Tuesday, October 12, 2021

आत्मकथा : अर्थ, परिभाषा एवं स्वरूप

साहित्य की इस विधा को अन्य विधाओं की अपेक्षा सबसे जनतांत्रिक माना जाता है। यह विधा किसी को अछूता नहीं मानती है। यह अछूतापन व्यक्ति, भाषा और शिल्प के स्तर पर कहीं भी नहीं दिखाई देता है। एक सामान्य आदमी जिसके पास अपने असामान्य अनुभव है और एक असामान्य आदमी भी जिसके पास अपने सामान्य अनुभव है, वह आत्मकथा लिख सकता है। यह विधा साहित्य की परिभाषा ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ को अन्य विधा की अपेक्षा अधिक पुष्ट करती है। क्योंकि साहित्य की अन्य विधाओं में यथार्थ के साथ कल्पना भी होती है। लेकिन आत्मकथा में अपने जिए हुए जीवन, सुख-दुख और तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक परिस्थितियों का लेखा-जोखा देखने को मिलता है। इस तरह यह साहित्य की एक अन्य परिभाषा ‘साहित्य जीवन की आलोचना होता है’ को भी सार्थक करती है। क्योंकि आत्मकथा में आत्मकथाकार केवल स्थितियों का ब्यौरा ही नहीं देता तो उसके साथ आत्मालोचन और आत्मविश्लेषण भी करता है। इस तरह यह समग्र जीवन की आलोचना बनती है। तभी वह आत्मकथा बन पाती है, नहीं तो कोरा जीवन वृत्तांत बनकर रह जाती है। आज हिन्दी साहित्य में आत्मकथा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं। जिसके चलते पहले की अपेक्षा आज ज्य़ादा आत्मकथाएँ लिखी जा रही हैं। लेकिन स्वतंत्रता से पहले आत्मकथा लेखन के लिए साहित्य में इतनी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थी। आज भी दलित आत्मकथा को आत्मकथात्मक उपन्यास और स्त्री आत्मकथा को अश्लिल मानने वालों की संख्या में कमी नहीं आई हैं। इस विधा के शुरुआती दौर में संपूर्ण भारतीय साहित्य में इसका विरोध किया गया था। आत्मकथा विधा प्राचीन भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देती है, क्योंकि भारतीय साहित्य परंपरा में अपने विषय में कहना उचित नहीं माना जाता था। भारतीय साहित्य में चरित या चरित्र लिखे जाते थे। कुछ प्राचीन कवियों ने अपने बारे में पद्यात्मक संक्षिप्त परिचयात्मक जानकारी काव्य ग्रंथों मे दी, लेकिन वह आत्मकथा विधा के अंतर्गत नहीं आ सकती और प्राचीन कवियों का उद्देश्य भी आत्मकथा लिखना नहीं था। आत्मकथा का विकास हिन्दी में उस तरह नहीं हुआ जिस तरह साहित्य की अन्य विधाओं का हुआ। पंकज चतुर्वेदी हिन्दी साहित्य में आत्मकथा के विकसित न होने के कारणों को बताते हुए लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य में आत्मकथा-लेखन की न तो समृद्ध परम्परा है और न मजबूत वर्तमान। उल्टे इसका आश्चर्यजनक अभाव है। मगर जब हम इस अभाव के सांस्कृतिक कारणों में जाते हैं, तो आश्चर्य नहीं होता है। अतीत में ‘आत्म’ को नश्वर और महत्वहीन माना गया है, तो आधुनिक काल में आत्मबद्धता और आत्ममुग्धता का साम्राज्य है। अलबता एक बात सर्व-सामान्य है- पूरी भारतीय परम्परा में आत्मकथा विधा के अंतर्गत ‘आत्म’ के सच को उघाड़कर रख देने का नैतिक साहस प्रायः नहीं मिलता। जिस समाज में आत्म-निर्मम यथार्थ-चेतना की रचनात्मक अभिव्यक्तियों का ऐसा भयावह लोप हो, उसमें आत्मकथा की जरूरत का सवाल उठाना ही चाहिए।” पंकज चतुर्वेदी आत्मकथा के विकास के बाधक तत्वों में भारतीय दर्शन, आत्ममुग्धता और आत्मबद्धता, तथा समाज में आत्मा के सच को उघाड़कर रखने का साहस न होने को मानते हैं, और इसकी आवश्यकता पर भी बल देते हैं। संजय कृष्ण इस विधा के विकास में हिन्दू-दर्शन को बाधक मानते हैं। वे लिखते हैं, “हिन्दी में इस रचनात्मक विधा के अभाव की मुख्य वजह संभवतः हिन्दू के उस कथित दर्शन में निहीत हैं, जहाँ ‘आत्म’ को नश्वर और महत्त्वहीन मानकर छोड़ दिया गया है। इसी कारण यहाँ अपने ‘आत्म’ के सच को उघाड़कर रख देने का नैतिक साहस प्रायः नहीं मिलता; हाँ, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का अकुंठ आलाप अवश्य दिखाई पड़ता है।” इसी कारण ‘आत्मा’ को निर्भिकता से खोलकर रखने का साहस भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देता है। इस संदर्भ में महिप सिंह का कथन महत्त्वपूर्ण लगता है,वे लिखते हैं “आत्मकथा लिखने के लिए जिस प्रकार की स्पष्टता, प्रामाणिकता, निर्ममता और बेबाकी की आवश्यकता होती है वह भारतीय चरित्र में नहीं है। यह चरित्र बचपन से ही एक विशिष्ट प्रकार की संभ्रात मानसिकता से घिरी आदर्शात्मकता के घेरे में पनपता है। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, आदर्श और व्यवहार के निरन्तर विकसित होते अन्तराल को छद्मता और आडम्बर से भरना उसकी सहज प्रकृति बन जाती है। इसलिए यहाँ आत्मकथा जैसी सर्जनात्मक विधा का विकास नहीं हुआ, क्योंकि यह विधा कई बार ऐसी नंगी सच्चाई को प्रकट करने का साहस माँगती है जो भारतीय (संभ्रात) चरित्र में बहुत कम सम्भव है।” आत्मा को नश्‍वर मानने वाला भारतीय दर्शन, आत्मा के सच को बताने के साहस का अभाव, भारतियों का संभ्रात मानसिकता में पनपता हुआ चरित्र ही हिन्दी आत्मकथा के विकास में बाधक सिद्ध हुआ। इस कारण आत्मकथा का विकास हिन्दी में उतना हो नहीं पाया जिस मात्रा में अन्य विधाओं का हुआ। मराठी के आलोचक डॉ. आनंद पाटील ने भारतीय संस्कृति में ‘आत्मान्वेषण’ की परम्परा को आध्यात्मिक माना और वे आज आत्मकथा में किये जाने वाले आत्मान्वेषण को भौतिकता से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, “....‘आत्मान्वेषण’ की संकल्पना भारतीय संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में प्राचीन युग से है। ‘आत्मन्’ इस शब्द से ‘आत्म’ यह विशेषण और ‘आत्मा’ यह नाम संस्कृत से आया है और मराठी भाषा में रूढ़ हो गया। ‘आत्मान्वेषण’ का अर्थ ‘खुद को खोज़ना’, इसका अर्थ खुद की खोज़ होता है। भारतीय दर्शन में कुछ मूलभूत प्रश्न है। उसमें ‘को S हम्’, मैं कोन हूँ, यह एक प्रश्न है, उसका उत्तर ‘सोS हम्’ यानी ‘वह’ मैं हूँ है। ‘वह’ यानी ‘परमेश्वर’, यह संकल्पना दर्शन की है। ‘धर्म’ की नहीं।...भारतीय दर्शन में ‘आत्मान्वेषण’ की संकल्पना है और तात्विक रूप से ‘स्व’ की खोज़ प्राचीन काल से की जा रही है। यह मीमांसा दर्शनात्मक है अथवा आध्यात्मिक स्वरूप की होती है। वह ‘मैं’ के भौतीक स्वरूप की नहीं होती है। ‘आत्मकथा’ इस आधुनिक साहित्य विधा में जो ‘आत्मान्वेषण’ की संकल्पना है, वह भौतिक स्तर की है।” इस तरह भारतीय दर्शन में भौतीकता को हीन मानने के कारण निजी अनुभवों को व्यक्त नहीं किया गया था। वे आज आत्मकथा के माध्यम से व्यक्त हो रहे हैं। आत्मकथा को लेकर 1932 में एक बहस प्रेमचंद और आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के बीच चली। यह वह समय था, जब प्रेमचंद ‘हंस’ का आत्मकथा विशेषांक निकालने वाले थे। इस विशेंषांक के लिए प्रेमचंद ने नन्ददुलारे वाजपेयी से अपनी आत्मकथा माँगी। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने प्रेमचंद को आत्मकथा तो नहीं दी लेकिन इस योजना का विरोध करते हुए आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने लिखा, “हमारे देश में आत्मकथा लिखने की परिपाटी नहीं रही। यहाँ की दार्शनिक संस्कृति में उसका विधान नहीं। यहाँ के सन्त हिमालय की कन्दराओं में गलकर विश्वशक्ति की समृद्धी करते थे और करते हैं। प्राचीन भारत अपनी इतिवृत्ति और अपनी आत्मकथा नष्ट कर आज चिरजीवन का रहस्य बतलाता है और जिन्होंने कथा लिखीं, वे बिला गए। इस युग के महात्मा गांधी ने जो आत्मकथा लिखी है, उसकी मूल भावना है- प्रायश्चित; अर्थात् वह एक नकारात्मक योजना है, परन्तु प्रेमचंद जी कैसी आत्मकथाएँ लिखा रहे हैं, यह बतलाने की जरूरत नहीं।” आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी जिस भारतीय संस्कृति की दुहाई दे रहे थे, उस भारतीय संस्कृति ने बड़े उदार मन से दूसरी संस्कृतियों से बहुत कुछ लिया था। वाजपेयी जी के उपर्युक्त वक्तव्य को कुतर्क मानते हुए भारत भारद्वाज लिखते हैं, “ कहने की जरूरत नहीं है कि वाजपेयी जी का तर्क कुतर्क है क्योंकि हमारे देश में आत्मकथा लिखने की ही नहीं, अन्य बहुत सारी चीजों की भी परिपाटी नहीं रही है। यदी हिन्दी में आत्मकथा लिखने की परंपरा क्षीण रही है तो इसका सांस्कृतिक कारण है जो भारतीय दर्शन से सीधे जुड़ा हुआ है। हमारा दर्शन आत्मोत्सर्ग तो करता है आत्मप्रकाश नहीं। जबकि आत्मकथा की संरचना में एक लोकोन्मुख बहीर्धमिता निहीत है, न वह किसी से पर्दा करती है न किसी को अछूत मानती है।” वाजपेयी के तर्क का जवाब भारत भारद्वाज ने दिया साथ ही हिन्दी में आत्मकथा की क्षीण परंपरा का कारण भी बताया और आत्मकथा की प्रकृति को भी। भारतीय साहित्य में आत्मकथा को बाल्यावस्था से लेकर आजतक कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। हिन्दी में देर से ही सही आत्मकथा का वृक्ष फल-फूल रहा है। आत्मकथा को समझने के लिए विद्वानों द्वारा दी हुई आत्मकथा की परिभाषाओं से होकर गुजरना होगा। 1.1 आत्मकथा की परिभाषाएँ 1.1.1 अंग्रेजी के शब्दकोश, विश्वकोश, साहित्यकोश के अनुसार 1.एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका :“आत्मकथा व्यक्ति के जिये हुए जीवन का ब्यौरा है, जो कि स्वंय उसके द्वारा लिखा जाता है।” 2. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी: इस शब्दकोश में आत्मकथा का अर्थ लेखक की अपने जीवन की स्वंय लिखी कहानी के रूप में दिया गया है” 3. कौलियर्स का एन्साइक्लोपीडिया–“आत्मकथा जीवनी का ही एक प्रकार है, जिसमें लेखन का विषय स्वंय लेखक ही होता है। यह सामन्यतः प्रथम पुरूष में लिखी जाती है, और लेखक के जीवन के अधिकांश अथवा महत्त्वपूर्ण तथ्यों को स्वंय में समाविष्ट करके चलती है।” 4. कैसल का साहित्य विश्वकोश- “आत्मकथा व्यक्ति के जीवन का विवरण है, जो स्वंय के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इसमें जीवनी के अन्य प्रकारों से सत्य का अधिकतम समावेश होना चाहिए।” 5. डिक्शनरी ऑफ वर्ल्ड लिटरेचरः “आत्मकथा मूलतः लेखक के जीवन का सातत्यपूर्ण विवरण होता है, जिसमें मुख्य भार आत्मनिरीक्षण और अपने जीवन की सार्थकता पर बाह्य परिवेश में प्रस्तुत किया जाता है।” 1.1.2 हिन्दी के शब्दकोश, विश्वकोश, साहित्यकोश के अनुसार 6. हिन्दी साहित्य कोश: “आत्मकथा लेखक के जीवन का संबंध वर्णन है। इसमें बीते हुए जीवन का सिंहावलोकन और एक व्यापक पृष्ठभूमि में अपने जीवन का महत्त्व दिखलाया जाना संभव है।” 7.मानक हिन्दी कोश: “ साहित्य में ऐसी पुस्तक जिसमें किसी व्यक्ति ने अपने जीवन की सभी मुख्य-मुख्य बातों का वर्णन किया हो।” 8.मानविकी पारिभाषिक कोश(साहित्यिक खंड): “आत्मकथा में लेखक के अपने जीवन से संबंधित घटनाओं का ब्यौरेवार वर्णन है।..आत्मकथा में लेखक के आंतरिक जीवन या चरित्र पर अधिक बल दिया जाता है।” 9. हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली- “आत्मकथा के लिए अंग्रेजी में आटोबायोग्राफी (Autobiography) शब्द प्रचलित है। ‘जीवनी’ ‘आत्मकथा’ दोनों में किसी विशिष्ट व्यक्ति का जीवन-वृत्त होता है पर जब लेखक स्वंय अपने जीवन का क्रमिक ब्यौरा पेश करता है तो उसे ‘आत्मकथा’ कहते है” आज हिन्दी साहित्य में आत्मकथा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं। जिसके चलते पहले की अपेक्षा आज ज्य़ादा आत्मकथाएँ लिखी जा रही हैं। लेकिन स्वतंत्रता से पहले आत्मकथा लेखन के लिए साहित्य में इतनी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं थी। आज भी दलित आत्मकथा को आत्मकथात्मक उपन्यास और स्त्री आत्मकथा को अश्लिल मानने वालों की संख्या में कमी नहीं आई हैं। इस विधा के शुरुआती दौर में संपूर्ण भारतीय साहित्य में इसका विरोध किया गया था। आत्मकथा विधा प्राचीन भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देती है, क्योंकि भारतीय साहित्य परंपरा में अपने विषय में कहना उचित नहीं माना जाता था। भारतीय साहित्य में चरित या चरित्र लिखे जाते थे। कुछ प्राचीन कवियों ने अपने बारे में पद्यात्मक संक्षिप्त परिचयात्मक जानकारी काव्य ग्रंथों मे दी, लेकिन वह आत्मकथा विधा के अंतर्गत नहीं आ सकती और प्राचीन कवियों का उद्देश्य भी आत्मकथा लिखना नहीं था। आत्मकथा का विकास हिन्दी में उस तरह नहीं हुआ जिस तरह साहित्य की अन्य विधाओं का हुआ। पंकज चतुर्वेदी हिन्दी साहित्य में आत्मकथा के विकसित न होने के कारणों को बताते हुए लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य में आत्मकथा-लेखन की न तो समृद्ध परम्परा है और न मजबूत वर्तमान। उल्टे इसका आश्चर्यजनक अभाव है। मगर जब हम इस अभाव के सांस्कृतिक कारणों में जाते हैं, तो आश्चर्य नहीं होता है। अतीत में ‘आत्म’ को नश्वर और महत्वहीन माना गया है, तो आधुनिक काल में आत्मबद्धता और आत्ममुग्धता का साम्राज्य है। अलबता एक बात सर्व-सामान्य है- पूरी भारतीय परम्परा में आत्मकथा विधा के अंतर्गत ‘आत्म’ के सच को उघाड़कर रख देने का नैतिक साहस प्रायः नहीं मिलता। जिस समाज में आत्म-निर्मम यथार्थ-चेतना की रचनात्मक अभिव्यक्तियों का ऐसा भयावह लोप हो, उसमें आत्मकथा की जरूरत का सवाल उठाना ही चाहिए।” पंकज चतुर्वेदी आत्मकथा के विकास के बाधक तत्वों में भारतीय दर्शन, आत्ममुग्धता और आत्मबद्धता, तथा समाज में आत्मा के सच को उघाड़कर रखने का साहस न होने को मानते हैं, और इसकी आवश्यकता पर भी बल देते हैं। संजय कृष्ण इस विधा के विकास में हिन्दू-दर्शन को बाधक मानते हैं। वे लिखते हैं, “हिन्दी में इस रचनात्मक विधा के अभाव की मुख्य वजह संभवतः हिन्दू के उस कथित दर्शन में निहीत हैं, जहाँ ‘आत्म’ को नश्वर और महत्त्वहीन मानकर छोड़ दिया गया है। इसी कारण यहाँ अपने ‘आत्म’ के सच को उघाड़कर रख देने का नैतिक साहस प्रायः नहीं मिलता; हाँ, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का अकुंठ आलाप अवश्य दिखाई पड़ता है।” इसी कारण ‘आत्मा’ को निर्भिकता से खोलकर रखने का साहस भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देता है। इस संदर्भ में महिप सिंह का कथन महत्त्वपूर्ण लगता है,वे लिखते हैं “आत्मकथा लिखने के लिए जिस प्रकार की स्पष्टता, प्रामाणिकता, निर्ममता और बेबाकी की आवश्यकता होती है वह भारतीय चरित्र में नहीं है। यह चरित्र बचपन से ही एक विशिष्ट प्रकार की संभ्रात मानसिकता से घिरी आदर्शात्मकता के घेरे में पनपता है। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, आदर्श और व्यवहार के निरन्तर विकसित होते अन्तराल को छद्मता और आडम्बर से भरना उसकी सहज प्रकृति बन जाती है। इसलिए यहाँ आत्मकथा जैसी सर्जनात्मक विधा का विकास नहीं हुआ, क्योंकि यह विधा कई बार ऐसी नंगी सच्चाई को प्रकट करने का साहस माँगती है जो भारतीय (संभ्रात) चरित्र में बहुत कम सम्भव है।” आत्मा को नश्‍वर मानने वाला भारतीय दर्शन, आत्मा के सच को बताने के साहस का अभाव, भारतियों का संभ्रात मानसिकता में पनपता हुआ चरित्र ही हिन्दी आत्मकथा के विकास में बाधक सिद्ध हुआ। इस कारण आत्मकथा का विकास हिन्दी में उतना हो नहीं पाया जिस मात्रा में अन्य विधाओं का हुआ। मराठी के आलोचक डॉ. आनंद पाटील ने भारतीय संस्कृति में ‘आत्मान्वेषण’ की परम्परा को आध्यात्मिक माना और वे आज आत्मकथा में किये जाने वाले आत्मान्वेषण को भौतिकता से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, “....‘आत्मान्वेषण’ की संकल्पना भारतीय संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में प्राचीन युग से है। ‘आत्मन्’ इस शब्द से ‘आत्म’ यह विशेषण और ‘आत्मा’ यह नाम संस्कृत से आया है और मराठी भाषा में रूढ़ हो गया। ‘आत्मान्वेषण’ का अर्थ ‘खुद को खोज़ना’, इसका अर्थ खुद की खोज़ होता है। भारतीय दर्शन में कुछ मूलभूत प्रश्न है। उसमें ‘को S हम्’, मैं कोन हूँ, यह एक प्रश्न है, उसका उत्तर ‘सोS हम्’ यानी ‘वह’ मैं हूँ है। ‘वह’ यानी ‘परमेश्वर’, यह संकल्पना दर्शन की है। ‘धर्म’ की नहीं।...भारतीय दर्शन में ‘आत्मान्वेषण’ की संकल्पना है और तात्विक रूप से ‘स्व’ की खोज़ प्राचीन काल से की जा रही है। यह मीमांसा दर्शनात्मक है अथवा आध्यात्मिक स्वरूप की होती है। वह ‘मैं’ के भौतीक स्वरूप की नहीं होती है। ‘आत्मकथा’ इस आधुनिक साहित्य विधा में जो ‘आत्मान्वेषण’ की संकल्पना है, वह भौतिक स्तर की है।” इस तरह भारतीय दर्शन में भौतीकता को हीन मानने के कारण निजी अनुभवों को व्यक्त नहीं किया गया था। वे आज आत्मकथा के माध्यम से व्यक्त हो रहे हैं। आत्मकथा को लेकर 1932 में एक बहस प्रेमचंद और आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के बीच चली। यह वह समय था, जब प्रेमचंद ‘हंस’ का आत्मकथा विशेषांक निकालने वाले थे। इस विशेंषांक के लिए प्रेमचंद ने नन्ददुलारे वाजपेयी से अपनी आत्मकथा माँगी। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने प्रेमचंद को आत्मकथा तो नहीं दी लेकिन इस योजना का विरोध करते हुए आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने लिखा, “हमारे देश में आत्मकथा लिखने की परिपाटी नहीं रही। यहाँ की दार्शनिक संस्कृति में उसका विधान नहीं। यहाँ के सन्त हिमालय की कन्दराओं में गलकर विश्वशक्ति की समृद्धी करते थे और करते हैं। प्राचीन भारत अपनी इतिवृत्ति और अपनी आत्मकथा नष्ट कर आज चिरजीवन का रहस्य बतलाता है और जिन्होंने कथा लिखीं, वे बिला गए। इस युग के महात्मा गांधी ने जो आत्मकथा लिखी है, उसकी मूल भावना है- प्रायश्चित; अर्थात् वह एक नकारात्मक योजना है, परन्तु प्रेमचंद जी कैसी आत्मकथाएँ लिखा रहे हैं, यह बतलाने की जरूरत नहीं।” आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी जिस भारतीय संस्कृति की दुहाई दे रहे थे, उस भारतीय संस्कृति ने बड़े उदार मन से दूसरी संस्कृतियों से बहुत कुछ लिया था। वाजपेयी जी के उपर्युक्त वक्तव्य को कुतर्क मानते हुए भारत भारद्वाज लिखते हैं, “ कहने की जरूरत नहीं है कि वाजपेयी जी का तर्क कुतर्क है क्योंकि हमारे देश में आत्मकथा लिखने की ही नहीं, अन्य बहुत सारी चीजों की भी परिपाटी नहीं रही है। यदी हिन्दी में आत्मकथा लिखने की परंपरा क्षीण रही है तो इसका सांस्कृतिक कारण है जो भारतीय दर्शन से सीधे जुड़ा हुआ है। हमारा दर्शन आत्मोत्सर्ग तो करता है आत्मप्रकाश नहीं। जबकि आत्मकथा की संरचना में एक लोकोन्मुख बहीर्धमिता निहीत है, न वह किसी से पर्दा करती है न किसी को अछूत मानती है।” वाजपेयी के तर्क का जवाब भारत भारद्वाज ने दिया साथ ही हिन्दी में आत्मकथा की क्षीण परंपरा का कारण भी बताया और आत्मकथा की प्रकृति को भी। भारतीय साहित्य में आत्मकथा को बाल्यावस्था से लेकर आजतक कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। हिन्दी में देर से ही सही आत्मकथा का वृक्ष फल-फूल रहा है। आत्मकथा को समझने के लिए विद्वानों द्वारा दी हुई आत्मकथा की परिभाषाओं से होकर गुजरना होगा। 1.1 आत्मकथा की परिभाषाएँ 1.1.1 अंग्रेजी के शब्दकोश, विश्वकोश, साहित्यकोश के अनुसार 1.एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका :“आत्मकथा व्यक्ति के जिये हुए जीवन का ब्यौरा है, जो कि स्वंय उसके द्वारा लिखा जाता है।” 2. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी: इस शब्दकोश में आत्मकथा का अर्थ लेखक की अपने जीवन की स्वंय लिखी कहानी के रूप में दिया गया है” 3. कौलियर्स का एन्साइक्लोपीडिया–“आत्मकथा जीवनी का ही एक प्रकार है, जिसमें लेखन का विषय स्वंय लेखक ही होता है। यह सामन्यतः प्रथम पुरूष में लिखी जाती है, और लेखक के जीवन के अधिकांश अथवा महत्त्वपूर्ण तथ्यों को स्वंय में समाविष्ट करके चलती है।” 4. कैसल का साहित्य विश्वकोश- “आत्मकथा व्यक्ति के जीवन का विवरण है, जो स्वंय के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इसमें जीवनी के अन्य प्रकारों से सत्य का अधिकतम समावेश होना चाहिए।” 5. डिक्शनरी ऑफ वर्ल्ड लिटरेचरः “आत्मकथा मूलतः लेखक के जीवन का सातत्यपूर्ण विवरण होता है, जिसमें मुख्य भार आत्मनिरीक्षण और अपने जीवन की सार्थकता पर बाह्य परिवेश में प्रस्तुत किया जाता है।” 1.1.2 हिन्दी के शब्दकोश, विश्वकोश, साहित्यकोश के अनुसार 6. हिन्दी साहित्य कोश: “आत्मकथा लेखक के जीवन का संबंध वर्णन है। इसमें बीते हुए जीवन का सिंहावलोकन और एक व्यापक पृष्ठभूमि में अपने जीवन का महत्त्व दिखलाया जाना संभव है।” 7.मानक हिन्दी कोश: “ साहित्य में ऐसी पुस्तक जिसमें किसी व्यक्ति ने अपने जीवन की सभी मुख्य-मुख्य बातों का वर्णन किया हो।” 8.मानविकी पारिभाषिक कोश(साहित्यिक खंड): “आत्मकथा में लेखक के अपने जीवन से संबंधित घटनाओं का ब्यौरेवार वर्णन है।..आत्मकथा में लेखक के आंतरिक जीवन या चरित्र पर अधिक बल दिया जाता है।” 9. हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली- “आत्मकथा के लिए अंग्रेजी में आटोबायोग्राफ1.1.3 विद्वानों और साहित्यकारों की आत्मकथा विषयक परिभाषाएँ 10. अंग्रेजी साहित्य के समीक्षक श्री डब्लू .एच. डन ने अंग्रेजी ‘बायोग्राफी’ के विषय में विचार करते हुए उसे ‘कबंध’(हाथ, पाँव और सिर विहीन शरीर) की उपमा प्रदान की है। संभवतः वे इसके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि वह एक अपूर्ण कहानी है। 11.श्री वियोगी हरि- “ आत्मकथा जीवन की कुछ घटनाओं और अनुभूतियों की एक अभिव्यंजना है।” 12. हरिवंश राय बच्चन-“आत्मकथा जीवन की एक तस्वीर है....आत्मकथा का अर्थ है आत्मचिंतन।” 13. अमृता प्रितम–“आत्मकथा यथार्थ से यथार्थ तक पहुँचने की प्रक्रिया है।” 14. डॉ. भगवानशरण भारद्वाज- “जब अपने जीवन के अनुभवों को सुसंबद्ध रूप में उपन्यस्त किया जाता है और उसके विकास की गति को रेखांकित किया जाता है तो आत्मकथा की सृष्टि होती है।” 15.कमलेश्वर- “आत्मकथा सबसे सघन, पहला और अकृत्रिम अनुभव की सच्ची दास्तान है।” 16. रामदरश मिश्र – “आत्मकथा का अर्थ ही है – अपने को खोलना। और खोलने का अर्थ है- लेखक अपनी शक्ति और अशक्ति, अपनी हार और जीत सभी कुछ सहज भाव से पाठक के सामने रख दे।” 17. महादेवी वर्मा- “ आत्मकथा अपने जीवन के सन्दर्भ में अन्तर्जगत तथा बहिर्जगत के घात-प्रतिघात, क्रिया-प्रतिक्रिया का पुनर्निरीक्षण है।” 18.विष्णु प्रभाकर –“ आत्मकथा तो उसे कहते हैं जिसमें आदमी आत्मा को बिल्कुल निरावरण कर देता है।” 19. इंदिरा गोस्वामी –“...आत्मकथा उस सबका समुच्चय होती है जो उसने अपने जीवन में सोचा हो, किया हो, भोगा हो। यह उसके आन्तरिक निजी विचारों की और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है। यह लेखक के जीवन में हुए घटनाओं, सम्पर्क में आए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों, विभिन्न स्थानों का यथार्थ-चित्रण होता है। इसमें कल्पना की कोई गुंजाईश नहीं रहती।” 20. रणवीर रांग्रा –“ आत्मकथा लेखन आत्मालोचन का ही दूसरा नाम है।” 21.पंकज चतुर्वेदी –“आत्मकथा की एक स्वाभाविक आधारभूत परिभाषा यही हो सकती है कि उसमें व्यक्ति समूचे समय और समाज के सन्दर्भ में रखकर अपने शब्द और कर्म, अपनी वैचारिकता और व्यक्तित्व की गहन और पारदर्शी पड़ताल करने की रचनात्मक कोशिश करता है। गहनता ‘आत्म’ के आद्यन्त विश्लेषण के लिए जरूरी है, तो पारदर्शिता औरों की आत्मीयता अर्जित करने के लिए क्योंकि आत्मकथा‘दूसरों’ के साथ ‘अपने’ जीवन-प्रसंगों का साझा है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कुछ मुख्य तथ्य उभरकर आते हैं, वे इस प्रकार हैं- 1. आत्मकथा का विषय आत्मकथाकार का जीवन होता है । 2. आत्मकथा में लेखक आत्मविश्लेषण, आत्मान्वेषण और आत्मालोचन करता है। 3. आत्मकथा में लेखक अपने जीवन को निड़र होकर उधेड़ता, खोलता है। 4. आत्मकथा में आत्मकथाकार के निजी अनुभवों के साथ-साथ बाह्य वातावरण का भी चित्रण होता है। 5. आत्मकथा में यश-अपयश दोनों के लिए समान जगह होती है। 6. आत्मकथा में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है। 7. आत्मकथा एक अपूर्ण कहानी है। 8. अपने अनुभवों के साथ आत्मकथाकार दूसरों के अनुभवों को हमसे साझा करता है। 9. आत्मकथा आत्मकथाकार से पूरे ईमानदारी की माँग करती है। 10. आत्मकथा गहनता और पारदर्शिता की माँग करती है। 11. तटस्थता आत्मकथा की महत्वपूर्ण शर्त है। इन सब परिभाषाओं के आधार पर आत्मकथा की एक परिभाषा यह दी जा सकती है- आत्मकथा उसे कहते हैं जिसमें लेखक अपने जीवन के अनुभवों को पूरे ईमानदारी के साथ, कुछ भी न छिपाते हुए प्रस्तुत करता है। जिसमें वह आत्मान्वेषन,आत्मालोचन और आत्मविश्लेषण करता है। आत्मप्रशंसा से बचता है। आत्मकथाकार अपनी गहन और पारदर्शी पड़ताल करता है। लेखक के अनुभवों के साथ उसका समय और समाज भी आत्मकथा में उपस्थित होता है। 1.2 आत्मकथा का स्वरूप आत्मकथा की परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यक्ति के जीवन की चुनी हुई स्मृतियों का दर्शन हमें उसकी आत्मकथा में होता है। इसके साथ उसके विचारों से भी अवगत होते हैं। आत्मकथा में अनायास ही तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि परिस्थितियों का चित्रण होता है। खासकर पुरूषों की आत्मकथाओं में इन स्थितियों का वर्णन व्यापक रूप से दिखाई देता है। स्त्रियों ने भी अपने समय की स्थितियों पर विचार व्यक्त किया, परन्तु उनकी एक सीमा है। आत्मकथाकार आत्मकथा में तटस्थ होकर अपने जीवनानुभवों को पाठकों के सामने रखने की कोशिश करता है। तटस्थता आत्मकथा की एक महत्वपूर्ण शर्त है। आत्मकथा लेखक जीवन के एक बिन्दू पर खड़ा होकर अपने गुजरे हुए वक्त को देखता है। जहाँ तक उसकी नज़र जाती है, उसमें से चुनी हुई स्मृतियों को वह हमारे सामने रखने का प्रयत्न करता है। कई बार स्मृतियाँ धूंधली हो जाती हैं। ऐसे समय में स्मृतियों की सत्यता पर संदेह होने लगता है। आत्मकथाकार अपने जीवन को आत्मकथा में क्रमबद्ध बताए तो उसमें एक गत्यात्मकता होगी। कुछ आत्मकथाकार जैसे-जैसे प्रसंग स्मरण होते हैं, उनके अनुसार आत्मकथा लिखते हैं। इससे पाठक को आत्मकथा समझने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। पंकज चतुर्वेदी आत्मकथा में ‘लोकोन्मुख बहसधर्मिता’ पाते हैं, जिससे लेखक आभिजात्य संस्कारों के विरूद्ध जाकर अपनी संपूर्णता में आत्मकथा में उपस्थित होने का प्रयत्न करता है। उनके अनुसार, “आत्मकथा की सरंचना में एक लोकोन्मुख बहसधर्मिता निहीत है। वह अपने मिज़ाज से ही आभिजात्य के विरूद्ध है, क्योंकि उसमें अपने अंतरंग का निश्‍चल उद्‌घाटन होता है। न वह किसी से पर्दा करती है, न किसी को अछूत मानती है। आत्मकथा में हम अपने सब-कुछ को सार्वजनिक कर देने के साहस और फिर इस सार्वजनिकता में से अपने को दुबारा पा लेने के अचरज के बीच लगातार आवाजाही करते हैं। इस तरह आत्मकथा एक बाह्यान्तर जनतन्त्र की बुनियाद पर खड़ी होती है।” इस कथन में आत्मकथा का जनतांत्रिक चरित्र नज़र आता है। जिसमें आत्मकथाकार अपने किसी भी पक्ष को छिपाता नहीं है। इसी कारण यह विधा अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक ईमानदारी की माँग आत्मकथाकार से करती है। आत्मकथा का स्वरूप आत्मकथा की सहधर्मी विधाओं के सात तुलना द्वारा अधिक स्पष्ट रुप से समझा जा सकता है। 1.3 आत्मकथा तथा अन्य सहधर्मी विधाएँ 1.3.1 आत्मकथा तथा जीवनी आत्मकथा की परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा, आत्मकथा लेखक के जीवन की कहानी होती है। वह खुद अपनी जीवनी लिखता है। आत्मकथाकार का पूरा जीवन आत्मकथा में आ नहीं पाता है। लेकिन जीवनीकार जीवनी में किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की जीवन कहानी को जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखांकित करता है। इन दो विधाओं के भेद के बारे में डॉ. कमलेश सिंह ने लिखा है, “आत्मकथा तथा जीवनी दोनों की ही आधारभूमि व्यक्ति और उसका व्यक्तित्व है। अंतर इतना है कि स्वानुभवों का निरूपण जब स्वयं के द्वारा होता है तो वह आत्मकथा कहलाता है और जहाँ अन्य के जीवन का निरूपण हो तो वह जीवनी आकार लेती है। इस आधारभूत अंतर से ही कई अन्य अन्तर उत्पन्न होते हैं।” इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि आत्मकथा में स्वानुभव होते है, आत्मकथाकार को तथ्यों को इकठ्ठा करने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। वह अपनी आत्मकथा लेखन के लिए पत्रों और डायरी का सहारा ले सकता है। लेकिन इसके विपरीत जीवनीकार किसी विशिष्ट व्यक्ति की जीवनी लिखता है, इसलिए उसे उस व्यक्ति के जीवन के बारे में जानने के लिए उस व्यक्ति से जुड़ी हर बात की जानकारी इकट्ठा करनी पड़ती है। तभी उससे उस विशिष्ट व्यक्ति का सही चित्रण हो पाएगा। आत्मकथा में लेखक अपना जीवन खुद देखता है। वह स्वलक्षी होता है। इस कारण आत्मकथा आत्मनिष्ठ होती है। जबकि जीवनीकार उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उस विशिष्ट व्यक्ति की जीवनी लिखता है। जीवनीकार परलक्षी होता है। इसलिए आत्मकथा वस्तुनिष्ट होती है। जीवनी की अपेक्षा आत्मकथाओं को ज्यादा पढ़ा जाता है। इसका कारण यह है कि आत्मकथा में लेखक स्वंय अपने अनुभवों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है, जबकि जीवनी में जीवनीकार किसी विशिष्ट का प्राप्त सामग्री के आधार पर जीवन प्रस्तुत करता है। डी.जी. नायक के अनुसार, “...आत्मकथा जीवनी की तुलना में सदैव एक विश्वसनीय और प्रभावोत्पादक रचना बनी रहती है, क्योंकि उसके पास ‘फर्स्ट हैंड़ इन्फार्मेशन’ होती है।” इसी ‘फर्स्ट हैंड़ इन्फार्मेशन’ के कारण आत्मकथाओं में पाठकों की ज्यादा रूची होती है। आत्मकथाकार आत्मकथा में अपनी जीवन कहानी लिखता है। वह उसमें अपने अंतर्द्वंद्वों को भी गहराई से अभिव्यक्त करता है। ऐसा करना जीवनीकार के लिए असंभव है। इस संदर्भ में डॉ. कमलेश सिंह लिखती हैं, “जीवनी-लेखक चरित्र नायक के अवचेतन की पहचान भी भली प्रकार नहीं कर सकता। आत्मकथाकार जितनी अपनी गहराई में उतर सकता है, जीवनी-लेखक नहीं। वास्तव में देखा जाये तो व्यक्ति जैसा जीवन भोगता है उसको ही यह अधिकार है कि वह अपनी अनुभूतियों को सत्य रूप में प्रस्तुत करें, क्योंकि भोक्ता व्यक्ति की स्मृतियाँ ही इसमें मुख्य भाग लेती है।” इस तरह हम देख सकते हैं कि यह दोनों भिन्न विधाएँ हैं, आत्मकथा आत्मनिष्ठ होती हैं, तो जीवनी वस्तुनिष्ठ। जिनमें शैली और शिल्प के स्तर भी भिन्नता दिखाई देती है। 1.3.2 आत्मकथा और डायरी ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में डायरी की परिभाषा इस प्रकार दी गई है,“जब कोई व्यक्ति तिथियों का उल्लेख करते हुए घटनाओं को उसी क्रम में लिपिबद्ध करता है, जिस क्रम से उसके जीवन में घटित हुई हैं या जिस क्रम से उसने उन्हें अपने जीवन-काल में देखा-सुना अथवा सोचा-समझा है तब ‘डायरी’ विधा जन्म लेती है। प्रचलित अर्थ में डायरी दैनिक व्यापारों का घटनाओं का ब्यौरा है।” इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा और डायरी में कुछ समानताएँ हैं, और इनमें अंतर भी है। इस अंतर को कमलेश सिंह इस तरह समझाती है। “आत्मकथा तथा डायरी में वही संबंध है, जो माला में उसके गुंथे हुए मनकों में होता है। आत्मकथा समग्र जीवन का विवरण है जबकि डायरी किसी विशेष दिन की अनुभूति का अंकन है।” इससे बात स्पष्ट होती है कि डायरी के एक-एक मनके को यानी एक-एक दिन के अनुभवों को जोड़कर आत्मकथा यानी माला बनती है। डायरी में मनुष्य अपने जिए हुए हर दिन का ब्यौरा लिखता है। डायरी आत्मकथा से भी ज्यादा निजी होती है। यह एक प्रकार का अपने आपसे एकांत में किया गया संवाद होता है। इसमें वह कहने और सुनने का काम स्वंय ही करता है। इस समय वह किसी भी प्रकार के संकोच और भय से परे होकर लिखता है। इसलिए डायरी मरणोपरान्त प्रकाशित होती है।‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में इन विधाओं के अंतर के बारें में लिखा है, “डायरी आत्मकथा का ही एक बदला हुआ रूप है। डायरी में सामान्यतः ताज़े अनुभवों को लिखा जाता है या संभव है कि कभी-कभी बीते हुए अनुभवों का पुनर्मूल्यांकन कर लिया जाए, जबकि दूसरी और, आत्मकथा में सारे अतीत पर अपेक्षाकृत कहीं अधिक परिपक्व और तटस्थदृष्टि डाल सकने की संभावना रहती है।” डायरी में जहाँ हर रोज़ के अनुभवों को लिखा जाता है, वहीं आत्मकथा में जीवन के एक खास समय में सोच-समझकर अपने अनुभवों को अभिव्यक्त किया जाता है। डायरी में लिखे गये अनुभवों में पूर्वापार संबंध नहीं होता है। आज किसी व्यक्ति के बारे कोई राय लेखक ने दी है, तो कल वह राय बदल भी सकता है। ये अनुभव एक दूसरे से कटे-कटे रहते हैं। इसमें कहानी जैसी निरंतरता न होने के कारण इसे पढ़ने में पाठक की रूची कम होती है। इसमें अनुभव खंड-खंड होते है। कभी-कभी तो डायरी में पूरा वाक्य भी नहीं होता है। पात्रों की संख्या भी बहुत होती है। उनका परिचय भी नहीं दिया जाता है। आत्मकथा में भी पात्रों की संख्या ज्यादा होती है, पर उसमें पात्रों का परिचय दिया जाता है। डायरी और आत्मकथा में ईमानदारी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। बिना ईमानदारी के इन दो विधाओं की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। यही तत्व इन दो विधाओं को जोड़ता है। डायरी लिखते समय भाषा और शिल्प की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। लेकिन आत्मकथा में डायरी की अपेक्षा भाषा और शिल्प पर ध्यान दिया जाता है। इन दो विधाओं के दो मुख्यविरोध के बारे कमलेश सिंह लिखती है, “ इन दोनों विधाओं के दो मुख्य विरोध ये है कि आत्मकथा-लेखक आयु के अंतिम छोर पर खड़ा रहकर अपने जीवन का पुनरावलोकन करता है। परंतु डायरी निरंतर चलनेवाली वस्तु है। यदि जीवन के प्रारंभ से ही व्यक्ति सतर्कता से डायरी लिखे तो क्रमिक रूप से तिथिवार उसमें से हमें बहुत कुछ बहुमूल्य प्राप्त हो सकता है और उस विशिष्ट समय की मानसिक स्थितियों का पूरा चित्र हमें प्राप्त हो जाता है। जिससे कृत्रिमता नहीं रहती और परिणामस्वरूप कई रोचक प्रसंग अपनी पूरी सत्यता के साथ सन्मुख आ जाते हैं। डायरी लेखक जिस ‘क्षण बिंदु’ पर खड़ा है, उस क्षण को वह तुरंत जी लेता है। इसीलिए उसके पास समय केवल वर्तमान रूप में ही होता है। डायरी लेखक का लेखन उसी के साथ-साथ आगे बढ़ता है। जबकि आत्मकथा की सृजन प्रक्रिया अतीत के परिवेश में से कुछ विशिष्ट बाहर लाने की क्रिया में आरंभ होती है।” डायरी में कृत्रिमता नहीं होती है। उसमें दैनंदिन जीवन के सत्य को व्यक्त किया जाता है। डायरी में व्यक्त सत्य के बारे में कठिनाई तब पैदा होती है जब डायरी आधी-अधूरी पढ़ी या लिखी जाती है। जिससे डायरी में लिखे गए अनुभवों का सही अर्थ लगाने में दिक्कत होती है। जिससे कई बार भ्रम भी पैदा होता है। आत्मकथा लेखन में डायरी से मदद ली जाती है। डायरी और आत्मकथा के संबंध को विश्व बंधु शास्त्री विद्यालंकार फिल्म के माध्यम से इस प्रकार समझाते हैं, “फिल्म की शुटिंग के समय प्रतिदिन के प्रसंग खण्ड खण्ड करके कैमरे के द्वारा फिल्म पर अंकित कर दिये जाते हैं और कालान्तर में संपादन व क्रम-नियोजन आदि के द्वारा उन्हें एक तारतम्य प्रदान कर रजत पट पर प्रोजेक्टर की सहायता से प्रदर्शित कर दिया जाता है। यदि कोई दर्शक पूरी फिल्म को खण्ड-खण्ड बनते हुए देखे, और फिर इसके संपादित और सेंसर हो चुके रूप के एक साथ देखे, तो निश्चित रूप से उसे प्रथम अनुभव डायरी के समान लगेगा, और दूसरा आत्मकथा के समान” इस प्रकार हम देखते हैं कि दोनों विधाओं में लेखक का जीवन आता है, पर उन दोनों में अंतर है। डायरी में जीवन खण्डित होकर आता है तो आत्मकथा में जीवन खण्डों को जोड़कर लिखा जाता है। इसमें एक प्रवाह होता है। दोनों में भी तथ्यों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। जहाँ यादें धूंधली पड़ जाती है वहाँ आत्मकथाकार डायरी की सहायता लेता है। ी (Autobiography) शब्द प्रचलित है। ‘जीवनी’ ‘आत्मकथा’ दोनों में किसी विशिष्ट व्यक्ति का जीवन-वृत्त होता है पर जब लेखक स्वंय अपने जीवन का क्रमिक ब्यौरा पेश करता है तो उसे ‘आत्मकथा’ कहते है” 1.1.3 विद्वानों और साहित्यकारों की आत्मकथा विषयक परिभाषाएँ 10. अंग्रेजी साहित्य के समीक्षक श्री डब्लू .एच. डन ने अंग्रेजी ‘बायोग्राफी’ के विषय में विचार करते हुए उसे ‘कबंध’(हाथ, पाँव और सिर विहीन शरीर) की उपमा प्रदान की है। संभवतः वे इसके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि वह एक अपूर्ण कहानी है। 11.श्री वियोगी हरि- “ आत्मकथा जीवन की कुछ घटनाओं और अनुभूतियों की एक अभिव्यंजना है।” 12. हरिवंश राय बच्चन-“आत्मकथा जीवन की एक तस्वीर है....आत्मकथा का अर्थ है आत्मचिंतन।” 13. अमृता प्रितम–“आत्मकथा यथार्थ से यथार्थ तक पहुँचने की प्रक्रिया है।” 14. डॉ. भगवानशरण भारद्वाज- “जब अपने जीवन के अनुभवों को सुसंबद्ध रूप में उपन्यस्त किया जाता है और उसके विकास की गति को रेखांकित किया जाता है तो आत्मकथा की सृष्टि होती है।” 15.कमलेश्वर- “आत्मकथा सबसे सघन, पहला और अकृत्रिम अनुभव की सच्ची दास्तान है।” 16. रामदरश मिश्र – “आत्मकथा का अर्थ ही है – अपने को खोलना। और खोलने का अर्थ है- लेखक अपनी शक्ति और अशक्ति, अपनी हार और जीत सभी कुछ सहज भाव से पाठक के सामने रख दे।” 17. महादेवी वर्मा- “ आत्मकथा अपने जीवन के सन्दर्भ में अन्तर्जगत तथा बहिर्जगत के घात-प्रतिघात, क्रिया-प्रतिक्रिया का पुनर्निरीक्षण है।” 18.विष्णु प्रभाकर –“ आत्मकथा तो उसे कहते हैं जिसमें आदमी आत्मा को बिल्कुल निरावरण कर देता है।” 19. इंदिरा गोस्वामी –“...आत्मकथा उस सबका समुच्चय होती है जो उसने अपने जीवन में सोचा हो, किया हो, भोगा हो। यह उसके आन्तरिक निजी विचारों की और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है। यह लेखक के जीवन में हुए घटनाओं, सम्पर्क में आए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों, विभिन्न स्थानों का यथार्थ-चित्रण होता है। इसमें कल्पना की कोई गुंजाईश नहीं रहती।” 20. रणवीर रांग्रा –“ आत्मकथा लेखन आत्मालोचन का ही दूसरा नाम है।” 21.पंकज चतुर्वेदी –“आत्मकथा की एक स्वाभाविक आधारभूत परिभाषा यही हो सकती है कि उसमें व्यक्ति समूचे समय और समाज के सन्दर्भ में रखकर अपने शब्द और कर्म, अपनी वैचारिकता और व्यक्तित्व की गहन और पारदर्शी पड़ताल करने की रचनात्मक कोशिश करता है। गहनता ‘आत्म’ के आद्यन्त विश्लेषण के लिए जरूरी है, तो पारदर्शिता औरों की आत्मीयता अर्जित करने के लिए क्योंकि आत्मकथा‘दूसरों’ के साथ ‘अपने’ जीवन-प्रसंगों का साझा है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कुछ मुख्य तथ्य उभरकर आते हैं, वे इस प्रकार हैं- 1. आत्मकथा का विषय आत्मकथाकार का जीवन होता है । 2. आत्मकथा में लेखक आत्मविश्लेषण, आत्मान्वेषण और आत्मालोचन करता है। 3. आत्मकथा में लेखक अपने जीवन को निड़र होकर उधेड़ता, खोलता है। 4. आत्मकथा में आत्मकथाकार के निजी अनुभवों के साथ-साथ बाह्य वातावरण का भी चित्रण होता है। 5. आत्मकथा में यश-अपयश दोनों के लिए समान जगह होती है। 6. आत्मकथा में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है। 7. आत्मकथा एक अपूर्ण कहानी है। 8. अपने अनुभवों के साथ आत्मकथाकार दूसरों के अनुभवों को हमसे साझा करता है। 9. आत्मकथा आत्मकथाकार से पूरे ईमानदारी की माँग करती है। 10. आत्मकथा गहनता और पारदर्शिता की माँग करती है। 11. तटस्थता आत्मकथा की महत्वपूर्ण शर्त है। इन सब परिभाषाओं के आधार पर आत्मकथा की एक परिभाषा यह दी जा सकती है- आत्मकथा उसे कहते हैं जिसमें लेखक अपने जीवन के अनुभवों को पूरे ईमानदारी के साथ, कुछ भी न छिपाते हुए प्रस्तुत करता है। जिसमें वह आत्मान्वेषन,आत्मालोचन और आत्मविश्लेषण करता है। आत्मप्रशंसा से बचता है। आत्मकथाकार अपनी गहन और पारदर्शी पड़ताल करता है। लेखक के अनुभवों के साथ उसका समय और समाज भी आत्मकथा में उपस्थित होता है। 1.2 आत्मकथा का स्वरूप आत्मकथा की परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यक्ति के जीवन की चुनी हुई स्मृतियों का दर्शन हमें उसकी आत्मकथा में होता है। इसके साथ उसके विचारों से भी अवगत होते हैं। आत्मकथा में अनायास ही तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि परिस्थितियों का चित्रण होता है। खासकर पुरूषों की आत्मकथाओं में इन स्थितियों का वर्णन व्यापक रूप से दिखाई देता है। स्त्रियों ने भी अपने समय की स्थितियों पर विचार व्यक्त किया, परन्तु उनकी एक सीमा है। आत्मकथाकार आत्मकथा में तटस्थ होकर अपने जीवनानुभवों को पाठकों के सामने रखने की कोशिश करता है। तटस्थता आत्मकथा की एक महत्वपूर्ण शर्त है। आत्मकथा लेखक जीवन के एक बिन्दू पर खड़ा होकर अपने गुजरे हुए वक्त को देखता है। जहाँ तक उसकी नज़र जाती है, उसमें से चुनी हुई स्मृतियों को वह हमारे सामने रखने का प्रयत्न करता है। कई बार स्मृतियाँ धूंधली हो जाती हैं। ऐसे समय में स्मृतियों की सत्यता पर संदेह होने लगता है। आत्मकथाकार अपने जीवन को आत्मकथा में क्रमबद्ध बताए तो उसमें एक गत्यात्मकता होगी। कुछ आत्मकथाकार जैसे-जैसे प्रसंग स्मरण होते हैं, उनके अनुसार आत्मकथा लिखते हैं। इससे पाठक को आत्मकथा समझने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। पंकज चतुर्वेदी आत्मकथा में ‘लोकोन्मुख बहसधर्मिता’ पाते हैं, जिससे लेखक आभिजात्य संस्कारों के विरूद्ध जाकर अपनी संपूर्णता में आत्मकथा में उपस्थित होने का प्रयत्न करता है। उनके अनुसार, “आत्मकथा की सरंचना में एक लोकोन्मुख बहसधर्मिता निहीत है। वह अपने मिज़ाज से ही आभिजात्य के विरूद्ध है, क्योंकि उसमें अपने अंतरंग का निश्‍चल उद्‌घाटन होता है। न वह किसी से पर्दा करती है, न किसी को अछूत मानती है। आत्मकथा में हम अपने सब-कुछ को सार्वजनिक कर देने के साहस और फिर इस सार्वजनिकता में से अपने को दुबारा पा लेने के अचरज के बीच लगातार आवाजाही करते हैं। इस तरह आत्मकथा एक बाह्यान्तर जनतन्त्र की बुनियाद पर खड़ी होती है।” इस कथन में आत्मकथा का जनतांत्रिक चरित्र नज़र आता है। जिसमें आत्मकथाकार अपने किसी भी पक्ष को छिपाता नहीं है। इसी कारण यह विधा अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक ईमानदारी की माँग आत्मकथाकार से करती है। आत्मकथा का स्वरूप आत्मकथा की सहधर्मी विधाओं के सात तुलना द्वारा अधिक स्पष्ट रुप से समझा जा सकता है। 1.3 आत्मकथा तथा अन्य सहधर्मी विधाएँ 1.3.1 आत्मकथा तथा जीवनी आत्मकथा की परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा, आत्मकथा लेखक के जीवन की कहानी होती है। वह खुद अपनी जीवनी लिखता है। आत्मकथाकार का पूरा जीवन आत्मकथा में आ नहीं पाता है। लेकिन जीवनीकार जीवनी में किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की जीवन कहानी को जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखांकित करता है। इन दो विधाओं के भेद के बारे में डॉ. कमलेश सिंह ने लिखा है, “आत्मकथा तथा जीवनी दोनों की ही आधारभूमि व्यक्ति और उसका व्यक्तित्व है। अंतर इतना है कि स्वानुभवों का निरूपण जब स्वयं के द्वारा होता है तो वह आत्मकथा कहलाता है और जहाँ अन्य के जीवन का निरूपण हो तो वह जीवनी आकार लेती है। इस आधारभूत अंतर से ही कई अन्य अन्तर उत्पन्न होते हैं।” इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि आत्मकथा में स्वानुभव होते है, आत्मकथाकार को तथ्यों को इकठ्ठा करने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। वह अपनी आत्मकथा लेखन के लिए पत्रों और डायरी का सहारा ले सकता है। लेकिन इसके विपरीत जीवनीकार किसी विशिष्ट व्यक्ति की जीवनी लिखता है, इसलिए उसे उस व्यक्ति के जीवन के बारे में जानने के लिए उस व्यक्ति से जुड़ी हर बात की जानकारी इकट्ठा करनी पड़ती है। तभी उससे उस विशिष्ट व्यक्ति का सही चित्रण हो पाएगा। आत्मकथा में लेखक अपना जीवन खुद देखता है। वह स्वलक्षी होता है। इस कारण आत्मकथा आत्मनिष्ठ होती है। जबकि जीवनीकार उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उस विशिष्ट व्यक्ति की जीवनी लिखता है। जीवनीकार परलक्षी होता है। इसलिए आत्मकथा वस्तुनिष्ट होती है। जीवनी की अपेक्षा आत्मकथाओं को ज्यादा पढ़ा जाता है। इसका कारण यह है कि आत्मकथा में लेखक स्वंय अपने अनुभवों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है, जबकि जीवनी में जीवनीकार किसी विशिष्ट का प्राप्त सामग्री के आधार पर जीवन प्रस्तुत करता है। डी.जी. नायक के अनुसार, “...आत्मकथा जीवनी की तुलना में सदैव एक विश्वसनीय और प्रभावोत्पादक रचना बनी रहती है, क्योंकि उसके पास ‘फर्स्ट हैंड़ इन्फार्मेशन’ होती है।” इसी ‘फर्स्ट हैंड़ इन्फार्मेशन’ के कारण आत्मकथाओं में पाठकों की ज्यादा रूची होती है। आत्मकथाकार आत्मकथा में अपनी जीवन कहानी लिखता है। वह उसमें अपने अंतर्द्वंद्वों को भी गहराई से अभिव्यक्त करता है। ऐसा करना जीवनीकार के लिए असंभव है। इस संदर्भ में डॉ. कमलेश सिंह लिखती हैं, “जीवनी-लेखक चरित्र नायक के अवचेतन की पहचान भी भली प्रकार नहीं कर सकता। आत्मकथाकार जितनी अपनी गहराई में उतर सकता है, जीवनी-लेखक नहीं। वास्तव में देखा जाये तो व्यक्ति जैसा जीवन भोगता है उसको ही यह अधिकार है कि वह अपनी अनुभूतियों को सत्य रूप में प्रस्तुत करें, क्योंकि भोक्ता व्यक्ति की स्मृतियाँ ही इसमें मुख्य भाग लेती है।” इस तरह हम देख सकते हैं कि यह दोनों भिन्न विधाएँ हैं, आत्मकथा आत्मनिष्ठ होती हैं, तो जीवनी वस्तुनिष्ठ। जिनमें शैली और शिल्प के स्तर भी भिन्नता दिखाई देती है। 1.3.2 आत्मकथा और डायरी ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में डायरी की परिभाषा इस प्रकार दी गई है,“जब कोई व्यक्ति तिथियों का उल्लेख करते हुए घटनाओं को उसी क्रम में लिपिबद्ध करता है, जिस क्रम से उसके जीवन में घटित हुई हैं या जिस क्रम से उसने उन्हें अपने जीवन-काल में देखा-सुना अथवा सोचा-समझा है तब ‘डायरी’ विधा जन्म लेती है। प्रचलित अर्थ में डायरी दैनिक व्यापारों का घटनाओं का ब्यौरा है।” इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा और डायरी में कुछ समानताएँ हैं, और इनमें अंतर भी है। इस अंतर को कमलेश सिंह इस तरह समझाती है। “आत्मकथा तथा डायरी में वही संबंध है, जो माला में उसके गुंथे हुए मनकों में होता है। आत्मकथा समग्र जीवन का विवरण है जबकि डायरी किसी विशेष दिन की अनुभूति का अंकन है।” इससे बात स्पष्ट होती है कि डायरी के एक-एक मनके को यानी एक-एक दिन के अनुभवों को जोड़कर आत्मकथा यानी माला बनती है। डायरी में मनुष्य अपने जिए हुए हर दिन का ब्यौरा लिखता है। डायरी आत्मकथा से भी ज्यादा निजी होती है। यह एक प्रकार का अपने आपसे एकांत में किया गया संवाद होता है। इसमें वह कहने और सुनने का काम स्वंय ही करता है। इस समय वह किसी भी प्रकार के संकोच और भय से परे होकर लिखता है। इसलिए डायरी मरणोपरान्त प्रकाशित होती है।‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में इन विधाओं के अंतर के बारें में लिखा है, “डायरी आत्मकथा का ही एक बदला हुआ रूप है। डायरी में सामान्यतः ताज़े अनुभवों को लिखा जाता है या संभव है कि कभी-कभी बीते हुए अनुभवों का पुनर्मूल्यांकन कर लिया जाए, जबकि दूसरी और, आत्मकथा में सारे अतीत पर अपेक्षाकृत कहीं अधिक परिपक्व और तटस्थदृष्टि डाल सकने की संभावना रहती है।” डायरी में जहाँ हर रोज़ के अनुभवों को लिखा जाता है, वहीं आत्मकथा में जीवन के एक खास समय में सोच-समझकर अपने अनुभवों को अभिव्यक्त किया जाता है। डायरी में लिखे गये अनुभवों में पूर्वापार संबंध नहीं होता है। आज किसी व्यक्ति के बारे कोई राय लेखक ने दी है, तो कल वह राय बदल भी सकता है। ये अनुभव एक दूसरे से कटे-कटे रहते हैं। इसमें कहानी जैसी निरंतरता न होने के कारण इसे पढ़ने में पाठक की रूची कम होती है। इसमें अनुभव खंड-खंड होते है। कभी-कभी तो डायरी में पूरा वाक्य भी नहीं होता है। पात्रों की संख्या भी बहुत होती है। उनका परिचय भी नहीं दिया जाता है। आत्मकथा में भी पात्रों की संख्या ज्यादा होती है, पर उसमें पात्रों का परिचय दिया जाता है। डायरी और आत्मकथा में ईमानदारी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। बिना ईमानदारी के इन दो विधाओं की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। यही तत्व इन दो विधाओं को जोड़ता है। डायरी लिखते समय भाषा और शिल्प की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। लेकिन आत्मकथा में डायरी की अपेक्षा भाषा और शिल्प पर ध्यान दिया जाता है। इन दो विधाओं के दो मुख्यविरोध के बारे कमलेश सिंह लिखती है, “ इन दोनों विधाओं के दो मुख्य विरोध ये है कि आत्मकथा-लेखक आयु के अंतिम छोर पर खड़ा रहकर अपने जीवन का पुनरावलोकन करता है। परंतु डायरी निरंतर चलनेवाली वस्तु है। यदि जीवन के प्रारंभ से ही व्यक्ति सतर्कता से डायरी लिखे तो क्रमिक रूप से तिथिवार उसमें से हमें बहुत कुछ बहुमूल्य प्राप्त हो सकता है और उस विशिष्ट समय की मानसिक स्थितियों का पूरा चित्र हमें प्राप्त हो जाता है। जिससे कृत्रिमता नहीं रहती और परिणामस्वरूप कई रोचक प्रसंग अपनी पूरी सत्यता के साथ सन्मुख आ जाते हैं। डायरी लेखक जिस ‘क्षण बिंदु’ पर खड़ा है, उस क्षण को वह तुरंत जी लेता है। इसीलिए उसके पास समय केवल वर्तमान रूप में ही होता है। डायरी लेखक का लेखन उसी के साथ-साथ आगे बढ़ता है। जबकि आत्मकथा की सृजन प्रक्रिया अतीत के परिवेश में से कुछ विशिष्ट बाहर लाने की क्रिया में आरंभ होती है।” डायरी में कृत्रिमता नहीं होती है। उसमें दैनंदिन जीवन के सत्य को व्यक्त किया जाता है। डायरी में व्यक्त सत्य के बारे में कठिनाई तब पैदा होती है जब डायरी आधी-अधूरी पढ़ी या लिखी जाती है। जिससे डायरी में लिखे गए अनुभवों का सही अर्थ लगाने में दिक्कत होती है। जिससे कई बार भ्रम भी पैदा होता है। आत्मकथा लेखन में डायरी से मदद ली जाती है। डायरी और आत्मकथा के संबंध को विश्व बंधु शास्त्री विद्यालंकार फिल्म के माध्यम से इस प्रकार समझाते हैं, “फिल्म की शुटिंग के समय प्रतिदिन के प्रसंग खण्ड खण्ड करके कैमरे के द्वारा फिल्म पर अंकित कर दिये जाते हैं और कालान्तर में संपादन व क्रम-नियोजन आदि के द्वारा उन्हें एक तारतम्य प्रदान कर रजत पट पर प्रोजेक्टर की सहायता से प्रदर्शित कर दिया जाता है। यदि कोई दर्शक पूरी फिल्म को खण्ड-खण्ड बनते हुए देखे, और फिर इसके संपादित और सेंसर हो चुके रूप के एक साथ देखे, तो निश्चित रूप से उसे प्रथम अनुभव डायरी के समान लगेगा, और दूसरा आत्मकथा के समान” इस प्रकार हम देखते हैं कि दोनों विधाओं में लेखक का जीवन आता है, पर उन दोनों में अंतर है। डायरी में जीवन खण्डित होकर आता है तो आत्मकथा में जीवन खण्डों को जोड़कर लिखा जाता है। इसमें एक प्रवाह होता है। दोनों में भी तथ्यों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। जहाँ यादें धूंधली पड़ जाती है वहाँ आत्मकथाकार डायरी की सहायता लेता है। 1.1.3 विद्वानों और साहित्यकारों की आत्मकथा विषयक परिभाषाएँ 10. अंग्रेजी साहित्य के समीक्षक श्री डब्लू .एच. डन ने अंग्रेजी ‘बायोग्राफी’ के विषय में विचार करते हुए उसे ‘कबंध’(हाथ, पाँव और सिर विहीन शरीर) की उपमा प्रदान की है। संभवतः वे इसके द्वारा यह कहना चाहते हैं कि वह एक अपूर्ण कहानी है। 11.श्री वियोगी हरि- “ आत्मकथा जीवन की कुछ घटनाओं और अनुभूतियों की एक अभिव्यंजना है।” 12. हरिवंश राय बच्चन-“आत्मकथा जीवन की एक तस्वीर है....आत्मकथा का अर्थ है आत्मचिंतन।” 13. अमृता प्रितम–“आत्मकथा यथार्थ से यथार्थ तक पहुँचने की प्रक्रिया है।” 14. डॉ. भगवानशरण भारद्वाज- “जब अपने जीवन के अनुभवों को सुसंबद्ध रूप में उपन्यस्त किया जाता है और उसके विकास की गति को रेखांकित किया जाता है तो आत्मकथा की सृष्टि होती है।” 15.कमलेश्वर- “आत्मकथा सबसे सघन, पहला और अकृत्रिम अनुभव की सच्ची दास्तान है।” 16. रामदरश मिश्र – “आत्मकथा का अर्थ ही है – अपने को खोलना। और खोलने का अर्थ है- लेखक अपनी शक्ति और अशक्ति, अपनी हार और जीत सभी कुछ सहज भाव से पाठक के सामने रख दे।” 17. महादेवी वर्मा- “ आत्मकथा अपने जीवन के सन्दर्भ में अन्तर्जगत तथा बहिर्जगत के घात-प्रतिघात, क्रिया-प्रतिक्रिया का पुनर्निरीक्षण है।” 18.विष्णु प्रभाकर –“ आत्मकथा तो उसे कहते हैं जिसमें आदमी आत्मा को बिल्कुल निरावरण कर देता है।” 19. इंदिरा गोस्वामी –“...आत्मकथा उस सबका समुच्चय होती है जो उसने अपने जीवन में सोचा हो, किया हो, भोगा हो। यह उसके आन्तरिक निजी विचारों की और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है। यह लेखक के जीवन में हुए घटनाओं, सम्पर्क में आए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों, विभिन्न स्थानों का यथार्थ-चित्रण होता है। इसमें कल्पना की कोई गुंजाईश नहीं रहती।” 20. रणवीर रांग्रा –“ आत्मकथा लेखन आत्मालोचन का ही दूसरा नाम है।” 21.पंकज चतुर्वेदी –“आत्मकथा की एक स्वाभाविक आधारभूत परिभाषा यही हो सकती है कि उसमें व्यक्ति समूचे समय और समाज के सन्दर्भ में रखकर अपने शब्द और कर्म, अपनी वैचारिकता और व्यक्तित्व की गहन और पारदर्शी पड़ताल करने की रचनात्मक कोशिश करता है। गहनता ‘आत्म’ के आद्यन्त विश्लेषण के लिए जरूरी है, तो पारदर्शिता औरों की आत्मीयता अर्जित करने के लिए क्योंकि आत्मकथा‘दूसरों’ के साथ ‘अपने’ जीवन-प्रसंगों का साझा है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कुछ मुख्य तथ्य उभरकर आते हैं, वे इस प्रकार हैं- 1. आत्मकथा का विषय आत्मकथाकार का जीवन होता है । 2. आत्मकथा में लेखक आत्मविश्लेषण, आत्मान्वेषण और आत्मालोचन करता है। 3. आत्मकथा में लेखक अपने जीवन को निड़र होकर उधेड़ता, खोलता है। 4. आत्मकथा में आत्मकथाकार के निजी अनुभवों के साथ-साथ बाह्य वातावरण का भी चित्रण होता है। 5. आत्मकथा में यश-अपयश दोनों के लिए समान जगह होती है। 6. आत्मकथा में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है। 7. आत्मकथा एक अपूर्ण कहानी है। 8. अपने अनुभवों के साथ आत्मकथाकार दूसरों के अनुभवों को हमसे साझा करता है। 9. आत्मकथा आत्मकथाकार से पूरे ईमानदारी की माँग करती है। 10. आत्मकथा गहनता और पारदर्शिता की माँग करती है। 11. तटस्थता आत्मकथा की महत्वपूर्ण शर्त है। इन सब परिभाषाओं के आधार पर आत्मकथा की एक परिभाषा यह दी जा सकती है- आत्मकथा उसे कहते हैं जिसमें लेखक अपने जीवन के अनुभवों को पूरे ईमानदारी के साथ, कुछ भी न छिपाते हुए प्रस्तुत करता है। जिसमें वह आत्मान्वेषन,आत्मालोचन और आत्मविश्लेषण करता है। आत्मप्रशंसा से बचता है। आत्मकथाकार अपनी गहन और पारदर्शी पड़ताल करता है। लेखक के अनुभवों के साथ उसका समय और समाज भी आत्मकथा में उपस्थित होता है। 1.2 आत्मकथा का स्वरूप आत्मकथा की परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यक्ति के जीवन की चुनी हुई स्मृतियों का दर्शन हमें उसकी आत्मकथा में होता है। इसके साथ उसके विचारों से भी अवगत होते हैं। आत्मकथा में अनायास ही तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि परिस्थितियों का चित्रण होता है। खासकर पुरूषों की आत्मकथाओं में इन स्थितियों का वर्णन व्यापक रूप से दिखाई देता है। स्त्रियों ने भी अपने समय की स्थितियों पर विचार व्यक्त किया, परन्तु उनकी एक सीमा है। आत्मकथाकार आत्मकथा में तटस्थ होकर अपने जीवनानुभवों को पाठकों के सामने रखने की कोशिश करता है। तटस्थता आत्मकथा की एक महत्वपूर्ण शर्त है। आत्मकथा लेखक जीवन के एक बिन्दू पर खड़ा होकर अपने गुजरे हुए वक्त को देखता है। जहाँ तक उसकी नज़र जाती है, उसमें से चुनी हुई स्मृतियों को वह हमारे सामने रखने का प्रयत्न करता है। कई बार स्मृतियाँ धूंधली हो जाती हैं। ऐसे समय में स्मृतियों की सत्यता पर संदेह होने लगता है। आत्मकथाकार अपने जीवन को आत्मकथा में क्रमबद्ध बताए तो उसमें एक गत्यात्मकता होगी। कुछ आत्मकथाकार जैसे-जैसे प्रसंग स्मरण होते हैं, उनके अनुसार आत्मकथा लिखते हैं। इससे पाठक को आत्मकथा समझने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। पंकज चतुर्वेदी आत्मकथा में ‘लोकोन्मुख बहसधर्मिता’ पाते हैं, जिससे लेखक आभिजात्य संस्कारों के विरूद्ध जाकर अपनी संपूर्णता में आत्मकथा में उपस्थित होने का प्रयत्न करता है। उनके अनुसार, “आत्मकथा की सरंचना में एक लोकोन्मुख बहसधर्मिता निहीत है। वह अपने मिज़ाज से ही आभिजात्य के विरूद्ध है, क्योंकि उसमें अपने अंतरंग का निश्‍चल उद्‌घाटन होता है। न वह किसी से पर्दा करती है, न किसी को अछूत मानती है। आत्मकथा में हम अपने सब-कुछ को सार्वजनिक कर देने के साहस और फिर इस सार्वजनिकता में से अपने को दुबारा पा लेने के अचरज के बीच लगातार आवाजाही करते हैं। इस तरह आत्मकथा एक बाह्यान्तर जनतन्त्र की बुनियाद पर खड़ी होती है।” इस कथन में आत्मकथा का जनतांत्रिक चरित्र नज़र आता है। जिसमें आत्मकथाकार अपने किसी भी पक्ष को छिपाता नहीं है। इसी कारण यह विधा अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक ईमानदारी की माँग आत्मकथाकार से करती है। आत्मकथा का स्वरूप आत्मकथा की सहधर्मी विधाओं के सात तुलना द्वारा अधिक स्पष्ट रुप से समझा जा सकता है। 1.3 आत्मकथा तथा अन्य सहधर्मी विधाएँ 1.3.1 आत्मकथा तथा जीवनी आत्मकथा की परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा, आत्मकथा लेखक के जीवन की कहानी होती है। वह खुद अपनी जीवनी लिखता है। आत्मकथाकार का पूरा जीवन आत्मकथा में आ नहीं पाता है। लेकिन जीवनीकार जीवनी में किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की जीवन कहानी को जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखांकित करता है। इन दो विधाओं के भेद के बारे में डॉ. कमलेश सिंह ने लिखा है, “आत्मकथा तथा जीवनी दोनों की ही आधारभूमि व्यक्ति और उसका व्यक्तित्व है। अंतर इतना है कि स्वानुभवों का निरूपण जब स्वयं के द्वारा होता है तो वह आत्मकथा कहलाता है और जहाँ अन्य के जीवन का निरूपण हो तो वह जीवनी आकार लेती है। इस आधारभूत अंतर से ही कई अन्य अन्तर उत्पन्न होते हैं।” इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि आत्मकथा में स्वानुभव होते है, आत्मकथाकार को तथ्यों को इकठ्ठा करने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती है। वह अपनी आत्मकथा लेखन के लिए पत्रों और डायरी का सहारा ले सकता है। लेकिन इसके विपरीत जीवनीकार किसी विशिष्ट व्यक्ति की जीवनी लिखता है, इसलिए उसे उस व्यक्ति के जीवन के बारे में जानने के लिए उस व्यक्ति से जुड़ी हर बात की जानकारी इकट्ठा करनी पड़ती है। तभी उससे उस विशिष्ट व्यक्ति का सही चित्रण हो पाएगा। आत्मकथा में लेखक अपना जीवन खुद देखता है। वह स्वलक्षी होता है। इस कारण आत्मकथा आत्मनिष्ठ होती है। जबकि जीवनीकार उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उस विशिष्ट व्यक्ति की जीवनी लिखता है। जीवनीकार परलक्षी होता है। इसलिए आत्मकथा वस्तुनिष्ट होती है। जीवनी की अपेक्षा आत्मकथाओं को ज्यादा पढ़ा जाता है। इसका कारण यह है कि आत्मकथा में लेखक स्वंय अपने अनुभवों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है, जबकि जीवनी में जीवनीकार किसी विशिष्ट का प्राप्त सामग्री के आधार पर जीवन प्रस्तुत करता है। डी.जी. नायक के अनुसार, “...आत्मकथा जीवनी की तुलना में सदैव एक विश्वसनीय और प्रभावोत्पादक रचना बनी रहती है, क्योंकि उसके पास ‘फर्स्ट हैंड़ इन्फार्मेशन’ होती है।” इसी ‘फर्स्ट हैंड़ इन्फार्मेशन’ के कारण आत्मकथाओं में पाठकों की ज्यादा रूची होती है। आत्मकथाकार आत्मकथा में अपनी जीवन कहानी लिखता है। वह उसमें अपने अंतर्द्वंद्वों को भी गहराई से अभिव्यक्त करता है। ऐसा करना जीवनीकार के लिए असंभव है। इस संदर्भ में डॉ. कमलेश सिंह लिखती हैं, “जीवनी-लेखक चरित्र नायक के अवचेतन की पहचान भी भली प्रकार नहीं कर सकता। आत्मकथाकार जितनी अपनी गहराई में उतर सकता है, जीवनी-लेखक नहीं। वास्तव में देखा जाये तो व्यक्ति जैसा जीवन भोगता है उसको ही यह अधिकार है कि वह अपनी अनुभूतियों को सत्य रूप में प्रस्तुत करें, क्योंकि भोक्ता व्यक्ति की स्मृतियाँ ही इसमें मुख्य भाग लेती है।” इस तरह हम देख सकते हैं कि यह दोनों भिन्न विधाएँ हैं, आत्मकथा आत्मनिष्ठ होती हैं, तो जीवनी वस्तुनिष्ठ। जिनमें शैली और शिल्प के स्तर भी भिन्नता दिखाई देती है। 1.3.2 आत्मकथा और डायरी ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में डायरी की परिभाषा इस प्रकार दी गई है,“जब कोई व्यक्ति तिथियों का उल्लेख करते हुए घटनाओं को उसी क्रम में लिपिबद्ध करता है, जिस क्रम से उसके जीवन में घटित हुई हैं या जिस क्रम से उसने उन्हें अपने जीवन-काल में देखा-सुना अथवा सोचा-समझा है तब ‘डायरी’ विधा जन्म लेती है। प्रचलित अर्थ में डायरी दैनिक व्यापारों का घटनाओं का ब्यौरा है।” इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा और डायरी में कुछ समानताएँ हैं, और इनमें अंतर भी है। इस अंतर को कमलेश सिंह इस तरह समझाती है। “आत्मकथा तथा डायरी में वही संबंध है, जो माला में उसके गुंथे हुए मनकों में होता है। आत्मकथा समग्र जीवन का विवरण है जबकि डायरी किसी विशेष दिन की अनुभूति का अंकन है।” इससे बात स्पष्ट होती है कि डायरी के एक-एक मनके को यानी एक-एक दिन के अनुभवों को जोड़कर आत्मकथा यानी माला बनती है। डायरी में मनुष्य अपने जिए हुए हर दिन का ब्यौरा लिखता है। डायरी आत्मकथा से भी ज्यादा निजी होती है। यह एक प्रकार का अपने आपसे एकांत में किया गया संवाद होता है। इसमें वह कहने और सुनने का काम स्वंय ही करता है। इस समय वह किसी भी प्रकार के संकोच और भय से परे होकर लिखता है। इसलिए डायरी मरणोपरान्त प्रकाशित होती है।‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में इन विधाओं के अंतर के बारें में लिखा है, “डायरी आत्मकथा का ही एक बदला हुआ रूप है। डायरी में सामान्यतः ताज़े अनुभवों को लिखा जाता है या संभव है कि कभी-कभी बीते हुए अनुभवों का पुनर्मूल्यांकन कर लिया जाए, जबकि दूसरी और, आत्मकथा में सारे अतीत पर अपेक्षाकृत कहीं अधिक परिपक्व और तटस्थदृष्टि डाल सकने की संभावना रहती है।” डायरी में जहाँ हर रोज़ के अनुभवों को लिखा जाता है, वहीं आत्मकथा में जीवन के एक खास समय में सोच-समझकर अपने अनुभवों को अभिव्यक्त किया जाता है। डायरी में लिखे गये अनुभवों में पूर्वापार संबंध नहीं होता है। आज किसी व्यक्ति के बारे कोई राय लेखक ने दी है, तो कल वह राय बदल भी सकता है। ये अनुभव एक दूसरे से कटे-कटे रहते हैं। इसमें कहानी जैसी निरंतरता न होने के कारण इसे पढ़ने में पाठक की रूची कम होती है। इसमें अनुभव खंड-खंड होते है। कभी-कभी तो डायरी में पूरा वाक्य भी नहीं होता है। पात्रों की संख्या भी बहुत होती है। उनका परिचय भी नहीं दिया जाता है। आत्मकथा में भी पात्रों की संख्या ज्यादा होती है, पर उसमें पात्रों का परिचय दिया जाता है। डायरी और आत्मकथा में ईमानदारी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। बिना ईमानदारी के इन दो विधाओं की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। यही तत्व इन दो विधाओं को जोड़ता है। डायरी लिखते समय भाषा और शिल्प की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। लेकिन आत्मकथा में डायरी की अपेक्षा भाषा और शिल्प पर ध्यान दिया जाता है। इन दो विधाओं के दो मुख्यविरोध के बारे कमलेश सिंह लिखती है, “ इन दोनों विधाओं के दो मुख्य विरोध ये है कि आत्मकथा-लेखक आयु के अंतिम छोर पर खड़ा रहकर अपने जीवन का पुनरावलोकन करता है। परंतु डायरी निरंतर चलनेवाली वस्तु है। यदि जीवन के प्रारंभ से ही व्यक्ति सतर्कता से डायरी लिखे तो क्रमिक रूप से तिथिवार उसमें से हमें बहुत कुछ बहुमूल्य प्राप्त हो सकता है और उस विशिष्ट समय की मानसिक स्थितियों का पूरा चित्र हमें प्राप्त हो जाता है। जिससे कृत्रिमता नहीं रहती और परिणामस्वरूप कई रोचक प्रसंग अपनी पूरी सत्यता के साथ सन्मुख आ जाते हैं। डायरी लेखक जिस ‘क्षण बिंदु’ पर खड़ा है, उस क्षण को वह तुरंत जी लेता है। इसीलिए उसके पास समय केवल वर्तमान रूप में ही होता है। डायरी लेखक का लेखन उसी के साथ-साथ आगे बढ़ता है। जबकि आत्मकथा की सृजन प्रक्रिया अतीत के परिवेश में से कुछ विशिष्ट बाहर लाने की क्रिया में आरंभ होती है।” डायरी में कृत्रिमता नहीं होती है। उसमें दैनंदिन जीवन के सत्य को व्यक्त किया जाता है। डायरी में व्यक्त सत्य के बारे में कठिनाई तब पैदा होती है जब डायरी आधी-अधूरी पढ़ी या लिखी जाती है। जिससे डायरी में लिखे गए अनुभवों का सही अर्थ लगाने में दिक्कत होती है। जिससे कई बार भ्रम भी पैदा होता है। आत्मकथा लेखन में डायरी से मदद ली जाती है। डायरी और आत्मकथा के संबंध को विश्व बंधु शास्त्री विद्यालंकार फिल्म के माध्यम से इस प्रकार समझाते हैं, “फिल्म की शुटिंग के समय प्रतिदिन के प्रसंग खण्ड खण्ड करके कैमरे के द्वारा फिल्म पर अंकित कर दिये जाते हैं और कालान्तर में संपादन व क्रम-नियोजन आदि के द्वारा उन्हें एक तारतम्य प्रदान कर रजत पट पर प्रोजेक्टर की सहायता से प्रदर्शित कर दिया जाता है। यदि कोई दर्शक पूरी फिल्म को खण्ड-खण्ड बनते हुए देखे, और फिर इसके संपादित और सेंसर हो चुके रूप के एक साथ देखे, तो निश्चित रूप से उसे प्रथम अनुभव डायरी के समान लगेगा, और दूसरा आत्मकथा के समान” इस प्रकार हम देखते हैं कि दोनों विधाओं में लेखक का जीवन आता है, पर उन दोनों में अंतर है। डायरी में जीवन खण्डित होकर आता है तो आत्मकथा में जीवन खण्डों को जोड़कर लिखा जाता है। इसमें एक प्रवाह होता है। दोनों में भी तथ्यों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। जहाँ यादें धूंधली पड़ जाती है वहाँ आत्मकथाकार डायरी की सहायता लेता है। 1.3.3 आत्मकथा और संस्मरण ‘हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’ में संस्मरण की परिभाषा इस प्रकार दी गई है, “संस्मरण का मूल अर्थ है, ‘सम्यक् स्मृति, एक ऐसी स्मृति जो वर्तमान को अधिक सार्थक, समृद्ध और संवेदनशील बनाती है।....संबंधों की आत्मीयता एवं स्मृति की परस्परता ही संस्मरण की रचना-प्रक्रिया का मूल आधार है।’” इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि आत्मकथा की तरह ही संस्मरण का संबंध स्मृति और स्वानुभूतियों से हैं। यह साम्य होने पर भी इनमें पर्याप्त अंतर है। इस अंतर को कमलेश सिंह इस प्रकार स्पष्ट करती हैं, “ आत्मकथा की भाँति ही संस्मरण लेखक भी अतीत की स्मृतियों और स्वानुभूतियों का संबल लेकर चलता है। परंतु दोनों का दृष्टिकोण भिन्न है। आत्मकथाकार अपने जीवन की कथा का उल्लेख करना ही अपना उद्देश्य समझता है। परिस्थितियाँ और घटनाएँ केवल उतना ही कार्य करती हैं, जितना वें उसकी जीवन-कथा को प्रभावित करने के लिए आवश्यक विवरण नहीं देता, बल्कि स्वानुभूति का रस डालकर उस विवरण को विस्तृत कथात्मक रूप प्रदान करता है। आत्मकथाकार का दृष्टिकोण विषयीगत अधिक होता है और विषयगत कम। इसके विपरीत संस्मरण लेखक विषयगत चित्र ही अधिक देता है। उसमें निजत्व का अभाव ही उसे अधिक विषयगत बना देता है।” इस कथन बात आत्मकथा और संस्मरण का अंतर स्पष्ट होता है कि आत्मकथा में आत्मकथाकार का जीवन महत्वपूर्ण होता है, परिस्थितियाँ और घटनाएँ एक सहायक के रूप में काम करती है। संस्मरण में विषयगत चित्र अधिक होने के कारण निजत्व का अभाव दिखाई देता है। संस्मरण लेखक के अतीत के प्रेम के कारण वह अपनी स्मृतियों में कल्पना के सहारे रंग भरकर हमारे सामने प्रस्तुत करता है। 1.3.4 आत्मकथा और रेखाचित्र रेखाचित्र चित्रकला का शब्द है। जिसे अंग्रेजी में स्केच(sketch) कहा जाता है। डॉ. हरिमोहन के अनुसार “रेखाचित्र कथेतर गद्य की जीवनी परक वर्णनात्मक विधा है, जिसमें निकट संपर्क के किसी एक व्यक्ति, प्राणी अथवा वस्तु का प्रभावपूर्ण, वस्तुपरक और संवेदना जगाने वाला चित्रण किया जाता है। इसमें वस्तुतः चाक्षुक और अपेक्षाकृत स्थिर बिम्ब होते हैं, जो जीवन का एकांगी चित्र पस्तुत करते हैं।” चित्रकला में जहाँ रेखाओं द्वारा चित्र को अंकित किया जाता है, वहीं साहित्य में शब्दों द्वारा चित्र बनाया जाता है। इसे हिन्दी में रेखाचित्र कहा जाता है। हमारा जीवन में अनेक लोगों और प्राणियों से रोज़ संपर्क होता है। जिसमें कुछ लोग हमारे भीतर घर कर बैठते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का चित्रण हम अपनी कल्पना शक्ति के सहारे करने लगते हैं, तो धीरे-धीरे रेखाचित्र आकार लेने लगता है। इसमें मनुष्य के साथ-साथ पशु, पक्षी का भी समावेश होता है। रेखाचित्रकार अपने शब्दों द्वारा किसी व्यक्ति या प्राणी का ऐसा चित्र हमारे सामने उकेरता है कि वह व्यक्ति रेखाचित्र पढ़ते हमारे सामने से समय सजीव हो उठता है। रेखाचित्रकार के लिए किसी विधि का बंधन नहीं है। वह अपने रेखाचित्र को साकार करने के लिए किसी भी विधि को अपना सकता है। इस विषय में कमलेश सिंह ने लिखा है ”रेखाचित्रकार व्यक्तित्व की रेखाओं को उभार देने के लिए कोई भी विधि अपना लेता है। कहीं वह व्यंग्यात्मक हो जाता है और मनमाने मोड़ ले लेता है। ऐसा करने का मुख्य कारण कला का आकर्षण ही होता है। इसीलिए एक रसात्मक वातावरण तैयार हो जाता है। रेखाचित्रकार की दृष्टि में कोई भी कृति किसी के लिए कष्टकर या चुटीले प्रहारों की वस्तु नहीं होनी चाहिए।” इतनी छूट आत्मकथाकार को नहीं मिलती है। आत्मकथाकार रसात्मकता की बजाय तथ्यात्मकता पर अधिक ध्यान देता है। रेखाचित्र के लेखक में भावुकता अधिक होती है। इस कारण उसके रेखाचित्र में भावुकता अधिक होती है। इसके विपरीत आत्मकथाकार तटस्थ होता है। अगर ऐसा नहीं करता है तो आत्मकथा की विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी। रेखाचित्र में कल्पना के लिए स्थान होता है, आत्मकथा में बिल्कुल भी नहीं । रेखाचित्र में भाव, बुद्धि और कल्पना का मिश्रण होता है। आत्मकथाकार को कल्पना विहीन चित्रण प्रस्तुत करना पड़ता है। उसके पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है, अगर वह ऐसा नहीं करता है तो वह कृती आत्मकथा नहीं कहलायेगी। रेखाचित्र और आत्मकथा में भाषा के स्तर पर भी भिन्नता दिखाई देती है। रेखाचित्र को कम-से-कम शब्दों में किसी वस्तु, व्यक्ति या भाव का अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्र अंकन करना पड़ता है। रेखाचित्र में शब्दों द्वारा ही रेखाएँ खिंची जाती है, इसलिए लाक्षणिक और व्यंजनात्मक भाषा का प्रयोग रेखाचित्रकार करता है। लेकिन यह छूट आत्मकथाकार को नहीं होती है, वह इतिहास की तरह विवरणात्मक शैली और व्याख्या प्रधान शैली का ही प्रयोग आत्मकथा लेखन में करता है। रेखाचित्रकार के पास आत्मकथाकार की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता नहीं होती है। रेखाचित्र और आत्मकथा के संबंध को इस प्रकार समझा जा सकता है, “….जब रेखाचित्र व्यक्तियों के जीवन पर लिखे जाते हैं, तब वे जीवनी के निकट पहुँचते हैं और जब कोई व्यक्ति स्वानुभवों को अंकित करता है, तब वह आत्मकथा के आयाम को छूता प्रतीत होता है। किन्तु अपनी संक्षिप्तता तथा मार्मिकता के कारण रेखाचित्र संस्मरण, जीवनी तथा आत्मकथा से अपना भिन्न अस्तित्व बनाये रखता है।” 1.3.5 आत्मकथा, उपन्यास, आत्मकथात्मक उपन्यास एवं कहानी आत्मकथा और उपन्यास दोनों ही विधाओं में व्यक्ति के जीवन का बड़ा हिस्सा चित्रित होता है। इस तरह दोनों में एक बड़ी कथा होती है। इस बड़ी कथा में मानव जीवन के संघर्ष, नाट्य, काव्य, हास्य, भाव, मन को छूने वाले प्रसंग आदि का चित्रण दोनों में मिलता है। दोनों में पात्रों की संख्या अधिक होती है। इन सबके द्वारा जीवन की कहानी लिखी जाती है। आत्मचरित्र में लेखक अपने ही बारे में बताता है इसलिए अनायास ‘मैं’ शैली का प्रयोग होता है। उपन्यास में बहुत सारी शैलियों का प्रयोग होता है। इसमें ‘मै’ शैली का प्रयोग करके भी आत्मकथात्मक उपन्यास लिखे गये हैं। इस तरह के उपन्यास को पढ़ते समय आत्मकथा पढ़ने का भास होता है। आत्मकथा का संबंध वास्तविक जीवन से होता है। इसमें वर्णित घटनाएँ आती हैं, अतीत में घटी हुई होती है। इसलिए उपन्यास में चित्रित पात्र या घटनाओं से अधिक मार्गदर्शक आत्मकथा पाठक को लगती है। उपन्यास में कल्पना और यथार्थ का मिश्रण होता है, इसलिए वह आत्मकथा इतना विश्वसनीय नहीं बन पाता है। आत्मकथा लिखने का हेतु स्वयं के जीवन का यथार्थ चित्रण करना होता है। आत्मकथाकार के जीवन में जितनी घटनाएँ घटती हैं या जितने लोग जीवन में आते हैं, उनका ही चित्रण आत्मकथा में होता है। लेकिन उपन्यासकार को इसमें पूरी छूट मिलती है। वह अपने अनुभव और कल्पना के सहारे पात्रों का सृजन भी करता है। वह दूसरों के अनुभवों को भी अपने उपन्यास के द्वारा व्यक्त कर सकता है। उपन्यासकार के पास बहुत सारे विषय होते हैं, ऐतिहासिक , धार्मिक ,पौराणिक आदि इनके आधार पर भी वह उपन्यास लिख सकता है। वह उपन्यास द्वारा मनोरंजन भी कर सकता है और समाज सुधार का कार्य भी। आत्मकथा में जीवन की वास्तविकताओं का चित्रण होता है। आत्मकथाकार मनोरंजन की जगह पाठक के सामने ईमानदारी के साथ तथ्यों को प्रस्तुत करने में लगा रहता है। ऐसे में आत्मकथा रोचक नहीं बन पाती है। इसलिए अपनी आत्मकथा को रोचक बनाने के लिए, या बाज़ार की माँग के अनुसार, या अपनी निजी बातों को बताते में डर लगने के कारण आत्मकथात्मक उपन्यास का लेखन किया जाने लगा है। इन सबके कारण आत्मकथात्मक उपन्यास का उद्भव हुआ है। इस तरह की रचना में यथार्थ और कल्पना के बीच रेखा खिंच पाना असंभव हो जाता है। इन दोनों के भेद पर इन्दिरा गोस्वामी का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है, वे कहती है, “वह केवल आंशिक सत्य है कि हर सर्जनात्मक रचना आत्मकथात्मक होती है। अपने उपन्यास में मैं उन लोगों या घटनाओं के बारे में लिख सकती हूँ जो मेरे अनुभव में आए हो, पर ये मेरी कल्पना के रंग में रंगकर और मेरे उस समय के मूड़ में ढलकर ही मेरे उपन्यास के पन्नों में आएँगें और अन्ततः वे जो रूप धारण करते हैं वह उन व्यक्तियों या घटनाओं का हू-बू-हू चित्रण नहीं होता। पर आत्मकथा उन सबका समुच्चय होती है जो उसने अपने जीवन में सोचा हो, किया हो, भोगा हो। यह उसके आंतरिक निजी विचारों की और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है। यह लेखक के जीवन में हुई घटनाओं, सम्पर्क में आए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों, विभिन्न स्थानों का यथार्थ चित्रण होता है। इसमें कल्पना की कोई गुंजाईश नहीं रहती।” उपन्यास का कथानक योजनाबद्ध होता है, आत्मकथा में ऐसी सुविधा नहीं होती है। आत्मकथा में जो संयोग सहज-स्वाभाविक, वास्तविक और विश्वसनीय लगते हैं, उपन्यास में वे खटकने लगते हैं, क्योंकि हमारे जीवन में घटनेवाली घटनाओं का कोई तर्क नहीं होता है। लेकिन उपन्यास के पात्रों के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं का तर्क होता है। आत्मकथा में जीवन प्राकृतिक होता है, उसमें कोई सुगठित कथा की आवश्यकता नहीं होती है। जबकि उपन्यास में जीवन सौद्देश्य और सचेत रुप से निर्मित होता है। उपन्यासकार को कथा चुनके का विकल्प होता है, लेकिन आत्मकथाकार को अपने जीवन में घटित घटनाओं के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है। जो अंतर आत्मकथा और उपन्यास के बीच है ,वही अंतर कहानी और आत्मकथा में दिखाई देता है। कहानी उपन्यास की तरह ही यथार्थ और कल्पना का मेल होती है। कहानी जीवन की किसी घटना को लेकर या किसी व्यक्ति को लेकर लिखी जाती है, आत्मकथा में आत्मकथाकार का लगभग पूरा जीवन आता है। दोनों की कलात्मक अभिव्यंजना में भी अंतर है। इस तरह हम कह सकते हैं कि आत्मकथा, उपन्यास , आत्मकथात्मक उपन्यास और कहानी में कुछ साम्य होते हुए भी ये विधाएँ एक दूसरे से भीन्न हैं। इन विधाओं अलावा कुछ अन्य सहधर्मी विधाएँ हैं जिसमें पत्र, यात्रावृत्र, रिपोर्ताज, शिकार कथा, एवं आत्मकथ्य आदि आते हैं। आत्मकथा की साहित्य के अन्य विधाओं के साथ तुलना करने से इन विधाओं के बीच की सुक्ष्म विभाजक रेखा को हम समझ पाए हैं। आत्मकथा साहित्य की अन्य विधाओं की तरह मनोरंजक न होते हुए भी इतिहास ग्रंथों से तो सरल होती ही है। इन विधाओं में कुछ साम्य होने पर भी सब विधाओं का अपना-अपना अलग अस्तित्व है। आत्मकथा का भी स्वरूप अन्य विधाओं से भिन्न है। 1.4. आत्मकथा लेखन के प्रयोजन सामान्यतः हर रचनाकार किसी-न-किसी प्रयोजन से रचना लिखता है। आत्मकथा लेखन के भी कुछ प्रयोजन होते है। आत्मकथा के लिखने का सबका अपना अलग-अलग प्रयोजन होता है। आत्मकथा लेखन के कुछ मुख्य प्रयोजन इस प्रकार हैं- 1.4.1.आत्मप्रशंसा कुछ लोगों को आत्मप्रशंसा करने की आदत होती है। इस कारण वह आत्मकथा का सहारा लेता है। अपने द्वारा किये गए कार्यों का कारण बताने के हेतु से आत्मकथा लिखी जाती है। अपने द्वारा किसी पर किए गये उपकारों की स्मृति के लिए भी आत्मकथा लिखी जाती है। इस प्रकार की आत्मकथाओं का उद्देश्य अपने चरित्र को महान बनाने में लगा रहता है। इस तरह की आत्मकथा साहित्य में विशेष स्थान नहीं रखती। इस तरह की आत्मकथाएँ बहुत जल्दी पहचानी जा सकती है। इन आत्मकथाओं के विषय में कमलेश सिंह ने लिखा है , “इस प्रकार की आत्मकथाएँ प्रायः जीवन मूल्यों को प्रस्थापित नहीं कर पातीं। दूसरे वे कला की दृष्टि से भी उच्च कोटी की नहीं बन पाती। आत्मकथा में आत्मश्लाघा अवांछनीय है। जहाँ तक वह आत्मप्रशंसा की प्रेरणा बने वहाँ तक उसकी आवश्यकता स्वीकार की जा सकती है, किन्तु वह प्रतिपाद्य बन जाये वहाँ वह विग्रहणीय है।” इस प्रकार की आत्मकथाओं का महत्व कम होने कारण इनके पाठकों की संख्या भी कम होती है। इस तरह की आत्मकथा पढ़ते समय पाठक आत्मकथाकार का उद्देश्य समझ जाता है। 1.4.2.आत्मस्वीकृति फ्रेंच लेखक रूसो ने अपनी आत्मकथा को confessionकहा है। कन्फेशन का मतलब होता है, अपने द्वारा किए गलत कामों को स्वीकारना। रूसो की आत्कमथा से उसकी आत्मकथा का उद्देश्य पता चलता है। हम अपने जीवन में बहुत सारे ऐसे काम करते हैं, जिसके लिए बाद में पश्चाताना पड़ता है। इस तरह के कामों के बारे में लोगों को बताने की हिम्मत जुटा नहीं पाते हैं। ऐसे समय में वह व्यक्ति आत्मकथा का सहारा लेता है। कभी-कभी इस तरह की आत्मकथाएँ मरणोपरांत प्रकाशित होती है। विश्‍व बन्धु शास्त्री, विद्यालंकार के अनुसार, “सर्वप्रथम लिखित बनारसीदास जैन की अर्ध्दकथा का प्रयोजन आत्म-प्रायश्‍चित और पश्‍चाताप है । वस्तुतः ऐसी कठिन आत्मभोगी स्थितियों के कारण ही वे आश्‍चर्यकारक रूप से उस काल में अपनी आत्मकथा लिख सके, जबकि सदियों आगे पीछे तक इस प्रवृत्ति के दर्शन दुर्लभ थे। वे लिखते हैं- भयो बनारसिदास तनु, कुष्ठ-रूप सरबंग। हाड़-हाड़ उपजी विद्या, केस रोम भुव-भंग।। विस्फोटक अगणित भए, हस्त चरन चौरंग। कोऊ नर साल ससुर भोजन करै न संग।।” मोरारजी देसाई, महात्मा गांधी और कमला दास आदि ने अपनी आत्मकथा में प्रायश्‍चित किया है। इस तरह जिस कृत्यों को समाज, परिवार से जीवन भर छिपाया था, उसे वे आत्मकथा द्वारा उजागर करने का साहस करते हैं। 1.4. 3. मृत्यु और अमरता की आकांक्षा मृत्यु का भय इन्सान को जीवन भर रहता है। वह जब किसी को मरते हुए देखता है, तो उसे भी अहसास होने लगता है कि उसे भी एक दिन मरना है। इसलिए कुछ ऐसे कार्य वह कर जाना चाहत है, जिससे मरणोपरांत उसे याद किया जाए। इसीलिए वह स्कूल, काँलेज या कोई लोकोपयोगी स्थान बनाते हैं और जो लोग इतना खर्च कर नहीं पाते वे कला के माध्यम से अपने जीवन को यादगार बनाते हैं। उनकी कला को देखकर उनको लोग याद करें। कुछ लोग अपने अनुभव रूपी ज्ञान भंडार को लोगों तक पहुँचाने के लिए आत्मकथा का निर्माण करते हैं। बाबू श्यामसुंदर दास अपने अनुभवों को लोगों तक पहुँचाने के लिए आत्मकथा लिखते हैं, उनके अनुसार, “मेरे जीवन से संबंध रखनेवाली मुख्य-मुख्य घटनाओं को जान लेना तो किसी के लिए भी कठिन न होगा। पर हिन्दी और विशेषकर काशी नागरी प्रचारिणी सभा से संबंध रखनेवाली अनेक घटनाओं का विवरण, जिनका उस समय प्रकाशित होना असंभव था, परन्तु जिनका ज्ञान बना रहतन परमावश्यक है, मेरे ही साथ लुप्त हो जायेगा और ज्यों-ज्यों समय बीतता जायोगा मैं भी उन्हें कुछ-कुछ भूलता जाऊँगा। इसलिए मेरी यह इच्छा है कि इस समय इन घटनाओं का वृत्तांत तथा अपना भी कुछ-कुछ लिख डालूँ, जिससे समय पड़ने पर मैं इन बातों से काम ले सकूँ और मेरे पीछे दूसरे लोग इन घटनाओं की वास्तविकता जानकर इस समय के ऐतिहासिक तथ्य का यथार्थ निर्णय कर सकें।” इस तरह लोग अपनी आत्मकथा लिखकर अपने जीवन भर का ज्ञान लोगों के उपयोग के लिए छोड़ जाते हैं। 1.4. 4.लोकोपकार के लिए मराठी में एक मुहावरा है, ‘पहल्याला ठेस, मागचा शहाना’ इसका अर्थ है, पहले को ठोकर लगने पर उसके पिछे चलने वाला सतर्क हो जाता है। हम दूसरों के अनुभवों को सुनकर भी बहुत सारी बातें सीखते हैं। इसी कारण कुछ लोग आत्मकथा लिखकर अपने अनुभवों को बाँटना चाहते हैं। जिसे पढ़कर पाठक लाभान्वित हो। इन्सान को अपने जीवन में बहुत सारे अच्छे-बुरे अनुभव आते हैं। वह चाहता है कि अपने अनुभवों से आने वाली पीढी लाभान्वित हो। इसलिए वह आत्मकथा लिखता है। हंसराज रहबर आत्मकथा लिखने का कारण बताते हैं, “ आत्मकथा लिखने का उद्देश्य यह था कि मैंने जो आजीवन संघर्ष किया है, उसका अनुभव पाठकों तक पहुँचाया जाये।” इससे स्पष्ट होता है कि हंसराज जी अपने संघर्षमय जीवन के द्वारा पाठकों को जीवन जीने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इसी तरह महात्मा गांधी भी अपनी आत्मकथा के बारे में लिखते हैं, “.....मुझे तो आत्मकथा के बहाने, मैंने सत्य के जो अनेक प्रयोग किये हैं, उनकी कथा लिखनी है। यह जरूर है कि उसमें मेरा जीवन ओत-प्रोत होने के कारण वह जीवन-वृत्तांत बन जाएगी। पर यदि उसके हर पन्ने में मेरे प्रयोग ही झलकें तो इस कथा को मैं स्वंय निर्दोष मानूंगा। मैं मानता हूँ कि मेरे सब प्रयोग इकट्ठे जनता को मिलना लाभदायक होगा।” यही विचार टालस्टाय के भी थे, वे अपने अन्य लेखन से अपनी आत्मकथा को ज्यादा महत्व देते हैं, क्योंकि वह लोकोपयोगी है। टालस्टाय के अनुसार, “यदि ईश्वर ने मुझे जिन्दगी और शक्ति दी तो मैं इन चारों कालों की बिलकुल सच्ची कहानी लिखूँगा। मैं समझता हूँ कि मेरे ग्रन्थों की बारह जिल्दों में जो कलापूर्ण बकवास भरी हुई है, और जिसे लोग आवश्यकता से अधिक महत्व देते हैं, उसकी अपेक्षा मेरी यह जीवनी अपनी कमियों के बावजूद लोगों के लिए ज्यादा लाभप्रद होगी।” इन महान लोगों के विचारों से ज्ञात होता है कि इनके आत्मकथा लेखन का हेतु लोगों को अपने अनुभवों से लाभान्वित करना था। इसी कारण विद्वानों, महान व्यक्तियों ने आत्मकथाएँ लिखीं। 1.4. 5. सहानुभूति प्राप्त करने के हेतु कुछ लोग जीवन में सहानुभूति प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपने दुखों का रोना रोते हुए पाये जाते हैं। अपने दुखों को ऐसे व्यक्ति अतिरंजित करके बताते हैं, जिससे घर-परिवार वाले, मित्र आदि लोग उनके प्रति सहानुभूति दिखाए। ऐसे लोग हमेशा अपने कृत्यों को सही ठहराने का प्रयत्न करते हैं। इस तरह के लोगों द्वारा लिखी गई आत्मकथाएँ आसूँओं का महासागर होती है। आदि से अंत तक एक रोना लगा रहता है कि वह कितना निष्पाप है और दुनिया ने उसके साथ कैसे अन्याय किया है। कभी-कभी लेखक अपने उपर लगाए गये आरोपों को खारीज़ करने के लिए भी आत्मकथा लिखता है। यहाँ भी वह एक प्रकार से समाज से सहानुभूति प्राप्त करना चाहता है। 1.4.6. अपने अहं की तुष्टि के लिए हर आत्मकथा में अहं भाव किसी न किसी रुप में दिखाई देता है। आत्मकथा की माँग अंह भाव को खो कर आत्मकथा लिखने की है, लेकिन प्रायः ऐसा होता नहीं है। केवल अपने अहं को तुष्ट करने के उद्देश्य से ही आत्मकथा लिखी जाने लगी तो पाठक कुछ पन्ने पढ़ने के बाद आत्मकथाकार का उद्देश्य समझ जाता है। जिससे वह आत्मकथा को आगे पढ़ नहीं पाता है। इस कोटी में साहित्यकारों और कलाकारों द्वारा लिखी गयीं आत्मकथाएँ आती हैं। इस तरह की आत्मकथाओं में आत्मप्रशंसा की जाती है, गुलाबराय ने अपनी आत्मकथा में आत्मप्रसंशा करते हुए लिखा है, “रेल की यात्रायों में यम-यातनाओं के कारण (कभी-कभी वे बहुत लम्बी यात्रा करा देती हैं) दूर के स्थानों की सभाओं का सभापतित्व करना छोड़ दिया है, और उनके लिए मुझे इतना ही श्रेय मिल सकता है जितना कि वृद्धा वेश्या को सती होने का। किन्तु निकट के मथुरा, अलीगढ़ आदि स्थानों को कुछ अधिक आग्रह करने पर नहीं छोड़ता।” इसमें लेखक यात्रा की कठिनाईयों को बताने के बहाने अपनी ख्याति प्रियता के दोष गिनाते हुए आत्मप्रसंशा करता हुआ दिखाई देता है। इस कोटी में लालकृष्ण अडवाणी की आत्मकथा ‘माई कन्ट्री माई लाईफ’ भी आती है, जिसमें लालकृष्ण अडवाणी ने अपने कार्यों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। 1.4. 7. अपनी प्रतिष्ठा एवं लोक प्रियता से आर्थिक लाभ उठाने की इच्छा विकिलिक्स के संस्थापक जुलियन अंसाज को आज दुनिया में कौन नहीं जानता है। ऐसा ख्याता व्यक्ति अगर आत्मकथा लिखता है, तो वह हाथो-हाथ बिक जाएगी। इसी कारण जुलियन अंसाज ने एक प्रकाशक के साथ 1.2 मिलियन डालर का करार अपनी आत्मकथा के प्रकाशन को लेकर किया है। इसी तरह पाकिस्तान की युवा मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला युसुफ़ज़ई ने अपने संस्मरण लिखने और उनका एक पुस्तक के रूप में प्रकाशन करने का संकल्प किया है। इस पुस्तक को लिखने के लिए 15-वर्षीय मलाला युसुफज़ई को 30 लाख डॉलर मिलेंगे। यह युवा मानवाधिकार कार्यकर्ता अपने देश, पाकिस्तान में शिक्षा पाने के लड़कियों के अधिकारों के लिए लड़ती रही हैं। इससे पता चलता है कि बहुत बार आत्मकथाएँ पैसा कमाने का एक जरिया मात्र बन कर रह जाती है। लेखक, खिलाड़ी, कलाकार इस तरह की आत्मकथाओं को लिखकर मोटी रक्कम कमाते हैं। इनका स्तर साहित्य जगत में क्या होगा, इसकी ओर आत्मकथाकार का ध्यान नहीं होता है। उसका एक मात्र उद्देश्य पैसा कमाना होता है। लेकिन इस तरह की आत्मकथाओं में भी कुछ आत्मकथाएँ उच्च कोटी की होती हैं। कमलेश सिंह के अनुसार कभी-कभी आत्मकथा स्वंय न लिखकर किसी और के द्वारा लिखी जाती है। वे इस तरह की आत्मकथाओं के बारे में लिखती हैं, “..ऐसी आत्मकथाओं में से कुछ आत्मकथाएँ छद्म (घोस्ट) आत्मकथाएँ होती हैं। वे लेखक के द्वारा स्वंय न लिखी जाकर, किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा प्रस्तुत की जाती हैं। उदाहरण के लिए श्रीमती जानकी देवी बजाज की ‘मेरी जीवन यात्रा’, श्रीमती रमादेवी मुरारका की ‘मेरी जीवन कहानी’ तथा तोताराम सनाढ्य की ‘फिजी में इक्कीस वर्ष’ आदि प्रस्तुत की जा सकती हैं। परंतु इन्हें स्वंय न लिखने के कारण भिन्न रहें होंगे। जैसे श्रीमति जानकी देवी बजाज अपढ़ थी। ” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कुछ लोगों ने केवल अपनी ख्याती से पैसा कमाने के लिए आत्मकथा का लेखन किया। 1.4. 8. प्रतिरोध की भावना हम अपने दुश्मनों का किसी न किसी बहाने प्रतिरोध करते ही रहते हैं। लेखक अपने पर किये व्यंगों, आरोपों का खण्डन अपनी रचनाओं के माध्यम से करता है। कभी- कभी अपनी आत्मकथा में उसके नाम के साथ उससे भीड़ता है। वह किसी ख्यात व्यक्ति के बारे कुछ ऐसी बाते लिखता है कि उसकी प्रतिमा मलिन हो जाए। कुछ लोग इसी उद्देश्य से आत्मकथा लिखते हैं। जिसमें किसी व्यक्ति पर किचड़ उछालने की पूरा प्रयत्न किया जाता है। हरिवंशराय बच्चन ने पंत के तेजीसिंह के प्रति प्रेम को छायावादी किस्म का प्रेम था, लिखा है। जो लोग पंत को जानते है, वे इस आरोप को खण्डित कर देंगे। इस प्रकार की आत्मकथाओं को जल्द ही पाठक पहचान लेता है। 1.4. 9. यश प्राप्ति एवं सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए इससे पहले देखा की अपनी आत्मकथाओं द्वारा कुछ लोग पैसा कमाना चाहते, कुछ लोग सहानुभूति प्राप्त करना चाहते है और कुछ पश्चाताप करना चाहते है, इनके साथ कुछ ऐसे भी लोग जुड़ते हैं जो अपनी आत्मकथा द्वारा समाज में नाम कमाना चाहते हैं। ऐसे लोग उच्चवर्ग से आते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन की यात्रा को अत्यंत रोचक ढंग से लिखते हैं। अपने संघर्षों को अतिरंजित करते हैं। इस तरह अपनी आत्मकथा द्वारा समाज में यश और प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। 1.4.10. मानसिक तनाव से मुक्ति के लिए श्यामाचरण दुबे अपनी किताब ‘परम्परा, इतिहास-बोध और संस्कृति’ में साहित्य के प्रयोजनों के बारे में लिखते हैं, “साहित्य,व्यक्तिगत और कुछ अंशों में सामूहिक मनोरंजन का साधन है, वह धार्मिक शिक्षा का माध्यम है, उससे समाजीकरण और सामाजिक नियंत्रण की प्रक्रियाओं को समर्थन और बल मिलता है और उसके द्वारा रचनाकार अपना मानसिक तनाव और भीतरी बेचैनी दूर कर सकता है। यह सूची अधूरी है और उससे हमें साहित्य की व्यापक सामाजिक भूमिका का पूरा परिचय नहीं मिलता।” इससे यह बात तो स्पष्ट होती है कि साहित्यकार मानसिक तनाव या बेचैनी से मुक्ति पाने के लिए साहित्य की रचना करता है। मानसिक तनाव को दूर करने के लिए कुछ लोग नशा भी करने लगते हैं। कुछ लोग डायरी, कहानी, आत्मकथा या पैंटिग बनाकर अपने तनाव से मुक्ति पाने की कोशिश में लगे रहते हैं। आत्मकथा लिखने के हेतुओं में से यह भी एक महत्वपूर्ण हेतु है। आत्मकथाकार अपने मन में चल रही उथल-पुथल को आत्मकथा में व्यक्त कर उससे कुछ हद्द तक मुक्ति पाता है। मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए आत्मकथा अन्य विधाओं से कैसे कारगर है, इसको कमलेश सिंह समझाते हुए कहती हैं, “....भीतरी अंतर्द्वंद्व को साहित्य की किसी भी विधा से तालमेल बिठाकर भीतर की बात प्रस्तुत कर दी जा सकती है। आत्मकथा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति का गुण इस अंतर्द्वंद्व से पूर्णतया निवृत्ति दिला देता है। व्यक्ति अपनी संवेदनाएं, अपेक्षाएं और उलझने अपने लेखन में विगलित कर उनकी जकड़ से मुक्त हो जाता है।” इस तरह आत्मकथाकार अपने तनाव और बेचैनी से मुक्ति पाकर एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश करता है। 1.4.11.अतीत का मोह हम सब जानते हैं कि अतीत में फिर लौटा नहीं जा सकता है, सिर्फ उसे याद किया जा सकता है। बहुत बार हम वर्तमान की समस्याओं से निज़ात पाने के लिए अतीत में चले जाते हैं। अतीत का सुखमय जीवन याद करके कुछ समय के लिए खुश हो जाते हैं। आत्मकथा लेखन भी अतीत को ताज़ा करने का एक माध्यम है, जिसके द्वारा हम अपने बीते हुए पलों को फिर से जिते हैं। हरिवंशराय बच्चन भी इस बात को पुष्ट करते हुए कहते हैं, “जीवन की जिस सीढ़ी पर हूँ, उस पर अतीत का स्मरण शायद स्वाभाविक होता है।” इसी अतीत को याद करने के लिए या फिर से जीने के लिए लोगों ने आत्मकथाएँ लिखीं। इस तरह हमने देखा कि आत्मकथा लिखने का कोई एक निश्‍चित हेतु नहीं है। जितने लोग हैं, उतने हेतु हो सकते हैं। जहाँ कुछ लोग अपने अनुभवों द्वारा दुनिया को शिक्षित करना चाहते हैं, तो कुछ लोग दूसरों की निंदा करते हुए या अपनी ही तारीफ में कशिदे पढ़ते हुए नज़र आयेंगे। यह तो हुए आत्मकथाकारों के हेतु लेकिन किन प्रयोजनों से पाठक इन आत्मकथाओं को पढ़ता है, इस पर भी विचार कर लेना चाहिए। 1.5 पाठकीय प्रयोजन आत्मकथा को पाठक क्यों पढ़ता है? इसका उत्तर डॉ. आनंद पाटिल इस प्रकार देते हैं, “मनुष्य में दूसरे मनुष्य को जानने की स्वाभाविक जिज्ञासा होती है। दूसरे मनुष्य को समझते हुये वह अपने आपको भी समझने लगता है। मनुष्य कैसा जीता है, प्रसंगों में, संकट में, आनंद में होते समय उसकी अवस्था कैसी होती है, उसका मन किस अवस्था से गुजरता है, इसका ज्ञान उसे होता है। उसे भी लगता है कि मैं भी ऐसे ही प्रसंगों, संकटों, आनंद, सुख-दुखों से जाते हुए हमें भी ऐसे ही कुछ लगता है, इसका उसे अनुभव होने लगता है। इस कारण उसे लगने लगता है कि वह भी दूसरों की तरह ‘इन्सान’ है, मुझ में और दूसरों में कोई फरक नहीं है, यह सहअस्तित्व की भावना उसे जीने के लिए ढाढ़स बंधाती है। मैं भी दूसरों के साथ हूँ, इसका उसे आनंद होता है, यह आनंद स्व-अनुभव का होता है। इस खूशी की तुलना नहीं की जा सकती।” डॉ. आनंद पाटिल के इस कथन से बात स्पष्ट होती है, कि इन्सान दूसरों के जीवन के बारे में जानना चाहता है, और अपने जीवन में उस तरह की समानताएँ पाकर खुश भी होता है। इस तरह दूसरों के जीवन का अध्ययन करते समय हमें जीवन जीने का सूत्र मिल जाता है, जिससे हमारा जीवन आसानी से व्यतित होता है। वैसे भी इन्सान स्वभावतः दूसरों के जीवन में झाँकने के लिए हमेशा तत्पर रहता है, यही कारण है कि फिल्मी गॉसिप वाली पत्रिकाओं की माँग अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा ज्यादा होती है। पाठक महान लोगों की आत्मकथाओं को, उनके अनुभवों से सीख लेकर अपना जीवन सफल बनाने के लिए पढ़ता है। इस तरह आत्मकथाकार और पाठक दोनों के अपने-अपने अलग-अलग प्रयोजन आत्मकथा को लेकर है। 1.6 आत्मकथा लेखन की अड़चनें आत्मकथा लिखते समय बहुत सारी अड़चनों का सामना आत्मकथाकार करता है। 1.6.1 सत्यकथन आत्मकथा की पहली शर्त होती है, सत्य को रेखांकित करना। सत्य के बिना आत्मकथा की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। मराठी के आलोचक मा.का. देशपांडे के अनुसार, “जिसे फुलों से प्यार नहीं वह उत्तम कवि नहीं हो सकता है, जिसे बच्चों से प्यार नहीं वह महान दर्शनाचार्य नहीं हो सकता और जिसे सत्य की कद्र नहीं वह आदर्श आत्मकथाकार नहीं बन सकता है।” बात स्पष्ट है, आत्मकथा का जीवन-प्राण ही सत्यकथन होता है। आत्मकथा में लेखक का उद्देश्य ही अपने जीवन के यथार्थ को पाठक के सामने रखना होता है। जीवन का सत्य वर्णन करना आत्मकथा में अनिवार्य तो है, पर वह लिखना तलवार की धार पर चलने इतना कठिन कार्य है। सत्य की तीन आयाम होते हैं –(1) स्वयं को दिखने वाला सत्य, (2) प्रतिपक्ष को दिखने वाला सत्य, (3) असली सत्य। इनमें से किसे चुना जाए यह प्रश्न निर्माण होता है। सत्य बोलना जितना आसान होता है, सत्य लिखना उतना ही कठिन होता है। बहुत बार लेखक विस्मृति का शिकार होता है, इसलिए वह जो लिखता है, उसमें कितना सच होता है, यह कहना असंभव है। 1.6.2. तटस्थता तटस्थता आत्मकथा के लिए अनिवार्य है। हम अपने जीवन की ओर तटस्थता से देखेंगे तो ही हम अपनी आत्मकथा में आत्मश्‍लाघा, आत्मसमर्थन इन दोषों से बच सकते हैं। अपनी गलतियों को सबके सामने रखने के लिए इन्सान को अपना सारा अहं भाव छोड़ना पड़ता है। ऐसा न करने पर वह अपनी ओर तटस्थता से देख नहीं पाएगा। ऐसा कोई महान व्यक्ति ही कर सकता है। क्योंकि सबको अपना जीवन पसंद होता है। वह उसकी आलोचना करने से कतराता है। यह एक कठिन साधना है। अनायास ही आत्मकथाकार से आत्मसमर्थन और आत्मप्रशंसा हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है, अतीत के बारे में कहना कठिन होता है और उसे लिखना उससे भी अधिक कठिन होता है। दूसरों की तरफ तो हम तटस्थता से देख कर दस दोष गिना देते हैं, लेकिन वही दोष हममें होने पर भी हम उसी तटस्थवृत्ति से अपने आपको देख नहीं पाते हैं। 1.6.3 ‘स्व’ केन्द्र में आत्मकथा का सौन्दर्य ही ‘स्व’ दर्शन में होने के कारण आत्मकथा में आत्मकथाकार को केन्द्र में होना ही चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज का चित्रण होता ही है, लेकिन आत्मकथाकार को अपने जीवन के बारे में बताना भूलना नहीं चाहिए। बहुत बार आत्मकथा में पात्रों की संख्या अधिक होने के कारण आत्मकथाकार न खुद के चरित्र को उभार पाता है न अन्य पात्रों के चरित्र को। ऐसे में पाठक आत्मकथा में उलझ जाता है। आरंभिक मराठी स्त्री आत्मकथाओं में आत्मकथाकार का चरित्र उतना स्पष्ट नहीं चित्रित होता है, जितना उनके पति का । इस तरह की आत्मकथा को क्या कहा जाए समझ में नहीं आता । 1.6.4 घटनाओं का चुनाव और क्रम आत्मकथाकार अपनी आत्मकथा का आरंभ और अंत लिखने के लिए के बारे में मुक्त है। वह अपनी आत्मकथा को कहीं से भी शुरु कर सकता है, और कहीं पर भी समाप्त । घटनाओं के चुनाव के संबंध में आंद्रे मोर्वा लिखते हैं, “A biographer or autobiographer is obliged to omit from his narrative, the common place of daily life and to limit himself almost exclusively to salient events, actions and traits, The writing and the reading of the bulky volumes, otherwise required would be alike impossible.” जीवन की सामान्य घटनाओं की काटछांट करके कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों के सहारे अपना रेखाचित्र बनाने का प्रयत्न आत्मकथाकार को करना पड़ता है। आत्मकथा में किन घटनाओं को शामिल करना है और किन घटनाओं को छोड देना है, इसका पूरा अधिकार आत्मकथाकार को होता है। आत्मकथाकार की दृष्टि से घटना कितनी भी महत्वपूर्ण होने पर आलोचक टिका करेंगे ही। आलोचक कहेंगे ही इसे कहना चाहिए था, उसे नहीं। लेकिन इन बातों को भूलकर आत्मकथाकार के लिए क्या महत्वपूर्ण है, उसी का चित्रण आत्मकथा में होना चाहिए। घटानाओं का चुनाव ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि जिसमें केवल आपका सकारात्मक या उपलब्धी वाला पक्ष ही सामने आए, आत्मकथाकार को जीवन के नकारात्मक पक्ष से संबंधित घटनाओं का चुनाव भी करना चाहिए। असफलताओं का वर्णन भी आत्मकथाओं में होना चाहिए। घटनाओं को क्रम से रखने में भी भारी कसरत करनी पड़ती है। बहुत बार ऐसा होता है कि किसी घटना के बारे में कुछ लिख रहे होते हैं, उसी समय कोई दूसरी घटना याद आती और उसे बेवजह पहली घटना की जगह दी जाती है। इस कारण पाठक को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। बहुत कम आत्मकथाओं में घटनाओं का चुनाव और क्रम ठीक होता है। जिसके चलते वह आत्मकथा पठनीय बन जाती है। 1.6.5 वस्तुस्थितिदर्शक निवेदन आत्मकथा वस्तुस्थितिदर्शक होनी चाहिए। संस्मरणात्मक घटनाओं का काल जीवन में केवल 15-20 साल का होता है। बची हुई जिंदगी में कहने लायक कुछ विशेष नहीं होता है। एक सामान्य जिन्दगी होती है। खाया-पिया सोया वाली। लेकिन आत्मकथाकार यह सब भूल जाता है। वह चाहता है कि वह जिस स्थिति में उसका चित्रण न कर, वह जिस स्थिति में रहना चाहता है, उसके बारे में लिखना अच्छा लगता है। कल्पना लोक का जीना अधिक सुखद और आनंददायक होता है, इस कारण आत्मकथा में वस्तुस्थिति का यथार्थ चित्रण नहीं हो पाता है। आत्मप्रशंसा करने की आदत होने के कारण बहुत सारे अवास्तव बातों को स्थान आत्मकथा में मिलता है। घटित घटनाओं में से उन्हीं घटनाओं का चयन आत्मकथाकार को करना चाहिए, जिसे पढ़कर पाठक की बुद्धी स्वीकार करें। ऐसी घटनाओं के चित्रण के कारण आत्मकथा वस्तुस्थितिदर्शक बनती है। आत्मकथा लेखन को लेकर एक धारणा बनी हुई है कि आत्मकथा किसी बड़े महान आदमी को ही लिखनी चाहिए। लेकिन यह धारण गलत है। आत्मकथा कोई भी लिख सकता है। इस पर मृणिलिनी देसाई लिखती हैं, “आत्मकथा इस साहित्य विधा को कोई भी अपना सकता है, इतना इसका फलक बड़ा है और मजेदार बात यह है कि, जिस व्यक्ति के पास यह जाती है, उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकार लेकर हमारे सामने प्रकट होती है।” इस तरह कह सकते है कि यह विधा जिसके पास जाती है उसके व्यक्तित्व की छाप उस पर हमें दिखाई देती है। निष्कर्ष अंततः कह सकते हैं कि आत्मकथा एक ऐसी विधा है , जिसे दुनिया का कोई भी आदमी लिख सकता है या लिखवा सकता है। सामान्य से सामान्य आदमी जिसके पास असामान्य अनुभव है, वह आत्मकथा लिख सकता है। आत्मकथा की पहली व महत्वपूर्ण शर्त ईमानदारी है। आत्मकथा की जान बताने लायक कुछ भी न छिपाने में है। आत्मकथा का शिल्प कोई बंधा-बधाया नहीं होता है। हर आत्मकथाकार अपनी भाषा और व्यक्तित्व की छाप आत्मकथा पर छोड़ता है। आत्मकथाकार आत्मकथा में आत्मविश्‍लेषण और आत्मालोचन करता है। ऐसा करने से ही वह आत्मकथा एक अच्छी आत्मकथा कहलायेगी। आत्मकथा आज हाशिए के तबके के लिए इतिहास के बराबर हो गई है। हाशिए के लोगों को इतिहास में स्थान नहीं दिया गया या दिया गया तो भी नगण्य था। इसलिए आज यह तबका अपनी आत्मकथा लिखकर अपनी जाति का इतिहास लिख रहा है। इसी कारण आज दलित और स्त्रियों की आत्मकथाओं में बढोत्तरी हो रही है। यह हमारे समाज में हो रहे परिवर्तन का संकेत है। आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, पृ.-vii वागार्थ, सं. विजय बहादुर सिंह, अक्टुबर, 2005, पृ.सं. 85 अपने अपने पिंजरे, मोहनदास नैमिशराय, पृ.सं. भूमिका से आत्मचरित्र मीमांसा, डॉ.आनंद यादव, पृ.सं. 1,2 हिन्दी साहित्य – बीसवीं शताब्दी, आ. नन्ददुलारे वाजपेयी, पृ.सं.126 हंस, सं. राजेन्द्र यादव, नवंबर, 2003, पृ, सं. 95 Encyclopedia Britannica vol-2, page-855 Oxford Dictionary vol-1 page no.-573 Collier’s Encyclopedia : vol-3, page no.-319 Cassel’s Encyclopedia of Literature by S.H. Steinspury ,page no.-62 Dictionary of world literature by J.T. Shipley, page no.32 हिन्दी साहित्य कोश-भाग-1 सं. डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, पृष्ठ-98 मानक हिन्दी कोश-प्रथम खंड, सं.रामचंद्र वर्मा, पृष्ठ.-2 मानविकी पारिभाषिक कोश(साहित्यिक खंड), सं. नगेन्द्र, पृष्ठ-28 हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, सं. डॉ. अमरनाथ, पृ.-70 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 03 से उद्धृत मेरा जीवन प्रवाह, श्री वियोगी हरि, पृष्ठ-03 क्या भूलूँ क्या याद करूँ डॉ. हरिवंशराय बच्चन, पृ.01 रसीदी टिकट, अमृता प्रितम, पृ-149 हिन्दी जीवनी साहित्य : सिद्धांत और अध्ययन, भगवानशरण भारद्वाज, पृ.44 गगनांचल, सं.अजय कुमार गुप्ता, जनवरी-मार्च,2007, पृ.-05 मेरे साक्षात्कार, रामदरश मिश्र, पृ.177 स्मृतिचित्र, महादेवी वर्मा, पृ-08 टेलीवीजन,साहित्य और सामाजिक चेतना, सं. अमरनाथ ‘अमर’, पृ.-218 भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अंतरंग बातचीत, डॉ. रणवीर रांग्रा, पृ.297 सत्यं शिवम् सुन्दरम्, डॉ.रणवीर रांग्रा, पृ.95 आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, पृ.-13 आत्मकथा की संस्कृति, पंकज चतुर्वेदी, पृ.सं.14 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 25 Art of autobiography, Dr. D.G. Nayak, page,38 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 27 हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, सं.डॉ. अमरनाथ, पृ.सं.236 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 31 हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, सं.डॉ. अमरनाथ, पृ.सं.237 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 32 हिन्दी का आत्मकथा-साहित्य,ले. विश्व बंधु शास्त्री विद्यालंकार पृ.सं.98 हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, सं.डॉ. अमरनाथ, पृ.सं.502-503 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 28 साहित्यिक विधाएः पूनर्विचार, ले. डॉ. हरिमोहन, पृ.सं.230 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 29 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 31 भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अंतरंग बातचीत,ले. डॉ.रणवीर राग्रा, पृ.सं. 297 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 53 हिन्दी आत्मकथा – साहित्य, ले. विश्‍व बन्धु शास्त्री, विद्यालंकार, पृ. सं. 140 मेरी आत्मकहानी, ले. श्यामसुंदर दास, पृ.सं.1 मेरे सात जन्म-भाग-4, ले. हंसराज रहबर, पृ.सं.-भूमिका से आत्मकथा– सत्य के साथ मेरे प्रयोग,ले. मो.क. गांधी, पृ.सं. 04 मेरी मुक्ति की कहानी, ले. टालस्टाय, पृ.सं.102 मेरी असफलताएं, ले. गुलाबराय, पृ.सं.119 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 56 परंपरा,इतिहास-बोध और संस्कृति, श्यामाचरण दुबे, पृ.सं. 160 हिन्दी आत्मकथा : स्वरूप एवं साहित्य, ले. डॉ. कमलेश सिंह, पृ.सं. 58 क्या भूलूं, क्या याद करूँ, ले. हरिवंशराय बच्चन, पृ.सं. भूमिका से आत्मचरित्र मिमांसा, ले. डॉ. आनंद यादव, पृ.सं. 122 आधुनिक मराठी वाङमयातिल स्त्रियांची आत्मचरित्रे: एक अभ्यास, ले. डॉ. विमल भालेराव, पृ.सं.19से उद्‌धृत Aspects of biography, Andre Marous, पृ.सं. 141 आधुनिक मराठी वाङमयातिल स्त्रियांची आत्मचरित्रे: एक अभ्यास, ले. डॉ. विमल भालेराव, पृ.सं.29से उद्‌धृत

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