। 7 नव्हंबर सन् 1955 को इनका रजिस्टर मैरेज हुआ। रजिस्ट्रार को पाँच रूपये गिरिजा के ससुर ने दिये। गिरिजा जी के पिता के पास उस समय इतने पैसे नहीं थे। ससुराल में ऐशोआराम की सारी वस्तुएँ थी, पर वहाँ पर किताबें नहीं थी। गिरिजा जी अपने ससुराल के विषय में लिखती है, “अनुशासन, व्यवस्था,व्यवहार, हिसाब यह सब कुछ था। नहीं था तो घर का अपनापन, ममता, संवाद! शायद वह एक जीवनपद्धती थी। यहाँ बौद्धिक जीवन नहीं था। इस घर में सोफा सेट था, फ्रिज़ था, गोदरेज की आलमीरा थी, पर किताबें नहीं थीं। आसानी से हाथ में आये,ऐसे कागज़-कलम नहीं थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि यहाँ गाना और हँसना नहीं था। जिस घर में इन्सान गुनगुनाते नहीं, खुलकर हँसते नहीं और न खुलकर रोते हैं, वह घर मैं समझ नहीं सकती। तब भी समझ नहीं पायी। हँसने का, गाना गाने का गुन्हा करनेवाली मैं, उस अनुशासन की चौखट में दम घुटता था।” विवाह के बाद के दस साल बहुत कष्टमय गुजरें। इन दस सालों में पाँच साल तो वे मायके में ही थीं। कभी बाहर रहने के लिए जगह न मिलने के कारण तो कभी पैसों की कमी के कारण और तो कभी पति ने मायके लाकर छोड़ा है। गिरिजा जी ने अनेक नौकरियाँ की। अपना घर बनने के बाद उन्होंने कथालेखन और कथोपकथन की ओर ही पूरा ध्यान दिया।
एक कथाकार के रूप में गिरिजा जी स्थापित हुई। गिरिजा जी को साहित्यिक राजनीति का अनुभव आता है। साहित्यिक गुटबाजी के कारण उनके साहित्य की दखल नहीं ली जाती है। इतना होने पर भी लोगों ने उनकी कथाओं को सुना और प्रशंसा भी की। वे जेल में कैदियों को अपनी कथाएँ सुनाने जाती थी। कैदी उन्हें अपनी माँ समान मानते थे। अपने बल पर उन्होंने विदेशगमन भी किया। उन्हें कथासम्राज्ञी उपाधि भी मिली। शून्य से शुरुआत करके सफलता का शिखर चढ़ने से पहले उन्हें बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा। कभी सफलता मिली तो कभी असफलता का सामना करना पड़ा, पर जीत ने के लिये वे उसी जोश से खड़ी होती थीं। वे इस तरह जीवन भर संघर्ष करते हुए सफलता के शिखर चढ़ती गयीं।
दो लड़कों की शादी हुई। घर में पोते भी आये। पर गिरिजा बाई को जन्मभर अकेलेपन ने सताया। वैसे सभी उन्हीं के अपने थे, पर वे किसी की नहीं बन पायीं। इस आत्मकथा की भाषा एकदम सरल और कथोपकथन वाली है।
(10) आयदान – उर्मिला पवार (सन् 2003)
अपनी राख से फिर से जन्म लेनेवाले फिनिक्स पक्षी की तरह का जीवन उर्मिला पवार की आत्मकथा ‘आयदान’ में दिखाई देता है। दीनता, लाचारी और असहायता का जीवन जीने वाले भाई-बंधुओं के क्षीण देह के भीतर के इन्सान की खोज करने वाला, केवल अपनी बहन ही नहीं, तो समस्त स्त्री जाति के बारे में संवेदना व्यक्त करने वाला और अपने भीतर के दोषों- स्वभाव का अत्यंत तटस्थ होकर किया चित्रण ‘आयदान’ में मिलता है। महाराष्ट के कोकण क्षेत्र की दलित बस्ती में उर्मिला जी का बचपन बीता। पिता शिक्षक थे और माता ‘आयदान’ करनेवाली। ‘आयदान’ यानी बाँस से बनी हुई चीजें- सूप, टोकरा आदि। आयदान बनाकर बेचनेवाली जाति को बुरुड कहा जाता है। उनके पिता शिक्षा का महत्व जानते थे, उनको लगता था, अपनी बेटी के लिए अच्छा रिश्ता आये, बेटियों को पढ़कर नौकरी करनी चाहिए। सन् 1960-65 का समय स्त्री शिक्षा की दृष्टि से अत्यंत कठिन था। यह समय दलित स्त्री के लिए और भी भयानक था। उर्मिला पवार के पिता शिक्षक थे, उन्होंने अपने छह बच्चों को स्कूल भेजा। उनकी जब मृत्यु हुई तब वे 58 साल के थे। उस समय उर्मिला पवार को लगा था, “कि पिता को इस समय मरना नहीं चाहिए था, मैं अपने पिता से कहना चाहती थी कि शांता दीदी को पढ़ना चाहिए , ऐसी आपकी इच्छा थी, पर वे पढ़ नहीं पाई। पर मैं पढूँगी, स्कूल जाऊँगी, आप मत मरो, यह बातें उनसे कहने की बहुत इच्छा थी। पर उनका देहान्त हो गया। वह शुक्रवार की रात थी।...दूसरे दिन शनिवार था। हमारा स्कूल सबेरे था। मुझे क्या लगा पता नहीं। मैंने स्कूल का बस्ता भरा और माँ से पूछा “मैं स्कूल जाऊँ क्या?” माँ ने दूसरी तरफ मुँह किया। मैंने उससे पहले और बाद में कभी स्कूल जाने के लिए उतना उत्साह नहीं दिखाया।” इस घटना से उर्मिला जी का अपने पिता के प्रति प्यार नज़र आता है। उर्मिला के पिता ने रत्नागिरी शहर में गाँव से आनेवाले दलितों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था की। अस्पृश्यों को मराठों के कुँओं पर पानी-पीना मना था। पिता की मृत्यु के बाद से उर्मिला जी को अपनी माता का आयदान तयार करता हुआ चेहरा नज़र आता है। उर्मिला जी की माता ने बाँस की वस्तुएँ बनाकर अपने बच्चों को पढ़ाया।
उर्मिला जी को बचपन में पढ़ाई और घर के कामों में मन नहीं लगता था। चौथी में वे फेल भी हुई थी। पर वे नाटक में काम करने की उनकी मन से इच्छा थी। उर्मिला जी बचपन में साफ-सफाई से कोसों दूर रहती थीं। इस कारण बिवलकर मैडम से मार भी खानी पड़ती थी। वे अपने इस स्वभाव के बारे में लिखती हैं, “सफाई मेरी जानी दुश्मनी थी। मेरी माँ का अपने कामों की वज़ह से हम बच्चों की ओर उनका विशेष लक्ष्य नहीं था, जिसका फल हमें भुगतना पड़ता। स्नान अपनी मर्जी से करना। इस कारण मैं दो-दो, तीन-तीन दिन स्नान की जगह केवल हाथ-पाँव धोकर ही स्कूल जाती थी। सुवर कि तरह मिट्टी में खेलने से बालों का घोसला बन जाता था। सजना-धजना क्या होता है, वह भी हमें पता नहीं था।” दरिद्रता के साथ, अज्ञानता, गंदगी के माहौल से बने बालमन को धीरे-धीरे स्वर्णों की संगत मिलती है। खानपान, कपड़े, साफ-सफाई के एक अलग दुनिया में कदम रखना पड़ा।
इसी समय बचपन की सीमा को पार कर बालमन जवानी की दहलीज़ में कदम रखता है और उर्मिला जी के जीवन में हरिश्चन्द्र पवार का प्रवेश होता है। हरिश्चन्द्र पवार दसवीं के बाद छोटी-मोटी नौकरी करने लगता है। दोनों का मिलना-जुलना, प्यार भरी बातें करना, छूपकर समुन्दर के किनारे जाकर मिलना, आदि का आरंभ होता है। हरिश्चन्द्र से मिलने जाने के लिए उर्मिला जी अपनी माँ से झूठ भी बोलती थी। इस झूठ के कारण उन्हें माँ और भाई से मार भी खाना पड़ा। हरिश्चन्द्र को मुंबई में नौकरी मिलने के बाद उन्होंने उर्मिला जी के भाई के सामने उर्मिला जी से शादी करने का प्रस्ताव रखा। यह रिश्ता उर्मिला के घरवालों को पसंद नहीं था, उन्होंने उर्मिला जी को लाख समझाने की कोशिश की पर वे अपनी बात पर अड़ी रही। अंत में उर्मिला की जिद्द के आगे सबको झुकना पड़ा और हरिश्चन्द्र के गाँव के घर में इन दोनों का विवाह हुआ। उर्मिला पवार की दीदी की शादी में जितने रिश्तेदार आये थे, उतने रिश्तेदार इनकी शादी में नहीं आये थे। शादी के समय ग्लक्सो लैबोरेटीज में पैकर के रूप में काम करती थी, पर नई-नई शादी हुई लड़कियों को कम्पनी काम पर नहीं रखती है, इसलिए तनख्वाह अच्छी होने पर भी उर्मिला जी को शादी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ी।
अपने पति, बच्चों को संभालते हुए नाटक और लेखन की तरफ मुडने लगती है। उर्मिला जी के घरे में लेखन की कोई परम्परा नहीं थी, और किसी ने उस तरह का प्रोत्साहन भी नहीं दिया। केवल स्त्री होने के कारण जो अनुभव उनको आये थे, उन्हें शब्दबद्ध करना चाहिए, इसी चाहत के चलते वे कथालेखन की ओर मुडी। लेखन के अनुभवों को इस तरह व्यक्त किया है, “ऑफिस के खाली समय में, इतना ही नहीं, बस, स्टॉप, ट्रेन कहीं पर भी बैठकर या खड़े होकर मेरा लिखने का प्रयास जारी रहता। बस में कभी मजा आती थी। तिकीट लेने के बाद जब मैं लिखने लगती तो, बगल में बैठा व्यक्ति झुककर देखने लगता, पुरुष होगा तो वह समझेगा की मैं उसे कुछ सिग्नल दे रही हूँ, इस कारण और झुककर देखने लगता। उसके इस तरह के देखने से लेखन में दिक्कत होती। पर मेरा अक्षर अत्यंत खिचडी था, उसमें बस में लगने वाले धक्के, इस कारण मैं क्या लिख रहीं हूँ, उसके बाप के भी समझ में नहीं आता था। इसके बाद वह सीधा बैठता और मैं अपना लिखना जारी रखती। लिखते समय कभी-कभी अपना स्टॉप भी भूल जाती थी। मैं चलते हुए वापस आती थी। कभी-कभी टी.सी. को दण्डशुल्क भी देना पड़ता। रात में सब की और अपनी आवश्यकतों का पूरा करने के बाद जब सब लोग सो जाते थे, तब मुझे लिखने का समय मिलता, किचन का लाईट जलाकर मैं चोर की भाँति लिखने लगती, पर कभी नींद रोक नहीं पाती और ऊंघने लगती तब अपने आपको ही चिल्लाते हुए जगाती ‘ऐ उट, सोती क्यों है, चल लिख’” इस तरह इनके लिखने की जिद्द हमें पता चलती है। वे अपने परिवार को सम्भलते हुए लेखन कार्य करती रही। ये अनुभव अन्य स्त्री रचनाकारों के लेखन संबंधित अनुभवों के समान ही है। अन्य स्त्री लेखिकाओं ने भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के बाद मिले हुए समय में लेखन कार्य किया है।
उन्होंने अपने अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिए भरसक प्रयत्न किया। बी.ए. पास होने पर खुश होने वाला पति नहीं चाहता कि उर्मिला जी एम.ए. कर उनसे आगे निकल जाये। उर्मिला जी अपने पति हरिश्चन्द्र की तारिफ के चलते ही एम.ए. करने का संकल्प करती है। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद हरिश्चन्द्र कहने लगते हैं, “तुझे एम.ए.-बी.ए. करके क्या करना है? अब घरमे बच्चों की तरफ ध्यान दो। उनकी पढ़ाई देखो।” उर्मिला जी को पता था कि उनका पति भी अन्य पुरुषों की तरह सोचते हैं, वे चाहते थे कि पत्नी को घर की पूरी जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। उर्मिला जी घर का सारा काम हो जाने के बाद अपनी पढ़ाई के लिए समय निकालती है। पति-पत्नी के बीच का यह संघर्ष तब और बढ़ने लगता है, जब उर्मिला जी स्त्री-आंदोलनों में भाग लेने लगती है। आंदोलनों से परिचित उर्मिला जी और पारंपारिक पुरुषप्रधान व्यवस्था में उलझे हुए हरिश्चन्द्र पवार के बीच का संघर्ष, दो वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है। उर्मिला जी अपने पति के स्वभाव के बारे में लिखती हैं, “मिस्टर पवार मुझसे दो स्तरों पर बर्ताव करते थे। एक तरफ – अपनी पत्नी लिखती है-बोलती है, इसकी उन्हें खुशी थी, अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को वे वैसा बताते भी थे; और दूसरी तरफ मेरे लेखन और बोलने का गुस्सा भी आता था। इससे झगड़ा भी होता था। मैं कहती, ‘मुझ में जान है... मैं भी आपके जैसे ही नौकरी करती हूँ। थकती हूँ। मेरे बर्ताव को, मेरे काम को आपके इतना ही मूल्य है।’ अर्थात् कैसा मूल्य, सब कुछ दौ कौडी का है, ऐसा उनके प्रतिसाद से लगता है। वे कहते थे, ‘हमारे गाँव की औरतों की तरफ देखो। वे कैसे घर शांति से, खुशी से चलाती है?’ उत्तर उनके इस सवाल में ही था।” उर्मिला जी अपने अधिकार चाहती थी, एक इन्सान होने के अधिकार तो उनके पति एक पारंपारिक पत्नी चाहते थे, जिसके अधिकार घर तक ही सीमित हो।
दलित आंदोलनों के नेताओं के वैचारिक अंतर्विरोधों से उर्मिला जी का जल्द ही सामना होता है। एक तरफ दलित नेता और कार्यकर्ता दलितों को इन्सान के रूप में देखने के लिए कहते हैं, तो दूसरी तरफ दलित स्त्री के प्रति सामंती सोच रखते हैं। दलित पुरुष अपने अधिकारों की बात तो करते हैं, पर दलित स्त्री के अधिकारों के प्रति उतने सतर्क दिखाई नहीं देते हैं। इस तरह की सोच रखने वाले समाज के कारण स्त्री मुक्ति आंदोलनो की तरफ दुर्लक्ष्य हो रहा था। वे हास्यास्पद हो रहे थे। इन सब कारणों के कारण वे स्त्रियों के लिए अलग साहित्य-मंच स्थापित करने का प्रयास करने लगी थीं। पर इसी समय उनके निजी जीवन में तूफान आया। जवान बेटे की दुर्घटना में मृत्यु होती है, जिसके चलते वे पूरी तरह भीतर से टूट जाती है। इस दुख को भूलने के लिए वे पूरी तरह लेखन में डूब जाती हैं। वे अपने दो लड़कियों के भविष्य के लिए फिर एक बार धैर्य के साथ खड़ी होती हैं। उर्मिला जी के पति पूरी तरह अपने आपको नशे में डूबो लेते हैं। अपनी लड़की के प्रेम-विवाह के बाद उर्मिला जी और उनके पति के बीच अनेक बार झगड़े होते रहते हैं। हरिश्चन्द्र लड़की के प्रेम-विवाह के लिए अपनी पत्नी को जिम्मेदार ठहराता है। इस तरह का तनाव घर में हर रोज़ बना रहता था। अंत में उर्मिला के पति का मृत्यु लिव्हर कैन्सर से होती है।
इस तरह उर्मिला जी का जीवन बीता। बचपन से ही जाति व्यवस्था से परिचय होता है। स्त्री होने के कारण होने वाला अपमान, दरिद्रता, विषमता और पुरुषप्रधानता इन तीन स्तरों पर उनकी लढ़ाई जीवन भर चलती रही। इस आत्मकथा में केवल उनका ही जीवन नहीं आया है, तो उनके साथ दलितों की समस्याओं का भी चित्रण हुआ। दलितों में धर्मान्तरण होने के बाद आये परिवर्तन को भी यह आत्मकथा चित्रित करती है। धर्मान्तरण ने एक तरफ दलितों को एक नई पहचान दी, तो दूसरीं ओर कुछ दलित धर्मान्तरण के बाद भी हिन्दू रीति-रिवाजों से जुड़े हुए हैं। उर्मिला जी अपनी आत्मकथा में दलित और स्त्री मुक्ति आंदोलनों के अंतर्विरोधों को भी तटस्थ होकर रेखांकित करती हैं।
यह आत्मकथा धर्मान्तरण, आरक्षण, दलित स्त्री-पुरुष भेद, पुरुषप्रधानता, शिक्षा-लेखन से नाम कमाने वाली पत्नी और पति के बीच के संघर्ष, पारिवारिक जीवन और नौकरी के बीच चलने वाला स्त्री का संघर्ष, दलितों के भीतर के नव-मध्यवर्ग और उसके आडम्भर, अंम्बेडकरवादी विचारधारा के संघर्ष, बहुजन समाज में आई जागृती आदि सभी सवालों पर विचार मंथन करने लगाती है। विशेषकर कोकण के रत्नागिरी से मुंबई की यात्रा में जातिव्यवस्था के चेहरे कैसे बदलते हैं और जाति के समान ही भयानक ‘स्त्री-पुरुष लिंगभेद’ अत्यंत स्पष्टरूप से रेखांकित हुआ है।
(11) मी नाही कुणाची (मैं नहीं किसी की) - सुशील पगारिया (सन् 2009)
यह एक किसान स्त्री लेखिका की आत्मकथा है। सुशील पगारिया मारवाड़ी परिवार से हैं। सुशील पगारिया लालचंद उमेदमल नवलखा और नंदुबाई लालचंद नवलखा की एकलौती बेटी है। छह भाईयों के बीच अकेली सुशील। वे माँ को बाई और पिता को काकाजी कहती हैं। वे अपने बचपन और माता-पिता के स्वभाव के बारे में लिखती हैं, “बाई को छह लड़के और एक लड़की हुई। बीरदीभाऊ, नैनसुखभाऊ,पोपटभाऊ, बन्सीभाऊ, केशरभाऊ, मैं और घनश्याम। छठी लड़की यानी मैं! मेरे बाद का एक भाई! सप्ताह में एक बार एक पैसे की भेल लाते और सब भाई-बहन मिलकर खाते। स्वाभिमान और सत्य की घुट्टी बाई-काकाजीं ने बार-बार पिलाई। घर की सब्जी-रोटी खाकर बच्चे संतुष्ट रहते थे। मामा के घर कभी बच्चे गए और मामा ने कुछ खाने का आग्रह किया, तो ‘हम अभी पेटभर खाकर आये हैं’ का साक्ष्य देते थे। ” इस तरह बचपन से ही सुशील जी को स्वाभिमान और सत्य की शिक्षा अपने घर से मिली। इसको सुशील जी की आत्मकथा में बार-बार देख सकते हैं।
सुशील जी अपने स्कूल जीवन का एक मज़ेदार किस्सा भी बताती है। स्कूल नाम पूछने पर वे अपना नाम कुछ इस तरह बताती हैं, पहले “प्रथम राष्ट्रीय पाठशाला मोजें के घर पर शुरू हुई थी। मैं पहली छात्रा थी। मुझे पूरा नाम पूछा गया, मैंने कहा ‘सुशीला नंदुबाई नवलखा’ वहाँ कहा गया, ‘इस तरह नहीं, पिता का नाम बताना है’ मैंने कहा ‘क्यों? मैं अपने बाई की लड़की हूँ’। फिर समझाया गया।”
सुशील के पुस्तकों से प्रेम की शुरुआत उनके पिताजी के चचेरे भाई पूनमचंदजी नवलखा के घर से हुई। पूनमचंदजी के पास पुस्तकों का बहुत बड़ा संग्रह था। वे हमेशा पढ़ते रहते थे। कहानियाँ सुनाते और सुशील जी को पढ़ने के लिए किताबें भी देते थे।
सुशील जी के भीतर की संवेदनशील स्त्री उनके साथ खेत में काम करनेवाले स्त्री मजदूरों के साथ लगाव निर्माण करने में सफल हुई है। सुशील पगारिया सन् 1965-66 से खेती करती है। वे अपने किसान बनने के बारे में लिखती हैं, “हमारे हिस्से में चौबीस एकड़ जमीन आयी। उसकी किसी और द्वारा होने वाली दूरावस्था, इसे समझने परे, मायके में पिता और भाई खेती से जुड़े हुए व्यवसाय से संबंध था, उनके आग्रह के चलते, मजा करने के लिए, मनोरंजन के लिए खेती की - पर बाद में एक आवश्यकता के रूप में खेती की तरफ ध्यान दिया।” खेती का काम करते समय उन्हें पैसा, गृहिणी, मातृपद आदि अड़चने आयी। एक किसान को किन हालातों का सामना करना पड़ता है, इसका यथार्थ चित्रण इस आत्मकथा में मिलता है। जवलगाँव के पास के धामणगाँव में उन्होंने खेती की। सुशील जी ने खेतों पर काम कर रही स्त्रियों की समस्याओं को भी रेखांकित किया है। खेती में स्त्रियाँ भी काम करती है, पर फसल आने पर उसका सारा श्रेय पुरुष का जाता है, वे इस विषय में लिखती हैं, “खानदेश में ज्यादातर खेती स्त्रियों के भरोसे ही की जाती थी।....फसल तैयार होने पर, पुरुष ट्रक-ट्रक्टर को किराये पर लाता है। व्यापारी को फसल बेचकर अपने खाते या जेब में पैसा डालता और इज्ज़त के साथ घुमता। ‘इस साल हेमाभाई ने या रामा-शिवा गोविंदा ने इतनी फसल निकाली’” इससे एक बात स्पष्ट होती हैं कि स्त्री की मेहनत का कोई मोल नहीं होता है। सफलता पुरुष के खाते में ही जाती है। सुशील जी फसल निकलने के अंतिम दिन सब मजदूरों के साथ मिलकर खेत में ही भोजन करती हैं। यह बात कुछ गाँववालों को नागवार गुजरती है। उनको लगता है कि सुशील जी गाँव की चली आ रही प्रथा को तोड़ कर एक नयी प्रथा की नीव डाल रही है।
सुशील जी के संघर्ष के दिनों में उनको कलम ने साथ दिया। सफलता-असफलता हर समय उनके साथ, उनकी कलम थी। वे अपने लेखन के विषय में लिखती हैं,“कविता ऐसी की किसी भी समय अवतार लेती थी। कितनी भी जल्दबाजी हो। आप थके हुए हो, कि इर्दगिर्द भीड़ हो! फिर उसका आना, खाना बनाते-बनाते, खाते समय, जूठन लगे हाथ धोते समय, अंधेरे में, दिया न जलाते हुए कलम चलती थी। सिरहाने कागज़-कलम रखनी पड़ती। या बस के टिकीटों पर उसका आना रोक नहीं पाती। उसको झेलना अपरिहार्य.....आवश्यक था।“ कुमुद पावडे और सुशील जी के लेखन विषयक अनुभव एक जैसे दिखाई देते हैं।
सुशील जी ने अपनी खेती देखते हुए समाज कार्य भी किया। गाँव मे दारु के कारण गरीब परिवारों का बुरा हाल हो रहा था। गाँव के लोगों की मदद से ही सुशील जी ने दारु के अड्डे को बंद किया। खेत में काम पर आने वाली स्त्रियों की समस्याओं को भी सुलझाने का काम सुशील जी ने किया।
यह आत्मकथा एक आत्मनिर्भर स्त्री की है। जो अपनी एक अलग पहचान बनाती है। इसीलिए आत्मकथा में बार-बार कहती हैं- ‘मैं नहीं किसी की, मेरा कोई नहीं।’ यह आत्मकथा केवल सुशील जी के जीवन के बारे में नहीं बताती तो, वह किसानों की समस्याएँ, किसानों की आत्महत्याओं के कारण, मजदूर स्त्री के काम की पहचान आदि बातों का भी इस आत्मकथा में चित्रण हुआ है।
2.2.6 दलित स्त्री की आत्मकथाएँ
(1) मिटलेली कवाडे (बंद किवाड़) – मुक्ता सर्वगोड (सन् 1983)
इस आत्मकथा में स्वतंत्रता पूर्व और प्राप्ती के बाद के दलित जीवन का चित्रण हुआ है। इसमें पाटण- कराज जैसे छोटे गाँवों का और पुणे-मुंबई जैसे बड़े शहरों के भी दलित जीवन का चित्रण हुआ है। मुक्ताबाई के बचपन में दलित परिवार से होने पर भी पढ़ाई के कारण उनकी गाँव में तारीफ की जाती थी। मुक्ताबाई ने अपने बचपन में अन्य दलितों की तरह जातिय दंश नहीं झेला। उनको कक्षा में प्रथम आने पर कक्षा की प्रथम बैंच पर बैठने का अवसर मिला। मुक्ताबाई ने महिला मंडल के कार्यों की आलोचना की। उनके अनुसार मुंबई के महिला मंडल केवल सभा की शोभा के लिए होते थे। इन महिला मंडलों से मुक्ताबाई को काफी अपेक्षा थी, उनको लगता था कि इनके द्वारा कुछ सामाजिक कार्य किया जा सकता है। पर यह महिला मंडल केवल नेताओं के स्वागत के लिए उत्सुक थे। स्वतंत्रता की इस्लामपूर की सभा में मुक्ताबाई कहती हैं, “.... सरकारी अधिकारी लिखता हैं कि सार्वजनिक कुँए सबके लिए खुले हैं, लेकिन महार-मांग (दलित) घंटों धूप में तड़पते हैं, उन्हें लगता है कोई गागर-भर पानी भीख देगा।” छोटे गाँव में उनको सवर्णों के मोहल्ले में घर नहीं मिलता। कामवाली भी नहीं मिलती। इसलिए वे मुस्लिम बस्ती में रहने लगती हैं और मुस्लिम कामवाली को घर काम के लिए रखती हैं। मुक्ताबाई के लड़कों से गाँव में जात-पाँत पूछी जाती है, पर मुंबई में इस समस्या से कभी सामना नहीं करना पड़ा था।
यह आत्मकथा उस दलित स्त्री की है, जिसने अपना पारिवारिक जीवन सम्भालते हुए सामाजिक कार्यों को समय दिया।
(2) माझ्या जन्माची चित्तरकथा (मेरे जीवन की चित्र कथा) – शांताबाई शेळके (सन् 1986)
इस आत्मकथा में सन् 1930 से सन् 1980 के बीच का दलित जीवन दिखाई देता है। शांताबाई के मायके में उनको नाजुका कहा जाता था। शांताबाई शेळके को स्कूल में तो जातिभेद दिखाई नहीं देता है, पर पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। महदू गाँव की दो ही लड़कियाँ स्कूल में पढ़ती थीं। नाजुका और शकु। नाजुका जब शकु के घर जाती है ,तो उसका उल्लेख महार की लड़की (दलित की लड़की ) कहकर होता है। शांताबाई को उस समय समझ में आता है कि वह महार है और शकु ब्राह्मण। गाँव की मस्जिद में दलित होने के कारण प्रवेश नहीं मिलता। इन प्रसंगों का शांताबाई के बालमन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पर उसकी कड़वाहट उनके मन में नहीं दिखाई देती है।
शांताबाई की शिक्षा उस समय हुई , जब स्कूल में जाने वाली लड़कियों को चिढ़ाया जाता था, पर उनके परिवार और समाज ने उनको पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। शांताबाई पढ़ी-लिखी होने के कारण उनके पिता ने उनका विवाह शिक्षक के साथ किया। उनका वैवाहिक जीवन ज्यादा समय तक नहीं चला । शांताबाई की अपने पति के साथ अनबन होती थी, इस कारण उनके पति ने दूसरी शादी कर ली। इस बूरे समय में शांताबाई के पिता उनके पक्ष में खड़े रहे। सन् 1942 में शांताबाई कुर्डुवाडी के स्कूल में शिक्षिका बनी। शिक्षिका बनने पर पति से अलग होने के कारण समाज ने उनकी अवहेलना की। कुछ समय पति से अलग रहने के बाद फिर से अपने पति के साथ रहने लगी। शिक्षा के कारण शांताबाई में अस्मिता जागृत हुई। यह आत्मकथा एक सहनशील स्त्री की है।
(3) जिणं आमुचं (जीवन हमारा)– बेबी कांबले (सन् 1986)
बेबी कांबले की आत्मकथा में स्वतंत्रता पूर्व के ग्रामीण दलित जीवन का चित्रण हुआ है। बेबी कांबले की शैली चित्रात्मक होने के कारण इस आत्मकथा को पढ़ते समय ग्रामीण दलित जीवन का चित्र हमारे सामने खड़ा होता है। गाँव के महारों का जीवन, पोतराज, शरीर में भगवान आनेपर नाचनेवाली औरतें, इन सब का चित्र हमारे सामने खड़ा होता है। महारों के जीवन के रीति-रिवाज, सुख-दुखों का लेखा-जोखा इस आत्मकथा में मिलता है। इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद पाठक को अंबेड़कर के आन्दोलन का सही अर्थ समझ में आता है।
माता-पिता को अपना बेटा पोतराज बनने पर को खुशी होती थी। पोतराज बनने पर लड़का भीख माँगता था। इस भीख माँगने में उनको खुशी होती थी। वे अपने अँधकारमय में जीवन में खुशी के पल ढूँढ़ निकालते थे।
दलित स्त्री को अपने सास-ससूर से अपमान सहना पड़ता था। परिवार के साथ-साथ गाँव के लोग भी उसको यातनाएँ देते थे। इसका यथार्थ चित्रण इस आत्मकथा में मिलता है। वैसे तो हर दलित की आत्मकथा अपनी जाति की आत्मकथा होती है, लेकिन बेबी कांबले की आत्मकथा में उनका जीवन कम रेखांकित हुआ है और महार जाति का ज्यादा।
(4) जगायचं.....पत्येक सेकंद (जीना है .....हर पल) – मंगला केवले (सन् 1996)
इस आत्मकथा में स्वातंत्र्योत्तर दलित जीवन रेखांकित हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दलितों को जिन प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है, उसका प्रतिनिधिक चित्र इस आत्मकथा में दिखाई देता है। यह आत्मकथा मुंबई की झोपड्डपट्टी में रहकर संघर्ष करनेवाले मंगला और उसके पति यशंवत की है। मंगला जाति से चमार है। मंगला ने बी.कॉम किया है और बैंक में नौकरी करती है।
यशवंत बूट पॉलिश करकर डॉक्टर बनता है। पढ़ाई के बाद ही मंगला और यशवंत शादी करते हैं। उनके परिवारिक जीवन में आर्थिक कारणों से अनबन होती है। मंगला को अपना जीवन जीने के लिए संघर्ष करना पड़ा, पर किसी जाति पर कोई टिप्पणी नहीं दिखाई देती है। यशवंत समाज के लिए कुछ करना चाहता था, पर उनकी मृत्यु स्कूटर दुर्घटना में सन् 1991 में हुई। पति के सारे कार्य मंगलाबाई ने पूरे किये। मंगलाबाई ने अपने लड़कों को भी अपने जैसा बनाया।
यह आत्मकथा पति-पत्नी के सफल किन्तु अपूर्ण जीवन की कहानी है।
(5) तीन दगडांची चूल (तीन पत्थरों का चूल्हा) – विमल मोरे (सन् 2000)
इस आत्मकथा में सन् 1970-2000 तक का समय रेखांकित हुआ है। इसमें सांगली और कोल्हापुर के समीप का ग्रामीण जीवन चित्रित हुआ है। इस आत्मकथा में गोंधळी समाज का चित्रण हुआ है। यह समाज साल भर भटकता रहता है। यह जाति किसी एक गाँव में नहीं रहती है। ये गाँव के बाहर पाल (एक प्रकार की कपड़े से बनी झोपड़ी) लगाकर रहते हैं। यह अपना गुजारा देवी के नाम पर भंडारा (हल्दी) लगाकर भीख में मिले आटा-चावल पर करते हैं। इस आत्मकथा का शीर्षक इस समाज की सामजिक स्थिति को दर्शाता है। घर के बाहर तीन पत्थरों का चूल्हा बनाकर खाना बनाते हैं। यह इनता नित्य क्रम है। इसलिए इस आत्मकथा का शीर्षक भी सार्थक लगता है।
समय के साथ-साथ इनके रहन सहन में भी काफी परिवर्तन हुआ है। इस जाति के ज्यादात्तर लोग अब भीख नहीं माँगते हैं। वे मजदूरी करने लगे हैं। शिक्षा का महत्व उन्हें समझ में आने लगा है। वे अपने बच्चों को शिक्षा देना चाहते हैं। वे गाँव-गाँव नहीं भटकते हैं। वे एक गाँव में स्थिर हो गये हैं।
विमल मोरे की आत्मकथा में उनके निजी अनुभव के साथ गोंधळी समाज का भी चित्रण हुआ है। इस समाज के रीति-रीवाजों को भी इस आत्मकथा के माध्यम से समझ सकते हैं। विमल मोरे के पिता एक गाँव से दूसरे गाँव भटकते रहे हैं। विमल के बड़े भाई ने पढ़ाई की और उसे सरकारी नौकरी भी प्राप्त हुई। उसने अपने छोटे भाईयों को भी पढ़ाया। विमल के भैय्या और भाभी में अक्सर झगड़ा होता था। फिर भी वे अपने परिवार को संभालते थे। इस समाज के पुरुषों की हालत दारू के कारण बहुत खराब थी, फिर ये लोग परिवार से जुड़े रहना चाहते थे, इस भावना के कारण परिवार टुटने से बचते थे। विमल का विवाह सामाजिक कार्यकर्ता दादासाहेब मोरे के साथ 6 मार्च सन् 1948 को हुआ। दादा साहेब मोरे की आर्थिक स्थिति कमजोर होने कारण विमलबाई के मायके से काफी मदद मिली। विमलबाई के जीवन में विवाह के बाद काफी परिवर्तन आया। दादासाहेब मोरे के कार्य से विमलबाई को बहुत सीखने को मिला। विमलबाई गोंधळी समाज की समस्याओं को जानने लगीं। विमलबाई सभाओं में भाग लेने लगीं। इस आत्मकथा के बारे में विनया खडपेकर लिखती हैं, “विमलबाई की लेखनी अपने समाज का मन व्यक्त करनेवाले संवाद लिख जाती है। उनकी शैली चित्रमय हैं, मरगम्मा देवी का उत्सव, लोगों की भीड़, पकता हुआ चावल, ज्वार की सौ-सौ रोटियाँ बनाती स्त्रियाँ, बली का बकरा, ये सब दृश्य हमारे आँखों के सामने चित्र के समान स्पष्ट दिखाई देते हैं। गोंधळी समाज के एक परिवार की कथा और उस समाज की व्यथा कहनेवाली , एक सांमजस्य स्त्री की यह आत्मकथा है।”
यह आत्मकथा विमलबाई के निजी जीवन को तो दर्शाती है, साथ ही साथ उस समाज के रीति-रिवाज को भी दर्शाती है, जो सालों से परम्परा के नाम पर तीन पत्थरों का चूल्हा गाँव के बाहर लगाकर जीवन यापन कर रहा है।
2.2.7 प्रसिद्ध पुरुषों की पत्नियों की आत्मकथाएँ
(1) मी आणि बालकवी (मैं और बालकवी) – पार्वतीबाई ठोमरे (सन् 1982)
पार्वतीबाई ठोमरे मराठी के प्रसिद्ध प्रकृति का चित्रण करनेवाले कवि बालकवि उर्फ त्र्यंबक ठोमरे की पत्नी हैं। इस आत्मकथा में बालकवि के जीवन का दर्शन होता है। पार्वतीबाई का जन्म सन् 1901 में खानदेश के असोदे गाँव में हुआ। उनके पिता विनायकराव जोशी स्कूल और पोस्ट ऑफिस दोनों में मास्टर थे। पार्वतीबाई का बचपन खुशहाली में बीता। पिता ने घर पर ही दूसरी कक्षा तक पढ़ाया। पार्वतीबाई अपने माता-पिता की एकलौती संतान थी। उन्हें घर में जीजी कहा जाता था। विवाह के समय बालकवि की उम्र 16 साल और पार्वतीबाई की उम्र 8 साल की थी। उन्हें उन्य स्त्रियों की तरह पति का डर, ससुराल का अन्यायपूर्ण माहौल, मायके और ससूराल के बीच संघर्ष आदि समस्याओं का सामना करना पड़ा।
इस आत्मकथा में बालकवि का आरंभिक जीवन प्रगतिशील चित्रित हुआ है। बालकवि दहेज के खिलाफ थे। इस कारण बालकवि को अपने रिश्तेदारों और घरवालों से बातें सुननी पड़ी। बालकवि ने अपने घरवालों से कहा , “मौज-मजा बाहरी दिखावा है। जिस समय हमारे शादी की बात हो रही थी, उसी समय हमने मन-ही-मन शादी कर डाली।” इस तरह के विचारों का पति मिलने पर पार्वतीबाई का जीवन सुखी होना चाहिए था। पर ऐसा हुआ नहीं। बालकवि के कथनी और करनी में अन्तर था। पार्वतीबाई को अपने पति से मार और प्यार मिला। उन्होंने बालकवि के मृत्यु के बाद सन् 1920 में पुणे के सेवादसन में पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। उस समय उनकी उम्र 20 साल थी। उन्होंने सेवासदन में बालकवि के पत्नी के रूप में कभी परिचय नहीं दिया। वे बालकवि के मृत्यु के पश्चात 60 साल तक वे जीवित थी।
पार्वतीबाई ने सरल भाषा में अपने जीवन की व्यथा इस आत्मकथा में व्यक्त की ।
(2) नाच ग घुमा (नाच री घुमा) - माधवी देसाई (सन् 1988)
यह आत्मकथा प्रसिद्ध लेखक रणजीत देसाई की पत्नी माधवी देसाई की है। गांधी जी के हत्या के समय उनकी उम्र 14-15 साल की थी। इस आत्मकथा में सन् 1935 से सन् 1985 तक के अनुभव रेखांकित हुए हैं। माधवी देसाई का जीवन संघर्षमय रहा है। इसका कारण उनकी नाजायज संतान होना भी था। उन्होंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा है। माधवी देसाई का माता पुराने जमाने की अभिनेत्री लीला है। उनको अपने पिता के विषय में जानकारी नहीं थी। माधवी जी बेलगाँव में अपने नानी के साथ रहती थी। बचपन में उनका नाम सुलोचना था। सुलोचना जब नौ साल की थी, तब उनकी माँ अपने पूरे परिवार को पुणे ले गई। मराठी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक भालजी पेंढारकर ने अपना नाम पिता के रूप में सुलोचना के साथ जोड़ा। सुलोचना भालजी पेंढारकर इस नाम से उनका दाखिला पुणे के स्कूल में हुआ। इस बारे में माधवी जी लिखती है, “ ‘माँ’, ‘पिता’ यह व्यक्ति या नाम मैं पहली बार देख रही थी। दूसरें बच्चों के माता-पिता कैसे बर्ताव करते हैं, यह कभी नहीं देखा था। परन्तु मैं अपने माता-पिता को केवल घर में रहते हुए ही देखती थी और मन में केवल डर।”
अपने पहले पति नरेंद्र काटकर की मातृसत्तात्मक विरासत को भी वे खुलकर व्यक्त करती हैं। विवाहेत्तर संबंधों से पैदा हुए बच्चों का एक पूरा समाज था। पहले पति के मृत्यु के पश्चात माधवी जी का जीवन संघर्ष आरंभ होता है। यह संघर्ष पहले से ज्यादा दर्द भरा था। नौकरी करनेवाली माधवी जी को कुछ लोगों ने मानसिक आधार दिया, तो कुछ लोगों नें मानसिक त्राण भी दिया। अकेली स्त्री को देखकर संबंध बनाने वाले पुरुष भी थे। इन से छूटकारा पाने के लिए उन्होंने रणजीत देसाई से शादी तो कि , लेकिन हुआ उल्टा ही। इस संघर्ष में रणजीत देसाई की लड़कियाँ और माधवी जी , रणजीत देसाई का इज्ज़तदार खानदान और माधवी जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि, माधवीजी का सामाजिक कार्य करने का मन और अपने में ही मस्त रहनेवाले रणजीत देसाई आदि थे। इतना होने पर भी माधवी जी ने हिम्मत नहीं हारी। माधवी जी कोवाड गाँव के परिसर में बालवाडी चलाने लगीं। पाठशालाओं को प्रोत्साहन दिया। महिला मंडल के नाम पर स्त्रियों को एकत्र किया। उनकी समस्याओं को दूर करने का प्रयत्न किया। माधवी जी ने रणजीत देसाई की पहली पत्नी को खोज की। उनका पुनर्वसन भी करना चाहती थी। माधवी देसाई से विवाह करने से पूर्व जो सपने रणजीत देसाई ने दिखाये थे, वे विवाह के कुछ दिनों बाद टुटते-बिखरते हुए दिखाई देते हैं। यह वही रणजीत देसाई थे, जिन्होंने माधवी जी से विवाह करने के लिए क्या कुछ नहीं कहा था। रणजीत देसाई माधवी जी को विविध नामों से संबोंधित करते थे। वे उन्हें कल्याणी, चित्ररेखा, सुगंधा, बसन्ती आदि नामों से बुलाते थे। रणजीत देसाई ने माधवी से कहा था, “सांबरा हवाई अड्डे पर मैंने जब तुम्हे देखा तब मुझे लगा, यह मेरी है। मैंने तुम्हारा घर देखा, जिस सामर्थ्य से तुम खड़ी थी, परिवार को संभाल रही थी, बच्चों की देखभाल कर रही थी, ये देखकर मुझे लगा कि यही वह स्त्री है। जो मेरे परिवार को संभालेगी, ध्यान देगी।” ये बातें और इस तरह की असंख्य बातें और सपने रणजीत देसाई ने माधवी देसाई को दिखाये। इन सब बातों का प्रभाव माधवी जी पर पड़ा था, इसीलिए वे लिखती हैं, “मैने तीन लड़कियाँ होते हुए भी विवाह किया है। क्योंकि मेरा इन्सानों पर, शब्दों पर, सौदर्य पर, साहित्य पर विश्वास होता है।” माधवी जी ने इसी विश्वास के साथ विवाह के बाद रणजीत देसाई की बेटियों को तो अपनाया ही, उनकी पहली पत्नी जिनकी दिमागी हालत खराब थी, उनका ईलाज करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई। माधवी जी केवल रणजीत देसाई के घर को ही नहीं संभाला था, तो पूरे गाँव की जिम्मेदारी उन्होंने ली थी। रणजीत देसाई जैसे व्यक्ति को सम्भालना भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम था। लेकिन इन सब जिम्मेदारियों को निभाने पर भी रणजीत देसाई लोगों की बातों में आकर माधवी देसाई से दूर होते चले गये और अंत में बात तलाक पर आकर रूक जाती है।
इस तरह अनेक संघर्ष करते हुए भी माधवी कभी जिन्दगी से हारी नहीं और न ही जिन्दगी को कोसा। वे सतत संघर्षशील रही और समाज कार्य भी करती रही।
(3) आहे मनोहर तरी...( है मनोहर फिर भी...) - सुनीता देशपांडे (सन् 1990)
सुनीता देशपांडे मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक पु.ल. देशपांडे की पत्नी है। सुनीता देशपांडे जी के पिता चाहते थे कि उनकी बेटी खुब पढ़े-लिखे। सुनीता देशपांडे लिखती हैं, “अप्पा(पिता) को लगता था, मैं वकील बनू, बैरिस्टर बनू।... पर मैंने उन्हें निराश ही किया।” इस आत्मकथा में सुनीताबाई के विविध रूप दिखते हैं। बचपन में साँपों से बातें करनेवाली, रंगिन छाता हाथ में लेकर घुमने वाली सुनीता.. स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए माता –पिता के गुस्से का सामना करनेवाली, इस आंदोलन के लिए कॉलेज छोड़नेवाली....बॉम्ब बनाने में लगी हुई सुनीता, पु.ल.देशपांडे के प्रेम में पडनेवाली सुनीता... विवाह किसलिए करना चाहिए सोचनेवाली सुनीता.. पति के लिए अपने पर्स में सिगरेट रखनेवाली सुनीता.. मालेगांव में आदिवासी लड़कों के साथ बातचीत करनेवाली सुनीता आदि रूप इस आत्मकथा में मिलते हैं।
सुनीताबाई का जीवन सुखमय ही था। इनके जीवन में आनंद और सफलता की उँचे पर्वत तो हैं पर दुःख और असफलता के दरिया नहीं है। इनका मायका सुखी और समृद्ध है। सुनीता जी अपने पति को भाई कहती थीं। दुनिया के लिए पु.ल. देशपांडे बड़े लेखक थे, पर अपनी पत्नी के साथ उनका व्यवहार बहुत ही गैरजिम्मेदाराना रहा है। सुनीताबाई देशपांडे अपने वैवाहिक जीवन के बारे में लिखती हैं, “विवाह इस सामाजिक बंधन की मुझे कभी जरूरत महसूस नहीं हुई। फिर भी मैं भाई से विवाह करने के लिए तैयार हुई, तब लगा था, यह बंधन जिस समय तोड़ने का मन हो, उस दिन तोड़ दूँगी। किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसा क्षण अचानक आता होगा, पर मेरे जीवन में धीरे-धीरे पास आता गया और आपातकाल के पहले कुछ समय और अधिक महसूस होने लगा। यह बंधन अब तोड़ना चाहिए, भाई से अब अलग होना चाहिए, यह विचार पक्का होने लगा।” पति-पत्नी के सहजीवन में सुनीताबाई का अपेक्षाभंग तो हुआ है, पर उसको सहने की शक्ति भी उनमें थी। सामाजिक कार्य, कला जीवन, प्रकृति आदि स्थानों पर पति-पत्नी एक साथ जाते हैं। सुनीताबाई के पति के चाहनेवालों की संख्या अधिक है। इसका उन्हें आनंद होता है। जीवन‘जीवन मनोहर ’, ‘फिर भी’ उदास है। इसमें विरोधाभास दिखाई देता है। संवेदनशील सुनीताबाई को इसका हमेशा एहसास रहा है। इसकी खोज उन्होंने ईमानदारी से की। पति असमान्य थे ही, पर मैं भी बिलकुल सामान्य नहीं , इस सवाल का यह उत्तर उन्हें मिला था।
सुनीताबाई का अनुभव विश्व मर्यादित है, पर उनकी अनुभव की गहराई तक जाने की क्षमता जबरदस्त है।
(4) बंध-अनुबंध - कमल पाध्ये (सन् 1993)
कमल पाध्ये सुप्रसिद्ध लेखक प्रभाकर पाध्ये की पत्नी हैं। इस आत्मकथा के केन्द्र में प्रभाकर पाध्ये हैं। मुंबई के रामवाडी में बचपन बिताने वाली कमल गोठोरकर का विवाह उन्नीस साल की होने पर प्रभाकर पाध्ये से हुआ। विवाह से कमालाबाई के जीवन को एक अलग ही मोड़ मिला। पंडित के पारम्पारिक और भरे परिवार में रहनेवाली कमलबाई परिवार से अलग रहनेवाले प्रगतिशील युवक की पत्नी बनी। यहाँ पर उसने अनेक मानसिक पीड़ा झेली। कटुता को झेला। प्रीती-मैत्री का आनंद भी मिला। कुछ खराब इन्सान मिले तो कुछ महान लोग भी मिले। अनेक प्रकार के अनुभवों से कमलाबाई का जीवन समृद्ध हुआ है।
कमलाबाई के पिता प्रगतिशील थे। उन्होंने सन् 1940 के समय अपने बेटी को कॉलेज जाने दिया। विवाह के बाजार में खराब कही जानेवाली कमल सन् 1940 में अलग थी। वे विद्रोही थीं। कमलबाई ने अपना रिश्ता खुद ही पक्का किया। विवाह पूर्व पति को पत्र लिखे। कमलाबाई के पारिवारिक जीवन में अनेक मोड़ आए। कमलाबाई के पति अपने घरवालों से अलग घर में रहते थें और कमलबाई ने घरवालों के विरोध में जाकर विवाह करने के कारण मायके वालों से भी उनके अच्छे संबंध नहीं रहे थे। इस कारण यह सहजीवन पति-पत्नी का ही है। अपने पति के कारण सामान्य स्त्री से अलग जीवन व्यतित करने मिला, इसका अहसास कमलबाई को है। इस जीवन का आस्वाद उन्होंने मनसे लिया। इनके जीवन में प्यार और मोहभंग के धागे एक दूसरे में उलझे हुए हैं।
कमलाबाई अच्छा गाती हैं। अपने पति के लेखन में बाधा निर्माण होगी इसलिए उन्होंने रियाज़ बंद किया। यह पारिवारिक जीवन के तान-तनाव सहते हुए, स्वंय की खुशी खोजने की, स्वतंत्रता खोजने और विचारों को विकसित करने की कला आनेवाली गृहिणी की आत्मकथा है।
(5) साथ संगत - रागिणी पुंडलिक (सन् 1994)
रागिणी पुंडलिक सुप्रसिद्ध लेखक विद्याधर पुंडलिक की पत्नी हैं। मायके में उनका नाम सुलोचना लघाटे था। विवाह तय होने से लेकर पति के मृत्यु तक का चित्रण इस आत्मकथा में हुआ है। 25 जून सन् 1953 को सुलोचना लघाटे का विवाह पुंडलिक से हुआ, तब से वे रागिणी पुंडलिक बनी।
विवाहपूर्व रागिणी का साहित्य से उतना संबंध नहीं था। पति विद्याधर रागिणी से हर बात बताते थे। हर विषय पर उससे बात करते थे। विद्याधर के मित्रों के घर दोनों साथ-साथ जाते थे। घर में होनी वाली चर्चाओं में रागिणी के पति उन्हें शामिल करते थे। इससे रागिणी की साहित्य के प्रति समज विकसित होते गई। मराठी के बड़े-बड़े लेखकों की बातें उन्हें सुनने को मिलती थीं। रागिणीबाई अपने जीवन की एक घटना बताती है, जिसमें एक विदेशी विद्याधर के पास हिन्दू धर्म से संबंधित जानकारी प्राप्त करने आया था। रागिणी के मायके में नवरात्र और रामनवमी का बड़ा उत्सव मनाया जाता था। इसलिए विद्याधर जी ने रागिणीबाई को इस विषय पर बोलने के लिए कहा। इस पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से चर्चा की। इसके बारे में वे कहती है, “मुझे अंग्रेजी में स्पष्ट बोलना नहीं आता था। मैं धीरे बोलती थी। लेकिन इस विषय में उनको कभी हलकापन महसूस नहीं हुआ। मुझे अंग्रेजी ठीक तरह से समज में आती थी, इसका ही उन्हें नाज़ था। उन्होंने मुझे एक बार समझाया था, अंग्रेजी स्पष्ट बोलना न आना , इसमें कोई शरमाने वाली बात नहीं है। आखीर वह विदेशी भाषा है।” यह एक संतुष्ट सहजीवन जीने वाली स्त्री की आत्मकथा है।
(6) मी भरुन पावले आहे - मेहरुनिस्सा दलवाई (सन् 1995)
मेहरुनिस्सा दलवाई सामाजिक कार्यकर्ता हमीद दलवाई की पत्नी हैं। मेहरुनिस्सा जी की शिक्षा उर्दू में हुई। उनको मराठी में लिखना नहीं आता था। इस कारण सरिता पदकी ने इस आत्मकथा का शब्दांकन किया। सरिता पदकी ने मेहरुनिस्सा जी की बोलचाल की भाषा को लेखन में आने दिया। मायके में उनका नाम मेहरुनिस्सा खान था। जन्म 25 मई सन् 1930 में हुआ। यह मुस्लिम महाराष्ट्रीयन स्त्री की मराठी में पहली आत्मकथा है। इस आत्मकथा में महाराष्ट्र के मुस्लिम परिवार और समाज का चित्रण हुआ है।
मेहरुनिस्सा जी की माँ सभी धार्मिक रीति-रिवाजों को मानेनेवाली थीं। माँ बुरखा पहनती थी। मिलिट्री में नौकरी करने वाले पिता को तो नमाज़ पढ़ना भी अच्छा नहीं लगता था। ननिहाल में मेहरुनिस्सा जी का बचपन प्रगतिशील माहौल में सुख में बिता। उनके चाचा और बुआ का घर भी प्रगतिशील ही था। मेहरुनिस्सा जी ने अपनी आत्मकथा में दिल खोल कर रख दिया है। इसमें कहीं भी कुछ छिपाया नहीं है।
2.2.8 इतर आत्मकथाएँ
(1) अनुभव – सुलोचना सोमण (सन् 1983)
डॉ. सुलोचना सोमन के बचपन का नाम सुलोचना श्रीखंडे था। इनका जन्म सन् 1900 के सितम्बर माह में हुआ। सुलोचना जब पाँच साल की थीं,तब उनकी माँ का देहांत हुआ। उनके पिता ने सुलोचना के अभिभावक के रूप में डॉ.काशीताई नवरंगे को जिम्मेदारी सौंपी। मुंबई में उनकी शिक्षा पूर्ण हुई। सन् 1926-27 में डॉक्टर बनी। कामा एण्ड ऑब्लेस हस्पताल में ‘रेसिडेंट हाऊस सर्जन’ के रूप में कार्य करने लगीं। वे प्रार्थना समाज की सदस्य भी बनी। काशीताई ने अनेक लोगों के विवाह किये, पर सुलोचना के विवाह के बारे में कभी बात नहीं की। सुलोचनाबाई का जीवन आधुनिक ,उच्च शिक्षित स्त्री का शिखर था। डॉक्टर बनने के बाद अनेक प्रकार की शिक्षा और नौकरी के कारण उन्हें कोलकाता, दिल्ली , शिमला आदि जगहों पर जाने का अवसर मिला। इस समय दूसरी स्त्रियाँ भी इस व्यवसाय में थीं, उनके साथ घुमना , बातें करना आदि का चित्रण इस आत्मकथा में आया है। उस समय की बिमारियाँ, गाँव में फैलने वाले रोग, स्त्रियों के प्रसव की समस्याएँ, गोरे डॉक्टरों का बर्ताव आदि का रेखांकन इसमें हुआ है। अकेली रहनेवाली इस स्त्री को किसी ने तखलिफ नहीं दी या विवाह के नाम पर परेशान नहीं किया। उनके पढ़ाई और नौकरी में व्यस्त रहने को समाज ने सहजता से स्वीकारा। इसी कारण सन् 1930 में सुलोचनाबाई उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लंडन चली गई। युरोप की यात्रा में शादीशुदा डॉक्टर सोमण से प्यार हुआ। डॉक्टर की पत्नी की मृत्यु के बाद दोन्हों ने विवाह तो किया पर इनका पारिवारिक जीवन सुखकर न रहा। डॉक्टर सोमण रंगिन स्वभाव के व्यक्ति थे। फिर भी सुलोचना बाई ने तलाक नहीं दिया। सुलोचनाबाई पर अपने पति के पहली पत्नी के बच्चों की जिम्मेदारी भी ली थी। इन्होंने अपने जिम्मेदारियों को निभाया।
संपन्न व्यक्ति जीवन, कार्यक्षम व्यावसायिक जीवन और दुखभरा पारिवरिक जीवन के अनुभव इस आत्मकथा में मिलते हैं।
(2) मी नरसाबाई (मैं नरसाबाई)– मेधा किराणे (सन् 1985)
इस आत्मकथा में नर्स के जीवन के अनुभव अंशतः मुखर हुए हैं। सन् 1942 में मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुई मेधा जी का सपना फ्लॉलेरन्स नाइंटिगल बनने का था। उन्होंने इस सपने को सच में बदला। घरवालों के विरोध को न मानते हुए दसवीं के बाद नर्स के कोर्स में दाखिला लिया। इस दाखिले के बाद उनका एक दूसरी दुनिया में दाखिला हुआ, जहाँ के माहौल में स्पिरीट, डेटाल, ईथर का गंध था। दर्द से कराहते हुए मरीज़, कहीं मृत्यु की आहट इसके कारण उन्हें कुछ क्षणों के लिए लगा कि उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई क्यों नहीं की, पर यह कुछ पल का ख्याल था। इस क्षेत्र में लड़कियाँ किसी न किसी मजबूरी के कारण आई थीं। किसी का पति नशेबाज था, तो कोई विधवा थी। यह सारा माहौल लड़कियों के मन को मारने वाला था। डाक्टरों का बर्ताव अच्छा था,वे कुछ न समझ में आने पर दुबारा समझाते थे, पर सीनियर नर्सों का बर्ताव ऐसा था, मानो वे इन पर आजीविका के लिए सहायता कर उपकार कर रही हो। ऐसे माहौल में भी नर्स आनंद के कुछ क्षण खोज ही लेती थीं। रात्र की शिफ्ट वाली नर्से एक-दूसरों को किसी उपन्यास की कथावस्तु या फिर किसी फिल्म की स्टोरी कहकर रात गुजारती थी।
जब उन्होंने ग्रामीण स्तर पर काम किया तो, वहाँ के अनुभवों ने उनके सपनों की फ्लॉरेन्स नाइटिंगेल को गायब कर दिया। कुछ समय बाद मेधा जी अपने डॉक्टर पति की मदद करने लगीं। गृहिणी, सचिव, सखी, प्रिया सब कुछ वे बन गयीं। इनका अस्पताल एक कमरे में शुरु हुआ था, जो बाद में बड़ा अस्पताल बन गया। इनकी आत्मकथा में पारिवारिक जीवन के कुछ ही अनुभव रेखांकित हुए हैं।
यह उस स्त्री की आत्मकथा है, जिसने कम उम्र में जिस लक्ष्य को पाने की ठानी थी, उसे वे पाकर रहीं।
(3) बिनपटाची चौकट (बिन किवाडों की चौखट)- इंदुताई जोंधळे (सन् 1994)
यह एक संघर्षशील स्त्री की आत्मकथा है, खासकर छात्रों को यह संघर्ष के लिए प्रेरणा देनेवाली आत्मकथा है। यह महाराष्ट्र के अनेक विश्वविद्यालों के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। यह आत्मकथा उस लड़की की आत्मकथा है, जिसके पिता जीवित होते हुए भी उसके हिस्से में अनाथपन आया था। उनका मायके में नाम इंदुमती जाधव था। इनका जन्म सन् 1955 में हुआ। इंदुमती जी की जीवन कहानी मराठवाडा के बर्दापुर से शुर होती है, शिरुर, पैठण, कोल्हापुर, नागपुर होते हुए औरंगाबाद आकर स्थिर होती है।
इस आत्मकथा में इंदुमती जी का विवाहपूर्व संघर्षमय जीवन है। विवाह के बाद के जीवन का चित्र केवल पंधरा-सोलह पृष्ठों में आया है। अपने परिवार से प्यार करने वाला पाँच बच्चों का पिता, अपने मित्र की छोटी बहन से प्यार करने लगता है, और उससे भागकर शादी करता है। मोरवाड गाँव में स्कूल खोलता है। दुकान चलाता है। चार बच्चें पैदा होते हैं। सबसे बड़ी इंदुमती थीं। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण माँ-पिता में झगड़ा होने लगता है। इंदुमती के पिता गुस्से से इंदुमती की माँ का खून करते हैं। पिता को उम्रकैद की सज़ा होती है और इंदुमति के कंधे पर कम उम्र में तीन भाईयों की जिम्मेदारी आती है। इसके बाद शुरु होता है, जीवन संघर्ष, जेल में पिता से मिलने जाना और सरकारी छात्रावास में रहकर पढ़ाई करना। इंदुमति ने जीवन के सकारात्मक पहलुओं को देखा। इस कारण कठिन समय में भी उनको कुछ अच्छे लोगों का साथ मिला। राष्ट्रीय सेवा दल के अण्णासाहेब सहस्त्रबुद्धे और अन्य कार्यकर्ताओं का आत्मियता से उल्लेख इस आत्मकथा में मिलता है। घटनाओं का कालक्रम ठीक नहीं है। घटनाओं को आगे-पीछे बताया गया है, इस कारण पाठकों को आत्मकथा पढ़ते समय थोड़ी दिक्कत जरूर होती है।
एक अनिवासी बालिका की कथा और व्यथा कहने वाली यह आत्मकथा, जीवन के बारे में एक नया दृष्टोकोण दे जाती है।
इस आत्मकथाओं के वर्ग में मधुताई आठले की ‘मागे वळून’(पीछे मुड़कर)(सन् 1988), मीना देशपांडे की ‘अश्रुंचे नाते’(आसूंओं के नाते) सन् 1995, विद्यादेवी परचुरे की वंचिता (सन् 1996), सरस्वतीबाई अकलूजकर की ‘आठवणी.....काळाच्या....माणसांच्या’ (यादें.....काल की.....मनुष्य की) ( सन् 2000), तसनीम पटेल की ‘भाळ-आभाळ’( सन् 2003) आदि आत्मकथाएँ आती हैं।
निष्कर्ष
इन मराठी आत्मकथाओं की लेखिकाओं की उम्र लगभग सत्तर साल की है। कुछ एक स्त्रियों की उम्र लगभग पचास-साठ हैं। तीस साल की उम्र पार करने से पहले एक ही आत्मकथा लिखी गई है। कलाकारों और प्रसिद्ध पुरुषों के स्त्रियों के आत्मकथाओं की संख्या अधिक है।
हिन्दी स्त्री आत्मकथाकारों की उम्र लगभग सत्तर है। हिन्दी की ज्यादात्तर स्त्री आत्मकथाएँ मध्यवर्ग से आती हैं। मराठी में स्त्री आत्मकथाएँ लगभग हर वर्ग और जाति से आती हैं। हिन्दी और मराठी की ज्यादात्तर स्त्री आत्मकथाओं में शिक्षा लेते समय आनेवाली अड़चनों का उल्लेख किया गया है। पारिवारिक प्रेम और द्वैष सभी आत्मकथाओं में कमोबेश मिलता है। पति-पत्नी के सुखमय जीवन के चित्र आत्मकथाओं में कम ही देखने को मिलते हैं। अनेक आत्मकथाओं का केन्द्र बिन्दू पति है, वह केन्द्र में न होने पर भी उसके बारे बहुत कुछ लिखा गया है। अपने बच्चों की बीमारी, पढ़ाई और उनके प्रति के लगाव के बारे में लिखा गया है, पर वे कभी आत्मकथा के केन्द्र में नहीं रहे हैं। मायके का चित्रण सुखमय वास्तु के रूप में नहीं हआ है। वहाँ के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों का उल्लेख आत्मकथाओं में हुआ है। स्त्री आत्मकथाकारों को माँ से ज्यादा पिता का व्यक्तित्व आकर्षित करता हैं। ज्यादात्तर स्त्री आत्मकथाकार अपने पिता जैसा बनना चाहती हैं। राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों का चित्रण कम हुआ है, इसके कारण भी स्पष्ट हैं कि स्त्रियों को घर के बाहर जाने के मौके कम ही मिलते हैं। कुछ एक स्त्रियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा भी लिया । ये आत्मकथाएँ केवल उन स्त्रियों का निजी जीवन को ही नहीं बताती हैं, तो तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक जीवन का इतिहास बयान करती नज़र आती हैं।
आत्मकथा की संस्कृति, ले. पंकज चतुर्वेदी, पृ.सं.46-47
सरला एक विधवा की आत्मजीवनी, ले. प्रज्ञा पाठक, पृ.सं. 05
आलोचना, सं.अरूण कमल, अक्टूबर-दिसम्बर 2009, पृ.सं.90
http://mohallalive.com/2013/02/13/first-women-autobiography-of-modern-hindi/
हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप और एवं साहित्य , ले. कमलेश सिंह, पृ.सं.172
हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप और एवं साहित्य , ले. कमलेश सिंह, पृ.सं.174
दस्तक जिन्दगी की, ले.प्रतिभा अग्रवाल, पृ.सं.5-6
वही,पृ.स.14
वही, पृ.सं.23
वही, पृ.सं.26
वही,पृ.सं 40
वही, पृ.सं.42
वही, पृ.सं48
वही, पृ.सं.53
वही, पृ.सं68-69
वही, पृ.सं.55
वही, पृ.सं.56
वही,पृ.सं.86
मोड़ जिन्दगी का, ले. प्रतिभा अग्रवाल, पृ.सं.3
वही, पृ.सं.141
बूँद-बावड़ी, ले. पद्मा सचदेव, पृ.सं.30
वही, पृ.सं.39
वही, पृ.सं.88
वही, पृ.सं.72-73
वही, पृ.सं.114
वही, पृ.सं.123
वही, पृ.सं.29
वहीं, पृ.सं.29
वही, पृ.सं.06
वही, पृ.सं.243
वही, पृ.सं.260
वही, पृ.सं.345
लगता नहीं दिल मेरा, ले. कुसुम अंसल, पृ.सं.13
वही, पृ.सं.28
वही, पृ.सं.28
वही, पृ.सं.29
वही, पृ.सं.31
वही, पृष्ठ सं.32
वही, पृ.सं. 110
वही, पृ.सं.46
वही, पृ.सं.49
वही, पृ.सं.60
वही, पृ.सं.61
वही, पृ.सं.68
वही, पृ.सं. 72-73
वही, पृ.सं.76
वही, पृ.सं.94
वही, पृ.सं.212
वही, पृ.सं.213
लगता नहीं दिल मेरी- ले. कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.22
वही, पृ.सं.30
वही, पृ.सं.29
वही, पृ.सं.29-30
वही, पृ.सं.47
वही, पृ.सं.78
वही, पृ.सं.90
वही, पृ.सं.86
वही, पृ.सं.159
वही, पृ.सं. 221
वही, पृ.सं.195
और...और...औरत, ले. कृष्णा अग्रिहोत्री, पृ.सं. 08
और...और...औरत, ले. कृष्णा अग्रिहोत्री, पृ.सं. 11
वही, पृ.सं.140
वही, पृ.सं.140
वही, पृ.सं.102-103
वही, पृ.सं.143
कस्तूरी कुंडल बसै – ले. मैत्रेयी पुष्पा, पृ.सं. 5
वही, पृ.सं. 5
पहल, जनवरी-फरवरी 2003, सं. ज्ञानरंजन, पृ.सं. 255,256
कथाक्रम ,अक्टूबर-दिसम्बर 2002, सं. पृ.सं. 98
पहल, जनवरी-फरवरी 2003, सं. ज्ञानरंजन, पृ.सं. 256
कस्तूरी कुंडल बसै, ले. मैत्रेयी पुष्पा, पृ.सं. 18
वही, पृ.सं.26
वही, पृ.सं.28
वही, पृ.सं.32
वही, पृ.सं.32
वही, पृ.सं.42
वही, पृ.सं.52-53
वही, पृ.सं.53
वही, पृ.सं.56-57
वही, पृ.सं.59
वही, पृ.सं.59
वही, पृ.सं.78
वही, पृ.सं.119
वही, पृ.सं.133
वही, पृ.सं.251
वही, पृ.सं. 276
वही, पृ.सं.309
http://www.tadbhav.com/issue_ 18/attma_ki.html#a
गुड़िया भीतर गुड़िया, ले. मैत्रेयी पुष्पा, पृ.सं. 16
वही, पृ.सं.14
वही, पृ.सं.25
वही, पृ.सं.211
वही, पृ.सं.246
वही, पृ.सं.123
हादसे, ले.रमणिका गुप्ता, पृ.सं. 18
वही, पृ.सं. 18
वही, पृ.सं.16
वही, पृ.सं24
वही, पृ.सं29
वही, पृ.सं.248
वही, पृ,सं.54
अन्या से अनन्या, प्रभा खेतान, पृ.16
वही-पृ.सं.31
वही, पृ.सं.33
वही, पृ. सं. 64
वही, पृ. सं. 65
वही, पृ. सं. 71
वही, पृ. सं. 179
वही, पृ. सं. 210
वही, पृ. सं. 211
वही, पृ. सं. 243
वही, पृ. सं. 246
वही, पृ. सं. 249
वही, पृ. सं. 250
वही, पृ. सं. 253
वही, पृ. सं. 255
वही, पृ. सं. 264
वही, पृ. सं. 287
एक कहानी यह भी, ले. मन्नू भंडारी, पृ.सं.08
वही, पृ.सं. 15-16
वही, पृ.सं. 17
वही, पृ.सं. 16
वही, पृ.सं. 18
वही, पृ.सं. 18- 19
वही, पृ.सं. 22
वही, पृ.सं. 23
वही, पृ.सं. 28
वही, पृ.सं. 34
वही, पृ.सं. 37
वही, पृ.सं.51
वही, पृ.सं. 52
वही, पृ.सं. 60
वही, पृ.सं. 222
वही, पृ.सं. 215
वही, पृ.सं.224
कुछ कही कुछ अनकही, ले. शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.14
वही, पृ.सं.16
वही, पृ.स.17
वही, पृ.सं.26
वही, पृ.सं.33
वही, पृ.सं.46
पिंजरे की मैंना, ले. चंद्रकिरण सोनेरिक्सा, पृ.सं. 69
वही, पृ.सं. 2 19
वही, पृ.सं. 220
वही, पृ.सं. 224
वही, पृ.सं. 214
वही, पृ.सं. 251
वही, पृ.सं.254
वही, पृ.सं.315
वही, पृ.सं 316
वही, पृ.सं. 339
वही, पृ.सं. 415
शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.13
वही, पृ.सं. 10
वही, पृ.सं. 17
वही, पृ.सं.51
वही, पृ.सं.72
वही, पृ.सं.99
वही, पृ.सं.107
वही, पृ.सं.116-117
वही, पृ.सं.1 19
वही,पृ.सं.129
वही, पृ.सं.143
वही, पृ.सं 172
आधुनिक मराठी वाङमयातिल स्त्रियांची आत्मचरित्रे :एक अभ्यास- विमल भालेराव पृ. सं-37-38
आधुनिक मराठी वाङमयातिल स्त्रियांची आत्मचरित्रे :एक अभ्यास- विमल भालेराव पृ. सं-44
मराठीतील स्त्री- आत्मचरित्राचां सामाजिक अंगाने अभ्यास- श्रुती श्री. बडगबालकर, पृ.सं.51
स्त्री साहित्याचा मागोवा, खंड1, सं. मंदा खापडे, पृष्ठ-141
स्त्री साहित्याचा मागोवा, खंड-1, सं. मंदा खापडे, पृ.सं.-146
स्त्री साहित्याचा मागोवा, खंड-1, सं. मंदा खापडे, पृ.सं.-146-147
आधुनिक मराठी वाङमयातील स्त्रियांची आत्मचरित्रेः एक अभ्यास, श्रीमती विमल भालेराव, पृ.सं. 45
स्त्री साहित्यचा मागोवा-(खंड-1) सं. मंदा खपडे, लीला दीक्षित, पृ.सं.160
आधुनिक मराठी वाङमयातील स्त्रियांची आत्मचरित्रे : एक अभ्यास - ले. विमल भालेराव, पृ.सं. 45-46 से उद्धृत
स्त्री साहित्यचा मागोवा-(खंड-1) सं. मंदा खपडे, लीला दीक्षित, पृ.सं.164
स्त्री साहित्यचा मागोवा-(खंड-1) सं. मंदा खपडे, लीला दीक्षित पृ.सं.164
स्त्री साहित्याचा मागोवा-सं.मंदा खापडे, पृ.सं. 199
स्त्री साहित्याचा मागोवा-सं.मंदा खापडे, पृ.सं. 199
माझ्या संगीत जीवनाची वाटचाल, ले.मालती पांडे, पृ.सं.88
http://arunbanchhor.blogspot.in/2011/06/blog-post.html
स्त्री साहित्याचा मागोवा –खंड -2, सं.मंदा खापडे, पृ.सं. 225
आधुनिक मराठी वाङमयातिल स्त्रियांची आत्मचरित्रे :एक अभ्यास- विमल भालेराव पृ.सं-60
सहवास, ले. मालतीबाई दांडेकर, पृ.सं.114
आठवले तसे, ले.दुर्गा भागवत, पृ.सं.60
वही, पृ.सं.59
वही,पृ.सं.104
वही, पृ.सं.112
माझ्या खुणा माझ्या मला, ले. सरोजिनी बाबर, पृ.सं.16
वडिलांच्या सेवेशी, ले.शिरीष पै, पृ.सं.178
माझ्या आयुष्याची गोष्ट, ले. गिरिजा किर , पृ.सं.104
वही, पृ.सं.95
वही, पृ.सं. 180-181
आयदान, ले.उर्मिला पवार पृ.सं. 24
वही, पृ.सं.71
वही, पृ.सं.192-193
वही, पृ.सं.203
वही, पृ.सं. 208
मी नाही कुणाची.....ले. सुशील पगारिया, पृ.सं. 69
वही, पृ.सं.77
वही पृ.सं.08
वही, पृ.सं. 51
वही, पृ.सं.28
मिटलेली कवाडे, ले.मुक्ता सर्वगोड, पृ.सं.15
स्त्री साहित्याचा मागोवा-खंड -2, सं. मंदा खापडे, पृ.सं.260
मी आणि बालकवि, ले. पार्वतीबाई ठोमरे, पृ.सं. 4
नाच ग घुमा ,ले. माधवी देसाई, पृ.सं.24-25
नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं.148
वही, पृ.सं.261
आहे मनोहर तरी, ले. सुनीता देशपांडे, पृ.सं.18
आहे मनोहर तरी, ले. सुनीता देशपांडे, पृ.सं.215
साथ संगत , ले. रागिणी पुंडलिक, पृ.सं.93
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