Tuesday, October 12, 2021

हिन्दी और मराठी स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं में अभिव्यक्त स्त्री जीवन का तुलनात्मक अध्ययन

हिन्दी और मराठी स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं में अभिव्यक्त स्त्री जीवन का तुलनात्मक अध्ययन________________________________________ स्त्री की आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं। ग्रामीण अनपढ़ स्त्रियाँ अपने जीवन अनुभवों को लोकगीतों, लोककथाओं में या फिर घर की दीवारों पर चित्र बनाकर अभिव्यक्त करती थीं। शिक्षित स्त्रियाँ अपने निजी अनुभवों को कविता- कहानी के माध्यम से विस्तार देती हैं। वर्तमान समय में स्त्रियाँ अपने जीवनानुभवों को आत्मकथा के माध्यम से सशक्त रूप में व्यक्त कर रही हैं। ये आत्मकथाएँ स्त्री की दृष्टि से बदलते समय-समाज की परतें खोलनेवाले महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज़ हैं। स्त्री आत्मकथाओं द्वारा स्त्री जीवन के यथार्थ का, स्त्री दृष्टि से किया हुआ आकलन सामने आता है। स्त्री द्वारा समाज का किया हुआ यह आकलन भी परिपूर्ण नहीं होगा, पर इनका अध्ययन किये बगैर स्त्री जीवन का समाजिक अध्ययन पूरा भी नहीं होगा। स्त्री जीवन से संबंधित साहित्य स्त्री और पुरुष रचनाकारों ने रचा है। स्त्री की समस्याओं को पुरुष रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया, लेकिन ये रचनाकार खुद भोक्ता नहीं थे। इसलिए उत्पीड़न की तीव्रता को वे पूरी तरह समझ नहीं पाते हैं। स्त्री रचनाकारों ने भी अपनी रचनाओं में स्त्री समस्याओं को उठाया। स्त्री रचनाकार स्त्री समस्याओं के भुक्तभोगी होने के कारण उत्पीड़न की तीव्रता को सही तरह पकड़ पायी है और उसे अभिव्यक्ती प्रदान कर पायी है। इसी कारण जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा है, “एक सावधानी बरतते हुए हम यह मान सकते हैं कि जो ज्ञान पुरुष स्त्रियों से उनके बारे में हासिल करते हैं, भले ही व उनकी संचित संभावनाओं केबारे में न होकर, सिर्फ उनके भूत और भविष्य के बारे में ही क्यों न हो; तब तक अधूरा और उथला रहेगा जब तक स्त्रियाँ स्वंय वह सब कुछ बता नहीं देती, जो उनके पास बताने के लिए हैं।” कुछ स्त्री लेखिकाओं की आत्मकथाओं में रेखांकित जीवनानुभव स्वतंत्रता से पूर्व और स्वतंत्रता के बाद के हैं, तो कुछ आत्मकथाओं में सिर्फ स्वतंत्रता के बाद का समय शब्दांकित हुआ है। इन आत्मकथाओं में दो पीढ़ियों का जीवन देखने को मिलता है। सन 1975 ई. के बाद लेखन करने वाली लेखिकाएँ स्त्रीवाद से प्रभावित होने के कारण, स्त्रीवाद का असर उनकी आत्मकथाओं पर दिखाई देता है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि जिन स्त्रियों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि उन सभी ने स्त्रीवादी होकर आत्मकथाएँ लिखी हैं। इन आत्मकथाओं में स्त्रियों ने अलग-अलग बातों से प्रेरित होकर अपने जीवनानुभवों को अभिव्यक्त किया है। इन आत्मकथाओं में स्त्री जीवन की बहुत सारी परतें खुलती हुई नज़र आती हैं। ‘लड़की’ या ‘स्त्री’ होने के कारण हीनता के अनुभव विविध स्तरों पर दृष्टव्य हैं, केवल इन्हें लिखना उनका हेतु नहीं था। फिर भी अनायास ही स्त्री के हिस्से में आयी दोयम दर्जे की हकीकत बयान होती है। ‘लड़की’ होने के कारण उस पर किये जाने वाले संस्कार, उसे लड़के से हीनतर मिलने वाला बर्ताव, उसके जीवन के हर पड़ाव पर मिलने वाला पुरुष सापेक्ष बर्ताव, नैतिक मूल्यों के कारण उस पर होने वाले अन्याय को अभिव्यक्ति इन आत्मकथाओं में मिली है। स्त्री को भोगवस्तू मानने वाली, स्त्री के कृतित्व से ज्यादा उसके पवित्रता को अतिरिक्त महत्व देने वाली, पति-पत्नी के रिश्ते में पत्नी के विचारे को दूसरे दर्जे का मानने वाली मानसिकता का भी दर्शन इन आत्मकथाओं में होता है। पुरूष को ही स्त्री से श्रेष्ठ माननेवाले, पत्नी पर मालिकाना हक्क बजाने वाले, पुरुषी अहंकार के कारण पत्नी को बराबरी का स्थान न देन वाले, इन सभी पुरुष मूल्यों को स्त्री आत्मकथाकारों नें शब्दांकित किया है । जाति प्रथा के कारण समाज में दिया जाने वाला दोयम दर्जा और ‘स्त्री’ होने के कारण मिलने वाला दोयम दर्जा इन दो पाटों के बीच दलित स्त्री का जीवन पीसा जाता है। इस कारण दलित स्त्री के जीवन के अनुभवों की भीषणता अन्य स्त्रियों के अनुभवों से अधिक होती है। इस अध्याय में स्त्री के बचपन, शिक्षा, उसके साथ होने वाला लैंगिक भेदभाव, स्त्रियों का बचपन से किया जाने वाला मानसिक अनुकूलन, स्त्री शरीर की विशिष्ट समस्याएँ, प्रेम, स्त्री ने विवाह को लेकर देखे स्वप्न और उनका यथार्थ रूप, काम जीवन, कामकाजी स्त्री की समस्याएँ, स्त्री के साथ किये जाने वाली विविध प्रकार की घरेलू हिंसा, राजनीति में स्त्री का स्थान, अकेलापन, भय एवं मानसिक अवसाद से जुझती हुई स्त्री, अविवाहित स्त्री, विवाह विच्छेद के बाद का स्त्री जीवन, विधवा स्त्री, दलित स्त्री के हिस्से में आये दोहरे जीवन आदि का अध्ययन किया है। 3.1 बचपन बचपन हमारे जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। बहुत सारे लोगों का बचपन ही उसके जीवन को उभारने और कुण्ठित करने में कारणीभूत होता है। बचपन में घटी कुछ घटनाओं का बालक के मन पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ता है, जो जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ता है। बचपन जीवन रूपी ईमारत की नींव होती है। जितना अच्छा बचपन बीतता है, उतना अच्छा उसका आनेवाला समय । इसीलिए बचपन को सँवारने वाला कोई मिलना चाहिए, नहीं तो उस बालक का जीवन बिखर जाएगा। स्त्री आत्मकथाओं में बचपन के बारे में लिखा गया है। क्योंकि बचपन ने उनके समूचे जीवन को काफी प्रभावित किया है। बचपन में पैदा हुई कुछ कुण्ठाओं ने उनका जीवन भर साथ नहीं छोड़ा। कुसुम अंसल को एक बालिका के रूप में कुचला हुआ बचपन मिला, सपनों को पंख फैलाने का अवसर रुढ़ीवादी परिवार ने नहीं दिया। कुसुम असंल का बचपन बहुत ही दुखद रहा । कुसुम असंल के पैदा होने के दस दिन बाद माँ की मृत्यु हो जाती है। सौतेली माँ के व्यवहार ने उनके बचपन को और भी दुखमय बना दिया। सौतेली माँ से प्यार की अपेक्षा करना ही बेकार था। उनसे कुसुम जी को उपेक्षा और फटकार ही मिली। कुसुम जी की आँखों में बचपन में बहुत सारे सपने थे। बचपन के बारे में वे अपनी आत्मकथा ‘जो कहा नहीं गया’ में लिखती हैं, “बचपन मुझे बरसात जैसा लगता था, अल्हड़, बहता हुआ, जहाँ एक ओर बादलों की गरज से मन में भय कंपाता था, दूसरी ओर छम-छम करती बारिश तले नहाने का अपना ही एक आकर्षण होता था। मैं भी बरसाती दिनों में अपने को रोक नहीं पाती थी- जैसे ही बादल घूमड़ते, दौडती हुई आँगन में जाती और भरपूर नहाती, कभी छत से बहते परनाले की तेज़ धार के नीचे खड़ी होकर पानी की तीव्र धारा को अपनी पीठ पर, झेलती, ओले गिरते तो उन्हें फ्रॉक के आंचल में भरती और चबा-चबाकर खाती-शायद वय के उस हिस्से में प्रत्येक का व्यवहार एक जैसा होता है, पर पता नहीं क्यों मुझे महसूस होता कि मुझमें और स्कूल की अन्य लड़कियों में कुछ भिन्नता हैं-अजीब-सा एक एहसास मुझे मस्ती की उस रेखा से एक कदम आगे खींच ले आता, जिस रेखा पर बाकी सब गुनगुनाते खिलखिलाते चले जाते थे। कुछ था जो मेरे भोले से मन में सवाल जगा रहा था, लग रहा था मेरे परिवेश में एक उलझाव है-सब लड़कियों की एक माँ है और मेरी तीन, सब लड़कियों के एक पापा हैं पर मेरे दो। हमारे घर के वातावरण में एक नियन्त्रण था सब कुछ बाकायदा होता था, पत्ता गिरता था तो उसे भी सलीके से अपने गिरने का स्थान तलाशना होता था- तो फिर मैं अपने सन्नाटे में किससे प्रश्न करती?” घर में सबकुछ था, घर बड़ा, समृद्धि हर कोने में थी, पर कुसुम असंल का परिवेश उससे अछूता था। मोटर गाड़ियाँ, घोड़ा गाड़ी सब होने पर भी अधिकत्तर पैदल, अकेले स्कूल जाना होता था। दस साल की उम्र में बुआ और फुफाजी ने गोद लिया। यहाँ कुसुम जी का साहित्य से परिचय हुआ। यहाँ का माहौल साकेत से बेहतर था, पर वे यहाँ कुछ ही समय तक रह पायी। बुआ को बेटी होने के बाद कुसुम जी को अपने पिता के घर लौटना पड़ा। वे वहाँ पर रम गई थीं और वे वहाँ से लौटना नहीं चाहती थीं। लेकिन उन्हें वहाँ से लौटना पड़ा। साकेत में उनको होना ही बेमानी लग रहा था। एक तरफ उनकी माँ थी, जिन्हें अपने रूप का गर्व था। वे कुसुम जी अपने साथ कहीं ले जाना नहीं चाहती थीं, वे लिखती हैं, “एक बार कहीं जाने के लिए तैयार हुई तो मम्मी ने कहा,- ‘तुम नहीं जायोगी हमारे साथ, तुम्हें साथ ले जाने में शर्म आती है हमें, ’ मैं अपने भीतर सिकुडती चली गई- पापा के पास हमारे लिए समय नहीं था, वह सुबह से शाम तक व्यस्त रहते-पूरा दिन क्या, महीनों हमारा वार्तालाप नहीं होता था।” कुसुम असंल का बचपन अलीगढ़ में अपने बुआ के घर अच्छी तरह बीत रहा था, वहीं उनके अपने घर आकर सपने बिखरने लगते हैं। कृष्णा अग्निहोत्री का बचपन भी एक आम भारतीय लड़की की तरह ही गुज़रा। कृष्णा जी उस समाज में जन्म लिया था, जहाँ पुत्र के सामने पुत्री की कोई औकात नहीं थी। कृष्णा जी के जन्म से माता-पिता दोनों दुखी थे। बड़ो का बच्चों की दुनिया से कोई लेना देना नहीं था। बच्चों की इच्छाओं, भावनाओं को जानने की कोई कोशिश नहीं की जाती थी। लेकिन नियम कड़ाई से लागू कर दिए जाते थे। इस संकीर्ण दम घोंटू घेरे को कृष्णा जी ने शिद्दत से महसूस किया। उनको लगता है उन्होंने बचपन नहीं देखा जल्द ही बड़ी हो गई है , इस विषय में वे लिखती हैं, “मैंने बचपन नहीं देखा बहुत पहले ही बड़ी हो गई थी। छोटी बूआ, बड़ी बूआ, माँ सभी तो कहते रहे, ‘यह सीखो-वो करो-पढ़ो, काम करो’ किसी को यह चिन्ता नहीं थी मैं क्या चाहती हूँ। मुझे क्या अच्छा लगता है। क्या बुरा लगता है। मैं क्या सोचती हूँ। यह विडम्बना तो मुझे आज तक भोगनी पड़ी हैं। मुझसे परिवार वाले पूरी तरह आशाएँ रखते हैं पर मुझे आशाएँ रखने का तो कोई अधिकार है ही नहीं।” बच्चों की मानसिकता को न समझ कर उस पर अपने विचार थोपना, बच्चों पर किया गया एक प्रकार का मानसिक अत्याचार ही है। इस अत्याचार से बच्चे जल्दी उभर नहीं पाते हैं। वे कुण्ठित होते हैं और उसका असर उनके पूरे जीवन पर पड़ता है। कृष्णा जी के साथ भी यही हुआ। कृष्णा जी ने अपनी आत्मकथा ‘लगता नहीं दिल मेरा’ में एक और महत्वपूर्ण समस्या को बताया है। जिसे अक्सर छिपाया जाता है। हमारे समाज में बच्चों का यौन शोषण बड़ो द्वारा अक्सर होता है। जिसको हम जान-बूझकर भी अनदेखा कर देते हैं। लेकिन इस यौन-शोषण के कारण बच्चों का बचपन तो प्रभावित होता ही है, साथ ही उसकी पूरी जिन्दगी भी। कृष्णा जी के बचपन में कुछ ऐसे लोग थे, जो बच्चो को यौन शोषण करते थे। पड़ोस में रहने वाला अवतार सिंह कृष्णा जी के साथ जबरदस्ती करने का प्रयत्न करता है। इस घटना के बारे में वे लिखती हैं, “आज सोचती हूँ कि लड़की का कोमल भोला बचपन भी क्या पुरुष से सहन नहीं होता, वह उसे भी अपने गन्दे सुख हेतु चीर देने को आतुर रहता है।” इस तरह का बच्चों का यौन शोषण भारतीय समाज में आम बात है, पर इस विषय में खुलकर बात नहीं करता है। इस तरह की घटनाओं पर पीड़ित बच्चों के माता-पिता ही पर्दा डालना चाहते हैं। परिणाम स्वरूप बच्चों का यौन-शोषण रुक नहीं पाता है। मन्नू भंडारी के बचपन की कुछ बातें उनमें कुण्ठा भर देती है। पाँच भाई-बहिनों में सबसे छोटी मन्नू अपने अन्दर छिपी हीन-भावना की उत्पत्ति के लिए पिता को ही उत्तरदायी मानती हैं। वे अपनी आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ में लिखती हैं, “मैं काली हूँ, बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिताजी की कमज़ोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी, खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और फिर उसकी प्रशंसा ने ही क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीनभाव की ग्रन्थि पैदा नहीं कर दी कि नाम,सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई?” मन्नू भंडारी अपनी इस कुण्ठा से अपने साहित्य प्रकाशन के बाद ही उभर पायी हैं। उनको साहित्य ने एक नयी पहचान दी थी, उन्हें साहित्य प्रकाशन के कारण अपने कुछ होने का अहसास होने लगा। पाठकों के पत्रों ने उनके भीतर आत्मविश्वास को जगाया। प्रभा खेतान का बचपन भी इन लेखिकाओं से अलग नहीं था। इन से कई ज्यादा और बड़े हादसे उनके बचपन में हुए थे। इन्हीं हादसों के कारण उनके जीवन को अनेक मोडों से गुजरना पड़ा। बचपन में जितना प्यार अपने परिवार वालों से मिलना चाहिए था, उतना प्यार उनको नहीं मिला। जिसके कारण वे अपने आपको अकेली मानती हैं, वे अपनी आत्मकथा ‘अन्या से अन्यन्या’ में लिखती हैं, “मेरा तो इहलोक-परलोक में कोई नहीं। हमेशा-हमेशा से अकेली हूँ। किसी को मुझसे प्यार नहीं, किसी की मुझ पर ममता नहीं, किसी ने क्षण भर को नहीं सोचा कि मेरी यह अकेली जिन्दगी कैसी चलेगी? स्नेह, प्यारविहीन....थार के रेगिस्तान जैसा मेरा जीवन रहा है, जहाँ केवल अकेले चलती रही हूँ। इस भाँति जीना मेरा चुनाव नहीं था।” प्रभा जी के इस कथन का कारण उनका बचपन है। जिसमें उन्हें अपने परिवार वालों से केवल उपेक्षा ही मिली। प्रभा जी के भाई-बहनों को जितना प्यार माँ से मिला, उतना प्यार इनके हिस्से आ नहीं पाया। इसी कारण वे अपने बचपन के बारे में लिखती हैं, “कैसा अनाथ बचपन था। अम्मा ने कभी मुझे गोद में लेकर चूमा नहीं। मैं चुपचाप घंटों उनके कमरे के दरवाजे पर खड़ी रहती। शायद अम्मा मुझे भीतर बुला लें। शायद...हाँ अपनी रजाई में सुला लें। मगर नहीं, एक शाश्वत दूरी बनी रही हमेशा हम दोनों के बीच। अम्मा मेरी बातों को समझ नहीं पाती थीं।” इसी कारण प्रभा जी हमेशा दाई माँ के साथ रहती है। दाई माँ वह स्त्री थी जो प्रभा जी को हर संकट से बचाकर निकालती थी। प्रभा खेतान कहती हैं, “दाई माँ मेरा सहारा, मेरा आश्रय थी। अम्मा के क्रोध, भाई-बहनों का तुफानी वेग, गरजते बादल, कडकती बिजलियाँ, दाई माँ इन सबसे मुझे बचाकर रखती।” वही उनका सबकुछ करती थी। दाई माँ के साथ रहने के कारण उन्हें दाई माँ की बेटी कहकर चिढ़ाया जाता है। रंग साँवला, दाँत कुछ बाहर को निकले हुए। कोई उन्हें ‘मिसरानी’ कहता तो कोई उसे ‘मिलिट्री का घोडा’ कहता। केवल परिवार के लोग ही नहीं, बल्कि उनकी राधा नौकरानी प्रभा जी के रंग को लेकर कहती है कि, “प्रभा बाई को जितना साबुन लगाओ, उतना उनका काला रंग चक-चक करता है।” बचपन की उपेक्षा और पक्षपात ने उन्हें बहुत घायल किया “मैं उपेक्षिता थी, आत्मसम्मान की कमी ने मेरा जिन्दगी भर पीछा किया।...माँ ने प्यार नहीं किया, यह तो समझ रही थी, क्योंकि मैं ठहरी काली। माँ की तरह गोरी नहीं। मैं बहुत शान्त, गीता की तरह स्मार्ट नहीं, मुँह पर फटाफट जवाब नहीं दे पाती, लेकिन मैं पढ़ने में तो अच्छी थी, क्या यह काफी नहीं था?” इन सब बातों का नन्हीं प्रभा के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए वे बरामदे बैठे-बैठे चिड़ियों से संवाद करने लगती हैं। इस तरह का बचपन किसी भी बच्चे के सपनों और कल्पनाओं को रौंद देता है। उनके मन में एक अकेलापन छोड़ देता है, जिससे वह उम्र भर उभरने की कोशिश करता है। शादीशुदा डॉ.सराफ की तरफ आकर्षण का एक कारण प्रभा जी का उपेक्षित बचपन रहा है। चंद्रकिरण सौनरेक्सा का बचपन उपेक्षा से भरा हुआ नहीं था। चंद्रकिरण जी को अपने पिता से बहुत प्यार मिला। बचपन की यादों का पिटारा चंद्रकिरण जी ने अपनी आत्मकथा ‘पिंजरे की मैना’ में खोला है। बचपन में चंद्रकिरण जी काफी शरारती थीं। माँ की हर एक बात को पकड़ लेती थी। माँ ने एक दिन गुस्से में आकर कुएँ में कुद जाने की बात कही थी। चंद्रकिरण जी कुँए में कूदने चली गई। महरी ने जब देखा तो, उसे रोका। यह दूसरी घटना थी। पहली बार इसी तरह हौज में डुबते-ड़ुबते बची थीं। स्कूल में पहले जाने से मना करने वाली और एक साल तक घर पर ही पढ़ाई करनेवाली चंद्रकिरण जी आगे चलकर पढ़ाई में झंड़े गाड़ते हुए नज़र आती है। चंद्रकिरण जी ने अपने पिता जी की संतान-वत्सलता का भी उल्लेख आत्मकथा में किया है। अपने पिता जी के स्वभाव के बारे में वे लिखती हैं, “अपने बाबूजी जैसा सन्तान-वत्सल पिता मैंने आज भी, अपनी इतनी लंबी जिन्दगी में नहीं देखा। उस जमाने में, चाहे लड़के हों या लड़कियाँ बाप से बस डरना भर जानते थे। साथ बैठकर खेलना, बीमारी में सेवा करना, माँ की प्रताड़णा से बचाना सब उस समय आम बातें नहीं थीं। और मुझ पर तो बाबूजी की विशेष ही छत्रछाया रहती थी। मैं उनकी सबसे छोटी संतान जो थी।” चंद्रकिरण जी को काम के साथ पढ़ाई करनी पड़ी। पर अन्य आत्मकथाकारों की तरह उनका बचपन अकेलेपन और उपेक्षा से भरा हुआ नहीं था। घर का काम करने के बाद जितना समय बचता था, उसमें ही वे पढ़ाई करती थीं और पढ़ाई में भी अव्वल थीं। मैत्रेयी पुष्पा के बचपन में उनके पिताजी का देहांत हो गया था। मैत्रेयी पुष्पा को उनकी माँ कस्तूरी और दादा ने पाला। गाँव वालों का भी प्यार उन्हें मिला। विधवा माँ अपनी पढ़ाई के लिए मैत्रेयी को अपने ससूर के पास अकेला छोड़ जाती थी। जिसके कारण उसकी देखभाल ठीक तरह से हो नहीं रही थी। कस्तूरी के कठोर अनुशासन ने मैत्रेयी का बचपन छीन लिया था। “ ‘बचपन के रहते ही बचपन छोड़ना पड़ा है’ मैत्रेयी इस बात को जानती है कि नहीं जानती, हाँ कस्तूरी समझती है कि पढ़ाई की गम्भीरता के चलते उसे न गाना है, न खेलना है, बल्कि इस गाँव से अपना वजूद उठा लेना है।” मैत्रेयी जी की माँ कस्तूरी पर पढ़ाई इस तर हावी हुई कि गाँव की औरतें कस्तूरी से कहने लगी,“यह रांड क्या हुई, सांड हो गई। न छोरी पर ममता, न बूढ़े ससुर का रहम। अरे तू डाँव-डाँव डोलेगी तो बच्चा की ऐसी ही गत बनेगी। बनी है महातमा गाँधी की चेली।” मैत्रेयी की माँ को नौकरी मिलने के बाद इतना अंधा बना दिया था कि वह अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर नौकरी के लिए तैयार करना चाहती थी, लेकिन मैत्रेयी का मन कहीं ओर ही लगा हुआ था। इसीलिए खेरापतिन दादी कस्तूरी को डाँटते हुए कहती है, “..तू तो पढ़ी-लिखी है कस्तूरी, इतना तो जानती होगी कि शेर का बच्चा भी कुछ दिन तक अपनी माँ का लाया शिकार ही खाता है। बेटी, तेरी तरक्की न तुझे ऐसा चकाचौंध कर डाला कि सबके सिर पर मुकुट देख रही है।” नौकरी की चाहत में कस्तूरी ने अपनी बेटी मैत्रेयी का बचपन रौंद डाला था। मैत्रेयी अपने बचपन को अनाथ बनाने वाली माँ को जीवन भर माफ नहीं कर पाती। पद्मा सचदेव के बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया था। पिता की कमी उन्हें अपने पूरे बचपन में खलती रही, इसीलिए वे अपनी आत्मकथा ‘बूँद-बावड़ी’ में लिखती हैं, “मैं चाँद-सितारों से गढ़े आसमान को देखती और सोचती, ये सब यहीं कहीं रहते होंगे। मन में एक तारा टूटकर आसमान में खो जाता। अगर मेरे पिताजी होते तो मैं इन सबसे मिल सकती थी, इन सबको देख सकती थी। पर मैं तो यतीम थी। मेरी माँ कोई कमी न रहने देती थी, पर कदम-कदम पर पिता की याद रास्ता रोक लेती थी।” जहाँ कहीं संकट में घिरती, उन्हें अपने पिता की याद आती। पिता रूपी सुरक्षा कवच बचपन में ही छीन लिया गया था। लेकिन पद्मा सचदेव एक जिन्द़ादिल स्त्री थीं, जिसने इस कमी को तो महसूस किया, पर कभी आगे बढ़ने से रूकी नहीं। सुशीला टाकभौरे का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बानापुरा (पुराना नाम बरहानपुरा) गाँव में एक दलित परिवार में जन्म हुआ। सुशीला जी अपने बचपन के बारे में अपनी आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ में लिखती हैं, “किसी गरीब-अछूत के बच्चे का पालन-पोषण जैसा होता है, उसी तरह मेरा पालन हुआ। मैं सुख-वैभव के पालने में नहीं झूली। अधिकतर नानी ही हमें सँभालती थी। अभाव थे मगर प्रेम और अपनापन भी था। पहली बार घुटना चलने पर, पहली बार पाँव चलने पर, पहली बार बोलने पर मेरे लिए भी घर-परिवार में खुशी हुई थी। दो साल के बाद छोटा भाई मोहन आ गया था तब से मैं नानी के पास ही अधिक रही। मोहन के बाद कैलाश हुआ लेकिन वह अधिक दिन जीवित नहीं रहा। उसके बाद कमल हुआ। जब हम भूख से रोते,माँ, नानी हमें काली चाय के साथ रोटी खिला देती थीं। कभी प्यार से, कभी गुस्से से थपककर सुला देती थीं। इसी तरह खाते, खेलते, रोते हम बड़े होते रहे।” इनके खिलौने पुरानी चिन्दियों से बने होते थे। सुशीला जी बचपन से ही दलितों पर हो रहे सवर्णों के अत्याचार को देखते आई है। वे अपने जीवन को ठीक तरह से नहीं जी पाने का मूल अपने बचपन को मानती हैं, उन्हीं के शब्दों में, “कभी लगता, मैंने अपने जीवन को पूर्ण रूप में नहीं जीया। जिन्दगी की गहराई में गहरी पैठ तो लगाई है मगर मुझमें ऊँची छलाँग लगाने का मनोबल नहीं जागा, न ही मैंने ऐसा हौसला किया। इसका कारण है, बहुत ठोस और सबल कारण है। मध्यप्रदेश की वर्णभेद-जातिभेद की मानसिकता और सामाजिक व्यवहार के बीच जन्मी, पली-बढ़ी एक अछूत जाति की लड़की में कितना मनोबल हो सकता था? हर बात के लिए बन्धन, अपमान, अंकुश। अब इस शिंकज़े का दर्द महसूस हो रहा है।” बचपन की इन घटनाओं के कारण उनमें बार-बार हौसले की कमी दिखाई देती है। उन्होंने यह भी देखा कि एक काम करने वाले मजदूरों में भी जातीय श्रेष्ठता का भाव होता है, जिसके चलते वे दलितों से दूर रहकर ही काम करते हैं। सुशीला जी का जन्म ऐसे समाज में हुआ था, जहाँ लड़कों की पढ़ाई को ही मनाही थी। लेकिन सुशीला के माता-पिता ने सुशीला जी को उच्च शिक्षा के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। स्कूली जीवन में कुछ कटु अनुभव भी आये, पर पढ़ाई छूटने के डर से वे अपने घरवालों को नहीं बताती हैं। शीला झुनझुनवाला के जीवन में रामायण और गंगा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वे अपनी आत्मकथा ‘कुछ कही कुछ अनकही’ में लिखती हैं, “रामायण और गंगा-इनसे अगल करके यदि मैं अपने बचपन को देखूँ तो उसमें कुछ शेष नहीं रहता। जिस समय में लड़कियाँ गुड़्डे-गुड़ियों का खेल खेलती हैं, उस उमर में मैं रामायण और गंगा से जुड़ी रही, न कोई संगी-साथी, न बचपन की कोई सहेली। बचपन का नटखटपन, ऊधम, शोर, छेड़छाड़-मैंने जानी ही नहीं।” माता-पिता और ताईजी के अनुशासन में पली शीला जी को गंगा से जुड़ी भगीरथ की कहानी ने भी बहुत प्रभावित किया। वे लिखती हैं, “भगीरथ के जीवन ने मुझे उस कच्ची उमर में ही, बहुत प्रभावित किया और शायद, यही कारण था कि मन में सदैव एक आत्मबल रहा और एक लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मैंने जो भी निश्चित किया, उसकी अड़चनों को सदैव अनदेखा किया।” इस तरह के बचपन के कारण ही शीला जी अपने जीवन के हर मोड़ पर संघर्ष कर पाई और अपनी गृहस्थी को सुखमय बनाने में कामयाब रही। मराठी स्त्री आत्मकथाकारों ने भी अपने बचपन के बारे में लिखा है। माधवी देसाई का बचपन खुशहाली में बीता। वे पिता के प्रेम के लिए कुछ समय तक तरसती रही। उनके पिता अपने अन्य बेटियों से बातचीत करते थे, लेकिन माधवी से बातें नहीं करते थे, इस बात का उन्हें बड़ा दुख होता था। वे अपनी आत्मकथा ‘नाच ग घुमा’ में लिखती हैं, “...पर पिताजी मुझसे बात क्यों नहीं करते? उनको बोलना चाहिए, माँ मुझे अपने पास लो। मैं भीतर ही भीतर रोती थी।” माधवी के माँ ने दूसरी शादी की थी, जिसके कारण उनके दूसरे पिता के बच्चे उनका अपमान करते थे, पर उनकी सौतेली माँ उन्हें प्यार करती थी। जब सरोज ने उन्हें कहा कि यह घर तुम्हारा नहीं है, तब उन्हें पहला धक्का लगा। वे लिखती हैं, “अभी तक पिता का प्यार दिखाई नहीं दिया था, सिर्फ उनका डर और उनके द्वारा मुझे अनदेखा करना देखकर रोना आता था और इन दोनों से जो रूप पिता का बनता था, वह मेरे दिल पर रेखांकित हुआ था। पर वे मेरे नहीं है, इस वाक्य से मैं पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। इन सब लड़कियों से मुझ में कुछ कमी है, इसका दुख मुझे रूला रहा था।” माधवी जी में कोई कमी नहीं थी, क्योंकि उनके टीचर और अन्य लोग उनके पढ़ाई और स्वभाव की खुब तारीफ करते थे। पिता का इस तरह का व्यवहार कुछ दिनों तक ही रहा। एक घटना के बाद से माधवी को वे चाहने लगे, माधवी को भी इस बात से बहुत अच्छा लगा। वे अपने पिता के वात्सल्य भरे प्रथम स्पर्श के बारे में लिखती हैं, “एक बार सदा को कुत्ते ने काट लिया। बहुत बुरी तरह से काटा था। मैं उसे देखकर रोने लगी, .....पिता ने मुझे पास लिया, माँ से कहा, “लीला, यह लड़की बहुत अच्छी होगी!” वह उनका पहला स्पर्श! उस स्पर्श से मैं भीतर तक हिल गई थी। ये ‘मेरे पिता’ है ऐसा उस दिन दिल से लगा था। उस दिन से मुझे अच्छा बनना है, इस भावना से मैं जीने लगी। रोज सबेरे गाँधी जी के चौबारे पर सर रखकर नमस्कार करती थी। पिता को श्रीकृष्ण पसंद है, इसलिए उसकी पूजा करती थी।” पिता के एक स्पर्श ने माधवी के बचपन को संवारा, सौतेली माँ का व्यवहार भी सौतेला नहीं था, उनसे माधवी जी को प्यार ही मिला। इन सबके कारण उनका बचपन सुखमय बीता। रणजीत देसाई अपनी पत्नी माधवी देसाई को तलाक देना चाहते थे, लेकिन माधवी देसाई तलाक देने से मना कर रही थी। तलाक देने से मना करने का एक कारण उनका अपने मायके प्रति प्यार ही था। वे जानती हैं कि एक तलाक शुदा बेटी के माँ-बाप पर क्या गुजरेगी। बचपन में पिता द्वारा सिखाई गयी बातें उन्हें जीवन की हर मुश्किल समय में रास्ता दिखाती है। इसी बचपन ने उन्हें मजबूत बनाया था, इसी के फलस्वरूप वे इतना संघर्ष कर पायी। गिरिजा कीर की माँ का देहान्त बचपन में हो गया था, पिता और बुआ ने उनको पाला। माँ के अभाव के कारण वे अपने बचपन को ठीक तरह से जी नहीं पाई। वे अपनी आत्मकथा ‘माझ्या आयुष्याची गोष्ट’ में लिखती हैं, “मेरा बचपन अत्यंत सुखमय, आनंदमय बीता ऐसा नहीं कह सकते। माँ से अलग होकर मैं अकेली, उदास और दबी मनःस्थिति में जी। पारिवारिक नाते संबंधों के तनावपूर्ण जीवन में मेरी आवाज़ दबी हुई ही रही। माँ से अलग हुये बच्चे इसी तरह अकेले, लावारिश होते होंगे।” बचपन बिन माँ के गुजरा, लेकिन पिता ने कभी माँ की कमी महसूस होने नहीं दी। बुआ माटू की डाँट-फटकार हमेशा सुननी पड़ी, वे कभी बुआ की बात मानती और कभी बुआ के खिलाफ विद्रोह कर बैठती। इस तरह उनका बचपन गुजरा। सरोजिनी बाबर के पिताजी शिक्षक थे। सरोजिनी जी को बचपन से ही अच्छे संस्कार मिले। पिता और उन के मित्रों से छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्य कथाएँ सुनी। जिस घर के लड़के सरोजिनी के पिता से पहले स्कूल नहीं गये थे, ऐसे घर की लड़की को पढ़ाने का धैर्य सरोजिनी के पिता ने दिखाया। वे अपनी आत्मकथा ‘माझ्या खुणा माझ्या मला’ में लिखती हैं, “जिस घर का लड़का भी पिताजी से पहले स्कूल नहीं गया था, उसी घर की मेरे जैसी लड़की को उन्होंने पढ़ने के लिए भेजा।” पिता जी उन्हें अनेक शौर्य कथाएँ सुनाई, जिसके फलस्वरूप उनके भीतर अपने देश के लिए कुछ करने का ज़ज्बा जगा। जिसके फलस्वरूप वे पहले ही चुनाव में विधायक बन पायीं। बचपन से ही राजनीति का पाठ घर पर ही मिला। इस तरह बचपन से ही सरोजिनी बाबर के व्यक्तित्व और कृतित्व निर्माण होनो की प्रक्रिया शुरु हो गयी थी। शिरीष पै ने अपने बचपन में अपने माता-पिता को लड़ते-झगड़ते देखा। उनकी माँ का तबादला नासिक के गव्हर्मेंट गर्ल्स हाईस्कूल में हुआ था, वहाँ वे प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त हुई थीं। उनके पिता फिल्म बनाने के लिये मुंबई जाते हैं। इस कारण आये फासले के बारे में शिरीष अपनी आत्मकथा ‘वडिलांच्या सेवेशी’ में लिखती हैं, “उनमें और मेरी माँ में एक विचित्र फासला निर्माण हुआ था। मैं उस समय बारह साल की थी। मेरी उम्र भी बड़ी चमत्मकारिक थी। और उसी समय हमारा छोटा-सा परिवार टूट गया।” इसके बाद उनकी माँ और उनका घर से बाहर निकलना दुश्वार हुआ था। लोग ताने मारते थे। इसीलिए उनकी माँ ने अपने घर और काम तक ही अपने को बाँधे रखा। शिरीष ने अपने सहपाठियों को पिता की फिल्मों के कारण चिढ़ाने पर झगड़े भी किये। इन सबके बावजूद शिरीष को एक अच्छे माता-पिता मिले, जिन्होंने उनका और उनकी पढ़ाई का पूरा ख्याल रखा। उर्मिला पवार का बचपन दलित परिवार में बीता, उन्होंने अपना बचपन गाँव के दलितों के बीच गुजारा। पिता शिक्षक थे, लड़कियों को पढ़ाना चाहते थे, पर वे थोड़े गुस्सेल भी थे। उर्मिला जी के सर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। माँ आयदान बनाकर बेचती थी। उसीसे उनका गुजारा होता था। पिता की मृत्यु के बाद उर्मिला की माँ का अपने बच्चों पर ध्यान न होने के कारण मलिका अमर शेख का बचपन अत्यंत प्रेममय माहौल में बीता। मलिका को बचपन में ही प्लूरसी की बिमारी हुई थी। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी थी कि चौदह साल की उम्र तक मलिका को रोने मत देना। एक तो इस तरह की बिमारी और दूसरे उनके माता-पिता का स्वभाव, जिसके कारण मलिका जी का बचपन सुखमय ही था। पिताजी अमर शेख कम्युनिस्ट थे, घर में बहुत सारी किताबें होती थीं, जिसके कारण मलिका जी को बचपन से ही पढ़ने का शौक लगा। पिता ने भी उन्हें किसी बात की कमी महसूस होने नहीं दी। वे अपने बचपन का एक प्रसंग अपनी आत्मकथा ‘मला उद्ध्वस्त व्हायचंय्’ में बताती हैं, “ मैं ऐसे ही एक बार बिमार थी, पिताजी पच्चास रुपये की बड़ी गुड़िया लाये....उस तरह की गुड़िया मुझे आज तक दिखाई नहीं दी... बाल-कथाओं की किताबें, टारजन, बेताल, चांदोबा, हैन्स एन्डरसन की परिकथा, स्टील का चुल्हा-बर्तन...इन सबमें पूरी तरह मैं डूब गयी थी। आगे भी कभी हमें घर में किसी बात की कमी पड़ने नहीं दी।” बिमार होने पर भी माता-पिता के प्यार के कारण मलिका जी का बचपन अत्यंत समृद्ध था। उन्हें केवल खिलौने ही नहीं मिले बल्कि, अच्छी-अच्छी किताबें भी पढ़ने को मिली। जिसके कारण उम्र के सातवें साल से ही उन्होंने कविता करना शुरू किया था। इन स्त्रियों पर बचपन में किये गये संस्कारों का, सामाजिक परिवेश और आर्थिक स्थिति का असर जीवन भर दिखाई देता है। इन सभी आत्मकथाकारों के बचपन की घटनाओं, बचपन मिली उपेक्षाओं और अकेलेपन का प्रभाव उनके पूरे जीवन पर पड़ा। वे उससे उभरने का प्रयत्न बार-बार करती हैं। उसमें से कुछ लोग सफल भी हुए। मन्नू भंडारी जैसी सफल कथाकार बचपन में पैदा हुई कुण्ठा से जीवन भर उभर नहीं पायीं। प्रभा खेतान का अपने उम्र से काफी बड़े और शादिशुदा डॉ. सराफ से प्यार करने के पीछे भी उनका उपेक्षा भरा बचपन ही रहा है। डॉ. सराफ के यहाँ उन्हें अपने अकेलेपन से छुटकारा मिलता है, यह छुटकारा कुछ समय के लिए ही क्यों ही न हो। कृष्णा अग्निहोत्री भी अपने बचपन के हादसों से उभर नहीं पाती हैं। बड़ो द्वारा बच्चों का किया गया यौन-शोषण भी बच्चों के मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालता है। सुशीला टाकभौरे ने कहा है कि बचपन की कमियों के कारण वे अपने जीवन को पूरी तरह जी नहीं पायीं। इन कमियों के कारण ही जीवन भर उनके हौसले में कमी नज़र आती है। इसी बचपन के आधार पर किस प्रकार उनका जीवन आगे बढ़ता है, जिसका विस्तृत उल्लेख इस अध्याय में आगे होगा। मराठी स्त्री आत्मकथाकारों का बचपन अच्छा ही गुजरा है। किसी ने बचपन की किसी कुण्ठा का जिक्र अपनी आत्मकथा में नहीं किया है। गिरिजा कीर को माँ का प्यार नहीं मिला, लेकिन पिता ने कभी माँ के प्यार की कमी महसूस होने नहीं दी। उर्मिला पवार के पिता का देहांत बचपन में हुआ, पर उनकी माँ ने अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाया। माधवी देसाई को बचपन में कुछ समय के लिए अपने पिता का प्यार नहीं मिला। बचपन में माधवी को अपनी सौतेली माँ और पिता दोनों से प्यार मिला। जिसके कारण ही वे तलाक देना नहीं चाहती हैं, तलाक देकर अपने मायके की इज्जत खराब नहीं करना चाहती हैं। अपने पिता द्वारा बतायी गयी हर एक बात जीवन के हर एक कठिन मोड़ पर उन्हें याद आती हैं। इस तरह जिनका बचपन अच्छा बीता, या माता-पिता से बचपन में अच्छे संस्कार मिले, वे स्त्रियाँ जीवन के हर मोड़ पर कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे बढ़ती गयीं। इस तरह हम कह सकते हैं कि किसी भी व्यक्ति के जीवन के बनने और बिगडने में उसके बचपन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 3.2 स्त्री का मानसिक एवं शारीरिक अनुकूलन सीमोन द बोउवार का प्रसिद्ध वक्तव्य है, “स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है।” सीमोन का यह वक्तव्य समाज में स्त्री बनने- बनाने की प्रक्रिया को उजागर करता है। स्त्री पर बचपन से ही कुछ विशेष संस्कार डाले जाते हैं। उसका मानसिक अनुकूलन किया जाता है। बचपन से ही स्त्री होने के कारण उसपर बंधन लादे जाते हैं। सीमोन इसको औरत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य बताते हुए लिखती हैं, “औरत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह बचपन से केवल दूसरी औरतों के हाथ में प्रशिक्षण के लिए छोड़ दी जाती है। लड़के का भी पालन-पोषण माँ द्वारा होता है, लेकिन माँ के मन में उसके पौरूष के प्रति सम्मान रहता है। लड़का बहुत जल्दी स्त्री-जगत से भाग खड़ा होता है, जबकि लड़की को उसी जगत में रहना पड़ता है।” लड़की बचपन में माँ की देखरेख में घर का कामकाज सीखती है। जबकि लड़के को घर के काम काज से छूट मिलती है। लड़की होने के कारण उसके खेल भी लड़कों से भिन्न हो जाते हैं। स्त्रियों को जो माहौल मिलता है, वह सबसे ज्यादा स्त्री की वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार होता है। यह माहौल जिसमें वह पैदा होती है, बड़ी होती हैं तथा जीवनयापन करती है। बच्चियों को बचपन से ही मार-पीटकर लड़की के रुप में परिवर्तित किया जाता है और लड़कियों को डरा-धमका कर महिला के रुप में परिवर्तित किया जाता है। इस परिवर्तन की प्रक्रिया के दौरान स्त्री को कभी उसकी इच्छा के बारे पूछा नहीं जाता और न उसे कोई जानने की कोशिश भी करता है। स्त्री बनाने की प्रक्रिया में उन्हें यह समझाया जाता है कि उन्हें क्या करना है और कैसे करना है, ताकि उनके भीतर स्त्रियोचित गुण पनप सकें। बच्ची को स्त्री बनाने की रवायत में उसके आसपास का परिवेश, परिवार, समाज सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उसे स्त्री बनने के गुर सिखा रहे होते हैं। वह लड़की इस प्रक्रिया के बीच कभी भी खुद से अपना निर्णय नहीं लेती। उसका कर्तव्य सिर्फ दूसरों के बताए रास्ते पर चलना बना रहता है। चूंकि बचपन में बच्चे जो कुछ सीखते हैं, उसे ताउम्र याद रखते हैं। लिहाजा, उन्हें अपनी समझ के आधार पर परिपक्व नहीं होने दिया जाता। लड़की को स्त्री बनाने का लक्ष्य रहता है। इसके लिए उसे बचपन से ही परिवार के संरक्षण में (शुरू में पिता और भाई के संरक्षण में, फिर पति के और उसके बाद पुत्र के संरक्षण में) रहने और उन्हीं की इच्छानुसार जीवन यापन करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। जिससे, स्त्रियाँ अपनी व्यक्तिगत जरूरतों और अपेक्षाओं को नजरअंदाज कर पारिवारिक कर्तव्यों की पूर्ति में जुटी रहती हैं। उनके लिए यही स्त्रीत्व का मतलब हो जाता है। इससे उभरने की कोशिश कुछ स्त्रियाँ करती हैं। पर अधिकतर स्त्रियों के हाथ असफलता ही लगती है। स्त्री बनने की इस प्रक्रिया से हिन्दी स्त्री आत्मकथाकारों को भी गुजरना पड़ा। प्रभा खेतान की माँ अपने लड़कियों को पढ़ाई से ज्यादा घर का कामकाज सीखाना चाहती हैं। प्रभा खेतान की माँ चाहती है कि अन्य लड़कियों की तरह उनकी भी बेटी घर का काम काज सीखें, अपनी बेटियों का नाम गोखले मेमोरियल कान्वेन्ट स्कूल से कटवाती हैं, और कहती हैं, “घर बैठो, राई-जीरा चुनो, सिलाई-कढ़ाई करो। नानी मुझे देखकर कहती –यह तो छोरी लम्बी ताड़ होती जा रही है। अरे बेटा पुरणी! जरा इन दोनों छोरियों का नाक तो छिदा दे, दोनों ब्याहने लायक हो गई है। हाँ माँजी, गीता को दसवाँ लग गया और प्रभा को नौवाँ।” प्रभा की माँ उनसे ड्रेस की जगह साड़ी पहनने के लिए कहती है। अम्मा ने कहा, “अब यह फ्रॉक-व्रॉक नहीं चलेगा। साड़ी पहनो।” लड़की से औरत बनाने की पूरी तैयारी की जाती है। कपडों में बदलावा किया जाता है। प्रभा की नानी को सबसे बड़ी चिंता शादी की होती है। इसीलिए लड़की के शरीर के साथ-साथ उसके मन को भी उसी लायक बनाकर उसमें स्त्रियोचित गुणों को भरना चाहते हैं। लड़की को स्त्री बनाने का एक और रास्ता है, उसे शिक्षा से दूर किया जाये। उसे पढ़ने-लिखने और धर्म की किताबें पढ़ने तक की शिक्षा मिलनी चाहिए। इन सबके बाद वह घर का कामकाज सीखे। चंद्रकिरण सौनरेक्सा की माँ भी एक प्रसंग में कहती है, “तो आगे पढ़ाने की जरूरत क्या है। इसने कौन-सी नौकरी करनी है! रामायण पढ़ लेती है। किशोरी भी किताबें लाकर देता है हिंदी की, वह सब पढ़ती हैं; धोबी, बनिये का हिसाब-किताब रखती है। अब इसे कुछ घर का काम सीखने दो – मसाला पीसना, दाल-रोटी बनाना......” यह संस्कार हर घर में बेटियों को दिये जाते हैं, उसे ज्यादा पढ़कर क्या करना है। एक स्त्री होने के नाते उसे घर का कामकाज आना चाहिए। इस तरह माँ के हाथों उसको बचपन से ही स्त्री बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अगर लड़कियाँ घर का कामकाज नहीं कर पाती है तो उन्हें व्यंग्य बाणों का भी सामना करना पड़ता है। चंद्रकिरण जी द्वारा सब्जी जल जाने पर उनको अपनी माँ से डाँट तो पड़ती ही है, और जब पड़ोसन दादी को इस बात का पता चलता है, तो वह चंद्रकिरण जी पर व्यंग्य करते हुए कहती है, “अरे तो दुल्हन! फिकर काहे की। ससुराल जायेगी तो ससुर को मोज़े बुन देगी, सास को सूटर बुन देगी, देवर को कढ़ा हुआ कुर्ता दे देगी- फिर सबसे कह देगी – खाना तुम सब होटल में खा आओ। तुम्हारा नाम चमका देगी।” इस तरह लड़कियों की मानसिकता को स्त्रियोचित बनाने के लिए डाँट-डपट के साथ तानों का भी सहारा लिया जाता है। लड़कियाँ चाहते, न चाहते हुए भी इस तरह के माहौल के कारण औरत बनने पर मजबूर हो ही जाती हैं। शीला झुनझुनवाला जब साप्ताहिक हिन्दुस्तान में संपादक थी, तब डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने एक बार शीला जी से कहा था, “शीला बहन, आपके और ठाकुर भाई के जीवन को मैंने बहुत करीब से देखा है। आप दोनों एक-दूसरे को प्यार भी करते हैं, झगड़ते भी हैं- आम पति-पत्नी की तरह छोटी-से-छोटी और फालतू-सी लगनेवाली बात पर भी। ठाकुर भाई में तेजी है, आप में धीरज है।” डॉ.लाल को जवाब देते समय शीला झुनझुनवाला ने बताया है कि किस तरह लड़कियों का बचपन से अनुकूलन होता है, वे लिखती हैं, “लाल भाई, हम औरतों को बचपन से यह महसूस कराया जाता है कि हमारे विचारों और कर्मों का कोई महत्व नहीं है। हमें सदैव दूसरों के साथ सामंजस्य करके चलना है। धीरे-धीरे जब अपने स्वतंत्र विचार बनने लगते हैं, तब तक हर स्थिति के साथ सामंजस्य बैठाना एक ‘आदत’ बन जाती है।” यही आदत स्त्री को इन्सान मानने नहीं देती। न ही वह स्वतंत्र रूप से कुछ सोच पाती है। वह अपने पति के स्वभाव और माँग के अनुसार जिन्दगी भर ढ़लती रहती है। स्त्री का मानसिक अनुकूलन बचपन से ही शुरु हो जाता है। वह क्या बनना चाहती है, इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं होता है, सब लोग मिलकर उसे एक सुघड़ स्त्री के रूप में ढालने का दिन-रात प्रयत्न करते रहते हैं। घरवाले-बाहरवाले आते-जाते उसकी हर एक हरकत पर नज़र रखे हुए होते हैं। इसी तरह के माहौल के कारण न चाहते हुए भी स्त्रियों को समाज के तानों से बचने के लिए अपने आपको समाज के नियमों के अनुसार ढ़ालना पड़ता है। मराठी के स्त्री आत्मकथाकारों को भी इस अवस्था से गुजरना पडा। गिरिजा कीर जी की बुआ माटु हमेशा ‘स्त्री का जीवन कैसे होता है’ के पाठ पढ़ाती थी। माटू बचपन में ही विधवा हो गयी थी, पति के मृत्यु के बाद उनका मुंडन किया गया था। पति के मृत्यु के बाद उनके जीवन में अकेलापन आ गया था। इस अकेलेपन ने उन्हें कठोर भी बनाया था। माटू अपनी भांजी गिरिजा कीर को स्त्री जीवन के बारे में बताते हुए कहती हैं, “…स्त्री की जाति में पैदा होना बहुत खराब होता है। तू लड़की है, विवाह करना और बच्चे पैदा करना, इतना हम औरतों के नसीब में। एकाध विधवा होती है..उसका तो और भी दुर्देव। पति नहीं है और पिता का भी घर नहीं...” स्त्री के जीवन से संबंधित यह विचार कम उम्र में विधवा हुई स्त्री के अपने निजी अनुभव से उपजे हुये थे। लड़की को विवाह से पहले एक सुघड़ गृहणी के गुणों से युक्त बनाने का प्रयत्न पूरा समाज करता रहता है। गिरिजा कीर की स्कूल में सिलाई सिखाने वाली शिक्षिका खोतबाई ने घाघरा सही न सीने पर कहा था, “आईये महारानी, उस घाघरे को उधेडकर ठीक तरह से सीकर लाईये। कक्षा में होशियार हो इसका मतलब यह नहीं की दुनिया को जीत लिया। कल सिलाई पसंद करनेवाला पति मिला तो रोओगी, रोओगी” खोतबाई की इस सलाह का सीधा अर्थ निकल रहा था, गिरिजा जी अपने भावी पति के लिए सिलाई काम सिखना चाहिए। चाहे उस काम में मन लगे न लगे। विवाह के लिए इस तरह लड़की की मानसिकता को तैयार किया जाता था। विवाह के बाद पति को खुश करने के लिए पत्नी को बहुत सारी कलाएँ आनी चाहिए। खोतबाई की यह बात सच भी हुई। सास और पति ने पूछ ही लिया था, ब्लाऊज सीने आता है, स्वेटर बुनने आता है। लेकिन गिरिजा ने कहा था स्वेटर बुनने में जो समय लगता है, उसे मैं पढ़ने में लगाऊंगी। पति का कहना था, “तो मुझे तू स्वेटर बुनकर देने तक क्या मैं जिन्दगी में कभी स्वेटर इस्तेमाल नहीं करूँगा। गृहणी को यह सब काम आना चाहिए।” इस तरह एक लड़की को विवाह योग्य बनाने के लिए उसका मानसिक अनुकूलन किया जाता है। स्त्री को घुँघट में रखने की परम्परा रही है। लड़कियों को पुरुषों के सामने या घर से बाहर चलते हुए नज़रे झुकाकर चलने का पाठ घर परिवार और समाज के सदस्य देते हैं। माधवी देसाई को उसके साथ स्कूल में पढ़ने और पड़ोस में रहने वाले बाबा यादव ने सर पर पल्लू न होने के कारण रोककर कहा, “आबे(प्यार से माधवी को कहते हैं), मैं रोज देखता हूँ। सर पर ठीक तरह से पल्लू क्यों नहीं लेती हो? सरपर पल्लू लेती जा। नहीं तो देख, कह देता हूँ” जिसके सर पर पल्लू नहीं है , वह लड़की नहीं है, पल्लू नहीं होगा तो देख लेगें। इस तरह की डाँट-डपट के आगे लड़कियाँ मजबूर होकर अपने-आप को समाज के नियमों के अनुसार ढ़ालने लगती हैं। बच्चे जब घर-घर खेलते है, उन खेलों को देखकर पता चलता है कि इन बच्चों को किस हद तक अनुकूलित किया गया है। बच्चे भी मानते हैं कि पति का पूरा अधिकार पत्नी पर होता है। उर्मिला पवार लिखती हैं, “कभी-कभी हम पति-पत्नी का खेल भी खेलते थे। कुंती हमसे बहुत बड़ी थी। वह खेल में तीनों का पति बनती थी और हमसे उसे जो लगता था वह काम करवाती थी, जो भी उसे लगे....!” इस तरह हम देखते हैं कि किस तरह बच्चों के दिल में यह बात बिठा दी गयी हैं कि पति कुछ भी कर सकता है, पत्नी को उसकी बात माननी पड़ेगी। स्त्रियों का केवल मानसिक अनुकूलन ही नहीं होता है, बल्कि शारीरिक अनुकूलन भी किया जाता है। इस तरह का अनुकूलन दुनिया के अन्य देशों में भी होता है। “चीन की प्रचलित रीति थी जिसमें महिलाओं के पैरों की अंगुलियों को सिर्फ इसीलिए मोड़ दिया जाता था ताकि उनके पैर छोटे रहें क्योंकि छोटे पैर सुंदरता की निशानी होते हैं। वहीं दूसरी ओर बर्मा में महिलाओं की सुंदरता को लंबी गर्दन से जोड़कर उन्हें बचपन में ही गर्दन में भारी भरकम छल्ले पहनने के लिए मजबूर कर दिया जाता था और उम्र के साथ-साथ इन छल्लों की संख्या भी बढ़ा दी जाती थी ताकि महिलाओं की गर्दन लंबी रहे। इतना ही नहीं कई अफ्रीकी देश ऐसे हैं जहां महिलाओं के कानों में अत्याधिक वजन वाले कुंडल पहना दिए जाते हैं जिससे कि उनके कान लंबे रहें क्योंकि उनके अनुसार लंबे कान खूबसूरती की निशानी होते हैं।” इस तरह स्त्री के शरीर को आकार देकर उसे एक सुंदर शरीर के रुप में परिवर्तित किया जाता है। उर्मिला पवार ने अपनी आत्मकथा ‘आयदान’ में इसका उल्लेख किया है, वे लिखती हैं, “लड़का-लड़कियों के शरीर के रखरखाव के भी स्त्रियों के और मेरी माँ के हिसाब थे। मालिश करते समय लड़कियो के हाथ के तलवे छोटे करने के लिए मुट्ठी में उसको कसते थे, लड़कों के फैले हुए होने के लिए अंगूठे से दबाते थे, उंगलियों को खिंचती थीं। पैरों को भी उसी प्रकार से करते। लड़कियों के कूल्हे न दिखे, इसलिए ऊपर से नीचे दबाते थे, तो लड़कों के दिखाई दे इसलिए इसके विपरीत किया जाता था। लड़कियों की कोख, कमर को ज्यादा दबाया जाता था, और उनकी सांस रूकने तक नाक को दोनों अंगूठे से ऊपर उठाया जाता था, लड़कों के नाक को छूते भी नहीं थे।” इस तरह विवाह के बाज़ार के लिए बचपन से ही लड़कियों को तैयार किया जाता था। इस तरह लड़कियों को परिवार के लोगों के साथ-साथ समाज के अन्य सदस्य भी उसका मानसिक अनुकूलन करते रहते हैं। लड़कियाँ अगर प्यार से मान जाती है तो ठीक है, नहीं तो डाँट-डपटकर या व्यंग्य कर उसको स्त्रियोचित बनाया जाता है। इस तरह लड़कियों को इन सब बातों की बचपन से ही आदत पड़ जाती हैं, इन सबके फलस्वरूप वह स्वतंत्र रूप से सोचना भी भूल जाती हैं। लड़कियों को एक सुंदर शरीर में बदलने के लिए उसका शारीरिक अनुकूलन भी किया जाता था। 3.3 लैंगिक भेदभाव भारतीय समाज में लड़कों को लड़कियों की अपेक्षा बहुत महत्व दिया जाता है। घर में बेटी का पैदा होना एक तरह से मनहूस माना जाता है। बेटी के पैदा होने की खुशी न माँ-बाप के चेहरे पर दिखाई देती हैं, न ही परिवार के अन्य सदस्यों के। माँ को बेटी होने पर अपने घर-परिवार वाले के कहने पर गिराना पड़ता है। बेटा पाने के लिए दो-तीन बेटियों को पैदा नहीं करना चाहते है। हमारे समाज में बेटियों को पालना-बड़ा करना पड़ोसी के बगीचे को बिना किसी लाभ के पानी देने के समान माना जाता है। आप उन्हें बड़ा करते हैं, हर तरह से उनकी सुरक्षा करते हैं, उनके विवाह की योजना भी बनाते, दहेज की व्यवस्था करते और इसके बाद वह पराये घर चली जाती है। इस दृष्टि से देखें तो बेटे वंश परंपरा को आगे बढ़ाते, बुढ़ापे में माता-पिता की देखभाल भी करते और मृत्यु के बाद धार्मिक कर्म-कांड करते हैं। बेटियों को पढ़ाना और शादी की उम्र तक उनके अपने पसंद के कार्य करने के लिए स्वतंत्रता देने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। यह सब मात्र परिवार पर बोझ बढ़ाता है। लड़कियों के बारे में इस प्रकार की धारणा पितृ प्रधान समाज में विशेष रूप से पायी जाती है, जिसे चुनौती दिए जाने की जरूरत है। लड़कियों के प्रति इन्हीं धारणाओं के कारण भारतीय समाज में लड़कियों को पैदा होने से पहले से ही लैंगिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। लेखिकाओं की आत्मकथाओं में लैंगिक भेदभाव के बहुत सारे उदाहरण भरे पड़े है। इस प्रकार का लैंगिक भेदभाव कामकाज़, कपड़े, खाने-पीने की चीजें, शिक्षा, खेल आदि स्तर पर देखा जा सकता हैं। लड़कियों के नाम से ही हमारे समाज में लैंगिक भेदभाव का पता चलता है। पद्मा सचदेव की एक बहन का नाम संतोष रखा गया था, संतोष नाम रखने का कारण पद्मा सचदेव बताती है, “वहीं एक घर याद आता है। शायद हम दूसरी या तीसरी मंजिल पर रहते थे। वहाँ मेरी एक बहन तोषी भी थी। पता नहीं कब पैदा हुई, पर वो थी। उसका नाम संतोष था। संतोष नाम इसलिए भी रखते थे कि लड़कियों से संतोष हो गया, अब और नहीं चाहिए।” इस तरह लड़कियों के नाम भी लैंगिक भेदभाव का शिकार हुये हैं। लड़कियों के जन्म के साथ ही उसके साथ भेदभाव वाला व्यवहार परिवार के लोग करना शुरु करते हैं। कृष्णा अग्निहोत्री की माँ को जब लड़की होती है, तब उनके पिताजी ने डॉ. जीवनलता से हताश होते हुए कहा था, “फंसा दिया न तुमने एक लड़का हो जाने दो, हो गयी न लड़की।” कृष्णा जी के पिता अपनी दूसरी लड़की उषा के जन्म के साथ हताश दिखाई देने लगे। पहली लड़की को उन्होंने बहुत प्यार किया, कभी हिकारत की नज़र से नहीं देखा था। कृष्णा जी को तब समझ में आया कि लड़के से ज्यादा लड़की का महत्व समाज में होता है। इसीलिए अपनी माँ से वह पूछ लेती हैं, “ “अम्मां तुमने डॉ. से भइया क्यों नहीं माँगा?” मेरे इस निर्दोष प्रश्न से माँ आहत हुई थी।” कृष्णा अग्निहोत्री के पिता की मानसिकता को तो समझ भी सकते है, वे अपने परिवेश और समाज के अनुसार सोच रहे थे। लेकिन कुसुम असंल भी बेटा होने पर गर्व महसूस करती हैं, उस समय उनके आनंद का कोई ठिकाना नहीं था। दो बेटियों के बाद प्रणव का जन्म हुआ था। प्रणव के जन्म के समय की अपनी स्थिति के बारे में बताते हुए कुसुम जी लिखती हैं, “…मैं पीड़ा और सुख से अचेतनता में खो गई थी, जब आँख खोली तो लगा, कोई गंधर्व गीत गा रहा है, वह एक पूर्ण हो आने का पल था-विपरीतताओं के मध्य एक सुख का पल था। सुशील ने मेरी थकी आँखों में झाँककर ‘थैंक्स’ कहा था, मुझे लगा उनके लिए कुछ कर पाने का शायद यही एक प्रयास था जो मैं निभा सकी थी।” पितृसत्तात्मक समाज में बेटे की महत्ता होती है, जो यहाँ दिखाई देती है। लगता है, कुसुम जी की पहचान बेटे के जन्म के साथ हुई है, बेटे के बिना तो उनकी जिन्दगी अधूरी थी। वे बेटे के जन्म के कारण पूर्णता का अनुभव करती हैं। इसी पितृसत्ता का दंश जो उन्होंने बचपन में झेला था, और आगे भी झेलती रही है, वे उसे भूल जाती हैं। अपने पति के लिए कुछ कर पाने के प्रयास की सफलता से खुश हो जाती है। लड़कियों को घर की सीमाओं में रहना बचपन से सिखाया जाता है। उनके खेल भी घर की सीमा के अन्दर के ही होते हैं। लड़के बिना किसी की इजाजत के दुनिया घूम कर आ सकते हैं। मन्नू भंडारी अपनी बहन के साथ सारे खेल घर के भीतर ही खेलती थीं। वे लिखती हैं, “…अपने से दो साल बड़ी बहिन सुशीला और मैंने घर के बड़े से आँगन में बचपन के सारे खेल खेले-सतोलिया, लँगड़ी-टाँग, पकड़म-पकड़ाई, काली-टीलों-तो कमरों में गुड़डे-गुड़ियों के ब्याह भी रचाए पास-पड़ोस की सहेलियों के साथ। यों खेलने को हमने भाइयों के साथ गिल्ली-डंडा भी खेला और पतंग उड़ाने, काँच पीसकर माँजा सूतने का काम भी किया, लेकिन उनकी गतिविधियों का दायरा घर के बाहर ही अधिक रहता था और हमारी सीमा थी घर।” बातें स्पष्ट थीं, लड़कियों को आज़ादी थी, लेकिन एक सीमा के भीतर ही। उनके खेल भी घर की सीमा के भीतर खेले जाने वाले होते हैं। लड़कों और लड़कियों की शिक्षा में भी अंतर होता है। लड़कियों को अपने मन पसंद विषय चुनने का अधिकार नहीं होता है। पिताजी या भाई ही उनके स्कूल या कॉलेज के बारे में निर्णय लेते हैं। कुसुम असंल के पिता कुसुम जी को उनके मन मुताबिक कोर्स पढ़ने नहीं देते हैं। वे ‘प्री मेडिकल’ की परीक्षा में बैठने की पूरी तैयारी भी करती हैं, फिर भी पिताजी उन्हें इस परीक्षा में बैठने नहीं देते हैं। उनके उनुसार, “मेरी बेटी क्या मीडवाईफ बनेगी, दाई लोगों के बच्चे जनवायेगी, नहीं कभी नहीं।” कुसुम जी भी अपनी ना न कहने की आदत के कारण पिताजी से कुछ बोल नहीं पाई। लेकिन कुसुम जी के पिता ने अपने लड़कों को पढ़ने के लिए विदेश भेजा। एक तरफ हम देखते हैं कि लड़की अपना विषय तक चुन नहीं पाती है, दूसरी ओर लड़कों को लंदन जाने की अनुमति भी मिलती है। कुसुम असंल लंदन में मनोविज्ञान का कोर्स करना चाहती थीं, पर पिता ने मना कर दिया, कुसुम अंसल लिखती हैं, “उन दिनों मेरे दोनों बड़े भाई लंदन में इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे। मेरा भी बहुत मन होता कि मैं भी वहाँ पढूँ और मनोविज्ञान का कोर्स कर लूँ, पर पापा की दलील थी, लड़कियों को कौन विदेश भेजता है।” पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों को पराया धन मानता है, जिसके चलते वे अपनी लड़की की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहता है। इसी लैंगिक भेदभाव के चलते स्त्रियों का मानसिक और सामाजिक विकास हो नहीं पाता है। पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों की प्रगति में बाधा बनकर खड़ा हुआ है। शीला झुनझुनवाला के साथ लैंगिग भेदभाव हुआ था, उनको लड़कों की तरह खुलकर जीने नहीं मिलता है, न ही उनकी पढ़ाई के लिए कोई टीचर घर बुलाया जाता है, इसीलिए वे लिखती हैं, “लड़की होना मानों जंजीरों में जकड़े रहना। लड़के और लड़की एक रेखा के दो छोर- लड़कों पर सारा प्यार-दुलार लुटाया जाए, वह पढ़े नहीं तो टीचर रखा जाए। मैं नहीं पढूँ तो किसी कोई को वास्ता नहीं। क्या फायदा ज्यादा पढ-लिखकर। आखिर, मुझे तो चुल्हा ही झोंकना है। लड़कों की आवारागर्दी और सौ खून माफ और मुझे इन बंधनों में जकड़कर रखना कि यहाँ नहीं जाना, वहाँ नहीं जाना। इतनी रुकावटें कि दो कदम भी कहीं आगे बढ़े तो साथ में एक भाई लेकर जाओ, चाहे वह उम्र में मुझसे दस साल छोटा ही क्यों न हो। समय पड़ने पर वह क्या मेरी रक्षा करेगा? मुझे ही उसे संभालना पड़ेगा।” इस तरह के बंधनों के बीच रहते हुए उनका अपना मन और अस्तित्व दोनों बंद हो गये थे। यह बंधन केवल परिवार ही नहीं लादता है, समाज भी बराबर लड़कियों के चाल-चलन पर नज़र रखे हुए रहता है। ऐसे समय में शीला जी अपनी मानसिक अवस्था के बारे में बताती है, “रुकावटों से जूझने के लिए मस्तिष्क अनेक बार हिम्मत करता, चिल्लाता किंतु, न जाने कहाँ से भय और शंकाओं के बादल घिर आते और विद्रोह की भावना तिरोहित हो जाती।” इस तरह शीला जी का मानसिक अनुकूलन उनके परिवार और समाज द्वारा किया गया, जिसके कारण वे विद्रोह करने की चाह रखने पर भी विद्रोह कर नहीं पाती हैं। क्योंकि उनके मन और अस्तित्व पर बंधनों, रुकावटों का जबरदस्त पहरा लगा हुआ है। एक भय हमेशा उनके साथ रहता है। इस तरह के माहौल में रहना एक आदत बन जाती है, जब यह बंधन स्त्री के लिए आदत बन जाते हैं, तो स्त्री विद्रोह की भाषा भूल जाती है। ऐसा ही शीला झुनझुनवाला के साथ भी हुआ। मराठी स्त्री रचनाकार भी लैंगिग भेदभाव का शिकार हुई हैं। हमारा पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों के प्रति लैंगिक भेदभाव उसके पैदा होने से पहले से ही शुरु कर देता है। लड़की होने के कारण उसके साथ अनेक बंधनों को लादता है। लड़का कहीं भी घूम कर आ सकता है, लेकिन लड़की घर या मोहल्ले की सीमाओं में ही घूम सकती है। लड़के को जितने अधिकार मिलते हैं, उतने लड़कियों को दिये नहीं जाते हैं। हमारा पितृसत्तात्मक समाज लड़की के जन्म पर कभी खुशी मनाते हुए नहीं देखा गया। लड़की को बोझ समझने वाला हमारा समाज उसके पैदा होने से पहले या पैदा होते ही मार देना चाहता है। उर्मिला पवार के साथ भी ऐसा ही हुआ था, वे लिखती हैं, “मैं सभी बहन-भाईयों में सबसे छोटी, फिर भी मेरा लाड़-दुलार कभी हुआ ही नहीं। उल्टा, लड़की होने के कारण मेरी किसी को आवश्यकता नहीं थी। मैं पैदा हुई तब गोविंद दादा मुझे गोबर डालने की जगह पर फेंकने के लिए निकला था। मैं जरा बड़ी हुई तो सबसे मैं ही पिटी।” लड़कियों के प्रति इस तरह का भेदभाव ज्यादात्तर दिखाई देता है। ऐसा भी नहीं है कि लड़कियों की पैदा होने से पहले या बाद में हत्या करने की प्रवृत्ति केवल अनपढ़ या गाँव के लोगों में ही है, इस तरह की प्रवृत्ति शहरी और शिक्षित लोगों में अनपढ और गाँव के लोगों की अपेक्षा ज्यादा पाईं जाती है। इन सबके लिए सोच में बदलाव की जरूरत है, जो धीरे-धीरे हो रहा है। लैंगिक भेदभाव का असर आज कल स्त्री शिक्षा पर पड़ रहा है। लोग स्त्री शिक्षा को उतना महत्व नहीं देते, वे सोचते हैं कि स्त्री पढ़-लिखकर क्या कर लेगी, अंत में उसे ससुराल जाकर चुल्हा और बच्चे ही तो संभालने है। उर्मिला पवार के पिता अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहते थे, लेकिन उनके जाति की स्त्रियाँ कहती थी, “लड़की की जाति को पढ़-लिखकर क्या करना है, चुल्हा ही तो फूँकना है।” इस तरह हमारे समाज ने स्त्री का क्षेत्र उसके अनुमति के बिना ही निश्चित किया है। लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखने या उनके मनमुताबिक शिक्षा न दिलाने के प्रयत्न किये जाते हैं। हम अपने घरों में खाने-पीने के चीजों को लेकर भी लिंगभेद करते हैं। लड़कों को मलई वाला दूध मिलता है, और लड़कियों के हिस्से में सिर्फ खाना आता है। सरोजिनी बाबर लोगों को स्त्री शिक्षा और अधिकारों के बारे में समझाते हुए कहती हैं, “लड़कों की तरह ही लड़कियों को दूध पीने को दो कहते ही लोग दौडने को आकर, कहते “बेटा घर का आधार, बेटी पराया धन!..आपको कोई काम नहीं इसलिए कीर्तन लगाया है?” ऐसी बातें निकलती थी। ..इसके अलावा, “बेटी को स्कूल में भेजने के बाद घर का काम कौन करेगा? छोटे बच्चों को कौन संभालेगा? भैंसों के पीछे कौन घूमेगा? आपके पिता या मेरे पिता?”” यहाँ देखा जा सकता है कि ग्रामीण भारत में स्त्रियों के साथ किस तरह का लैंगिक भेदभाव किया जाता है। शिक्षा तो दूर की बात है, खाने-पीने के चीजों को लेकर ही स्त्री के साथ लैंगिक भेदभाव किया जाता है। वे लोग समजते हैं कि लड़की तो पराया धन है, इसे चाहे जितना भी अच्छा खिलाओ आखिर घर छोड़कर जाना ही है। लड़के की चाह ने हमारे यहाँ स्त्री भ्रूण हत्याएँ दिनों-दिनों बढ़ती जा रही है। इसके खिलाफ सरकार ने कानून भी बनाया है, पर लोगों की मानसिकता में अभी बदलाव नहीं आया है। माधवी देसाई के पति माधवी जी से बेहद प्यार करते थे, लेकिन दो बेटियों के जन्म के बाद उन्हें बेटे की चाह थी। जिसे माधवी जी पूरा कर नहीं पाई। इस कारण उनके पति कहते हैं, , “तुम सबकुछ देती हो; पर मुझे जो चाहिए वह देती नहीं हो। तो मुझे गुस्सा आता है।” माधवी जानती हैं पति किस संदर्भ में कह रहे हैं, “पर उन्हें ‘जो’ चाहिए था, वहीं पर मैं कमजोर पड़ रही थी। उन्हें लड़का चाहिए था। मुझे डर लगता था। उस बच्चे का पालन-पोषण कैसे होगा? पहले ही दो लड़कियों को बड़ी मेहनत से पाला था।” माधवी के पति पढ़े-लिखे हैं, लड़कियों का भी बड़े प्यार से पालन-पोषण करते हैं। वे चाहते हैं लड़कियाँ अच्छे कपड़े पहने, ईस्त्री किये हुए, बूट और साक्स पहने। पर इन सबके बावजूद उनको एक कमी खल रही थी, वह थी लड़के की। इस तरह के लैंगिक भेदभाव भारत के ग्रामीण क्षेत्र से लेकर शहरी क्षेत्र तक और अनपढ़ से लेकर पढ़े-लिखे लोगों तक फैला हुआ है। यह हर जगह दिखाई देता है। लैंगिक भेदभाव घर, स्कूल, कामकाज की जगह, खान-पान, हर कहीं दिखाई देता है। भेदभाव करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। 3.4 स्त्री शिक्षा भारत में स्त्री शिक्षा की स्थिति के बारे में संतुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट बताती है कि “संयुक्त राष्ट्र के संगठन ‘यूनाइटेड नेशन्स एजुकेशनल, साइंटिफिक, कल्चरल ऑर्गेनाईजेशन’ (यूनेस्को) के अनुसार महिलाओं की शिक्षा के मामले में भारत, दक्षिण और पश्चिम के देशों की सूची में अंतिम पांच देशों में से एक है। भारत में स्त्री शिक्षा की दर 47.8 फीसदी है जिसके चलते उसका स्थान पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों के बीच है।” जहाँ एक ओर हम भारत को सुपर पॉवर बनाने के सपने देख रहे हैं, वहाँ देश की आधी आबादी शिक्षा से वंचित है या उनको पूरी शिक्षा मिल नहीं पा रही है। समाज के सर्वांगीण विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षा ही किसी भी जाति, वर्ग, समाज या देश के विकास का पहला पायदान होती है। राष्ट्र रुपी इमारत को मजबूत बनाना है, तो उस राष्ट्र को अपने यहाँ अच्छी शिक्षा का प्रबंध करना चाहिए। अच्छी शिक्षा मनुष्य को उसके जीवन का उद्देश्य बताती है, उसकी पहचान बनती है। स्त्रियों के जीवन में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। नारी को शिक्षा अपने अस्तित्व, पहचान और सामर्थ्य का विश्वास देने में महत्वपूर्ण योगदान निभाती है। शिक्षा के कारण ही नारी जीवन का विकास हो पाया है। समाज के किसी एक तबके का विकास होने मात्र से उसे पूरे समाज का विकास नहीं कहा जा सकता, उसी तरह पुरुषों की शिक्षा को लेकर सज़ग होने भर से ही हमारे समाज का विकास नहीं होगा। समाज की संरचना स्त्री-पुरुष दोनों के सामाजिक दायित्वों पर आधारित होती है। लेकिन हम अपने समाज कि तरफ देखते हैं तो पाते हैं कि स्त्री शिक्षा के अधिकारों से वंचित है। ऐसे में वह अपने सामाजिक दायित्वों को कैसे निभा पाएगी। अशिक्षा के कारण आज स्त्रियों का शोषण, दमन और उन्हें अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, हमारा समाज भी स्त्री शिक्षा के प्रति उदासीन बना हुआ है। स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं में स्वतंत्रता ‘पूर्व’ और ‘पर’ की स्त्री शिक्षा से संबंधित तथ्य सामने आते हैं। भारतीय समाज स्त्रियों के प्रति दोयम दर्जे की मानसिकता रखता है। जिसके चलते स्त्री शिक्षा के प्रति हमारे समाज का बड़ा तबका उदासीन है। स्वतंत्रता आंदोलन और आर्य समाज के आंदोलनों के कारण स्त्री शिक्षा को कुछ हद्द तक बढावा मिला। गांधीजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि, “स्त्रियों को वही शैक्षिक सुविधाएँ दी जाएँ जो पुरुषों के लिए हो। यदि हो सके तो उन्हें विशेष सुविधाएँ मिलनी चाहिए” गाँधी जी के विचारों के प्रभाव से समाज सुधार की लहर चली थी, इसका असर बहुत सारे लोगों पर पड़ा और अपनी बेटियों को पढ़ने का अवसर दिया। स्त्री शिक्षा को लेकर अनेक धारणाएँ है, जैसे- ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की को शादी के लिए आसानी से लड़का मिलता नहीं या मिलता ही नहीं। स्त्री को चिट्ठी-पत्री लिखने-पढ़ने तक पढ़ना आना चाहिए। लड़कियाँ ज्यादा पढ़-लिखकर क्या कर लेगी? लड़कियों को पढ़ने-लिखने के लिए विदेश भेजने की क्या जरूरत है? लड़कियों को पढ़ाई से ज्यादा घर का कामकाज़ सीखना चाहिए। इन सभी बातों का सामाना स्त्री रचनाकारों ने किया। साथ ही उन्हें अपनी माँ,पिता, बहन और भाईयों से लिखने-पढ़ने के लिए प्रोत्साहान भी मिला। प्रतिभा अग्रवाल को पिता और पति दोनों ने ही पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रतिभा अग्रवाल की माँ का देहांत हो जाने के कारण घर में कामकाज भी करना पड़ता था। अपनी पढ़ाई के बारे में प्रतिभा जी लिखती हैं, “माँ की मृत्यु वाले साल अग्रवाल कन्या पाठशाला में छठी की परीक्षा दी, कक्षा में प्रथम रही। स्कूली पढ़ाई एक बार समाप्त हुई। कन्या पाठशाला में उन दिनों छठीं कक्षा तक ही पढ़ाई होती थी। आगे की पढ़ाई के लिए हिन्दू स्कूल जाना पड़ता जो घर से दूर था। फीस ज्यादा लगती, आने-जाने का बस का खर्च लगता, अच्छे कपड़े-लत्ते चाहिए थे और ऊपर घर का काम करने के लिए समय न रहता।” प्रतिभा अग्रवाल ने घर से ही मैट्रिक की, घर में उनके भाइयों ने पढ़ाई में मदद की। पिता ने संगीत सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। पिता ने जो उनको संगीत के संस्कार दिये थे, उसे वे जिन्दगी भर भूल नहीं पाती हैं। प्रतिभा अग्रवाल के पति मदन बाबू प्रगतिशील विचारों वाले थे। उनके कथनी और करनी में अंतर नहीं था, इसीलिए उन्होंने अपनी पत्नी को विवाह के बाद भी पढ़ने दिया। प्रतिभा जी शिक्षा और व्यक्तित्व विकास में लाठ दम्पति का भी योगदान है, उनके योगदान के बारे में प्रतिभा जी बताती हैं, “आज बैठकर सोचती हूँ तो पाती हूँ कि मेरे व्यक्तित्व के विकास में लाठ दम्पत्ति का महत्वपूर्ण हाथ था। मदनजी का व्यक्तित्व तो तब तक विकसित हो चुका था पर साढे चौदह साल की मैं उस मिट्टी-सी थी जिसे कोई भी आकार दिया जा सकता था। मदनजी ने मुझे जिस रास्ते पर ले जाने का निर्णय किया, उसकी प्रेरणा उन्हें भी शायद इन्हीं लोगों से मिली थी। मुझे शिक्षा प्राप्त करना है, साहित्य, कला, संस्कृति के क्षेत्र में प्रगति करनी है, स्वतन्त्र चिन्तन की क्षमता अर्जित करनी है आदि बातें जैसे मेरे लिए निर्धारित थीं। मोहन बाबू सचमुच आधुनिक विचारों वाले थे और स्त्री की स्वतंत्रता तथा उसके विकास में आस्था रखते थे।” इस तरह एक पूरा माहौल शिक्षा और व्यक्तित्व विकास के लिए प्रतिभा जी को मिला, जिसके चलते वे अपने व्यक्तित्व का विकास कर पाईं तथा साहित्य, नाटक, रंगमंच, और अनुवाद के क्षेत्र को अपना योगदान दे पाईं। कुसुम असंल को उनके माता-पिता से ज्यादा बुआ और फुफा ने पढ़ने में मदद की। आगरे के घर में बहुत सारी सुख-सुविधाएँ नहीं थी, पर कुसुम असंल जी को यहाँ सांस लेने के लिए खुली जगह मिली थी और मिला था, पढ़ने का माहौल, जो अलीगढ़ के बड़े घर में कभी नहीं मिली था। आगरे के पापा को पढ़ने को बहुत शौक था, इसलिए अपनी बेटी को रसोई की बजाय, किताबों के साथ समय बिताने के लिए कहा। वे लिखती हैं, “अगर मैं रसोई में माँ का हाथ बटाती तो कहते, नहीं, तुम सब्जी नहीं काटोगी, तुम औरों जैसी नहीं हो, तुम्हें तो कविता पढ़नी है।....परिणामस्वरूप मेरा अस्तित्व एक बदलाव में ढल रहा था, मुझे पुस्तकों से प्रेम हो चला था- खूब सारे नये पुराने उपन्यास पढ़ती- कविताएँ पढ़ती।” एक तरफ आगरे के पिता कुसुम असंल को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे, दूसरी ओर इनके अपने पिता अपनी बेटी की पढ़ाई के बारे में चिंतिंत दिखाई नहीं देते हैं। वे अपनी बेटी को मनमुताबिक कोर्स भी चुनने नहीं देते हैं, कुसुम जी अपने भाईयों की तरह विदेश में पढ़ना चाहती है, लेकिन माता-पिता लड़की होने के कारण मना कर देते हैं। मन्नू भंडारी के पिता ने अपनी बेटियों को शिक्षा के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। मन्नू भंडारी लिखती हैं, “ पिताजी का ध्यान भी पहली बार मुझ पर केन्द्रित हुआ। लड़कियों को जिस उम्र में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुघड़ गृहिणी और कुशल पाक-शास्त्री बनाने के नुस्खे रटाए जाते थे, पिताजी का आग्रह रहता था कि मैं रसोई से दूर ही रहूँ। रसोई को वे भटियारखाना कहते थे और उनके हिसाब से वहाँ रहना अपनी क्षमता और प्रतिभा के भट्टी में झोंकना था” आर्य समाजी पिता ने अपनी बेटियों की पढ़ाई पर कोई रोक नहीं लगाई, बल्कि उनको प्रोत्साहित करने का कार्य किया। वे अपनी लड़कियों के जीवन को रसोई तक ही सीमित नहीं रखना चाहते थे, इसी कारण घर में होने वाली राजनीतिक बहसों को सुनने का मौका अपनी लड़कियों को दिया। इस तरह मन्नू जी के पिता ने अपनी बेटियों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया। प्रभा खेतान की माँ अपनी बेटियों की शादी को लेकर चिंतित होने के कारण अपनी बेटियों का नाम स्कूल से निकलवा देती है, वे कहती हैं, “घर बैठो, राई-जीरा चुनो, सिलाई-कढ़ाई करो। नानी मुझे देखकर कहती- यह छोरी तो लम्बी ताड़ होती जा रही है। अरे बेटी पुरणी! जरा इन दोनों छोरियों का नाक तो छिदा दे, दोनों ब्याहने लायक हो गईं। हाँ माँजी, गीता को दसवाँ लग गया और प्रभा को नौवाँ।” यहाँ पर लड़कियों की शिक्षा की चिंता से ज्यादा चिंता उनके ब्याह को लेकर है। प्रभा खेतान के पिता भी गाँधी जी के विचारों से प्रभावित होने के कारण बाल विवाह का विरोध करते हैं। प्रभा और उनकी बहनों को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रभा खेतान की माँ भी कुछ समय बाद मान गई कि घर के काम और बच्चे पैदा करते रहने के कारण उनका शरीर तो खराब हुआ ही, लेकिन जीवन में अपने लिए कुछ विशेष कर नहीं पायी। चंद्रकिरण सौनरेक्सा ने अपनी पढ़ाई घर का काम करते-करते पूरी की है। किताबें भी दूसरों से मंगवाकर पढ़ीं। वे पढ़ाई में तेज़ होने के कारण हर परीक्षा में सफल होती गईं। यहाँ पर माँ शिक्षा के विरोध में दिखाई देती हैं, उनको अपने बेटी के विवाह की चिंता है, तो आर्य समाजी पिता अपनी बेटी की पढ़ने की ललक को प्रोत्साहित करते रहते हैं। शीला झुनझुनवाला को अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष करना पडा। शीला जी के साथ शिक्षा को लेकर भी भेदभाव हुआ। उनके भाईयों की पढ़ने में रूचि न होने के बावजूद उनको पढ़ाने घर पर टीचर आता था। वे लिखती हैं, “छोटे भाइयों का पढ़ने में मन नहीं लगता था किंतु वे लड़के थे। उन्हें तो पढ़ाना ही था। एक टीचर रखे गए भाइयों को पढ़ाने के लिए।” शीला डाक्टर बनना चाहती थी, लेकिन उनको पता था कि भाई पहले तो शहर जाकर हॉस्टेल में रहकर पढ़ने की अनुमति नहीं देगे और फिर पैसे की बात तो दूर की कौड़ी ही है। छोटे भाइयों की ट्यूशन लेने वाले टीचर ने उन्हें इस समस्या का हल सुझाया। अपने एक परिचित मारवाडी परिवार की लड़कियों को पढ़ाने का ट्यूशन दिलावाया। इस तरह शीला जी को अपनी पढ़ाई के लिए पहले खुद अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ा। वहीं उनके छोटे भाइयों को, जो पढ़ने में रूचि नहीं रखते थे, पढ़ाने के लिए घर पर टीचर आता था। सुशीला टाकभौरे दलित है। दलितों के यहाँ लड़कों की पढ़ाई के ही कोई मायने नहीं होते है। ऐसे समय में सुशीला जी की माँ ने उन्हें पढ़ाई के लिए पूरा सहयोग दिया। वे लिखती हैं, “मेरी पढ़ाई के लिए माँ ने मुझे विशेष सहयोग दिया। उन्होंने मनोयोग से चाहा मैं विशेष योग्यता प्राप्त करूँ ताकि अच्छी नौकरी कर सकूँ। सन1960 ई. में माँ का इस तरह सोचना उनका प्रगति-परिवर्तनवादी दृष्टिकोण था। उन दिनों हमारे जाति समुदाय में बच्चों की शिक्षा के प्रति माता-पिता जाग्रत नहीं थे, न लड़कों के प्रति, न लड़कियों के प्रति। “ बच्चों को पढ़ाकर का होयगो? अपनी जात तो वही रहेगी। काम, रोज़गार तो अपनी जात के ही करनो पड़ेगो, फिर क्यों बच्चों को परेशान करें?”” सुशीला जी को स्कूल में दलित होने के कारण अपमान सहना पड़ा। दलित होने के कारण उन्हें सजा भी बहुत देर मिलती रही। वे अपने अध्यापकों को द्वारा मिले अमानवीय व्यवहार के बारे में लिखती हैं, “शिक्षकों की उपेक्षा और अपमान से मेरा मन दुखी हो जाता था। स्कूल के शिक्षक गाँव के सवर्ण हिन्दू महाजनों का बहुत सम्मान करते थे, उसी प्रकार उनके बच्चों को सजा से छुटकारा तुरन्त मिल जाता था। गरीब, पिछडे, अछूत वर्ग के बच्चे घंटों सजा भोगते, मानो गुरुजी उन्हें सजा देकर भूल गये हों। बच्चे रोने लगते तब जैसे गुरुजी को याद आता और वे कहते – “अच्छा, अच्छा...ठीक है, ठीक है....बैठ जाओ।” मेरी सजा ऐसी ही लम्बी होती थी।” इस तरह दलित स्त्री को स्त्री और दलित होने के कारण शिक्षा लेते समय कठिनाइयों का सामाना करना पड़ता है। इस तरह हम देख सकते हैं कि स्त्री शिक्षा को लेकर समाज में सकारात्मक बदलाव आ रहा था। कहीं-कहीं पुराने विचारों के लोग भी मिल जाते हैं, जिनके लिए स्त्री के जीवन में शिक्षा से ज्यादा उसके विवाह का महत्व है। बेटी को एक बोझ की तरह मानने के कारण उसके विवाह की तैयारी में सब लोग जुट जाते हैं। स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव तो आया है, फिर भी इसे पूरी तरह बदलाव नहीं कह सकते हैं। विषयों और कोर्स को चुनने का अधिकार आज भी स्त्रियों को नहीं है। स्त्री अपने मन पसंद कॉलेज, विषय या कोर्स को नहीं चुनती है। यह कार्य उनके माता-पिता या भाई करते हैं। दलित स्त्रियों का हाल सवर्ण स्त्रियों से और भी गया गुजरा है। स्त्री शिक्षा को लेकर हमने देखा है कि गाँधीजी, आर्य समाज और क्रिश्चन मिशनरी की वजह से समाज के कुछ हिस्से में परिवर्तन दिखाई देता है। लोग गाँधी जी को मानते थे, गाँधी जी ने लोगों को स्त्री शिक्षा का महत्व समझाया था। इन सबका का असर गाँधी जी के अनुयायियों पर पड़ा और उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाया। मराठी स्त्री रचनाकार आत्मकथाकारों में से किसी के भी घर से पढ़ाई करने के लिए ना नहीं कहा गया। सभी स्त्रियों को घरवालों ने शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया। सुनीता देशपांडे जी के पिता चाहते थे कि उनकी बेटी खुब पढ़े-लिखे। सुनीता देशपांडे लिखती हैं, “अप्पा(पिता) को लगता था, मैं वकील बनूँ, बैरिस्टर बनूँ।... पर मैंने उन्हें निराश ही किया।” गिरिजा कीर को उनके पिता और बुआ माटु ने भी पढ़ने की आज़ादी दे रखी थी। दोनों ने भी पढ़कर कामयाब मनुष्य बनने के लिए कहा था। गिरिजा कीर की बुआ कहती थी, “रमी, तुम पढ़ो। बहुत पढ़ो। इतनी पढ़ो, कि कोई तुम्हें कमजोर न समझे और विवाह, पति, पुरुष इन झंझटों में भी मत पड़ना। एक बार इनमें अटक गई तो फँस गई। विवाह हो गया तो पति और बच्चे। तुम तेजस्वी हो। स्वाभिमान से जीना सीख। तुम बड़ी हो जाओगी तो दुनिया तुम्हारे कदमों में आयेगी।” माटु के इस तरह की सलाह गिरिजा कीर को देने का कारण उनका अपना जीवन था, कम उम्र में ही विधवा होने के कारण बाल मुँड़वाने पड़े। इस तरह बाल मुँड़वाने की प्रथा केवल स्त्री के शरीर को विद्रूप नहीं करती बल्कि, उसके मन पर भी आघात करती है। जो कभी कम नहीं होते। इसलिए वे अपनी भाँजी को बार-बार समझाती हैं। वे अन्य लड़कियों की तरह शादी करके बच्चे और चूल्हा संभालने से मना करती है। सरोजिनी बाबर के पिता भी चाहते थे कि उनकी लड़कियाँ खुब पढ़े। वे अपने पिता के अपनी लड़कियों के शिक्षा के प्रति विचार बताती है, “अपनी लड़की बी.ए. होनी चाहिए, खुब पढ़नी चाहिए , यह पिता की इच्छा थी। उनके पिता ने उनको पढ़ने नहीं दिया ना? इसलिए मुझे और मेरी बहन को खुब पढ़ाना है, ऐसा उन्होंने निश्चय किया।” यह तो हुई सरोजिनी बाबर के पिता के विचार , पर सरोजिनी बाबर विधायक बनकर लोगों को स्त्री शिक्षा का महत्व समझाने लगती है, तो उन्हें अनेक सवालों का सामना करना पड़ता है। वे अपनी एक सभा का अनुभव बताती हैं। एक गाँव की सभा में स्त्री शिक्षा का महत्व समझाते हुए सरोजिनी बाबर ने कहा, “एक लड़की शिक्षित होती है, तो पूरा घर शिक्षित होता है।” इस तरह जब स्त्रियों को स्त्री शिक्षा का महत्व सरोजिनी जी समझाती थी, तो गाँव की औरतों के पास इसका जवाब तैयार रहता था। वे फटाक से कह देती, “हम भी वही कह रहे हैं। लड़की ने घर-परिवार को सम्भालना सीखा, मतलब उसका परिवार ठीक तरह से चलने लगेगा। क्या करना है ग म भ न करके? आपके कहने के अनुसार लड़की ने पढ़ाई की तो वह सर पर बोझ बन जायेगी। एक तो लड़कों के पिता ना कहेंगे या फिर दहेज बढ़ाकर मागेंगे। क्योंकि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ किसी की बात नहीं मानती। उलटे बोलने लगती। किसी को कुछ नहीं समझती। क्यों खरीदे इस तरह की बीमारी?” इस तरह हमारा समाज स्त्री शिक्षा के बारे में सोचता है। पढ़ी-लिखी लड़कियाँ घर को सम्भाल नहीं पाती। पितृसत्तात्मक समाज को लगता है, कहीं पढ़-लिखकर लड़की अपने अधिकार न माँगने लगे। इसलिए जैसी स्थिति पहले है, वैसी ही रहने दो। दुर्गा भागवत ने बचपन में लोगों से पढ़ी-लिखी स्त्री के बारे में अक्सर कहते हुए सुना था कि, “लड़कियाँ कितना पढ़ रही है देखो, ये लड़कियाँ वैवाहिक जीवन में नालायक ही साबित होगी।” यह तो आम लोगों की धारणा थी, लेकिन दुर्गा भागवत के एक अध्यापक काणे, जो उन्हें साईन्स पढ़ाते थे, कट्टर हिन्दुत्ववादी थे। यह स्त्री शिक्षा के विरोधी थे। उनकी भी स्त्री शिक्षा को लेकर आम लोगों की तरह धारणा थी कि पढ़ी-लिखी लड़की की शादी करने में दिक्कतें आती हैं। इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी को चौथी कक्षा के बाद घर पर ही बिठाया। शिरीष पै के पिता आचार्य प्र.के. अत्रे मराठी के बड़े लेखक थे। शिरीष के पिता को अपने बेटियों से बड़ी अपेक्षाएँ थी, खासकर अपनी बड़ी बेटी शिरीष से। वे अपनी बेटी को दुनिया के एक बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ाना चाहते थे। शिरीष अपने पिता की उनकी शिक्षा को लेकर रही अपेक्षाओं के बारे में लिखती हैं, “उनको लगता था कि मैं केंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढूँ। लंदन जाकर बैरिस्टर बनूँ।” शिरिष के पिता को लगता था कि उनकी बेटी विजयालक्ष्मी पंडित की तरह अंग्रेजी बोले। दुर्गा भागवत के जैसा लिखे। शिक्षा के लिए उनके घर में पूरा माहौल था, पर शिरीष पै अपने पिता की इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर नहीं पाईं। वे लेखक बनना चाहती थी और बनी भी। उर्मिला पवार के पिता को क्रिश्चन स्कूल में शिक्षा मिली थी। वे अध्यापक भी थे। वे अपनी लड़कियों को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे। उर्मिला पवार को अपने पिता के मृत्यु के बाद लगा था,“उस दिन लगा था, पिता न मरे। वे जीये। शांतिआक्का को पढ़ई करनी चाहिए, उनकी इच्छा थी, पर वह पढ़ी नहीं। मैं पढ़ूँगी, स्कूल जाऊँगी, आप मत मरो, ऐसा कहने का बहुत मन हुआ।” उर्मिला पवार के पिता सिर्फ अपनी लड़कियों को स्कूल ही नहीं भेजना चाहते थे, बल्कि वे चाहते थे कि लड़कियाँ पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाये। कुछ समय बाद माँ-बाप लड़कियों को पढ़ाने भी लगे। लेकिन उनका अपनी लड़कियों को पढ़ाने का उद्देश्य लड़कियों के व्यक्तित्व का विकास नहीं था। इंदिरा संत अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि , “मैट्रीक परीक्षा मतलब अच्छा लड़का मिलने का सर्टिफिकेट, डिग्री मतलब अमीर घर और दहेज कम” इंदिरा संत को उनके पिता बचपन में आशीर्वाद देते हुए ‘विद्यावंत बनो’ कहते थे, लेकिन समय के अनुसार किस तरह बेटी को शिक्षा से संबंधित आशीर्वाद देने में बदलाव आया इसके कुछ उदाहरण इंदिरा संत बताती है, “ ‘विद्यावंत बनो’ भूलने लगी। ‘पढ़ो-लिखो और अच्छा पति पाओ’, ‘पढ़ो और कमाती बनो,' ‘पढ़ो और सुखी रहो’ यह आशीर्वाद आये। यही आशीर्वाद सुशिक्षित लड़कियों के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं।” स्त्री को शिक्षा तो दी जाने लगी, पर उद्देश्य केवल विवाह के लिए एक अच्छा पति या अमीर घर पाना रह गया। लड़के अगर विवाह के लिए पढ़ी-लिखी लड़की की माँग नहीं करते तो स्त्री शिक्षा का इतना विकास भारत में शायद ही हो पाता। इसका सीधा मतलब निकलता है कि हमारा समाज आज भी स्त्री शिक्षा के विषय में गंभीरता से सोच नहीं रहा है। इन स्त्री आत्मकथारों को शिक्षा लेने से किसी ने रोका नहीं, पर उनके इर्द-गिर्द के लोग अपनी बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहते थे। उनके सामने सबसे बड़ी समस्या लड़की के विवाह को लेकर होती थी। एक बार लड़की का विवाह हो जाये तो, सर से बला टल जाये। वे नहीं चाहते थे कि पढ़ाई और शादी दोनों का खर्चा उठाए। पढ़ी-लिखी लड़की के लिए लड़का ढूँढना भी बहुत मुश्किल काम होता था। ऐसे अनेक कारणों से लोग अपनी लड़की को पढ़ाना नहीं चाहते थे। लेकिन धीरे-धीरे इन विचारों में परिवर्तन आ रहा है। आज लड़कियों को पढ़ाया जा रहा है। लेकिन कोर्स के चुनाव को लेकर लिंग भेद तो दिखाई देता ही है। लड़कों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजने के लिए कर्जा लिया जाता है, वहीं लड़की अपनी मर्जी से कोर्स का चुनाव भी नहीं कर सकती है। इसलिए अभी और बड़े बदलाव की जरूरत है। 3.5 स्त्री शरीर की विशिष्ट समस्याएँ हमारा समाज लड़कियों को अनेक पाबंदियाँ लगाता है, मासिक धर्म के समय इन पाबंदियों का घेरा बढ़ते ही जाता है। माहवारी महिलाओं के शरीर की एक सामान्‍य व महत्‍वपूर्ण प्रक्रिया है। माहवारी की प्रक्रिया को हमारे समाज में बहुत ही गंदा एवं अपवित्र माना जाता है, इसके दौरान महिलाओं पर कई प्रकार की सामाजिक रोक-टोक रहती है। जैसे ही लड़कियों की माहवारी शुरु हो जाती है, उनको कुछ खास हिदायतें दी जाती हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है। जैसे- घर की कई महत्वपूर्ण चीजों को छूने की मनाही, आचार को छूने की मनाही, कहा जाता है, अगर स्त्री माहवारी की समय अचार को छूती है, तो अचार खराब हो जाता है। कहीं-कहीं तो स्नान भी करने की मनाही होती है। और अगर माहवारी किसी कारण समय से पहले आ जाए तो पाप समझा जाता है। दरअसल माहवारी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो यह संकेत देती है कि एक बच्ची अब माँ बनने काबिल हो गयी है। मासिक धर्म शरीर में हो रहे एक शारीरिक परिवर्तन का संकेत होता है, जिसमें योनि के माध्यम से गर्भाशय से रक्त का प्रवाह होता है। यह चक्र लगभग पचास साल तक चलता है। मगर इस सहज स्वाभाविक शारीरिक चक्र को समाज ने हव्वा बना दिया है। हिन्दी में माहवारी के बारे में प्रभा खेतान को छोड़कर किसी भी लेखिका ने नहीं लिखा। प्रभा खेतान की माहवारी दसवें साल से ही शुरु हो जाती है, जिससे उनकी माँ परेशान होती है। माहवारी का आना अपवित्र माना जाता है, जैसे ही प्रभा खेतान कहती है, “डरते-डरते अम्मा से कहा, “अम्मा ! मुझे पीरियड्स...” बस एक भयानक विस्फोट था।“मरणजोगी ! आज ही तुझे यह सब होना था... ? कल तेरे बाबूजी की बरषोदी (वार्षिकी) है। ताई-चाची सब आएँगी और ताई की गिद्ध दृष्टि से कुछ छिप नहीं सकता – भगवती, यह तो साढ़े दस की उमर में ही चौदह की लगने लगी।”” माँ द्वारा कही गयी, ये सब बातें प्रभा खेतान के मन में अपराध बोध जगाती है। प्रभा खेतान के सवालों का जवाब दाई माँ के पास भी नहीं होता है। प्रभा खेतान के कहने पर की माँ उनसे क्यों चिढ़ती है, का जवाब दाई माँ इस तरह देती है, “ई तो कहो कि शहर है, हमार गाँव में तो बियाह के पहिले कवनों लड़की का ई महिना सुरु हो जाय तो माँ-बाप का सर पर पाप का बोझ बढ़त है।” स्त्री शरीर में उम्र के साथ होने वाले बदलाव की प्राकृतिक क्रिया को स्त्री के सर पाप बनाकर मढ़ देना, हमारे ही महान समाज में हो सकता है। मासिक धर्म के समय जो बंधन स्त्री पर कसे जाते हैं, उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं हैं। यह बस पितृसत्ताक समाज में स्त्री को बंधन में रखने के अनेक प्रकारों में से एक प्रकार है। हमारा पढ़ा-लिखा समाज अभी-अभी इसे मात्र एक स्त्री शरीर में होनेवाला स्वाभाविक बदलाव मान रहा है। रजोनिवृत्ति के बारे में केवल प्रभा खेतान में अपनी आत्मकथा में लिखा है। रजोनिवृत्ति के बारे में हिन्दी विकिपीडिया ने लिखा है- “रजोनिवृत्ति होने पर स्त्री के शरीर में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के पविर्तन हो जाते हैं। बहुधा ये परिवर्तन इतनी धीमी गति से तथा अल्प होते हैं कि स्त्री को कोई असुविधा नहीं होती, किंतु कुछ स्त्रियों को विशेष कष्ट होता है। रजोनिवृत्ति को अंग्रेजी में मेनोपॉज़ कहते हैं, जिसका अर्थ 'जीवन में परिवर्तन' है। यह वास्तव में स्त्री के जीवन का पविर्तनकाल होता है। इस काल का प्रारंभ होने पर चित्त में निरुत्साह, शरीर की शिथिलता, निद्रा न आना, शिर में तथा शरीर के भिन्न भिन्न भागों में पीड़ा रहना, अनेक प्रकार की असुविधाएँ, या बेचैनी होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं। बहुतों के शरीर में स्थूलता आ जाती है। आनुवंशिक या वैयक्तिक उन्माद की प्रवृत्तिवाले व्यक्तियों को उन्माद, या पागलपन होने की आशंका रहती है। अन्य प्रकार के मानस विकास भी हो सकते हैं।” प्रभा खेतान मेनोपॉज के कारण अपना संतुलन खो बैठती हैं, वे लिखती हैं, “सन्तुलन कहाँ रख पाती हूँ, और मेनोपॉस के बाद, पोर-पोर से फूटती हुई निराशा, मेरा चेहरा कभी कपूर की भाँति धक से जल से जल उठता, कभी हेथलियाँ पसीज उठतीं, कभी रातों की नींद उड़ जाती।” अपने रजोनिवृत्ति को न छीपाते हुए वे डॉक्टर सुजीत से कहती है और सुजीत उन्हें सुझाव देते हुए कहते हैं, “हाँ, माँ बनने के अलावा आप सब कुछ कर सकती हैं। निराश मत होइए...मगर हॉरमोन लीजिएगा..., अन्यथा मानसिक संतुलन नही रख पाइएगा।” इस तरह प्रभा खेतान रजोनिवृत्ति के बारे में डॉक्टर सुजीत उन्हें सही सुझाव दे पाते हैं। लड़कियों को शुरुआत में इन सबका पता नहीं होता। इस तरह की बातों पर घर में चर्चा भी नहीं की जाती है। इसलिए मासिक धर्म को लेकर लड़कियों के मन में अनेक तरह के भ्रामक विचार चलते रहते हैं। लड़कियाँ नहीं चाहती हैं कि कम उम्र में मासिक धर्म प्रारंभ हो। किसी-किसी लड़की को जल्द ही शुरू हो जाता है। उसे छिपाने की लाख कोशिश की जाती है। लड़कियाँ जल्दी बड़ी दिखना नहीं चाहती है, इसके लिए अनेक उपाय करती है। उर्मिला पवार ने अपनी आत्मकथा में मासिक धर्म के समय लड़कियों की मानसिक स्थिति के बारे में बताया है। वे लिखती हैं, “..मासिक धर्म का आना मतलब औरत बनना...बड़ा होना। दरअसल, हमें छोटा रहना चाहिए, बड़ा नहीं बनना, बड़ा नहीं दिखना, ऐसा हम सबको लगता था। इसलिए उम्र चुराते थे। ज्यादा से ज्यादा कसी हुई और सपाट ब्रेसीयर का इस्तेमाल करते थे।” लड़कियों के इस तरह के व्यवहार के पीछे के कारणों का भी पता चलता है। लड़कियाँ जानती हैं, शादी के बाजार में जाना हैं, तो शरीर अच्छा दिखना चाहिए। इसी कारण अपने शरीर को कम उम्र का दिखाने का भरसक प्रयास करती हैं। मासिक धर्म शब्द का प्रयोग भी औरते नहीं करती हैं, उसकी जगह ‘कौवे ने छूआ’ कहा जाता है। जो समाज ‘मासिक धर्म’ शब्द को ही अपवित्र मानता है, वह समाज लड़कियों के साथ मासिक धर्म के समय कैसा व्यवहार करता होगा, कितने बन्धन स्त्रियों पर लादता होगा। इन बन्धनों के बारे में उर्मिला जी ने लिखा है, “मासिक धर्म के कारण अपने पर अनेक बन्धन लादे जायेंगे, ये सबको पता होता था। ये मत करो, बाहर कहीं खड़ी मत हो, मंदिर में मत जाओ, इस तरह की ‘नकार घंटा’ सब तरफ बजती थी। मासिक धर्म के बारे में सबको कुतूहल होता था। किसका आया, किसका नहीं आया, इसकी चर्चा चलती थी।” इस तरह के बन्धन हमारा समाज मासिक धर्म के समय डालता है। जिसमें स्त्री का कोई दोष नहीं है, न ही इस दोष कहा जा सकता है, यह स्त्री शरीर की एक प्राकृतिक क्रिया मात्र है। मासिक धर्म की सही-सही जानकारी के अभाव में हास्यास्पद स्थितियाँ भी निर्माण होती है। उर्मिला की माँ कहती है, “मासिक धर्म के समय पुरुष के केवल स्पर्श से भी बच्चे पैदा होते हैं।” इस तरह की धारणाएँ मासिक धर्म को लेकर थी, लेकिन जब उर्मिला पवार को फिजियोलॉजी-हायजीन की क्लास में अध्यापक ने प्रजनन प्रक्रिया के बारे में बताया, तब माँ ने बताई बातें कितनी भ्रामक थी, इसका पता चला। मलिका अमर शेख के पिता कम्युनिस्ट थे, घर का माहौल भी खुला था। मलिका को पढ़ने-लिखने की आज़ादी थी। मलिका अमर शेख ने मासिक धर्म के संबंध में जानकारी किताबों द्वारा अर्जित की थी। वे मासिक धर्म के कारण शरीर में कैसे बदलाव आता है, मासिक धर्म कैसे शुरू होता है और क्यों? इन सबको जानती थीं। वे अपने मासिक धर्म के समय की स्थिति को इस तरह बयाँ करती है, “मैंने दीदी को बताया। दीदी ने मुझे बताया...समझाया।(मैं अनजान मुद्रा बनाकर गर्दन हिला रही थी।) कितना अलग लग रहा था...अन्दर से...दिमाग शांत...मौन...खून में कूछ घूम रहा था,...अरे! यह क्या नया? शरीर के बदलाव के साथ मानसिक स्थिति ऐसी होती होगी क्या? मेरा ही शरीर मुझे नया लगने लगा….आँखें, होंठ---सब पर एक नयी संवेदना..और कमर के नीचे का हिस्सा टूट गया हो...कुछ अलग घटित हो रहा था और नया कुछ तो घटित हो रहा है, इसलिए मन उत्सुक...” मलिका अमर शेख के मन में मासिक धर्म को लेकर कोई भ्रामक मान्यताएँ नहीं थी। इन दो उदाहरणों से एक बात स्पष्ट होती हैं कि बच्चों को सेक्स ऐजुकेशन देनी चाहिए। इसके अभाव में हम भ्रामक मान्यताओं से घिर जाते हैं। जैसा हाल उर्मिला पवार का हुआ, वैसा मलिका अमर शेख का नहीं हुआ। इसका कारण मलिका जी ने किताबों द्वारा मासिक धर्म के बारे में जानकारी हासिल की थी। उर्मिला जी का बचपन आज से 50-60 पहले का है, लेकिन आज भी स्त्रियों को मासिक धर्म के समय घर से बाहर बिठाया जाता है, उनको अचार छूने नहीं दिया जाता है। दूसरी तरफ बाज़ार मासिक धर्म के नाम पर पैड बेचकर करोड़ो कमा रहा है। पैड के विज्ञापन में भी भ्रामक बातें बताई जाती हैं। केवल पैड़ लगाने से ही मासिक धर्म में भी स्त्री उछल-कूद कर सकती है। इस तरह के विज्ञापन में एक प्रतिशत भी सच्चाई नहीं है। इस तरह के भ्रामक विज्ञापन परोसकर बाजार भी स्त्रियों को मासिक धर्म के नाम पर लूट रहा है। इन सब से मुक्ति स्त्रियों को सही शिक्षा देकर ही की जा सकती है। 3.6 प्रेम बच्चन सिंह ने अपनी किताब ‘बिहारी का नया मूल्यांकन’ में लिखा है, “मानवीय जीवन को सरस और सृजनशील बनाने के लिए प्रेम की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। प्रेम के अनेकानेक रूपों में नर-नारी का प्रेम सर्वाधिक पूर्ण तथा तादात्म्यमूलक होता है।” हिन्दी की ज्यादात्तर स्त्री आत्मकथाकारों ने प्रेम विवाह किया है। इनमें ज्यादात्तर का प्रेम असफल ही रहा है। कुसुम असंल ने विश्वविद्यालयीन जीवन में प्यार किया, पर वह सफल नहीं हो पाया। कुसुम असंल और उस लड़के के बीच बहुत बड़ी आर्थिक खाई थी। कुसुम अंसल के क्लास का एक मेधावी छात्र जिसके इर्द-गिर्द क्लास की अन्य लड़कियाँ मंडराती थी। लड़का एक मध्यवर्गीय घर से था और कुसुम एक अमीर बाप की लड़की थी। दोनों के बीच फासले पहले से तैयार थे। उसके साथ कुसुम जी का प्रणय-संबंध स्थापित हो गया । वार्तालाप बहुत नियमित थे, किताबों का आदान-प्रदान होता था, दोनों के बीच चुप्पी थी। इसी तरह समय बीतता गया। परीक्षाएँ समाप्त हो गईं। प्रैक्टिकल बाकी थे, कुसुम जी को उसके एक मित्र ने चिट्ठी लाकर दी। चिट्ठी को देखकर जो रोमांच उनके मन में आया था, वह उसे पढ़कर गायब हो गया। उनके प्रेमी ने पत्र में पाँच सौ रुपये की माँग की थी। कुसुम जी की प्रतिक्रिया इस तरह थी, “ मैं रोमांचित हो उठी, काँपती रही, क्या होगा उसमें, कोई मशवरा, स्थिति का कोई निदान? आश्चर्य, वैसा कुछ नहीं था, उसमें लिखा था, उसे मुझसे सहायता चाहिए – कि पाँच सौ रूपये की आवश्यकता है। कोरा, भावनाविहीन पत्र मुझे एक परिहास लगा, मेरी कोमल भावनाओं को चकनाचूर करने वाला एक दस्तावेज।” उन्होंने अपने पॉकेट मनी और भाईदूज में मिले पैसे जोड़कर पाँच सौ रूपये अपने उस प्रेमी को दिये। इसके साथ ही उनके अन्दर जो विश्वास उन दिनों इस प्रेम के चलते पनपा था, अब वह प्रश्न चिन्ह बनकर उभरा। कुछ सालों बाद कुसुम अंसल का प्रेमी जीवेश ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट’ अहमदाबाद में मिलता है। कुसुम जी उसे सवाल करती है, तो जवाब में जीवेश कहता है, “मैं चाहता था तुम यही समझो, सच को भ्रम समझकर टूट जाने दो, क्योंकि उस समय का सच यही था कि तुम अलीगढ़ के सबसे बड़े परिवार की एकमात्र बेटी थी कि जिसकी परछाई तक छूना मेरे वश की बात नहीं थी, उस समय उम्र ऐसी थी कि कोई दलील काम नहीं आती, अतः सय्यदैन और मैंने वह नाटक खेला था।” जीवेश भावुकता में नहीं बहा, वह जमीनी सच्चाईयों से वाकिफ था। इसलिए उसने स्थिति को बड़ी खूबी से सम्भाला। मन्नू भंडारी ने राजेन्द्र यादव से प्यार किया। मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव की पहली औपचारिक मुलाकात बालीगंज शिक्षा सदन की लायब्ररी के लिए पुस्तकों की सूची बनाने के संदर्भ में हुई। दोस्ती से शुरु हुआ यह सफर, प्यार और शादी तक चला गया। मन्नू भंडारी राजेन्द्र यादव को पाकर खुश थी, राजेन्द्र यादव के पूर्णकालिक लेखक होने पर उन्हें गर्व भी था, उन्हीं के शब्दों में, “ मेरे लिए तो बस यही बड़े सुख-संतोष की बात थी कि एक लेखक- स्थापित, यशस्वी और पूरी तरह लेखक-मेरे मित्र हैं।” अपने इस प्यार को पाने के लिए मन्नू भंडारी को अपने पिता से विद्रोह भी करना पड़ा है। अपने में प्यार इस कदर मन्नू जी डूबी हुई थी कि उन्हें राजेन्द्र यादव का अपगंत्व भी नहीं दिखाई दिया। लेकिन धीरे-धीरे राजेन्द्र यादव की असलियत सामने आती है। वे अपनी प्रेमिका मिता के साथ संबंधों को बनाये रखने के लिए, उनका समान्तर जिन्दगी का फार्मूला और ‘लेखकीय स्वतंत्रता’ के नाम पर छूट पाने चाहते थे। मन्नू भंडारी ने विवाह के बाद अपने पति के मुँह से यह कहते हुए सुना कि, “ देखो, छत जरूर हमारी एक होगी लेकिन जिंदगियाँ अपनी-अपनी होंगी – बिना एक-दूसरे की जिंदगी में हस्तक्षेप किए बिलकुल स्वतंत्र, मुक्त और अलग” इस तरह मन्नू भंडारी का प्रेम और प्रेम से जुड़े सपने चकनाचूर हो गये। यह वही राजेन्द्र यादव है, जो स्त्री मुक्ति की बात बड़े जोर-शोर से करते है, लेकिन स्वयं पितृसत्तात्मक संस्कारों से मुक्त हो नहीं पाये थे। प्रभा खेतान का प्यार अन्य स्त्री आत्मकथाकारों से अलग था। प्रभा खेतान की सन् 1965 ई. में एम.ए. फाईनल की परीक्षा थी। अब कॉलेज की बातें और दोस्त पीछे छूट चुके थे। प्रभा खेतान का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना था। उन के सिर में कुछ दिनों से दर्द था। इसलिए उनकी बहन गीता ने आँखों का चेकअप करवा लेने के लिए कहा और डॉ.सराफ से एप्वाइंटमेंट भी ले ली थी। डॉ. सराफ को पहली बार देखकर प्रभा खेतान को लगा, “पहली बार जब मैंने उन्हें देखा तो पता नहीं क्यों मुझे लगा कि इस व्यक्ति का मेरे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होगा।” प्रभा खेतान को जो लगा वही हुआ। वे डॉ. सराफ को अपना दिल दे बैठी। प्रभा खेतान को अपनी अब तक की जिन्दगी डॉ. सराफ के बाहों में आकर सुरक्षित लगी। कुछ ही समय में दोनों एक हो गए। प्रभा खेतान इस संबंध को आगे बढ़ाना चाहती हैं, लेकिन डॉ. सराफ ऐसा करने से मना करते हैं। वे शादीशुदा और पाँच बच्चों के पिता भी थे। डॉ. सराफ के विवाहेत्तर संबंध थे। वे अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं थे। क्योंकि उनकी शादी उनके मर्जी से नहीं हुई थी। डॉ. सराफ अन्य संबंधो के बारे में कमजोर नहीं हुए थे, लेकिन प्रभा खेतान के संबंधों को लेकर कमजोर दिखाई देते हैं। डॉ. सराफ समाज से डरते हैं। लेकिन प्रभा खेतान प्यार में पूरी तरह डूब चुकी थीं। उन्हें अपने अब तक के जीवन में डॉ. सराफ की बाहों में सबसे ज्यादा प्यार मिला था और सुरक्षित महसूस कर रही थीं। डॉ. सराफ प्रभा खेतान की नादानी का फायदा नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए दूर रहने की बात प्रभा जी से कह चुके थे। लेकिन प्रभा खेतान एक दम जिद्दी थीं। उन्हें भविष्य की कोई चिंता नहीं थी। प्रभा खेतान अपने इस तरह के स्वभाव के बारे में जानती थीं, इसलिए लिखती हैं, “….मुझे पता था जिस राह पर में चल पड़ी हूँ वह गलत-सही जो भी हो पर वहाँ से वापस मुड़ना सम्भव नहीं। इसे ही प्रेम कहते हैं और मुझे अपने प्यार पर पूरा भरोसा था।” इस तरह प्रभा खेतान का डॉ. सराफ से मिलना-जुलना चलता रहा। प्रभा खेतान का प्यार केवल देह तक सीमित नहीं था, लेकिन देह से पूरी तरह परे भी नहीं था। प्रभा खेतान ने अपने प्यार को अविवाहित रहकर जिन्दगी भर निभाया। चंद्रकिरण सौनरेक्सा की कहानी कलकत्ता से निकलने वाली पत्रिका ‘विचार’ में प्रकाशित हुई। कुछ दिनों बाद ‘विचार’ के उपसंपादक कांतिचन्द्र का लम्बा पत्र लेखिका को मिलता है। इसके साथ और भी पत्र आए, और साथ ही उनका परिचय भी। कांतिचन्द्र वकील के बेटे थे, भगवती बाबू के साथ ‘विचार’ में काम करते थे, उनका एक कहानी संग्रह ‘चौराहा’ छप चुका था। बड़े भाई शामलाल का तबादला दिल्ली हुआ। चंद्रकिरण भी अपने भाई के साथ दिल्ली चली गई। कांतिचन्द्र के पत्र शामलाल को दिखाए जा चुके थे। इस तरह कांतिचंद्र से उनका रिश्ता तय होता है। इनके प्यार में कुछ समय बाद खींचातानी शुरु हो जाती है। कांतिचन्द्र शादी के बाद अपना रुप दिखाना शुरु कर देते हैं। जिसके चलते रोज ही इनके बीच झगड़े होने लगते हैं। कांतिचंद्र शक्की मिज़ाज के व्यक्ति थे। जिसके कारण चंद्रकिरण जी अपनी कहानियाँ छपने के लिए कांतिचंद्र जी को देने लगती हैं, वे चाहे तो इसे फाड़कर फेंके या अपने मनमुताबिक किसी पत्रिका को भेजें। इस तरह शादी के बाद कांतिचंद्र में पितृसत्तात्मक संस्कार जगने लगे थे। वे पत्नी के घर रहते हुए भी, छात्रावास से एक लड़की को घर में लाकर शारीरिक संबंध बनाते हैं। रमणिका गुप्ता ने प्रेम और प्रेम-विवाह करके अपने समाज और परिवार में विद्रोह किया था। रमणिका जी को अपना प्यार पाने के लिए बहुत संघर्ष करना पडा, उनको घरवालों ने मारा-पीटा, घर से बाहर निकलना भी बंद किया था। गांधीजी की हत्या का समाचार सुनकर रमणिका गुप्ता और उनके मामा का परिवार उसी रात दिल्ली चला जाता है। रास्ते में वेदप्रकाश गुप्ता से उनका परिचय हुआ। वे लिखती हैं, “रास्ते में वेदप्रकाश गुप्ता, जो उन दिनों सहायक एम्पालमेंट ऑफिसर के पद पर मामा के अधीन कार्यरत थे, से मेरा परिचय हुआ। हम लोगों ने लौटकर शादी करने का निर्णय सुनाया, हालाँकि मेरा परिचय उनसे राजनीतिक परिस्थिति-वश ही हुआ था लेकिन मेरा यह निर्णय मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना थी। जाति तोड़कर और वह भी प्रेम विवाह-दोनों ही परिवार की परम्परा और मर्यादा के लिए चुनौती के रूप में देखे जा रहे थे। मामा ने मेरा घर से निकलना बन्द कर दिया था। माँ आई। मेरी खूब पिटाई हुई पर मैं कटिबद्ध थी । फिर मुझे पटियाला ले जाया गया। रोज़ मार पड़ती। फैसला बदलने के लिए दबाव पड़ता।” इतना विरोध होने के बावजूद उन्होंने वेदप्रकाश गुप्ता से विवाह किया। शादी का निर्णय ही रमणिका गुप्ता ने खुद लिया था, तो शादी के बाद की समस्याओं के बारे में मायके वालों से कभी कुछ नहीं कहा। रमणिका जी लिखती हैं, “क्योंकि प्रकाश से शादी मैंने खुद अपनी मर्जी से की थी इसलिए कष्ट होने पर भी उसकी शिकायत अपने माँ-बाप से कभी नहीं करने का निर्णय मैंने लिया।” इस तरह अन्य स्त्री आत्मकथाकारों की भाँति ही रमणिका गुप्ता को भी बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्हें ससुराल आकर एक प्रकार का विद्रोह बनिया संस्कारों के प्रति करना पड़ा। बनिया परिवार की सारी रुढियाँ और परम्पराएँ एवं छुआछूत को भी यहाँ माना जाता था। इन सबको हटाने के लिए रमणिका जी को अपने ही लोगों के साथ संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने शादी के बाद पढ़ाई के साथ-साथ, नाटक और नृत्य जारी रखा। शीला झुनझुनवाला की प्रेम कहानी किसी फिल्मी कथा से कम नहीं है। अपने पड़ोस में रहनेवाले ठाकुर प्रसाद उर्फ टी.पी.झुनझुनवाला को बीमारी के समय सेवा करने वाली शीला जीवन भर का साथ निभाती हैं। अपने प्रेम के बारे में शीला जी लिखती हैं, “प्रेम के जिस मुकाम पर हम पहुँच चुके हैं, वहाँ इसलिए नहीं हैं कि हमें वहाँ होना चाहिए था या कि हमें किसी ने विवश किया है वहाँ पहुँचने के लिए। बल्कि, इसलिए है कि हम वैसा ही चाहते हैं। एक चरम बिंदु पर पहुँचने के लिए आत्मा की स्वीकृति बहुत आवश्यक है। हर व्यक्ति के अंदर एक दूसरा व्यक्ति होता है। यह दूसरा व्यक्ति ही उसकी अंतरात्मा होती है, जो सदैव उसे सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है। हो सकता है, उसका रास्ता अनेक अड़चनों, बाधाओं और उलझनों के बीच से जाता हो, पर उसको पाने के लिए इन बाधाओं, अड़चनों को झेलना उतना ही जरूरी है, जितना मंजिल पर पहुँचना।” शीला और टी.पी. को लगता था कि वे एक दूसरे के लिए ही बने हुए थे, वे शादी के लिए किसी की अनुमति नहीं चाहते थे, न ही उनको किसी की फिक्र थी। इलाहाबाद में जब परीक्षा समाप्त होने पर टी.पी. ने शीला जी के गले में माला डाली और शीला जी को अपने गले में माला डालने के लिए कहा तो , उनको को यह सब प्यार की रचनात्मक अभिव्यक्ति लगी, इसी समय टी.पी. ने अपने प्यार को परिभाषित करते हुए कहा था, “सुशी, प्यार मनुष्य को डरपोक नहीं, बल्कि निर्भीक बनाता है। प्यार की डोर से बंधा मनुष्य कायदे-कानून से बंधे व्यक्ति से कहीं ज्यादा मजबूत होता है। एक-दूसरे के प्यार की कद्र न करने से किसी भी रिश्ते या प्यार में दरार पड़ जाती है और मैं वायदा करता हूँ कि हमारे जीवन में ऐसा क्षण कभी नहीं आएगा, जब मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र न करूँ।” इस तरह के प्यार को पाकर शीला जी धन्य हो गयी और कहने लगी, “मन की सारी ऊहापोह, शंका उस क्षण जैसे घुल गई। स्वच्छ निर्मल गंगा-से पवित्र इस प्यार की गरमी को पूरे मन से स्वीकारा मैंने। दिन-भर की तपती हुई धरती पर जैसे सावन की फुहारें बरस उठीं।” सावन की ये फुहारें शीला जी के जीवन भर उनके साथ रही। इसका मतलब यह भी नहीं है कि दोनों में कभी झगड़ा या नोंकझोंक नहीं हुई हो। लेकिन दोनों में काफी समझदारी थी, एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते थे। जिसके कारण इनके वैवाहिक जीवन में कभी खट्टास उत्पन्न नहीं हुई। पद्मा सचदेव रेडियों के कार्यक्रमों और कवि सम्मलनों में भी जाने लगी, वहीं उनकी मुलाकात डोगरी के प्रसिद्ध कवि दीप जी से हुई और उन्हीं से मोहब्बत भी। अपने दीप के प्रति आकर्षण के बारे में पद्मा जी लिखती हैं, “दीपजी निहायत सादा व्यक्ति हैं। मैं उनकी ओर खिंचने लगी। वो कभी-कभी मुझे मुहब्बत भरी नज़र से देखते। कई बार कवि सम्मेलनों व गोष्ठियों में मिलना होता।...मुझसे तकरीबन बारह बरस बड़े थे। लेकिन उनकी शायरी, उनकी मासूमियत, उनका खलूस जादू की तरह मेरे सिर पर चढ़कर बोलने लगे।...माँ का भी ख्याल था। पर मुहब्बत में और कुछ दिखाई नहीं देता। न जिम्मेदारी,न विवेक, न समय, न काल। तो साहब दुनिया का सबसे हसीन हादसा गुजर गया। पूरी रूह, पूरे जिस्म्, पूरी दुनिया पर हावी हो गया।” दीप साहब दारू पीते थे, उन्होंने विवाह के बाद दारू छोड़ने का वचन दिया था। पर उन्होंने कभी दारू नहीं छोड़ी। न अपने वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारियों को निभा पायें। पद्मा सचदेव को आँतड़ो की टी.बी. हुई थी, तीन साल एक ही अस्पताल में गुजारने पड़े, उस समय पति के साथ की बेहद आवश्यकता थी, लेकिन दीप जी का साथ नहीं मिल पाया। सुशीला टाकभौरे के गाँव में प्रेमलता का प्रेम जब परवान चढ़ गया था, तब सुशीला टाकभौरे की माँ ने उसे समझाते हुए कहा था,”बेटा, तुम कभी ऐसा नहीं करना। अपनी इज्जत का सवाल है।” माँ के इस तरह समझाने पर सुशीला जी का जवाब था, “मैं ऐसा क्यों करूँगी? मैं तो बूढ़ी ही जनमी हूँ।” सुशीला जी उस समय खुद नहीं जानती थी कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा। लेकिन यौवन का अहसास करानी वाली उमंग उनके जीवन में कभी नहीं आयी। जिस तरह एक आम भारतीय लड़की को उसके घरवाले प्यार के बारे में बताते है, उसी तरह सुशीला जी को भी उनकी माँ और नानी ने बताया था कि प्यार सिर्फ पति से शादी के बाद किया जाता है। आदर्श पत्नी की कहानियों से भी सुशीला जी परिचित थी, इसलिए वे लिखती हैं, “पुरानी हिन्दी फिल्मों से, आदर्श कथा-कहानियों से और माँ-नानी की शिक्षा से यही सीखा था, माता-पिता जिसके साथ मेरा विवाह करेंगे, उसी से प्यार करना है और उसी का प्यार पाना है। अपने मन से किसी अनजान लड़के से प्रेम करना पाप है। प्रेम शादी के बाद पति से ही किया जाता है, यह संस्कार बचपन से मिला था।” इस तरह हम देख सकते हैं कि पढ़ी-लिखी स्त्रियों ने प्रेम किया, अंतरजातीय विवाह भी किया, पर उसे पितृसत्तात्मक बंधनों से मुक्ति नहीं मिली। उसे पुरुषसत्तात्मक समाज के ढ़ाँचें को मानना पड़ा। जहाँ उसने तोड़ने की कोशिश की, वहाँ उसे प्रताड़ना मिली। लेकिन यह भी नहीं कि पुरुष सत्तात्मक समाज के ढ़ाँचें को तोड़ने के प्रयत्न नहीं हुए है। शुरुआत में जो प्यार इन स्त्रियों को मुक्ति का द्वार लगा, वही मुक्तिद्वार विवाह के बाद पुरुषसत्तात्मक समाज के आँगन में खुलता हुआ नज़र आया। हमारी प्यार के प्रति ऐसी धारणा है कि वह प्यार करने वालों को मुक्त करता है, पर शादी के बाद पता नहीं ऐसा क्या हो जाता है, जिससे पुरुष प्रेमी का चोला उतारकर पति बन जाता है। अन्य पतियों की तरह अपनी पत्नियों से अपेक्षा करता है, उसे पितृसत्तात्मक समाज ने जो संस्कार बचपन से दिये हैं, वह अचानक कहीं से सर उठाने लगते हैं। उपर्युक्त सभी प्रेम कहानियों में ऐसा होते हुए देखा है। इन प्रेमियों में सभी पुरुष पढ़े-लिखे हुए है। कुछ तो लेखक भी हैं। जिसे हम संवेदनशील मानते हैं। फिर भी वे अपने संस्कारों से मुक्त हो नहीं पाते हैं। मराठी स्त्री रचनाकार आत्मकथाकारों ने भी प्रेम विवाह किये हैं, इसमें उर्मिला पवार, मलिका अमर शेख, गिरिजा कीर, शिरीष पै, इंदिरा संत आदि हैं। इन सभी स्त्रियों अपने प्रेमियों के साथ शादी भी की हैं। भारतीय समाज विचित्र है, हम फिल्मों में नायक-नायिका के प्यार के पक्ष में होते हैं। जो खल पात्र नायक-नायिका अलग करने के लिए षड़यंत्र रचते उनको देखकर हमें गुस्सा आता है। लेकिन जैसे ही हम थियेटर के बाहर आते हैं और अपने समाज में चले जाते हैं, हमारी सोच थियटर में बैठी सोच से बिलकुल अलग होती है। यहाँ हमारे घर या मौहल्ले की किसी स्त्री को प्यार हो जाता है, तो उसे नैतिकता के काँटे पर तौलने लगते हैं। जो स्त्री प्यार करती हैं, उसके चरित्र को लेकर छिंटाकशी होने लगती है। यह विडम्बना पूरे भारतीय समाज की है। ऐसी भी स्थितियों में प्यार करने वाले अपने लिए समय और जगह ढूँढ़ ही लेते हैं। ऐसे लोगों का घर वालों द्वारा विरोध भी होता है। ऐसे कम ही प्रेमी युगल होंगे जिन्हें प्रेम विवाह करने में दिक्कत न आई हो। स्त्री आत्मकथाकारों को भी इन समस्याओं का सामना करना पड़ा। जहाँ प्यार की परिभाषा देते समय अक्सर कहते हैं कि प्यार हमको बन्धनों से मुक्त करता है। प्यार दोनों को बराबर के अधिकार देता हैं। लेकिन भारतीय समाज में प्यार की यह अवधारणा कुछ शर्तों के साथ लागू होती हैं। इसका कारण हमारे समाज का पितृसत्तात्मक होने में है। लड़का जहाँ एक ओर प्रेमी होता है, वहीं दूसरी ओर वह एक पुरुष, जो समझता हैं कि स्त्री भोग्या है, उसकी दासी या उससे कमजोर होती है। ऐसी स्थितियाँ प्रायः प्रेम विवाह के बाद उत्पन्न होती है। प्रेमी लड़का प्रेम विवाह के बाद पति बन जाता है। वह आम भारतीय पति की तरह बर्ताव करने लगता है। यहीं पर आकर प्यार समाप्त हो जाता है। पति और पत्नी की कमजोरियाँ सामने आने लगती हैं। इन स्त्री आत्मकथाकारों को भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। मलिका अमर शेख के घर का पूरा माहौल मार्क्सवादी विचारों से भरा हुआ था। किताबों की दुनिया में खोनेवाली मलिका। कविता पढ़ने और लिखने वाली मलिका थी। उनके अपने सपनों के राजकुमार को लेकर कुछ सपने थे, वे लिखती हैं, “फक्कड़...कवि... दिखने में स्मार्ट...साँवला... उसके हालचाल में भी पौरूष चाहिए, मर्दानगी चाहिए....” दलित पैंथर के नेता नामदेव ढसाल से प्यार होने का कारण कविता थी। नावदेव ढसाल आन्दोलनों से जूड़ा हुआ नाम था। उनकी जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं था। कब-कहाँ आन्दोलन करने जाये, या कब पुलिस पकड़कर ले जाये, इसका भी कोई भरोसा नहीं था। लेकिन उनकी कविता ने मुख्य धारा की कविता को हिला के रखा था। नामदेव ढसाल, मलिका के जीजाजी अनिल बर्वे के दोस्त थे। अनिल बर्वे पत्रकार थे, इसलिए उनकी नामदेव ढसाल से अक्सर मुलाकत होती थी। अनिल बर्वे के साथ नामदेव ढसाल भी मलिका के घर आने-जाने लगे थे। मलिका को नामदेव ढसाल की पिछली जिन्दगी के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। नामदेव ढसाल, मलिका की कविता की डायरी पढ़ते हैं। यहीं से प्यार की शुरुआत होती है, मलिका के घरवालों का भी कोई खास विरोध इस रिश्ते को लेकर नहीं होता है। मलिका और नामदेव की प्रेम कहानी बहुत ही रोमांटिक है। इस कहानी में रात के समय का समुन्द्री किनारा है, चुम्बन है, मुम्बई को पैदल घूमकर देखने के अनुभव भी है, चेचक से पीड़ित अपनी प्रेमिका के लिए नामदेव ढसाल गुलाबों के फूलों का बुके लेकर आते हैं। मलिका अपने इस अनुभवों के बारे में लिखती हैं, “हम घूमने लगे। फिल्म...नाटक....बाग....समुन्दर। वह बस या ट्रेन में गलती से भी सफर नहीं करता था। टैक्सी या पैदल चलना...पैदल वह बहुत चलता था। इस घुमक्कड़ी में मैं मुंबई का कोना-कोना देख आई।” नामदेव भी अपने दोस्तों से मलिका की पहचान अपनी पत्नी के रूप में करवाते थे। विवाह से पहले ही इन दोनों में इतनी नजदीकियाँ बढ़ी कि इनके बीच शारीरिक संबंध भी स्थापित हो गये। नामदेव ढसाल ने अपनी पत्नी को किसी बात की कमी विवाह के बाद न हो, इसलिए उन्होंने बान्द्रा में किराये पर एक अच्छा मकान लिया। मलिका चाहती थी कि उनका रजिस्ट्रर मैरेज हो, पर कम उम्र होने के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा था और नामदेव ढसाल इन्तजार नहीं करना चाहते थे। इसलिए मालाएँ बदलकर ही विवाह हो गया। मलिका और नामदेव दोनों एक-दूसरे के प्यार में पूरी तरह डूब गये थे। जिसका एक उदाहरण हम नामदेव ढसाल के घर को लेकर दे सकते हैं, मलिका जी को भी नामदेव ढसाल के झोपडपट्टी वाले घर से कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन मलिका की दीदी और माँ का नामदेव ढसाल का घर-परिवार देखने के बाद कहना था, “मैं अपने ही दुनिया में ही थी, पर माँ, दीदी को अच्छा नहीं लगा था। अर्थात...इतने लाड़-प्यार से पली-बढ़ी बेटी इतने गंदगी में कैसे ढकेले, मतलब..फिर दोनों के घर के संस्कार अलग...कवि हुआ तो क्या हुआ..आदि...” नामदेव ढसाल को भी होनेवाली पत्नी के बारे में चिंता थी, उनको लग रहा था कि इस गंदी बस्ती में मलिका जी रह नहीं पायेगी। मलिका लिखती हैं, “ उस भयंकर बस्ती मैं रहूँगी, तो मर जाऊँगी, इस डर से नामदेव ने दो हजार डिपाजीट देकर बांद्रा में जगह ली।” इस तरह हम देख सकते हैं कि दोनों किस हद तक एक-दसरे के प्यार में डूब गये थे। लेकिन यह प्यार भरा जीवन शादी के कुछ सालों बाद बिखर गया। नामदेव ढसाल के आन्दोलन, उनके कार्यकर्ता, आर्थिक दिक्कतें और अन्य स्त्रियों के साथ संबंध, घर के प्रति गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार, घरेलू हिंसा आदि अनेक कारण थे, जिसके परिणास्वरूप इनके जीवन में बिखराव आया। शिरीष और व्यंकटेश पै की पहली मुलाकत लॉ कॉलेज में होती है। शिरीष पै पहले ही दिन से व्यंकटेश से प्यार करने लगती है। व्यंकटेश की ओर से कोई संकेत न मिलने पर शिरीष जी का कहीं मन नहीं लगता है, वे उस समय की अपनी मानसिक स्थिति के बारे में लिखती हैं, “मैं दिन-ब-दिन कॉलेज से उबने लगी थी। परीक्षा पास आने के कारण किताब लेकर बैठती थी, लेकिन कुछ भी नहीं पढ़ती थी। यह पास आनेवाला और फिर दूर जानेवाला लड़का मेरा कोई था क्या? हम पास आने वाले थे या ऐसे ही दूर फेंके जाने वाले थे? दिल में सिर्फ सवाल अंकित हो रहे थे। जवाब नहीं मिल रहे थे। विशेष कुछ न घटने की यादें बहुत तकलीफ दे रही थी।” इस तरह का विचलन कुछ ही दिनों तक रहा क्योंकि व्यंकटेश ने परीक्षा में आनेवाले संभावित सवाल शिरीष के घर लाकर दिये और शिरीष को व्यंकटेश के प्यार का संकेत मिल चुका था। यह पल उनके जीवन में प्यार की फुहार लेकर आया था। इस पल के बारे में शिरीष जी लिखती हैं, “वह वही पल था- उस पल में मुझे उसकी और मुझे उसके प्यार की गवाही मिल गयी थी। मैंने उसी पल उसका वरण किया था, पूरी तरह काया-वाचा-मनसे। फिर क्या हुआ? जो होना था वही हुआ। उस साल मैं परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुई!” इस तरह उनके प्यार की शुरुआत होती है। और यह प्यार प्रेम-विवाह में बदल जाता है। विवाह के बाद शुरु हो जाती है, प्यार की असली परीक्षा। प्यार ने जितना सपनों के पंख लगा कर उडाया था, विवाह ने झट से इन दोनों को जमीन पर ला पटका। जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही उर्मिला जी के जीवन में हरिश्चन्द्र पवार का प्रवेश होता है। हरिश्चन्द्र पवार दसवीं के बाद छोटी-मोटी नौकरी करता है। दोनों का मिलना-जुलना, प्यार भरी बातें करना, छुपकर समुन्दर के किनारे जाकर मिलना, यह सब शुरु हो गया। आज भी प्यार करनी वाली लड़की को ‘चालू लड़की’ कहा जाता है, और उर्मिला जी के समय में भी कुछ ऐसा ही था। ‘नितंब’ शब्द का अर्थ बताते हुए हरिश्रन्द्र ने उर्मिला जी को पास खिंच लिया, और उर्मिला जी शर्म से लाल हो गयी थी। वे इस तरह की शुरुआत के बारे में लिखती हैं,“ वैसी शुरूआत होने के बाद हम दोनों का बहुत सारा समय एक-दूसरे से बात करते हुए बैठे रहना, अवसर मिलने पर छिपकर मिलना आदि शुरु हो गया। उस समय प्रेम करनेवाली लड़की यानी ‘चालू लड़की’ इस तरह का गणित था।” हरिश्चन्द्र से मिलने के लिए उर्मिला जी अपनी माँ से झूठ भी बोलती थी। इस झूठ के कारण उन्हें माँ और भाई से मार भी खानी पड़ी। कुछ समय तक दोनों का मिलना-जुलना बंद हो गया, उर्मिला जी ने अपनी पढ़ाई की तरफ ध्यान देना शुरु किया, पर प्यार तो प्यार है, कब किस ओर कदम बढाए पता ही नहीं चलता है, ऐसे प्यार के बारे में उर्मिला जी कहती है, “उसके बाद प्यार का बुखार थोड़ा कम हुआ और मैं पढ़ाई आदि करने लगी। पर प्रेम का बुखार मलेरिया के जैसे छिपता है, और बीच-बीच में बाहर आते रहता है और कँपकँपी छुटने लगती है। मेरा भी वही हाल हुआ। एक दिन, मैं किसी काम से सबेरे ही बाज़ार जाते समय रास्ते में पड़ने वाले हरिश्चन्द्र के कमरे की ओर मुड़ी।” इस कदर उर्मिला जी हरिश्चन्द्र के प्यार में डुबी हुई थी। हरिश्चन्द्र को मुंबई में नौकरी मिली थी। नौकरी मिलने के बाद हरिश्चन्द्र ने उर्मिला जी के भाई के सामने उर्मिला जी से शादी करने का प्रस्ताव रखा। यह रिश्ता उर्मिला के घरवालों को पसंद नहीं था, उन्होंने उर्मिला जी को लाख समझाने की कोशिश की पर वे अपनी बात पर अड़ी रहीं। अंत में उर्मिला की जिद्द के आगे सबको झुकना पड़ा और हरिश्चन्द्र के गाँव के घर में इन दोनों का विवाह हुआ। विवाह के बाद धीरे-धीरे एक-दूसरे की कमियाँ सामने आने लगी। विवाह के बाद वह आकर्षण और प्यार नहीं रहा, जो पहले था। गिरिजा कीर को कॉलेज के दिनों में उमाकांत कीर से कविताओं की डायरी देने के बहाने एक दूसरे से बातचीत होती है। एक-दूसरे की कविता एक-दूसरे को पसंद आती है। उमाकांत एक कविता गिरिजा कीर पर लिखते हैं, और काव्यसम्मेलन में पढ़ते हैं, इस कविता की चर्चा पूरे कॉलेज में होने लगती है, उसी दिन उमाकांत गिरिजा कीर से कहते हैं, “आप मुझे पसंद है। आप भी मुझे पसंद करती होंगी तो बोलिये। आपसे विवाह करने की मेरी इच्छा है।” गिरिजा कीर इस तरह अचानक पुछे गये सवाल से गड़बड़ा गयी, और कह दिया , आप मुझे पहचनाते ही नहीं है। उमाकांत का जवाब तैयार ही था, दो साल से आपको जानता हूँ। आपके बारे मैं पूरी जानकारी है। आप चार दिन के बाद जवाब दे सकती है। इस तरह चार दिन के बाद जवाब आया, और गिरिजा के पिता से उमाकांत की बात हुई और उमाकांत तथा गिरिजा कीर का विवाह हो गया। इन सभी प्रेम कहानियों में स्त्रियों का पूरा समर्पण देखने को मिलता हैं। स्त्रियों ने अपने प्रेमी के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ कोई संबंध नहीं रखा, लेकिन कुछ पुरुषों के एक से ज्यादा स्त्रियों के साथ संबंध थे। अपनी प्रेमिका से प्यार भरे संबंधों को जीवनभर निभाने का वादा करने वाला प्रेमी विवाह के बाद पति की भूमिका निभाते हुए दिखायी देता है। पति की भूमिका में आने के बाद वह पत्नी से पितृसत्तात्मक समाज के नियमों का पाठ पढ़ाने लगता है। एक आदर्श पत्नी की अपेक्षा करने लगता हैं। प्रेमी के रूप में मुक्ति की बातें करने वाला पुरुष पति बनते ही यह सब बातें भूल जाता है। इस तरह प्रेम जो बंधनों से मुक्ति की बात करता है, वही प्रेम विवाह के बाद पितृसत्तात्मक बंधनों में जकड़ता हुआ नज़र आता है। 3.7 विवाह : स्वप्न और यथार्थ विवाह की परिभाषा भारत डिस्कवरी.आर्ग वेबसाईट पर इस प्रकार दी गई है, “विवाह मानव समाज की अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रथा या संस्था है। यह समाज का निर्माण करने वाली सबसे छोटी इकाई परिवार का मूल है। इसे मानव जाति के सातत्य को बनाए रखने का प्रधान साधन माना जाता है। इस शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो अर्थों में होता है। इसका पहला अर्थ वह क्रिया, संस्कार, विधि या पद्धति है जिससे पति-पत्नी के स्थायी संबंध का निर्माण होता है। प्राचीन एवं मध्यकाल के धर्मशास्त्री तथा वर्तमान युग के समाजशास्त्री समाज द्वारा स्वीकार की गई 'परिवार की स्थापना करने वाली किसी भी पद्धति' को विवाह मानते हैं।… विवाह का दूसरा अर्थ समाज में प्रचलित एवं स्वीकृत विधियों द्वारा स्थापित किया जाने वाला दांपत्य संबंध और पारिवारिक जीवन भी होता है। इस संबंध से पति-पत्नी को अनेक प्रकार के अधिकार और कर्तव्य प्राप्त होते हैं। “ विवाह स्त्री-पुरुष के बीच स्थायी संबंध स्थापित करता है और इससे पति-पत्नी को कुछ अधिकार और कर्तव्य प्राप्त होते हैं। पहले पत्नी पति पर आश्रित होती थी, पर अब परिस्थितियाँ बदल गयी हैं, स्त्रियाँ भी आर्थिक रुप से सक्षम होने लगी हैं, जिसके चलते पति-पत्नी के अधिकार और कर्तव्यों में बदलाव आया है। पहले पति का कर्तव्य होता था, वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करें और पत्नी घर तथा बच्चों को संभाले। लेकिन आज के युग में परिस्थितियों के अनुरूप तथा स्त्री चेतना के कारण इनमें बदलाव दिखाई देता है। पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों के लिए विवाह किसी हसीन सपने से कम नहीं होता है। नीरू विवाह को लेकर भारतीय लड़कियों की सोच के बारे में लिखती हैं, “पितृसत्ता के दायरे में विकसित होती हर लड़की का सबसे हसीन सपना है-विवाह। वास्तव में ढेरों बंदिशों-पाबंदियों के बीच बचपन गुजारती हर लड़की को लगता है कि इस बंधन से मुक्ति का एक ही मार्ग है-विवाह। इसीलिए ‘विवाह’ के लिए उसकी उत्सुकता, तड़प, उसका आकर्षण दिनोंदिन बढ़ता जाता है।...मगर जिस विवाह को अपनी मुक्ति का मार्ग समझ कर बड़े अरमानों के साथ स्वीकार किया था, उसी का भीतरी सच इतना भयावह होगा, कहाँ जानती थीं ये नायिकाएँ?” विवाह को लेकर भारतीय स्त्री जो सपनें अपनी आँखों में संजोती हैं, उनमें से उसके बहुत कम सपने पूरे होते हैं। स्त्री को लगता है, विवाह के बाद एक नई जिन्दगी की शुरूआत होगी। पति और उसके घरवालों से मधुर संबंध स्थापित होंगे। लेकिन अक्सर यथार्थ की जमीन पर सपनों के पौधें मुरझाए हुए दिखाई देते हैं। स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं को देखकर तो, यह सौ प्रतिशत सच्च प्रतीत होता हुआ दिखाई देता है। विवाह को लेकर स्त्रियों ने जो सपने देखे थे और स्त्रियों को प्रेमियों ने विवाह के जो सपने दिखाए थे, वे सब विवाह के बाद केवल सपने बनकर रह जाते हैं। इन सपनों को टूटते हुए देखना, उनके लिए असहनीय हो जाता है। पुरुषों ने प्रेमी बनकर जो सपने दिखाये थे, वे सपने प्रेमी के पति बनने के बाद पितृसत्तात्मक संस्कारों की दुनिया में कहाँ गायब हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता है। मन्नू भंडारी ने राजेन्द्र यादव को लेकर कुछ सपने देखे थे। उन्हें शादी से पहले राजेन्द्र यादव के लेखक होने पर फक्र था। राजेन्द्र यादव ने भी अपना प्रगतिशील चेहरा ही मन्नू भंडारी और उनकी बहन सुशीला जी को दिखाया। दिल्ली में आर्थिक आधार खोज़ने से पहले मन्नू भंडारी की बड़ी बहन सुशीला जी के सामने मन्नू भंडारी का हाथ पकड़कर कहा था, “सुशीलाजी, आप तो जानती ही हैं कि रस्म-रिवाज़ में न तो मेरा कोई खास विश्वास है, न दिलचस्पी...बट वी आर मैरीड! जैसे ही मेरे काम का कोई इन्तज़ाम हो जाएगा हम लोग..” इस तरह की बात सुनकर कोई भी लड़की उस लड़के पर मर मिटने के लिए तैयार हो जाएगी, मन्नू भंडारी ने भी यही किया। उन्हीं के शब्दों में कहें तो, “इससे अधिक किस आश्वासन की हम लोग आशा करते। मेरी तो दुनिया ही एकदम जगमगा उठी।” इस जगमगाती हुई दुनिया और शादी के हसीन सपनों में मन्नू भंडारी खो जाती है। उन्हें अपने इन सपनों के आगे राजेन्द्र यादव का अपंग होना या पिताजी का इस शादी के लिए विरोध करना भी दिखाई नहीं देता है। क्योंकि मन्नू भंडारी ने राजेन्द्र यादव के साथ अपनी जिन्दगी बिताने को लेकर बहुत सपने देखे थे, शादी के बाद जैसे ही कलकत्ते में किराये पर उन्हें मकान मिलता है, तो वे उसे सजाती हैं, क्योंकि इस जिन्दगी को लेकर उन्होंने कुछ सपने संजोए थे, वे लिखती हैं, “एक महीने की भाग दौड़ के बाद आखिर सी.आई.टी. रोड पर एक मकान मिला, छोटा, खूबसूरत और मन लायक फ्लैट! बड़े मन और जतन से मैंने उसे सजाया और अप्रैल में हमने साथ-साथ अपनी गृहस्थी में कदम रखा। बहुत सपने देखे थे इस जिन्दगी को लेकर, बहुत उमंग भी थी,….. सब लोग सोचते थे और मुझे भी लगता था कि एक ही रूचि..एक ही पेशा.. कितना सुगम रहेगा जीवन! मुझे अपने लिखने के लिए तो जैसे राजमार्ग मिल जाएगा।” ये मन्नू भंडारी ने अपने वैवाहिक जीवन को लेकर देखे हुए सपने थे, जो कभी सच नहीं हुए। राजेन्द्र यादव ने हमेशा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया । उन्होंने घर की किसी जिम्मेदारी में मन्नू जी का हाथ नहीं बटाया। मन्नू जी लिखती हैं, “अपनी-अपनी जिन्दगी का जो बँटवारा हुआ उसमें घर की सारी जिम्मेदारियाँ और समस्याएँ- आर्थिक से लेकर दूसरी तरह की – मेरे जिम्मे थीं, जिसमें मुझे राजेन्द्र की दिलचस्पी की ही नहीं, सहयोग की भी ज़रूरत रहती थी लेकिन उसे तो राजेन्द्र ने मेरा अधिकार-क्षेत्र घोषित कर रखा था। मेरे अधिकार-क्षेत्र में कभी भी न झाँकने की, न किसी तरह की दिलचस्पी लेने की और न कोई हस्तक्षेप करने की बेहद उदारवादी मुद्रा ओढ़कर एक बड़ी ‘वाजिब और तर्क-संगत’ उपेक्षा ये करते थे कि मैं भी इनके अधिकार-क्षेत्र में थे इनके ‘निजी सम्बन्ध’ और सरोकार, जब-तब, जहाँ-तहाँ घूमने-फिरने की और जब मन हुआ, बिना पीछे की जरा भी चिन्ता किए कलकत्ता से भाग निकलने की छूट। ‘लिखना है’ का तुरुप का पत्ता तो हमेशा उनके हाथ में रहता ही था, जिसके सामने प्रतिरोध का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था।” राजेन्द्र यादव अपने हिस्से की भी जिम्मेदारियाँ मन्नू भंडारी को सौंप देते हैं। ‘लेखकीय स्वतंत्रता’ के नाम पर अपनी जिंदगी में मस्त रहते हैं। मन्नू जी को उनके अदंर सामान्य-सी इन्सानियत भी नज़र नहीं आती। क्योंकि उन्होंने बिमारी में मन्नू जी का साथ नहीं दिया। बेटी के जन्म के समय मन्नू जी को उनका सानिध्य चाहिए था, वह भी नहीं मिला। मन्नू जी को राजेन्द्र यादव की यह आधुनिकता समझ में नहीं आई। उनको लगा भी कि केवल जिन्दगियाँ ही समान्तर क्यों हो, छत भी समानान्तर होने चाहिए। लेकिन वे चाहकर भी ऐसा कर नहीं पायी। इसके कई कारण थे। एक तो राजेन्द्र यादव के साथ बिताए गये दो साल, पिताजी से किया गया विद्रोह, जिसके लिए वे किसी भी कीमत पर अपने-आपको सही साबित करना चाहती थी। एक अंतरजातीय विवाह करके डाली हुई परम्परा को तोड़ना नहीं चाहती थीं। और सबसे महत्वपूर्ण बात थी, मन्नू जी का यह मानना कि, “या यह भी हो सकता है कि मुझे उम्मीद थी कि मेरा समर्पण एक न एक दिन राजेन्द्र यादव को जरूर बदल देगा और बाद में टिंकू भी एक बहुत बड़ा कारण हो गई थी। मैं नहीं जानती कि क्या कारण था... शायद सभी का मिला-जुला रुप रहा होगा, लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि राजेन्द्र ने भी अलग होने की दिशा में कभी कोई प्रयास नहीं किया बल्कि एक-दो बार तो कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं कि स्थिति मेरी सहन-शक्ति के बाहर हो गई और मैंने अलग होने का निर्णय ले भी लिया तो आँसू भर-भरकर राजेन्द्र ने अपने को ऐसा कातर बना लिया कि मेरा सारा आक्रोश, सारा संकल्प उसी में बह गया।” इस तरह राजेन्द्र यादव ने मन्नू भंडारी को अपने से दूर होने नहीं दिया और पास भी आने नहीं दिया। एक दूरी हमेशा दोनों के बीच बनी रही। राजेन्द्र यादव से मन्नू जी को दूर होने के लिए तीस साल लगे। मन्नू जी के शादी के सपने और यथार्थ में जमीन-आसमान का फर्क था। चंद्रकिरण सौनरेक्सा ने भी अपनी शादी को लेकर बहुत सारे सपने देखे थे। शादी के बाद भाभी के तानों से मुक्ति मिलेगी, अपना घर होगा। अपनी मर्जी से एक नयी दुनिया में जी पाएगी। शादी के बाद कुछ समय तक सबकुछ ठीक-ठीक ही चलता रहा। ऐसा अनेक स्त्रियों के साथ हुआ है कि प्रेमी के रूप में अच्छा लगने वाला पुरूष पति बनने के बाद बुरा हो जाता है। जो बातें प्रेमी के रूप में कही जाती है, वह पति बनने के बाद कहाँ गायब हो जाती है, पता ही नहीं चलता है। विवाह के बाद अपनी पत्नी को दासी बनाकर रखना चाहता है। चंद्रकिरण जी के साथ भी यही सब हुआ। पत्र में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कांतिचन्द्र और वास्तव के कांतिचन्द्र में जमीन आसमान का फर्क था। कांतिचन्द्र जी अदूरदर्शी, अव्यावहारिक, ईर्ष्यालु एवं क्रोधी स्वभाव के थे, जिसके परिणाम स्वरूप चंद्रकिरण जी के मन में पति की छवि मलिन होती गई। अनेक यातनाओं को सहना पड़ा। पति ने कभी उनके लेखन को प्रोत्साहित नहीं किया, उलटे उनसे ईर्ष्या ही की। वे इस विषय में लिखती हैं, “घर में तो सब कुछ इसी तरह चलता रहता था, पर मेरी सृजनात्मक प्रक्रिया हर चट्टान से टकराती हुई, निर्बन्ध चलती रहती थी। उसकी ऊर्जा का तेज़ कभी कम नहीं हुआ। कम से कम समय में बिना किसी अतिरिक्त सुविधा के मेरी लेखनी, कोरे काग़ज पर, कहानियों को आकर देती थी।” इसी कारण जब ‘हंस’ के सम्पादक अमृतराय ने चंद्रकिरण जी को पत्र लिखा, तब कांतिचन्द्र की प्रतिक्रिया थी, “ये साले संपादक भी लड़कियों को बड़े मीठे-मीठे पत्र लिखते हैं। अभी कोई पुरुष लेखक अपनी रचना भेजता तो उत्तर ही पंद्रह दिन बाद मिलता – या मिलता ही नहीं।“ और ‘यह’ रसोई के सामने खड़े थे – क्रोध-ईर्ष्या की मिली-जुली तस्वीर बन कर- “तुमने भी तो कहानी भेजते समय पत्र में कुछ न कुछ तो लिखा ही होगा जरूर...उसके चूत़ड़ों में घी मला होगा।” इस बात से क्रोधित होकर चंद्रकिरण जी ने अलग होने का निर्णय लिया। उन्हें लगा कि तीन साल का साथ, जब विश्‍वास का आधार बन नहीं पाया, तो आगे क्या होगा। यही सोचकर अपनी बच्ची के साथ मेरठ जाकर रहने का निर्णय लिया। लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाईं। इसमें भावनाओं और रिश्तों के स्तर पर बहुत सारी अड़चनें आने लगी। अलग होने का ख्याल ख्याल ही बनकर रह गया, जिसका उन्हें अंत तक पछतावा होता है। वे लिखती हैं, “रात भर मेरी पलक नहीं झपकी – मेरठ जाने का मेरा इरादा ख्यालों में जैसे आया था, वैसे ही ख्यालों में गुम हो गया। पर भविष्य में, अपने आप को कल शाम की स्थिति तक जाने का अवसर न प्रदान करने के लिए, मैंने दूसरा निश्‍चय किया – कहानी लिखूँगी, पर इन्हीं को पकड़ा दूँगी - फिर ‘यह’ चाहे जहाँ प्रकाशन के लिये भेजें – मेरा कोई सीधा संपर्क आदर्शवादी, पतिव्रता पत्नी का निर्णय था – जिसकी कीमत मेरे पूरे साहित्यिक-जीवन ने चुकाई- और लगभग गुमनामी के कगार पर खड़ी –अभिशप्त सरस्वती के वरदान सी – मैं खड़ी हूँ।” इस तरह चंद्रकिरण जी का जीवन अपने पति के सनकी स्वभाव के कारण निरंतर दुख की खाई में जाता रहा। लेकिन उन्होंने जीवन और परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को सम्भालते हुए लेखन कर्म निरंतर जारी रखा। शीला झुनझुनवाला और टी.पी. के संबंध जीवन भर अच्छे थे। लेकिन इन संबंधों को अच्छा बनाये रखने के लिए शीला झुनझुनवाला को अनेक भूमिकाएँ निभानी पड़ी। अपनी इस अनेक भूमिकाओं के बारे में डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल को बताते हुए कहा था,“मैं समझती हूँ, पति अपनी पत्नी के रूप में प्रेमिका, माँ, बहिन, धर्मपत्नी, नौकर, सखा, गुरु, पथप्रदर्शक- सब कुछ देखना चाहता है। एक में अनेक। मैंने अपने को हर स्तर पर, इनकी भावनाओं के अनुरूप, सहज रखा है, इसीलिए शायद, गाड़ी ठीक ही चल रही है।” विवाह से पहले जिस प्रेम को टी.पी. जी ने परिभाषित करते हुए कहा था कि प्रेम इन्सान को बंधनों से मुक्त करता है। वही टी.पी. पति की भूमिका में अपने पत्नी में प्रेमिका, माँ, बहिन, धर्मपत्नी, नौकर, सखा, गुरु, पथप्रदर्शक सब कुछ देखना चाहता है। इसमें से कोई एक भी भूमिका कमजोर पड़ने लगती है, तो पति या प्रेमी के अंदर का पुरुष बोलने लगता है। एक घटना में टी.पी. ने शीला जी की गलती न होने पर भी डाँटा था, तब शीला जी को लगा था कि, “वाह रे पुरुष! उस समय ठाकुर नहीं बोल रहे थे, पति का दंभ बोल रहा था। पति जो कभी-कभी अकारण ही कितना कठिन हो जाता है, अपने हिस्से की सारी धूल पत्नी के ऊपर डाल देता है और स्वंय धूल झाड़कर अलग खड़ा हो जाता है। ऐसे समय यदि पत्नी भी कड़क उठे तो घर में महाभारत हो जाए।” आखिर में शीला जी को समझौता करना पड़ा और स्थिति को संभालना पड़ा। शीला और टी.पी. के परिवार को लोग खुशहाल और आदर्श परिवार कहते थे, उस खुशहाल और आदर्श परिवार को बनाए रखने के लिए शीला जी को अनेक समझौते करने पड़े। प्रतिभा अग्रवाल को मदन बाबू के रूप में एक प्रगतिशील विचारों वाला पति मिला था। मदन बाबू की कथनी और करनी में अंतर नहीं था। इसीलिए प्रतिभा जी अपनी आत्मकथा में जगह-जगह अपने पति के उनके व्यक्तित्व निर्माण में किये गये योगदान का जिक्र करती हैं। प्रतिभा जी अपने पति के बारे में लिखती हैं,“बिना दहेज़ के, बिना पर्दें के विवाह किया, अपने घरवालों की अनिच्छा के बावजूद अपनी मर्जी से अपनी पसन्द की लड़की से विवाह किया, विवाह के पन्द्रह दिनों बाद ही उसे स्कूल में भर्ती कराया, अगले साल पढ़ने के लिए शांतिनिकेतन भेज दिया, बाद में अभिनय करने के लिए हर तरफ अनुकूल वातावरण बनाया, उसे लोगों से मिलने-जुलने की पूरी स्वतंत्रता दी। यह बहुत बड़ी बात थी, विशेषकर उस जमाने में जब उन्होंने दी थी।...सन् 45-50 की स्थितियाँ सर्वथा भिन्न थीं। यह नहीं कि इस सारे प्रयत्न में हम दोनों ने एक-दूसरे पर ज्यादतियाँ न की हो, दुख न पाया हो या न दिया हो, पर वह सब अस्थायी होता था।” सुशीला टाकभौरे ने एक आम भारतीय लड़की तरह अपने पति को लेकर कुछ सपने सजाए थे, वे सपने इस प्रकार थे, “प्रेम के आदान-प्रदान और मन की कोमल भावनाओं के फलने-फूलने की सम्पूर्ण अपेक्षा शादी के बाद पति से ही थी। मैं प्यार के सपने देखती थी, ‘मेरे सपनों का शहजादा जरूर आयेगा, वही मुझे प्यार देगा’ सामाजिक मानसिकता के अनुसार मेरे संस्कार ढाले गए थे। मैं यह भी सोचती थी- ‘कोई बड़ा नेकदिल इनसान होगा जो मुझसे विवाह करेगा’” सुशीला टाकभौरे को शादी से पहले अपने पति सुन्दरलाल टाकभौरे के प्रगतिशील विचार सुनकर अच्छा लगता है। पति उनसे काफी बड़े थे, सुशीला को जब देखने आये थे, तब आधुनिक व्यक्ति की तरह बातें करने लगे थे। सुशीला जी से उन्होंने एकांत में पूछा था. “आपको शादी की बात पसंद है न? बाद में नहीं कहना कि पसन्द नहीं है।” उन्होंने उस समय शादी के बाद आगे पढ़ने की अनुमति भी दी थी, इस अनुमति को सुनकर सुशीला जी खुश हो गई थी, उन्हीं के शब्दों में , “ मैं खुश हो गई, जैसे पढ़ाई करना ही मेरी जिन्दगी का एकमात्र सपना था। इसके बाद मैंने और कुछ नहीं देखा। मैं आगे पढ़ाई कर सकूँगी, इसके बाद मैंने ज्यादा कुछ नहीं सोचा। सच पूछा जाये तो मुझे यह ज्ञान ही नहीं था, शादी कितनी उम्र वाले से की जाती है। समाज में 5-10 साल छोटी पत्नी रहना आम बात मानी जाती थी। जैसी श्रद्धा में अपने शिक्षकों के प्रति रखती थी, वैसे ही श्रद्धाभाव से मैंने टाकभौरे जी को देखा था।” शादी के बाद आधुनिकता का यह मुलम्मा उतर गया और पति का मध्यकालीन सामंती मनोवृत्ति वाला स्वरूप सामने आ गया। वह अपनी पत्नी को गुलाम की तरह देखता है। सुशीला जी अपने पति के स्वभाव के बारे में लिखती हैं, “स्कूल से या बाहर से आने के बाद कभी-कभी टाकभौरे जी मेरे सामने पैर लम्बे कर देते। मेरा ध्यान न रहने पर हाथ से इशारा करके जूते उतारने के लिए कहते। मैं चुपचाप उनके पैरों के पास बैठकर जूते के फीते खोलती, जूते उतारती, मोजे उतारती। यह बात मुझे अजीव लगती। थी।” पति, ननद और सास ने भी इनका शोषण किया। दहेज कम मिलने के कारण इन्हें हमेशा ताने सहने पड़े। सुशीला जी प्रेम कहानी लिखने और उनमें काल्पनिक कथा और पात्रों द्वारा अपने जीवन में जिस तरह का प्यार पाना चाहती थीं, का वर्णन करती हैं। अपने मन के भटकाव को इस कल्पना लोक में उन्हें ठिकाना मिलता है। वे प्रेम कहानी लिखने का कारण बताती हैं, “यदि टाकभौरे जी ने कभी मुझे प्यार, दुलार दिया होता, कभी मुझे मनाया होता तो क्यों मैं जीवन में काल्पनिक प्यार और मनुहार की बातें सोचती? क्यों इन बातों के लिए तरसती हुई कल्पना में भटकती? अन्त में मैंने वह मानसिक स्थिति प्राप्त कर ली थी, जो ‘सूरज के आसपास’ कहानी की नायिका में चित्रित है।” लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि सुशीला जी के लेखिका बनने और जीवन व्यक्तित्व के निर्माण में उनके पति का योगदान नहीं है। वे स्वंय अपने पति के योगदान के बारे में लिखती हैं, “मैं यह कबूल करती हूँ, मेरे जीवन-व्यक्तित्व निर्माण में टाकभौरे जी का, नागपुर शहर का और महाराष्ट्र प्रांत का बड़ा योगदान है।” सुशीला जी ने पति के रुप में एक प्यार करनेवाले जीवन साथी की अपेक्षा की थी, वह अपेक्षा पूरी हो नहीं पाई। खुलकर प्यार भरी बातें करने की इच्छा या पति-पत्नी के बीच में हँसी-मजाक की बातों की जगह उन के जीवन में ज्यादातर पति, सांस और ननद की डाँट फटकार ही मिली। कुसुम अंसल से न पढ़ाई में उनकी इच्छा पूछी गई, न उनके शादी के बारे में। दिल्ली के सुशील अंसल के साथ उनका विवाह तय होता है, कुसुम जी अपने भावी पति के बारे में कुछ नहीं जानती, वे लिखती हैं, “अपने भावी पति के विषय में मेरी जानकारी कुछ भी नहीं थी.....सब कुछ था रहस्यमय सा, अनजान सा, ‘अननोन’ और मैं संकोच के परदों में बंद उस अजनबी को अपना बनाकर... ‘द नोन’ जानकर स्वीकारने की स्थितियों में कदम रख रही थी। ” कुसुम अंसल के मायके और ससुराल में सांस्कृतिक अंतर था। जिससे उनका सामना जल्द हो गया। कुसुम के अलीगढ़ की सहेलियों ने जिन बर्तनों में खाना खाया था, सास की नज़र में बर्तन म्लेच्छों द्वारा खाना खाने से अशुद्ध हो गये थे। कुसुम जी के पति चाहते थे, ससुराल के अनुसार पत्नी बदले, उसके अनुसार ही अपने आप को ढाले। कुसुम अंसल के कुछ ओर ही सपने थे। उनके पति पर अपनी कम्पनी और भाईयों की जिम्मेदारी थी, जिसके चलते कुसुम जी का मन निराशा से भर जाता था। वे अपने इन उदास दिनों के बारे में लिखती हैं, “मेरे वह सुनहरे दिन मेरे सैन्सिटिव मन में, जिसमें कभी कविता बहा करती थी, गुलाब के फूल महका करते थे, अब काँटों का एक घना जंगल उग आया था, परिणाम स्वरुप मैं गहरे कुएँ जैसे डिप्रेशन में चली जाती थी।” कुसुम अंसल का पूर्ण पुरूष का स्वप्न केवल स्वप्न बनकर रह जाता है। उनके अंतर्रात्मा से आवाज़ आती है, “ मेरी अन्तर्रात्मा में अनुगूँज उठती थी- ‘सब स्वप्न निरर्थक हैं, इस संसार में पूर्ण-पुरुष जन्म नहीं लेते....क्या होता है पूर्ण पुरुष?’ मात्र एक धुंधली आकृति, मनगंढ़त, जिसका कोई आकार नहीं होता। ” यह ड्रिपेशन की स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रही। दोनों को पास रहने का मौका मिल जाता है। कुसुम असंल के पति ने उन्हें ज्यादा समय तो नहीं दिया पर कभी उनके किसी कार्य को लेकर कोई सवाल भी नहीं किया। वे दूसरों के लिए घर तो बनवाते रहे पर अपने घर की तरफ उनका कम ही ध्यान रहता था, जिसके चलते कुसुम जी बार-बार ड्रिप्रेशन में चली जाती। वे इससे बाहर निकलने के लिए ‘ईप्टा’ के रंगमंच से जुड़ी। इससे जुड़कर उन्हें अपने जीवन की सार्थकता महसूस हुई। वे लिखती हैं, “रंगमंच का यह वातावरण मुझे बहुत अपना लगता था, शायद इसलिए भी कि मुझे लगता मेरा अस्तित्व, मेरी साँसें उतनी बेमानी नहीं हैं जितना मेरी स्थिति मेरे लिए बना रही थी। यहाँ की यह सृष्टि मुझे छूती ही नहीं थी, तल्लीन भी बनाती थी। एकाएक ऐसा लगा था कि जैसे बेकार हाथ से छूटता जीवन, ‘त्रिवेणी सभागार’ की दिवारों के साथ टिककर खड़ा हो गया है और पहली बार उसके पैरों ने धरती को छूआ है-” नाटक के फोटों देखकर सास ने घर में हंगामा खड़ा किया। अपने बेटे को उकसाने का काम भी किया। कुसुम जी अपनी ओर से सफाई देती रही। कुसुम जी के अंदर अपने प्रति आसक्ति, नवअर्जित स्वाधीनता और विद्रोह अचानक उठ खड़ा होता है। ‘कम्पलिट मैन’ के जिस सपने को उन्होंने देखा था, वह ‘कम्पलिट मैन’ उन्हें कहीं दिखाई नहीं दिया। कृष्णा अग्निहोत्री ने भी अपने भावी पति को लेकर कुछ सपने संजोए थे। एक पति के बारे में स्त्री के क्या सपने होते हैं, इस विषय में उन्होंने लिखा हैं, “एक पति की कल्पना स्त्री के लिए किसी आशियाने में बैठे प्यार से भीगे जीवनसाथी की ही होती है जिसकी प्रत्येक नस व अंग से जीवन अमृत धारा बहती हो जो हल्की- सी ठोकर लगते ही सहलाता, थामता....सिहरता... संभालता साथ चलता हो।” ऐसा उनके सपनों का भावी पति था, पर यथार्थ बहुत ही भयानक था। जिसकी उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। कृष्णा जी की शादी कानपुर के मास्टर श्यामलाल के बडे बेटे सत्यदेव अग्निहोत्री के साथ सन् 1949 में बड़े धूमधाम से हुई। सत्यदेव अग्निहोत्री बनारस में डिप्टी कलेक्टर थे। शादी के बाद कृष्णा जी के शोषण और अपमान का सिलसिला शुरू हुआ, जो उनके तलाक तक चलता रहा। पति ने पहले दिन से ही शोषण आरंभ कर दिया था। रेलवे में ही कृष्णा जी से बिना बातचीत किए सबकुछ कर डाला। कृष्णा जी लिखती हैं, “इन्होंने न कोई प्रश्न किया न पूछा बस बोले तो यही, “...कुछ मोटी लग रही हो।”.....मैंने हैरत से अपनी आँख ऊँची की। मेरी उम्र उस समय यही थी कि मेरी प्रशंसा ही होगी....लेकिन कुछ पलों ही में मुझे लगा कि सामने वाला व्यक्ति अपने गुणों, पद, विद्वता एवं रूप के विषय में अत्याधिक जागरुक है। मैं बातूनी हूँ परन्तु बात का अवसर नहीं मिला। उन्होंने बिना वार्तालाप, जान-पहचान या स्नेह के मेरे साथ वह सब कर डाला जो अच्छा तो नहीं ही लगा था। उसे सैक्स विकृति ही कहेंगे। ” इस तरह की सैक्स विकृति और मारपीट का सिलसिला जबतक पति-पत्नी साथ थे तब तक चलता रहा। अलग होने के बाद भी कृष्णा जी के पति ने इस तरह का एक-दो बार बलात्कार किया। मारपीट के बाद बलात्कार रोज़ ही होने लगा। कृष्णा जी पति के साथ के शारीरिक संबंधों को बलात्कार ही कहती हैं। वे लिखती हैं, “और हो गई धुनाई। रूई सी धुनाई, इसके बाद बलात्कार की पुनरावृत्ति। अब तो कुछ-कुछ यही समझ आ रहा था कि इसी सब में जीना है।” न पहले पति ने उनके साथ प्यार भरा व्यवहार किया न दूसरे। बाहर के लोग तो कृष्णा जी को एक सुंदर शरीर से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे। राजेन्द्र अवस्थी भी कृष्णा जी को तलाक लेने के लिए कहते हैं, जिससे वे मिल-जुल सकते हैं। कृष्णा जी को यह सब रखैल बनाने जैसे लगता है। जवाब मैं वे कहती हैं, “मैं रखैल बनकर कभी नहीं रह सकती और आवेश के क्षणों में सुख के लिए मेरी भावना से कोई भी खिलवाड़ करे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।” कृष्णा जी हमेशा एक स्थिर और अपनेपन से भरे संबंध के इंतज़ार में सारी जिन्दगी गुजार देती हैं। कृष्णा जी के पति के अनेक स्त्रियों के साथ संबंध थे। इसके कारण अनेक बार बड़े आफिसरों से कृष्णा जी के पति को डाँट भी मिली। कृष्णा जी ने यह बात अपने सास को बतायी तो सास अपने बेटे के करतूतों का समर्थन ही करने लगी। इन सब से बच निकलने का कहीं पर भी रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। यह सिलसिला उनके तलाक तक चलता ही रहा। उन्होंने तलाक के बाद भी अपने पति की सहायता की। मैत्रेयी पुष्पा पुरुषों की गंदी नज़र से बचने के लिए विवाह का रास्ता चुनती हैं। क्योंकि जिस किसी के घर में कस्तूरी ने मैत्रेयी को पढ़ने के लिए रखा वहाँ के किसी-न-किसी सदस्य ने मैत्रेयी के शरीर के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की। जगदीश आधे रस्ते में साईकल रोककर मैत्रेयी के साथ जबरदस्ती करता है। संयोजिका का विवाहित बेटा मैत्रेयी के पेट पर हाथ लगाता है। ऐसी बहुत सारी घटनाएँ मैत्रेयी माँ को सुनाती है। इसी कारण कस्तूरी कहती है, “जिम्मेदार घरों के स्वामी गुनाहगार कैसे हो गए। मैंने इज्जतदार लोगों को खोज़ा था, वे ही लड़की की आबरू उतारने लगे। सोचा था-माँ का मोह उसकी पढ़ाई में बाधा बनेगा। लाड़-दुलार से बच्चे बिगड़ते हैं। पर मैत्रेयी जो सुना रही है, उसके चलते वह बच्ची कहाँ है? लड़की जन्म लेते ही औरत हौ जाती है।” इन सबसे बचने के लिए ही तो मैत्रेयी शादी करने का निर्णय लेती हैं। मैत्रेयी का विवाह भी अपनी माँ के द्वारा किये बहुत सारे प्रयत्नों के कारण होता है। मैत्रेयी बाहरी वहशियों से बचने के लिए विवाह संस्था के हवाले अपने आपको करती है। विवाह के बाद पति अपना अधिकार जताने लगता है, काम संबंधों में पहल करने पर मैत्रेयी पुष्पा से कुछ दिन बात नहीं करता है। कॉलेज आते-जाते लड़के मैत्रेयी को देखने के लगते या मैत्रेयी किसी लड़कों से बात करने लगती तो उन्हें डाँट पड़ती “सुनो, मैं किसी आदिवासी लड़की से शादी करने के मंसूबे नहीं बाँधे थे। साले हरामी लड़के कॉलेज की कहानी सुनने नहीं,तुम्हारे देह की झांकी लेने आते हैं। अच्छी मुसीबत हो तुम। कायदे से, तमीज़ से नहीं रह सकती तो अपने यहाँ जाओ। चिड़ियाघर का जानवर शहर में कैसे रहे।” मैत्रेयी को अपना घर ही गुफा लगने लगता है, जिसके संकरे द्वार पर जो पहरेदार है, वह उसका पति है। इस तरह एक लड़की का विवाह को लेकर देखा गया सुनहला सपना जो एक अंघेरी-संकरी गुफा में बदल जाए। यही विवाह संस्था का सच है और यही सच ज्यादातर लड़कियों के हिस्से में आता है। मराठी स्त्री आत्मकथाकारों ने भी अपने विवाह और भावी पति को लेकर कुछ सपने बुने थे। लेकिन उनके सपनों का वैवाहिक जीवन और यथार्थ दोनों भिन्न थे। इंदिरा संत अपनी आत्मकथा में एक सुखी पारिवारिक जीवन के लिए पति-पत्नी के बीच कैसे संबंध होने चाहिए, इस पर उन्होंने लिखा हैं,“ मैं ‘आश्रित’ हूँ इस मानसिकता से ही पहले स्त्री मुक्त होनी चाहिए। परिवार दोनों का होना चाहिए। तो वह स्त्री मुक्ति का अहसास होगा। पति की गुलाम न होकर उसके कंधे-से-कंधा मिलाकर वैवाहिक जीवन में हिस्सा लेगी। और इससे पति-पत्नी में वरिष्ठ-कनिष्ठ, मालिक-गुलाम का रिश्ता न रहकर, मित्रत्व का, अपनेपन का नाता निर्माण होगा। वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए ‘मित्रता’ रसायन बहुत जरूरी है।” पारिवारिक जीवन में मित्रता रसायन के होने के कारण सुख या दुख किसी एक के हिस्से में न आकर दोनों सुख में साथ रहकर खुशियाँ मनाते हैं और दुख में दोनों एक दूसरे का सहारा बनते हैं। इस मित्रता रसायन के अभाव में विवाह को लेकर स्त्री द्वारा देखे गये सपनों को चूर होने में समय नहीं लगता है। यही मराठी स्त्री रचनाकार आत्मकथाकारों के जीवन में घटा भी है। मलिका अमर शेख, अपने भावी जीवन साथी कैसा हो के बारे में सोचते हुए लिखती हैं, “फक्कड़...कवि... दिखने में स्मार्ट...साँवला... उसके हालचाल में भी पौरूष चाहिए, मर्दानगी चाहिए....” इस तरह की बातें वे नामदेव ढसाल में देखती हैं, उनसे प्यार भी होता है, विवाह पूर्व जीवन मस्ती के साथ, रोमान्स में बीतता है। वैवाहिक जीवन की शुरुआत के साथ ही, मलिका जी को कुछ बातें खटकने लगती हैं। पहला बच्चा पैदा होने के बाद मलिका को लगा कि नामदेव के जीवन में उनका कोई स्थान नहीं हैं, वे अपने बेटे से ज्यादा अपने पति का साथ चाहती थीं, वे लिखती हैं, “..पर अचानक उसे देखते हुए लगा....कि..मैं बहुत दूर हो गयी उससे...मेरी जरुरत, मेरी अस्तित्व का आनंद उसके जीवन से घट गया था। मैं बहुत दुखी हो गयी थी...मुझे अपने बेटे से ज्यादा अपने पति की, मेरे साथी की जरुरत थी।” मलिका और नामदेव ढसाल के प्रेम में विवाह से पहले जो गरमी थी, अब कम होती हुई नज़र आ रही है। नामदेव ढसाल की दलित आन्दोलन को लेकर व्यस्तताएँ थी, वे अपने घर को कभी संभाल ही नहीं पाये और पति की भूमिका को ठीक तरह से निभा नहीं पाये। इस कारण मलिका जी को अनेक तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। शादी के बाद पीना शुरु हो गया, जो कभी खत्म नहीं हुआ। झगड़ा भी, मारपीट का सिलसिला भी शुरु हुआ। पर इन सबसे बड़ा दुख नामदेव ढसाल का मलिका के जीवन से गुम हो जाना था। वे लिखती हैं, “इसके बाद यह दुश्‌चक्र शुरु हो गया..पीना, झगड़ा, गाली-गलौच, मारपीट। पर इन सब दुखों से बड़ा दुख था, मैं अपना पहले का नामदेव कहीं खो बैठी थी, वह बदल रहा था, मुझे से दूर हो रहा था, और मैं कुछ नहीं कर सकती थी! मुझे उसके सहवास की, उसके प्यार का आकर्षण था। पर उसे मेरी जरुरत नहीं, इस एहसास से, इस कटु सत्य से मैं हिल गयी थी।” जिन कविताओं के कारण मलिका और नामदेव के बीच नज़दीकियाँ बढ़ी और कवियों के विषय में जो धारणाएँ मलिका जी ने बनायी वे टूटती हुई नज़र आ रही थी, तभी तो उन्होंने लिखा है, “नामदेव की कविता से आज भी प्यार है। कवि नामदेव से भी। क्योंकि कवि नामदेव ढसाल अपने कविताओं से अबतक तो ईमानदार है। पर प्रेम करना और प्रेम निभाना, ये दो बातें अलग-अलग है। मैं वहाँ कमजोर हुई, यह मेरी हार होगी, उसकी नज़र से; पर अच्छा कवि, अच्छा पति या साथीदार हो सकता है, इस पर मेरा विश्वास हो नहीं पाता है।” चाहे नामदेव ढसाल एक कवि के रुप में अपनी कविताओं से ईमानदार रहे हों, पर अपनी पत्नी के साथ उन्होंने शादी के बाद हिंसा भी की है। उनका अपने पत्नी और बच्चे के प्रति गैरजिम्मेदाराना व्यवहार मलिका जी को जीवन भर सालता रहा है। इस तरह हम देखते हैं कि मलिका जी ने शादी को लेकर जो सपने देखे थे, उन सपनों को शादी के बाद पूरा होता हुआ न देखकर बहुत दुखी हो जाती हैं। नामदेव ढसाल जैसा संवेदनशील और दलित आंदोलनों से जुड़ा हुआ कवि पारिवारिक जिम्मेदारियों को सम्भालने के मोर्चे पर कमज़ोर पड़ता हुआ नज़र आता हैं। शिरीष पै के भी अपने भावी पति को लेकर कुछ सपने थे, लेकिन वे सपने पूरे न होने पर वे लिखती हैं, “इस जिन्दगी में ‘प्रिन्स चार्मिंग’ कभी नहीं मिलता है। वह केवल एक सपना है।” विवाह के बाद शिरीष पै को लगा कि विवाह को लेकर देखे गये, सपने टूटकर बिखर रहे हैं। शिरीष पै और व्यंकटेश ने वैवाहिक जीवन के बारे में उतना सोचा नहीं था, इसीलिए वे कहती हैं, “उस प्यार के खातिर उसके बारे में ज्यादा जानकारी न होते हुए भी उससे शादी की। उसकी आर्थिक स्थिति, उसका भविष्य- किसी का भी विचार न करते हुए मैंने उसके गले में माला डाली।” शिरीष के पिता के समाचार पत्र ‘मराठा’ का काम व्यंकटेश करने लगे थे, आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई थी। फिर भी व्यंकटेश अपनी पत्नी को समाचार पत्र के कार्यालय में ही डाँटता-फटकारता है। व्यंकटेश के स्वभाव में आये परिवर्तन के बारे में शिरीष लिखती हैं , “मेरी स्त्रियों के साथ की दोस्ती वह सह नहीं पाता था; पुरुषों के साथ की बात ही छोड़ो। किसी साहित्यकार का मुझसे हँसते-खेलते हुए बातचीत करना उसे जरा भी पसंद नहीं था। बाहर कुछ भी नहीं दिखाता था । पर पीछे मेरे दिल पर चोट करने वाली भाषा का प्रयोग करता था। कभी-कभी तो उसने बड़े-बड़े लोगों का अपमान सिर्फ इसलिए किया कि वे मुझसे प्यार से पेश आते थे। ऐसी परिस्थिति में शरीर और मन से मैं उससे दूर जा रही थी।” ऐसी स्थिति में आये अकेलेपन को दूर करने के लिए उन्होंने लेखन का सहारा लिया। क्योंकि व्यंकटेश ने उनकी मानसिक स्थिति को जानकर सहारा तो नहीं दिया लेकिन शिरीष जी द्वारा हुई कुछ गलतियों के लिए अपने मन में द्वैष भाव रखा था। शिरीष मानती हैं कि पति-पत्नी के बीच झगडा, रुठना-मनाना होता ही रहता है। रिश्तों का प्रवाह अपने साथ गंदगी लेकर ही चलता है, वह अपनी यह गंदगी किनारे पर फेंकते रहता है और बार-बार शुद्ध होने का प्रयास करते रहता है। शिरीष और व्यंकटेश ने भी काफी समय बाद अपने रिश्तों की गंदगी दूर करने का प्रयत्न किया था। पर, “उसके अंतिम दिनों में थोड़े समय के लिए क्यों न हो, हमारे रिश्तें का प्रवाह शुद्ध होने की संभावना निर्माण हुई थी। पर वह संभावना निर्माण हुई नहीं थी कि वह प्रवाह एकदम सूख ही गया...वक्त के आँचल में गायब हो गया।” इस तरह अपने प्रेम को बचाने की हर संभव कोशिश शिरीष जी द्वारा हुई, जब तक दोनों के रिश्तों के फासले कम होने का समय पास आने लगा था, तब तक व्यंकटेश दुनिया से फासला बढ़ा चुका था। सुनीताबाई देशपांडे का प्रेम-विवाह मराठी के प्रसिद्ध लेखक पु.ल.देशपांडे से हुआ। दुनिया के लिए पु.ल. देशपांडे बड़े लेखक थे, पर अपनी पत्नी के साथ उनका व्यवहार बहुत ही गैरजिम्मेदाराना रहा है। सुनीताबाई देशपांडे अपने वैवाहिक जीवन के बारे में लिखती हैं, “विवाह जैसे सामाजिक बंधन की मुझे कभी जरूरत महसूस नहीं हुई। फिर भी मैं भाई( सुनीता जी अपने पति को भाई कहती थीं) से विवाह करने के लिए तैयार हुई, तब लगा था, यह बंधन जिस समय तोड़ने का मन हो, उस दिन तोड़ दूँगी। किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसा क्षण अचानक आता होगा, पर मेरे जीवन में धीरे-धीरे पास आता गया तथा आपातकाल के पहले कुछ समय और अधिक महसूस होने लगा। यह बंधन अब तोड़ना चाहिए, भाई से अब अलग होना चाहिए, यह विचार पक्का होने लगा।” धीरे-धीरे ही सही सुनीता जी पु.ल.देशपांडे के साथ का सहजीवन छोड़ने का मन हो रहा था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। पु.ल. देशपांडे की तरह की रणजीत देसाई का नाम मराठी साहित्य में आदर से लिया जाता है। माधवी देसाई रणजीत देसाई की दूसरी पत्नी थीं और माधवी देसाई की भी यह दूसरी शादी थी। माधवी देसाई से विवाह करने से पूर्व जो सपने रणजीत देसाई ने दिखाये थे । यह वही रणजीत देसाई थे, जिन्होंने माधवी जी से विवाह करने के लिए क्या कुछ नहीं कहा था। रणजीत देसाई माधवी जी को विविध नामों से संबोधित करते थे, वे उन्हें कल्याणी, चित्ररेखा, सुगंधा, बसन्ती आदि नामों से बुलाते थे। रणजीत देसाई ने माधवी से कहा था, “सांबरा हवाई अड्डे पर मैंने जब तुम्हें देखा तब मुझे लगा, यह मेरी है। मैंने तुम्हारा घर देखा, जिस सामर्थ्य से तुम खड़ी थी, परिवार को संभाल रही थी, बच्चों की देखभाल कर रही थी, ये देखकर मुझे लगा कि यही वह स्त्री है, जो मेरे परिवार को संभालेगी, ध्यान देगी।” ये बातें और इस तरह की असंख्य बातें व सपने रणजीत देसाई ने माधवी देसाई को दिखाये। इन सब बातों का प्रभाव माधवी जी पड़ा था, इसीलिए वे लिखती हैं, “मैने तीन लड़कियाँ होते हुए भी विवाह किया है। क्योंकि मेरा इन्सानों पर, शब्दों पर, सौंदर्य पर, साहित्य पर विश्वास होता है।” माधवी जी ने इसी विश्वास के साथ विवाह के बाद रणजीत देसाई की बेटियों को तो अपनाया, उनकी पहली पत्नी जिनकी दिमागी हालत खराब थी, उनके ईलाज करवाने में प्रमुख भूमिका निभाई। ये सब और भी बहुत सारे कार्य रणजीत देसाई के लिए माधवी जी ने किये, पर अंत में उनके हिस्से में निराशा ही आई। रणजीत देसाई लोगों के बहकावे में आकर माधवी देसाई से दूर होते चले गये और अंततः बात तलाक पर आकर रूक जाती है। इस तरह हम देख सकते हैं कि शादी को लेकर स्त्रियों ने जो सपने संजोए हुए थे, उनका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं था। स्त्रियों ने एक पूर्ण पुरुष की कामना की थी, जो उनके हर सुख और दुख में बराबर का साथी बने। लेकिन पुरुष अपने अधिकारों के प्रति तो सचेत दिखाई देते हैं, पर कर्तव्य के प्रति नहीं। ये सारे पुरुष उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, फिर भी पितृसत्तात्मक समाज के दिए हुए संस्कार इनकी पूरी शिक्षा और विचारों पर हावी होते हुए नज़र आते हैं। हमारी शिक्षा भी इन संस्कारों को रोक नहीं पाती है। जिसके चलते साहित्यकार भी अपनी पत्नी से अमानवीय व्यवहार करते हुए नज़र आते हैं। इनकी सारी बौद्धिकता केवल बातों और किताबों तक ही सीमित नज़र आती है। इनका व्यवहार दूसरे पुरुषों के भाँति ही होता है। कुछ स्त्रियों ने प्रेम विवाह किया, उनके पतिओं का भी विवाह के बाद रवैया एकदम बदलता हुआ नज़र आता है। इंदिरा संत, शीला झुनझुनवाला और पद्मा सचदेव (दूसरे विवाह के बाद का) वैवाहिक जीवन सुखमय बीताते हुए नज़र आती हैं। इन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, ये सारी स्त्री आत्मकथाएँ स्त्रियों के सपनों के टूटने की कहानियाँ ही कहती हैं। 3.8 लैंगिग जीवन पुरुष अपनी आत्मकथा में अपने काम जीवन के बारे में निसंकोच बताता है, उसके लिए इस तरह लिखना गर्व की बात हो सकती है। हमारे समाज में उसे इस तरह के अनुभव लिखने के लिए अपमानित भी नहीं होना पड़ता है। न समाज उसे एक अलग नज़र से देखकर उसका जीना हराम करता है। लेकिन इसको अगर स्त्री आत्मकथा के संदर्भ में देखने पर स्थितियाँ विपरित हो जाती हैं। इस तरह के अनुभव अगर कोई स्त्री लिखती हैं, तो हमारे समाज की भूमिका एकदम विपरित होती है। वह अपने पति या प्रेमी के साथ के काम संबंधों के अनुभवों के बारे में लिखती हैं, तो उसकी आत्मकथा पर अश्लिलता की मुहर लगा दी जाती है। इसीलिए ज्यादातर स्त्रियाँ काम जीवन से संबंधित अनुभवों का आत्मकथाओं जिक्र नहीं करती है। कुछेक स्त्रियों ने ही काम जीवन से संबंधित अनुभवों को आत्मकथाओं में व्यक्त किया है। पति-पत्नी को एक-दूसरे को समझने के लिए शरीर संबंधों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। मलिका अमर शेख लैंगिक संबंधों को पारिवारिक जीवन का बेस कहती हैं, तो सुशील पगारिया इसे पति-पत्नी के बीच के संवाद महत्वपूर्ण माध्यम कहती हैं। पारिवारिक जीवन का यह एक आवश्यक हिस्सा है। इसका जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है, जिसके बारे लिखना स्त्रियाँ टालती हैं या संकोच के कारण लिखती नहीं हैं। स्त्रियों का इस विषय पर अपने अनुभवों को न लिखने के कारण हमारे पितृसत्तात्मक समाज की जड़ों में है। इस विषय पर कुछेक स्त्रियों ने अपने अनुभवों को बड़ी गहराई से लिखा है। प्रभा खेतान ने अपनी आत्मकथा में खुलकर काम संबंधों के बारे में लिखा है। डॉ. सराफ विवाहित है। प्रभा खेतान आँखें दिखाने के लिए डॉक्टर सराफ के पास जाती हैं और अपना अपना दिल डॉक्टर को दे बैठती है। प्रभा खेतान को डॉक्टर की बाहों में सुरक्षित महसूस करती हैं। विवाहित डॉक्टर और अविवाहित प्रभा खेतान के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं। । अपने इन संबंधों के बारे में प्रभा खेतान डॉक्टर से कहती हैं,“हमारे मिलने का कारण केवल देह नहीं...पर हम देह से अलग भी तो नहीं हो पा रहे।” प्रभा खेतान का यह कथन सही भी है, क्योंकि वे पूरे समर्पण भाव से डॉक्टर सर्राफ से प्यार करती हैं, हृदय से भी और देह से भी। प्रभा खेतान अपने प्यार को देह से अलग करके देख नहीं पाती है। केवल देह को प्राप्त करना ही उनके लिये प्यार नहीं है, न उनका लक्ष। इसलिए जब डॉक्टर सर्राफ उनकी तरफ अनदेखा करने लगे थे, किसी और के साथ संबंध बनाने में व्यस्त थे, तब प्रभा खेतान को लगा था, “औरत भी तो कह सकती है तू नहीं तो कोई और सही। कम-से-कम एक बार किसी अन्य पुरुष की बाँहों में अपना होना तो महसूस कर पाउँगी।” अन्य पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाकर भी देखती हैं, पर वहाँ केवल एक शरीर दूसरे शरीर से टकराता भर है, तब प्रभा खेतान को प्यार और वासना के बीच के अंतर का पता चलता है, इसलिए वे लिखती हैं, “खैर, शरीर टकराए, पर मैं उस चेहरे में डॉक्टर साहब को खोज रही थी। मैं अपनी ही देह की प्रत्येक हरकत को साक्षी भाव से देखती रही थी। दो-एक बार हम और मिले। मुझे लगा मैं इस व्यक्ति से प्रेम नहीं करती। प्रेम और वासना का फर्क मुझे उस दिन समझ में आया। प्रेम सर्कस का नाम नहीं, जिमनास्टिक का खेल नहीं...” इस घटना के बाद उनको कुछ दिनों तक अपराध बोध ने घेर तो लिया पर एक बात उनकी समझ में आ चुकी थी कि, “लेकिन मुझे भी समझ में आ गया कि प्रेम कभी देह आधारित नहीं हुआ करता, देह की भूमिका गौण है।” प्रभा खेतान देह की महत्ता को पूरी तरह नकारती नहीं है, लेकिन वह प्यार की तुलना में उसे गौण मानती है। जहाँ प्यार नहीं है, वहाँ शारीरिक संबंध उनके लिए महज दो शरीर का टकराना भर है। जिसे कभी प्यार नहीं कहा जा सकता है। प्रभा खेतान और डॉक्टर सर्राफ के शुरुआत में मिलने का कारण देह नहीं था, पर देह से अलग भी नहीं मानते हैं। यहाँ उनके लिए देह गौण होते हुए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वे जिसे प्यार करती हैं, उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित कर रही होती है। अन्यथा, किसी अन्य व्यक्ति, जिसे वे प्यार नहीं करती हैं, वहाँ उनके लिए शरीर की भूमिका गौण हो जाती है। पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला हमारा समाज स्त्री के मन में भी काम-भावना होती है, कि कल्पना भी कर नहीं सकता है। सेक्स संबंधों में निष्क्रियता स्त्री के सतीत्व की पहचान है। अगर पत्नी सेक्स संबंधों में सक्रियता दिखाती है, तो उसे संदेह की नज़र से देखा जाता है। हमारा समाज स्त्री की भी काम इच्छाएँ होती हैं, को मानता नहीं है। मैत्रेयी पुष्पा का पति जब काम संबंधों का ठीक तरह से लुफ्त उठा नहीं पाता है, तब मैत्रेयी मोर्चा अपने हाथ में लेकर आनंद लोक की सैर करती है। इस घटना के बारे में वे लिखती हैं, “कुछ न सोचा फिर, पिया को आनन्दलोक में खींच लिया। वे खिंच भी आए, क्योंकि सचमुच आनन्द पा रहे थे। सारी पर्देदारियों से मुक्त होकर जो आदिम दृश्य बना, उसमें थल नहीं जल-ही-जल था। जल की तरंगें उलटी थीं। उलटी लहरों की बात ने बिसात पलट दी। श्रृखंला कड़ियाँ टूटीं। प्रियतम चकराए, मर लड़की चकराने का मौका दे तब न? लहरों पर लहरें चली आईं। सिलसिला बीच में टूटे तो भँवर पड़ जाएगा, यह बात डॉक्टर ने भी समझ ली। “वंडरफुल !” महारस के बाद डॉक्टर ने शाबासी दी।” रात में ‘वंडरफुल’ कहने वाला डॉक्टर सबेरे सवालों के झड़ी लगा देता है। उन्हें अपनी पत्नी का कामसंबंधों में पहल करना अपने मर्दानगी का अपमान लगने लगता है। उनको अपनी पत्नी पर संदेह होने लगता है और अपने प्रति हीन भाव जग जाता है। मैत्रेयी को हिदायते दी जाती है, घुँगट में रहने के आदेश मिलते हैं। स्त्री का इस तरह सेक्स संबंधों में मोर्चा सम्भालना भारतीय पुरुष मन बसी चरित्रवान स्त्री की छवी को तोड़ता है। वह इस तरह की किसी भी पहल को बर्दास्त नहीं कर पाता है। इसी कारण मैत्रेयी का पति पहली रात ‘वंडरफुल’ कहता है, पर जैसे ही उसके भीतर का पुरुष जग जाता है, वह अपनी पत्नी पर शक करने लगता है। इस तरह एक बात तो स्पष्ट होती है कि काम संबंधों में स्त्री केवल एक निष्क्रिय गुड़िया बनी रहेगी या अपने पति के कहे नुसार क्रिया करेगी तो वह चरित्रवान कही जायेगी। स्त्री की यौनिकता के बारे में जानने का प्रयत्न पति द्वारा किया नहीं जाता है। कृष्णा अग्रिहोत्री के काम जीवन की यादें बहुत भयानक है। इनका दाम्पत्य जीवन बहुत दुखद रहा है। पति ही उनपर बलात्कार करता है। इनके पहले पति सत्यदेव अग्निहोत्री ने कभी कृष्णा जी से प्रणय संबंधों के बारे में पुछा नहीं, जब मर्जी की तब कृष्णा जी को अपने पति के लिए तैयार रहना पड़ता था। बहुत बार उनको पति का ऐसा करना बलात्कार के समान लगता था। इसीकारण कृष्णा अग्निहोत्री कहती हैं, “नारी की शारीरिक तुष्टि उसी पुरुष से होती है जिससे प्रेम हो जो उसे सामाजिक या व्यक्तिगत जीवन में सम्मान व सुरक्षा प्रदान करे, इस तथ्य को अग्निहोत्री जी तो कभी नहीं समझ पाये।” कृष्णा जी अपने पति से न घर पर इज्जत मिली न बाहर वालों के सामने, इसलिए अपने पति द्वारा किया गया सेक्स उन्हें बलात्कार के समान लगता है। जिसमें कृष्णा जी के पति हिंसक हो जाते थे। मराठी स्त्री रचनाकारों ने भी अपने काम संबंधों के बारे में लिखा है। पत्नी के शारीरिक-मानसिक व्यथा को न जानते हुए, उससे केवल भोग की अपेक्षा करने से उसे गहरा आघात पहुँचाता है। शिरिष पै के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। शिरीष पै को जचगी के समय टाईफाईड की बीमारी हुई थी। बीमारी कम हुई थी, पर अभी पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं हुई थी। शरीर संबंध के लिए न उनका मन तैयार था न शरीर। इस विषय में वे लिखती हैं, “मेरी सारी शारीरिक इच्छाएँ जैसे नष्ट हो गयी थी। वैराग्य की भावना ने घर क लिया था। विशष कर शरीर को। ऐसे स्थिति में एक रात को व्यंकटेश ने बुलाया था। बहुत सारी रातें में उससे दूर ही थी। उस रात उसने बहुत आत्मीयता से बुलाया था। मेरी जाने की इच्छा नहीं थी। मैं गयी नहीं। वह गुस्से में चिल्लाने लगा “…तो तुम मर नहीं जाती” हाँ बाबा...हाँ, मरती नहीं! पर ‘नहीं’ कहने का भी मुझे अधिकार नहीं था? उन शब्दों से मेरे मन को एक गहरा जख्म हुआ। इतना गहरा की जिन्दगी भर कभी भरा ही नहीं। जिंदगी भर वह जख्म बहता ही रहा।” यहाँ एक व्यंकटेश को समझनी चाहिए थी कि समागम केवल अकेले की इच्छा से संभव नहीं है, न ही स्त्री केवल एक मन विहीन शरीर है। समागम के लिए मन के साथ-साथ शरीर की स्थिति भी अच्छी होनी चाहिए। किसी एक के अभाव में सेक्स संबंध आनंददायी नहीं होंगे। मलिका अमर शेख और नामदेव ढसाळ के बीच विवाह के पहले से ही शारीरिक संबंध थे। जिसे उन्होंने अपनी आत्मकथा में खुलकर कहा है। उन्होंने यह भी बताया है कि पहले समागम के संबंध में किस तरह की भ्रामक बातें हमारे समाज में फैली है। वे अपने पहले समागम के अनुभव के बारे में बताती हैं, “बाप, रे....वह पहला अनुभव दर्दनाक था। इस कसरत को लोग शरीर सुख क्यों कहते होंगे, यह सवाल मेरे सामने खड़ा हुआ! कितना शारीरिक दर्द!..” मलिका अमर शेख को अपना पहला समागम बहुत दर्दनाक लगा, लेकिन अपने किसी पसंदीदा व्यक्ति को शरीर सौंपते हुए अच्छा भी लगा। मलिका जी वैवाहिक जीवन को सुखक बनाने के लिए काम संबंधों को अच्छा होना, कितना आवश्यक के बारे में इस तरह बताती हैं, “सेक्शुअल रिलेशनशिप एक नाजुक और कठिन सवाल है... तार जुडे, तो जिन्दगी भर महफिल जम जाती है। नहीं तो बेसूर हुआ एखाद स्वर मिलाते-मिलाते पारिवारिक जीवन के अन्य स्वर बिखरने लगते हैं। क्योंकि शरीरिक संबंध ही पारिवारिक जीवन का ‘बेस’ होता है।...पर शरीरिक संबंधों का संवाद ठीक तरह से होना ही चाहिए, क्योंकि अभी तक पुरुष प्राणी स्त्री के बारे में उसके शरीर से परे होकर सोच नहीं सकता है, इसलिए संवाद के लिए इस ‘ब्रिज’ का इस्तेमाल करना एक विकल्प है।” मलिका जी बात सही भी है। बहुत सारे परिवारों में पति-पत्नी को मिलने का समय नहीं मिलता है, वे एक-दूसरे से ठीक तरह से बात नहीं कर पाते हैं। रात के समय शारीरिक संबंध स्थापित करते समय ही वे संवाद स्थापित कर पाते हैं। एक दुसरे का सुख-दुख जानने से ज्यादा समय शरीर की आवश्यकता को तृप्त करने में चला जाता है। ऐसे समय में स्त्री अपने पति के साथ शरीर से संवाद साधने का प्रयत्न करती है। सुशील पगारिया और उनके पति के बीच शुरूआत में बातचीत केवल शारीरिक संबंधों के दौरान ही होती थी। वे अपने इन अनुभवों के बारें में लिखती हैं, “परिचय केवल देह का था, स्वभाव आदि का होने का कोई कारण ही नहीं था। कभी साथ में रिश्तेदारों के यहाँ जलगाँव आयें, तो वे रस्ते के एक तरफ से चलते थे और मैं विरुद्ध बाजु से! यह मर्यादा, परंपरा या इसे क्या नाम दे?” सुशील जी का अपने पति के साथ केवल देह का संबंध था। इसलिए भारतीय समाज के परिप्रेक्ष में मलिका जी वक्तव्य सही कहा जा सकता है, ज्यादातर पुरुष स्त्री को शरीर के अलावा कुछ नहीं समझते हैं। विवाह के पश्चात पहले शारीरिक संबंध के बाद उर्मिला पवार का पति कहता है, “बहुत थंडी हो” इस तरह की तक्रार करने वाला पति को अपने पत्नी का काम संबंधों में अनुभवहीन होना खुश कर जाता है। उसे अपने पत्नी की पवित्रता का सबुत मिल जाता है। वह अपने पत्नी के साथ के पहले शरीर संबंध से खुश न होने पर भी पत्नी का इन संबंधों में अनुभवहीन होना उसे दुगनी खुशी देता है। हालाँकि उर्मिला पवार को शरीर संबंधों की जानकारी थी, पर उनके उनुसार, “मैंने पहल की होती तो, मैंने कहाँ इस तरह का अनुभव प्राप्त किया, इस शक से उनके चेहरा उदासी से भर जाता। दरअसल, मैं थंडी नहीं थी। ‘वह’ सब मेरी समझ में आ रहा था, पर सबकुछ मेरे मन के विरुद्ध घटा था।” उर्मिला पवार और मैत्रेयी पुष्पा के विवाह के बाद की पहली रात के अनुभवों से एक बात स्पष्ट होती है कि पढ़े-लिखे पुरुषों पर पुरुषसत्तात्मक मूल्यों का कितना गहरा प्रभाव होता है। उर्मिला पवार का पति उर्मिला को पहली रात के काम संबंधों से खुशी न मिलने पर भी अपने पत्नी के इन संबंधों में अनुभवहीन होने से खुश होता है, तो दूसरी ओर मैत्रेयी पुष्पा विवाह के बाद की पहली रात में पहल करती हैं और अपने पति को चरम सुख प्रदान करती हैं, पति ‘वंडरफुल’ भी कहता है। लेकिन सबेरे जैसे मैत्रेयी पुष्पा के पति के पुरुषसत्तात्मक मूल्य जग जाते हैं। वह अपनी पत्नी को डाँटने लगता है। इस तरह हम देखतें हैं कि लैंगिक संबंधों में किस तरह पुरुषवादी मानसिकता हावी हुई है। स्त्री का ऐसे संबंध में अज्ञानी होना उसके चरित्रवान होने का प्रमाण-पत्र बनता है। इसलिए ज्यादातर भारतीय स्त्रियाँ संभोग के समय पहल नहीं करती है, क्योंकि ऐसा करने वाली स्त्री को पति शक की निगाह से देखता है। आज भी भारतीय घरों में पति-पत्नी को खुलकर बात करने का समय नहीं मिलता है। ऐसे में संभोग का समय ही उनके लिए संवाद का समय बनता है। इसलिए इस संबंध को बेहतर बनाने के लिए स्त्रियाँ अनेक प्रयास करती हैं। लैंगिग संबंधों को पारिवारिक जीवन का ‘बेस’ कहने वाली मलिका अमर शेख अपने पति के साथ संभोग करने से पहले उसे एक साफ शरीर देने के लिए नहाकर तैयार होती है। इस तरह वह अपने पति के साथ शरीर से संवाद साधकर अपना पारिवारिक जीवन सुखदायक बनाना चाहती है। इन स्त्री आत्मकथाकारों को देह का महत्व तो पता था, पर किसी ने भी देह को अतिरिक्त महत्व नहीं दिया। 3.9 घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा को हमारे समाज ने एक मूक सम्मति दी हुई है। इसकी जड़े काफी गहरी हैं। दिनों-दिन घरेलू हिंसा के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। पहले खासकर स्त्रियाँ घरेलू हिंसा की शिकायत नहीं करती थी। लेकिन आज समय के साथ स्त्रियों की सोच में भी बदलाव आया है। वे घरेलू हिंसा का प्रतिकार कर रही हैं और न्याय के लिए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा रही हैं। घरेलू हिंसा का शिकार घर में केवल स्त्रियाँ ही नहीं होती हैं, वृद्ध और बच्चे भी इसके शिकार होते हैं। हमारा समाज विवाह के बाद स्त्री पर हाथ उठाने का अधिकार उसके पति को दे देता है। निलय श्रीवास्तव अपने लेख ‘घरेलू हिंसा’ में घरेलू हिंसा को समझाते हुए उसकी परिभाषा इस प्रकार दी हैं- “घरेलू हिंसा की परिभाषा:- पुलिस - महिला, वृद्ध अथवा बच्‍चों के साथ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा अपराध की श्रेणी में आती है। महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा के अधिकांश मामलों में दहेज प्रताड़ना तथा अकारण मारपीट प्रमुख हैं। राज्‍य महिला आयोग - कोई भी महिला यदि परिवार के पुरूष द्वारा की गई मारपीट अथवा अन्‍य प्रताडना से त्रस्‍त है तो वह घरेलू हिंसा की शिकार कहलाएगी। घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 उसे घरेलू हिंसा के विरूद्ध संरक्षण और सहायता का अधिकार प्रदान करता है। आधारशिला (एन.जी.ओ.) - परिवार में महिला तथा उसके अलावा किसी भी व्‍यक्ति के साथ मारपीट, धमकी देना तथा उत्‍पीड़न घरेलू हिंसा की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा लैंगिक हिंसा, मौखिक और भावनात्‍मक हिंसा तथा आर्थिक हिंसा भी घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं।” घर में होनी वाली अधिकत्तर हिंसा महिलाओं से ही जुड़ी होती है। इस तरह की हिंसा का परिणाम उनके शरीर के साथ मन पर भी पड़ता है। जिसके चलते उनकी कार्यक्षमता कुंद पड़ती है। मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है। मोहम्मद सुलेमान और दिनेश कुमार अपनी किताब ‘मनोविज्ञान और सामाजिक समस्या’ में घरेलू हिंसा के अनेक प्रकारों का उल्लेख करते हैं -1.शारीरिक हिंसा, 2. यौन हिंसा, 3.यौन दुराचार,4. मनोवैज्ञानिक हिंसा, 5. संवेगात्मक हिंसा, 6. आर्थिक दुरूपयोग,7.धोखा धड़ी 8. आत्मिक दुरुपयोग , 9. मादा भ्रूण हत्या। इन घरेलू हिंसा के प्रकारों में से कुछ प्रकार हमें स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं में दिखाई देते हैं। सुशीला टाकभौरे के पति उनके साथ केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं करते हैं, बल्कि उनके साथ गाली-गलौच भी करते हैं। लगातार उनके साथ शारीरिक और मनौवेज्ञानिक हिंसा सुशीला टाकभौरे के पति ने की है। वे लिखती हैं, “मेरे साथ घर में मारपीट-गाली-गलौज सब कुछ हुआ। बाल पकड़कर खींचना, लातों से मारना, गर्दन पर मुक्के बनाकर मारना, पीठ पर घूँसे मारना-मैने सब कुछ सहा। बेंत के निशान कई दिनों तक मेरे शरीर पर रहते थे। मार खाने के बाद मेरी हालत यह होती थी-घंटों सिर चकराता, जैसे मैं हवा में उड़ रही हूँ, जमीन से फिसल रही हूँ, बड़े-बड़े पत्थर मेरी तरफ लुढ़कते आ रहे हैं, जैसे भागता हुआ हाथी आकर अचानक मेरे सिर पर पैर रखकर मुझे कुचल रहा है। कई बार मुझे लगता, लगातार बाल खींचकर सिर पर मारने से कहीं मैं पागल तो नहीं हो गई? कभी लगता मैं होश में हूँ या बेहोश हूँ? घंटो रोती, सिसकती रहती थी, कोई देखता ही नहीं था कि मुझे कहाँ चोट लगी, घातक तो नहीं लगी? मुझे क्या हो रहा है या क्या होगा? किसी को चिन्ता नहीं थी।” सुशीला जी के पति भयभीत कर कमजोर बनाने का हुनर जानते थे। इसीलिये वे बार-बार सुशीला जी के लिए हीन शब्दों को प्रयोग करते रहते थे। वे सुशीला जी से कहते हैं, “तू मेरे सामने कुछ नहीं है। तेरी औकात सिर्फ एक बर्तन माँजने वाली नौकरानी के बराबर है।” इस तरह की बातें करके सुशीला जी को मानसिक रूप से कमजोर करने की हर तरह की कोशिश उनके पति ने की। आर्थिक रुप से कमजोर करना भी घरेलू हिंसा का एक प्रकार है। जिसमें पति पत्नी की कमाई को अपने पास रखता है, और उसे अपने खर्चे के लिए पति के सामने हाथ फैलाने पड़ते है। सुशीला जी लिखती हैं, “अपने वेतन का हिसाब कभी नहीं बताते थे, मेरा पूरा वेतन ले लेते थे। मुझे पता ही नहीं चलता था, कहाँ क्या खर्च हो रहा है। वे चाहते थे, मैं अपने पूरा वेतन हमेशा उन्हें देती रहूँ, कभी कोई हिसाब न माँगूँ। हमेशा उनके बड़प्पन को मानती रही हूँ, कभी उनसे कोई सवाल-जवाब न करूँ। ऐसा न करने पर मैं हिंसा की शिकार बनती। छोटी सी बात होते ही छड़ी उठा लेते, वे छड़ी हमेशा सँभालकर, छिपाकर रखते थे।” इस तरह सुशीला जी को कॉलेज जाने के लिए बस किराए के पैसे रोज अपने पति से माँगने पड़ते थे। लेकिन सुशीला जी ने भी इस अन्याय को बहुत दिनों तक नहीं सहा। उन्होंने अपने पति को वेतन के पूरे पैसे देना बंद किया। पद्मा सचदेव के पति दीप जी न कुछ काम करते थे, न दारू पीना छोड़ते थे। दीप जी ने लोगों के बीच पद्मा जी का अपमान करते हुए कहते थे,“ये दफ्तर जाती है। पता नहीं किस-किसने इसके संबंध हैं। पांच रूपये हों तो दो, मैं जरा गम गलत करूंगा।” इस तरह बदनाम कर दीप जी पद्मा सचदेव के साथ मानसिक हिंसा ही करते थे। कृष्णा अग्निहोत्री के पति केवल उनके साथ शारीरिक हिंसा ही नहीं करते थे बल्कि उनके साथ यौन हिंसा भी करते थे। कृष्णा अग्निहोत्री के पति छोटी-छोटी बात को लेकर भी अपने पत्नी की पिटाई करते थे। शराब के नशे में हो तो मारपीट के साथ अपने पत्नी का बलात्कार भी करते थे। कृष्णा जी अपने पति के अमानवीय व्यवहार के बारे में लिखती हैं, “आधी रात को शराब में धुत अग्निहोत्री जी घर आते ही मुझे पलंग से घसीट अंकशायनी बना लेना चाहते ....बस यही नहीं सह पाती, विरोध करती और जमकर पिटती और बलात्कार को सह बेशर्मी से सो जाती।” इस तरह की वारदातें कृष्णा जी के रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा बन गई थीं। रोज़ ही किसी न किसी कारण मारपीट और पत्नी का मन न होते हुए भी उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना, बलात्कार के बराबर था। इन सबके परिणाम स्वरूप कृष्णा जी अपने पति से अलग हो जाती है। कृष्णा अग्निहोत्री के दूसरे पति ने कृष्णा जी के साथ मनोवैज्ञानिक हिंसा करनी शुरु की, वे जहाँ जाते वहाँ कृष्णा की बदनामी करते रहते हैं, वे लिखती हैं, “श्रीकांत ने एक नई बात प्रारंभ की। देहली गये...शिमला गये...जहाँ जाते वहीं मेरी बुराई करने लगते...सड़कों पर गाली-गलौज प्रारंभ हो जाता।” इस तरह का अपमान चंद्रकिरण सौनरेक्सा के पति ने भी किया है। चंद्रकिरण सौनरेक्सा के पति भी शक्की मिज़ाज के थे। वे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकों द्वारा चंद्रकिरण जी के नाम लिखे पत्रों को लेकर उनके साथ गाली-गलौज करते हैं। गाली-गलौज भी मनोवैज्ञानिक हिंसा का एक प्रकार है। चंद्रकिरण जी के पति भी खुद एक साहित्यकार और कलाकार थे। लेकिन उनका अपने पत्नी के प्रति व्यवहार एक बीमार मानसिकता वाले व्यक्ति जैसा था। वे अपने पत्नी के साथ किसी भी साहित्यकार का अनैतिक संबंध होने की बात करते हैं। चंद्रकिरण जी का कहानी संग्रह ‘जवान मिट्टी’ विष्णु प्रभाकर जी के सहयोग से प्रकाशित हुआ, तब उस सहयोग को वे अनैतिक संबंध के रूप में प्रचारित करते रहे। चंद्रकिरण जी अपने पति के स्वभाव के विषय में लिखती हैं, “फिर तो, घर में हर वर्ग का पुरुष, उन्हें मेरा प्रेमी लगने लगा- चाहे वह कोई संभ्रात परिचित हो, या अख़बार देने वाला। उन्हें यह समझ में नहीं आया कि लेखिका चंद्रकिरण सौनरेक्सा से प्रतिशोध लेने में, बदनामी सौनरेक्सा-खानदान की अपनी बहू की; उनके बच्चों की माँ की हो रही थी। पूरे लखनऊ में, जब यह सब कांतिजी द्वारा कहा जा रहा था, तब लखनऊ की उर्दू-अकादमी मुझे अपना सदस्य बनाने और सम्मानित करने की योजना बना रही थी; और मसरूर जहाँ, उर्दू की लेखिका, से ही मुझे पता चला। उन्होंने कहा, “दीदी! भाईजान ने यह क्या गंद फैलाना शुरू किया है। माना बहुत से लोग इस बकवास पर विश्वास नहीं करेंगे, पर खाविंद जब खुद ऐसी-वैसी बात का इलज़ाम बीबी पर लगाये, तो कुछ उसे सच भी मानेंगे। उर्दू अकादमी में भी ये बातें पहुँच चुकी हैं। इनसे सफाई लेना बेकार था।” इस तरफ का अपमान करना पहली बार नहीं था। ‘हंस’ पत्रिका के सम्पादक अमृतराय के पत्र व्यवहार को लेकर भी कांतिचंद्र जी बड़ी भद्दी बात कही थी, उन्होंने कहा था, “ये साले संपादक भी लड़कियों को बड़े मीठे-मीठे पत्र लिखते हैं। अभी कोई पुरुष लेखक अपनी रचना भेजता तो उत्तर ही पंद्रह दिन बाद मिलता- या मिलता ही नहीं।... तुमने तो कहानी भेजते समय पत्र में कुछ न कुछ तो लिखा ही होगा जरूर...उसके चुतड़ों में घी मला होगा।” इतनी सारी बातें बोलते समय कांतिचंद्र जी ये भूल गये थे कि उनके और चंद्रकिरण जी के प्यार की शुरुआत ही इस तरह के पत्राचार से ही हुई थी। इस तरह की हिंसा करके उन्होंने चंद्रकिरण को अंदर ही अंदर मार डाला था। इसके बाद से चंद्रकिरण जी अपनी रचनाएँ अपने पति को देती थी, वे अपनी मन मर्जी से किसी भी पत्रिका को रचनाएँ भेज देते थे। इस बात का दुख उन्हें अपनी जिन्दगी भर रहा कि वे अपनी मर्जी से रचनाओं को बड़ी पत्रिकाओं में भेज नहीं पाई। घरेलू हिंसा की शिकार मराठी की स्त्री रचनाकार भी हुई हैं। मराठी साहित्य में अपनी दलित कविताओं द्वारा हलचल पैदा करने वाले और दलित मुक्ति के लिए आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले नामदेव ढसाल ने भी अपनी पत्नी के साथ एक आम पति की तरह हिंसा की। मलिका जी को नामदेव ढसाल के वैवाहिक जीवन का शुरुआती समय काफी आनंदपूर्ण रहा है, बीच-बीच में नामदेव ढसाल अपनी पत्नी से मारपीट करते थे, वे इस संदर्भ में लिखती हैं,“इसी समय उसने किसी और बात से तंग आकर मुझे थप्पड़ मारी। सहजीवन...साथी आदि प्रतिमाएँ टूट गईं। दुख से मैं रोई। पर मुझे ऐसा कैसे मारा है, इस कारण वही परेशान हुआ।” नामदेव ढसाल मारते-पिटते भी थे, और प्यार भी करते थे। लेकिन कभी-कभी दारु पीने के बाद अश्लिल गालियाँ भी देते थे। मलिका लिखती हैं, “इस के बाद यह दुश्‍चक्र शुरु ही हो गया है... पीना, झगड़ा करना, गाली-गलौज, मारपीट पर इन सब दुखों से बड़ा दुख था, मैंने अपना पहले का नामदेव कहीं खो दिया था। वह बदल रहा था, मुझसे दूर जा रहा था और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी! मुझे उसके सहवास का, उसके प्यार का आकर्षण था। पर उसे मेरी जरूरत नहीं थी।” इस तरह मारपीट और गाली-गलौज का जो सिलसिला शुरु हुआ, वह कभी खत्म नहीं हुआ। इन सबके कारण मलिका जी अकेलेपन का शिकार हुई और बीमार रहने लगी। इन सबके परिणास्वरूप अनेक बार आत्महत्या करने का भी प्रयत्न किया। मराठी के ख्यात लेखक रणजीत देसाई की पहली पत्नी भी घरेलू हिंसा की शिकार हुई। माधवी देसाई देसाई अपने दूसरे पति रणजीत देसाई के विचित्र स्वभाव के कारण हमेशा परेशान रहती है। रणजीत देसाई की पहली पत्नी के पागल होने का कारण भी रणजीत देसाई का ही स्वभाव था, वे उनको छडी से बहुत मारते थे। माधवी की इस अवस्था को देखकर नौकरानी पहली पत्नी के साथ रणजीत देसाई के व्यवहार के बारे में कहती हैं, “बेत की छड़ी से झम-झम मारते थे। हम उन्हें अपनी पीठ के पीछे छिपाते थे। अब आप इस तरह बैठी है, इसलिए याद आयी। ऐसा मत करिए जी।” इस तरह हमने देखा है कि महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के अंतर्गत पुरुषों ने केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं कि तो मानसिक और आर्थिक रुप से कमज़ोर करने की हर संभव कोशिश की है। जहाँ कहीं उन्हें लगा कि स्त्रियाँ उनसे ज्यादा प्रगति करने वाली है, वहाँ किसी न किसी हिंसा के द्वारा उनके कदमों को खिंचने का काम पतियों ने किया। कहीं-कहीं तो पुरुष अपने पौरूष्य को दिखाने के लिए भी उनके साथ हिंसा करता हुआ नज़र आता है। इस तरह की हिंसा हर वर्ग और वर्ण के स्त्रियों के साथ हुई है। कुछ पुरुषों में समय के साथ बदलाव आये भी है, उन्होंने अपने पत्नियों के कार्य को सराहा भी है। इस तरह के उदाहरण हमारे समाज में कम ही दिखाई देते हैं। 3.10 अकेलापन, भय एवं मानसिक अवसाद अकेलापन वह मनःस्थिति है जिसमें व्यक्ति, परिवेश एवं समाज से कटता हुआ; अजनबीपन और परायेपन की चक्की के मध्य पिसने लगता है। अकेलापन अभिशाप बनकर भ्रम, कुण्ठा निराशा को जन्म देता है। अकेलेपन के डर से नारी कभी भावुक होती है, तो कभी हताश होकर जिंदगी खत्म करने पर उतर आती है। कुछ स्त्रियों को पुरुष साथी सही न मिलने के कारण जीवन भर एक भय बना रहता है। वे अकेलापन और भय के कारण मानसिक अवसाद का शिकार भी बनती हैं। स्त्री का अकेलापन पुरुष के अकेलेपन से ज्यादा खतरनाक होता है। पुरुष कहीं बाहर जाकर अपने अकेलेपन को दूर कर सकता है। कुछ स्त्रियों को अकेले बाहर जाने की अनुमति मिलती है, वह भी बंधनों के साथ। अकेलापन, भय और अवसाद मनुष्य को भीतर से खोखला कर देते हैं। आदमी की जीने की इच्छा को खत्म कर देते हैं। अकेलेपन से तनाव, अवसाद जैसी मानसिक बिमारियाँ बढ़ने लगती हैं। शारीरिक रूप से भी आदमी कमजोर होता है। इस तरह की अवस्था में मनुष्य अक्सर आत्महत्या करने के लिए प्रवृत्त होता है। स्त्रियों के अकेलेपन का सबसे बड़ा कारण उनके पारिवारिक जीवन में आयी अस्थिरता होता है। इन आत्मकथाओं के आधार पर कहा जाये तो पति-पत्नी के रिश्तों में आई दरारें ही इनको अकेलेपन, भय और अवसाद के गहरे खाई में ढ़केल देती हैं। यह स्त्रियाँ और इनके पति सब शिक्षित हैं, कुछ पुरुष तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से साहित्य से भी जुड़े हुए है। पर इनके पारिवारिक संबंधों को देखकर लगता हैं कि इनका व्यवहार भी आम पति की तरह ही हैं। इन आत्मकथाकारों को घर, परिवार और बच्चे होते हुए भी अकेलेपन का शिकार होना पड़ा। स्त्री आत्मकथाकारों के जीवन में भी अकेलापन आया। कुसुम असंल के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, पर उनके पति के पास उनके लिए समय नहीं था। उनकी अपनी व्यस्तताएँ थीं। घर में करने के लिए कुछ विशेष नहीं था। इन परिस्थितियों में कुसुम जी में विकृतियाँ पैदा होती हैं। वे लिखती हैं, “मैं विकृतियों के एक जंगल में भटक गई थी, अपनी मानसिक विक्षिप्तता के साथ एक ऐसे किनारे पर खड़ी थी जहाँ मात्र उलझनें थीं और कुछ नहीं। सुशील का व्यवसाय व्यवस्थित और निर्मित हो रहा था, उन्हें अवश्य ही उनकी अनेक उपलब्धियाँ परितोष दे रही थीं। पर जीवन तो बहुत सी कड़ियों के जुड़ते जाने का अटूट सिलसिला है- सुशील कुछ कड़ियाँ जोड़ लेने के बाद अन्य नये के तहत चल पड़े थे, उनके आगे रास्ता खुद-ब-खुद तैयार होता जाता था-बहुमंजिला इमारतें अपने आप में दिल्ली के लिए नया प्रयोग थीं, सफल होती गईं और एक के सात दूसरी जुड़ती चली गईं। समृद्धता धीरे-धीरे पैर पसार रही थी, छोटा ऑफिस बड़ा हो गया था – नाम बड़ा हो गया था – परन्तु घर? घर के नाम पर वही छोटा-सा घर जिसके छोटे-बड़े कमरों में हम ‘एक’ से दो होकर परिवार में बदल रहे थे – गोपाल का विवाह हो चुका था, दीपक का होने वाला था, मेरे बच्चे बड़े हो रहे थे – परन्तु घर के प्रति परिवार की उदासीनता तटस्थ थी। मैं कुछ कहती तो गलत समझ ली जाती। मेरे इस मानसिक डिप्रैशन के मध्य से रेनू आकर मुझे उठा ले गई- वह मुझे जैसे घसीटती हुई ‘इप्टा’ के परिसर में ले आई” इप्टा के जुड़ने के कारण अकेलेपन और मानसिक अवसाद से कुसुम असंल बाहर तो आईं, परन्तु उनकी सास को रंगमंच पर पराये पुरुष के साथ काम करना अच्छा नहीं लगता था। पति से इस काम का कोई विशेष विरोध नहीं था, वे सिर्फ घर में शांति बनाए रहना चाहते थे। प्रभा खेतान के जीवन में भी हमेशा अकेलापन रहा है, उनकी सफलता भी उनके इस अकेलेपन को भर नहीं पाई। वे अपने अकेलेपन के बारे में लिखती हैं, “मैं अकेली थी, इतनी अकेली कि मैं किसी का रोल मॉडेल नहीं बन सकी। कोई लड़की मेरे जैसी नहीं होना चाहती थी...मेरी तमाम सफलताएँ सामाजिक कसौटी पर पछाड़ खाने लगतीं। सारी उपलब्धियाँ अपनी चमक खो देती। अतः मेरी स्वतंत्रता एक जहरीली स्वतन्त्रता थी। जहाँ तनाव अधिक था, कभी न खुलनेवाली गाँठे थीं। अपनी शर्त पर फलती-फूलती हुई एक प्यार भरी जिन्दगी को भीतर के परास्त कर देनेवाली अलझने थीं।” इन मानसिक अवसाद का कारण भारतीय समाज द्वारा बनायी गयी सामाजिक कसौटियाँ थीं, जिन पर प्रभा खेतान का जीवन कभी खरा नहीं उतरता है। वे इन मानसिक अवसाद और अकेलेपन के बीच भयभीत भी रहती हैं। वे लिखती हैं, “मेरी सबसे बड़ी त्रासदी थी कि मैं हमेशा भयग्रस्त रहती, समाज के ताने-बोली का भय, डॉक्टर साहब के विमुख होने का भय, उनके परिवार में एक बाहरी व्यक्ति ही बनकर न हर जाऊँ इसका भय, भय मेरा स्थायी स्वभाव बन गया। मजे की बात तो यह है कि मुझे आर्थिक असुरक्षा कभी नहीं घेरती थी।” आर्थिक सुरक्षीत होने पर भी, जीवन में प्यार के न रहने का डर और रिश्तों के टूटने के भय से, वे हमेशा अकेलेपन और भय ग्रस्त रहती हैं। इस अकेलेपन और भय को कुछ समय के लिए दूर करने के लिए वे हमेशा व्यापार में व्यस्त रहती हैं।उन्होंने लिखा भी हैं कि व्यापार की व्यस्तताओं ने ही उनको अबतक जिन्दा रखा है। मराठी स्त्री रचनाकारों को भी अकेलापन, भय और मानसिक अवसाद से जूझना पड़ा। रणजीत देसाई की पत्नी माधवी देसाई का जीवन बचपन से ही अकेलेपन और प्यार के बीच झूलता आया है। बचपन में कुछ समय तक वे अपने पिता के प्रेम से वंचित रही, इसका उन्हें बेहद दुख होता था। वे चाहती थी कि उनके पिता उनसे बात करें। कुछ तो कहें । लेकिन बचपन का यह अकेलापन कुछ ही दिनों तक रहता है। पित्रा और पुत्री में कुछ समय बाद संवाद स्थापित होता है। रणजीत देसाई के साथ शादी करने के कुछ सालों के भीतर ही दोनों के संबंधो में खट्टास आती है और संबंधों में आये इस दुराव के कारण तलाक होता है। माधवी देसाई के जीवन में तलाक के बाद यादें और अकेलापन रह जाता है। इन यादों और अकेलेपन के बारे में वे लिखती हैं, “दुनिया ऐसे ही चलनेवाली- कभी बरसनेवाली, कभी समाप्त होने वाली, सुखी, शुष्क, पर इसी काल ने मुझे अनेक अच्छी यादें दीं। स्नेही मीले। स्नेह दिया। यात्रा के कारण पहले न देखी हुई, न पढ़ी हुई दुनिया प्रत्यक्ष देख पायी।...आँखों के सामने होते हैं अनेक दृश्य, अनेक प्रसंग, अनेक स्नेही। एक विश्वदर्शन इस काल में मैंने लिया और साथ में होता था,मुझ से अनजान मुझसे चिपका हुआ अकेलापन।” और इस अकेलेपन से खुद लड़ती रही और अपने कर्तव्य निभाती रही। माधवी जी ने रणजीत देसाई को नज़दीक से देखा था, वे बड़े लेखक थे दुनिया के लिये, लेकिन एक भारतीय पुरुष की तरह उनके मन में सामन्ती मानसिकता कुट-कुट के भरी हुई थी। केवल रणजीत देसाई की पत्नी ही नहीं तो दलित मुक्ति की आवाज़ बने और आन्दोलनों से उपजे कवि नामदेव ढ़साल की पत्नी भी अकेलेपन का शिकार होती हैं। नामदेव ढसाल अपनी पत्नी के साथ मारपीट करते हैं, गालियाँ देते हैं, दूसरी औरतों के साथ शादी के बाद भी संबंध रखते हैं, इन सब के कारण मलिका जी की मानसिक स्थिति में बदलाव आने लगता है। वे लिखती हैं, “वह साल मैंने असह्य मानसिक त्राण सहते हुए निकाला। उसी के परिणास्वरूप मेरी तबीयत खराब हुई तो खराब ही हो गयी। आज तक मैं पूर्वस्थिति में आ नहीं पाई। नसों में खिंचाव आता था। आँखों में खून जमा होता था....सर में असंख्य हथोड़ें...” इस तरह मलिका अवसाद में चली जाती है। उनको लगता हैं कि, “ थप्पड़ मारने के कारण नाक से बहते हुए खून को पोछते हुए मैं बिछाने पर लेटी थी... लगता था कोई मेरे पास न आये । तन से, मन से, जिन्दगी से, मैं बर्बाद हो गयी। उस एक क्षण में मैंने मृत्यु का अनुभव किया था।” इस तरह के अनेक घटनाएँ उनकी जिन्दगी में घटी। वे हमेशा अकेलपन, भय और अवसाद से घिरी हुई रहती थी। शिरीष पै को अपने पति के स्वभाव के कारण अकेलेपन का अहसास होने लगता है। विवाह के कुछ समय बाद शिरीष और उनके पति व्यंकटेश के बीच अनबन शुरू हो जाती है। व्यंकटेश छोटी-छोटी बात को लेकर उन्हें अपमानित करता है। उनके संबंधों के धागे टूटते रहते थे। शिरीष अपने इस दुख में सुख का रास्ता खोजने का प्रयास करती है। उन्हें लेखन का रास्ता अपना मन हलका करने के लिए मिलता है, पर यह रास्ता उनके अकेलपन को कम करने के लिए काफी नहीं था। तब उन्हें लगता है कि, “कोई तो माया-ममता से पास लेने वाला चाहिए था। मेरे माता-पिता और मेरी बहन मुझसे दूर हुई थी। मेरा पति मुझसे नफरत कर रहा था।” इन सबके कारण शिरीष अवसाद और अकेलेपन से घिर जाती हैं। उनके पति ने भी उनकी मानसिक स्थिति को नहीं पहचाना। पति-पत्नी के बीच के फासले बढ़ते ही गये। जब दोनों अपनी-अपनी एक-दूसरे की गलतियाँ भूल कर पास का आने का प्रयत्न करने लगते तभी व्यंकटेश की मृत्यु हो जाती है। शिरीष के जिन्दगी में अपने माता-पिता और पति के देहांत के बाद अकेलापन सताने लगता है। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वे लेखन का सहारा लेती हैं। कुछ समय के लिए अध्यात्म की ओर भी मुड़ती हैं। इस तरह का अकेलापन, भयग्रस्तता और मानसिक अवसाद भारतीय स्त्री के जीवन का हिस्सा बन गया है। इसकी जड़े पितृसत्तात्मक सोच में हैं। जिसने हमारे समाज के पुरुषों के साथ ही स्त्रियों को प्रभावित किया है। जिसके चलते इस तरह की परिस्थितियाँ निर्मित हुई । इस तरह की परिस्थितियाँ स्त्री आत्महत्या करने के लिए भी मजबूर करती है। इनसे उबरने के लिए कुसुम असंल ने अपना ध्यान रंगमंच और साहित्य की ओर किया तो प्रभा खेतान ने अपना मन व्यापर में लगाया। शिरीष पै अपने मन को लिखकर हलका कर रही थी। इस तरह से ये स्त्रियाँ इन मानसिक उलझनों और भय को कुछ समय के लिए अपने से अलग कर पाईं। 3.11 अविवाहित स्त्री भारतीय समाज में विवाह का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। विवाह को हमारा समाज पवित्रता और आदर की दृष्टि से देखता है। अविवाहित स्त्री से हर कदम पर सवाल किये जाते हैं। उसको संदेह की नज़र से भी देखा जाता है। अविवाहित रहकर भी नारी सुखी रह सकती है, इसकी कल्पना भी हमारा समाज नहीं कर सकता है। इसी कारण अविवाहित नारी हमेशा किसी पुरुष के सहारे की अपेक्षा करती है। नारी को संरक्षण प्रदान करने हेतु विवाह के सूत्र में बंधना नितांत जरूरी है। नारी के विवाह के द्वारा ही वंशवृद्धि की परम्परा का पालन किया जा सकता है। इस तरह की धारणाएँ हमारे समाज ने बनायी है। हमारे देश में लड़की के मन में शुरु से ही यह बात डाल दी जाती है कि बड़े होने पर किसी और के घर जाना है। वह जवान होने पर विवाह की प्रतीक्षा करने लगती है। अगर किसी विपरीत परिस्थिति के कारण उसका विवाह नहीं हो पाता तो वह हीन भावना से ग्रस्त हो जाती है। अविवाहित नारी का एकाकीपन भी उसकी विषम समस्या है। बिना किसी के सहारे के उसे अपना जीवन नीरस और सारहीन प्रतीत होता है। अविवाहित स्त्री को एक सहारे की तलाश रहती है, जिसके सहारे जीवन की समस्याओं से निजात पा सके। लेकिन समय के साथ स्त्रियों के अन्दर का यह डर थोड़ा कम होता नज़र आ रहा है। खासकर पढ़ी-लिखी महिलाएँ जान चुकी हैं कि उसकी पहचान केवल विवाह से ही नहीं , विवाह किये बिना भी हो सकती है। वे कुछ बनकर दिखाना चाहती हैं। वे अपनी पहचान के सहारे जीना चाहती है। प्रभा खेतान को जिन्दगी भर अविवाहित रहना पड़ता है। उनको भी लगता है, कि एक भारतीय स्त्री की तरह वैवाहिक जीवन जिए। पर उन्होंने जिस रास्ते को चुना था, उस रास्ते से विवाह की मंजिल की ओर नहीं जाया जा सकता था। इसी के परिणामस्वरूप उनको समाज ने बहुत अपमानित किया। प्रभाजी के जीवन में अकेलापन बचपन से ही है। प्रभा खेतान को इस अकेलेपन से निज़ात विवाहित डॉ. सराफ के बाहो में मिलती है। प्रभा खेतान और डॉ.सराफ के बीच शारीरिक संबंध भी स्थापित होते हैं। डॉक्टर प्रभा जी को इस संबंध के भविष्य के बारे में समझाकर अलग होने के लिए भी कहते हैं, लेकिन प्रभा खेतान कहाँ मानने वाली थी। वे तो डॉ.सराफ के लिए जिन्दगी भर कुँवारी रहना चाहती थी। डॉ. सराफ से कहती हैं, “ डॉक्टर साहब आप मुझे इस तरह खारिज़ नहीं कर सकते समझे! मैं उन औरतों में नहीं जो अबतक आपके पास आती-जाती रही..... मैं शरीर को भी उतना ही पवित्र मानती हूँ जितना मन को, मैंने आपको दोनों दिए हैं। उलझन आपके दिमाग में है, आप कभी मुझे स्वीकारते हैं तो कभी छोड़ते हैं।” धीरे-धीरे यह सम्बन्ध आगे बढ़ता गया। एक समय के बाद वे लोग चाहकर भी अलग नहीं हो पा रहे थे, न शादी कर पा रहे थे। लेकिन हमारा समाज विवाहेतर संबंधों को नहीं स्वीकारता है। प्रभा खेतान भी जानती थी कि बिना शादी के उनकी कोई पहचान नहीं हैं, वे लिखती हैं, “और यदि विवाह व्यवस्था ही एक शास्वत सच है, और यदि इससे इतर कुछ भी स्वीकृत नहीं तो मुझे भी शादी कर लेनी चाहिए, बिना शादी के मेरी कोई पहचान नहीं है।” यह बात सच भी होती है, प्रभा खेतान को अपना व्यापार दुनिया में फैलाने के बावजूद उनकी अपनी कोई सामाजिक पहचान न होने का दुख होता है। क्योंकि हमारे समाज में स्त्री की पहचान उसके साथ रहनेवाले पुरुष से होती है। सेंट लुईस में जब डॉ.केडिया और उनकी पत्नी द्वारा प्रभा खेतान पर डॉक्टर सर्राफ के साथ के संबंधों को लेकर व्यंग किये जा रहे थे, तब उन्हें लगता हैं कि, “..मैं जल रही थी आग की तरह, वह दाल में घी का तड़का लगा रही थी...मैं प्रभा खेतान कौन हूँ?” क्या मेरी कोई पहचान नहीं है? मैं सधवा नहीं, क्योंकि मेरी शादी नहीं हुई, मैं विधवा नहीं...क्योंकि कोई दिवंगत पति नहीं, मैं कोठे पर बैठी हुई रंडी भी नहीं...क्योंकि मैं अपने देह का व्यापार भी नहीं करती। मैं किसी पर निर्भर नहीं करती, स्वावलम्बी हूँ, अपना भरण-पोषण खुद करती हूँ। स्वेच्छा से एक जीवन का वरण किया है। तब मैं क्या हूँ? मैं अबोध हूँ....अबोध माने मूर्ख। दीन-दुनिया से बेखबर, समाज की सच्चाइयों से दूर। मैं विवाहित होकर किसी से अफेयर चलाए रखती, कुछ दिनों तक ....तब भी ठीक था। लोग स्वीकार लेते, आवारगी को समाज स्वीकार लेता है। मगर विवाहित रहकर एक विवाहित पुरुष, पाँच बच्चों के पिता के साथ टँगे रहना, भला यह भी कोई बात हुई? एक बात तो स्पष्ट हो गई थी कि, हमारा समाज चाहे अनपढ़ हो, पढा-लिखा हो या विदेश में जाकर रह रहा हो, उन सबका नजरियाँ स्त्रियों के प्रति कमोबेश एक जैसा ही है। डॉ.केडिया और उनकी पत्नी अमरिका में रहते हैं, जहाँ पर किसी के निजी जीवन के बारे में इतनी पूछताछ नहीं होती है, जितनी प्रभा खेतान से की जा रही थी। प्रभा खेतान ने व्यापार में बड़ी-ब़ड़ी ऊँचाईयाँ हासिल की, लेकिन समाजिक के स्तर पर उन्हें अविवाहित होने के कारण हर वक्त मात खानी पड़ी। जीवन के पच्चीस साल एक साथ बिताने के बावजूद हमारा समाज इस संबंध को नहीं मानता है। प्रभा खेतान के सामने किसी और पुरुष से विवाह न करने की कोई मजबूरी नहीं थी। वे चाहती तो दूसरा विवाह भी कर सकती थीं। डॉक्टर के साथ उनका केवल शरीर से संबंध नहीं था, वे अपने इस संबंध के बारे में लिखती हैं, “क्या यह देह का आकर्षण था। नहीं, देह के लिए भला इतनी कीमत देने की क्या जरूरत? देह तो हर जगह उपलब्ध है, कहीं भी, किसी भी कोने में। तब मन का लगाव था? इसे प्रेम कहा जाए, हाँ....नहीं...वैसे सब कुछ देह से शुरु होता है। फिर पर्त दर पर्त धूल मन पर जमती चली जाती है। और फिर एक दिन साहब मेरे लिए सुरक्षा के प्रतीक थे। मानो उनके लिए मैं जिन्दा थी, उनको कुछ हो जाए ऐसा मैं सोच भी नहीं पाती। डॉक्टर साहब मेरे लिए बरगद की छाँव थे। मेरी जिन्दगी का पड़ाव, मेरा सब कुछ, रूपए-पैसे की मुझे कोई चिन्ता नहीं, मैं आत्मनिर्भर थी।” इन शारीरिक संबंधों के कारण प्रभा खेतान गर्भवती बनती है। अविवाहित को स्वीकार न करने वाला समाज अविवाहित माता को कैसे स्वीकार करता। प्रभा खेतान को न चाहते हुए भी अपना बच्चा गिराना पड़ा। सरोजिनी बाबर ने अविवाहित होकर भी बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किये। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। स्त्री शिक्षा और लोक साहित्य से संबंधित महत्वपूर्ण कार्य किये । इरावर्ति कर्वे द्वारा विवाह से संबंधित सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने अविवाहित रहने का कारण बताया था, वे कहती हैं, “एक तो मुझे वैसे वैवाहिक जीवन पसंद नहीं है न उसका आकर्षण है। और दूसरी बात यह है कि मेरा भाई जवाहर जिस दिन छोड़कर चला गया, उसी दिन मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी, मैंने माँ को ऐसा वचन दिया था!..इसके सिवा स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेते समय सुभाषबाबू के सामने देशकार्य के लिए समर्पित होने की कसम खायी थी....शादी नहीं करूँगी। नौकरी नहीं करूँगी, कहा था!” अविवाहित होने से कभी उनके किसी कार्य पर प्रभाव नहीं पड़ा। न उनको इसकी कमी कभी खली, न इनके जीवन में अविवाहित होने के कारण अकेलपन था। क्योंकि सरोजिनी बाबर अनेक कामों में व्यस्त रहती थीं। साहित्य, राजनीति और समाज कार्य में अपना सारा समय खर्च करती हैं। एक सामान्य स्त्री की तरह साहित्य और समाज की सेवा करते हुए अपना जीवन बिताया। जब तक स्त्री विवाहित नहीं होती है, तब तक इस तरह के संबंध को अक्सर देह तक सीमित रखने की सोच हमारे समाज ने विकसित की है। प्रभा खेतान ने ठीक ही लिखा है कि विवाहित होकर अफेयर चलाएँ होते तो हमारा समाज कुछ समय बाद स्त्री की नादानी समझकर भूल भी जाता, लेकिन ऐसी एक अविवाहित स्त्री का किसी विवाहित पुरुष के साथ पच्चीस साल साथ रहना, वह भी एक भारतीय पत्नी की तरह पति की आज्ञाओं का पालन करते हुए। इस तरह के संबंधों को भारतीय समाज में कोई पहचान नहीं देता है, हमारा समाज इस तरह के संबंधों को अस्वीकार करता है। क्योंकि हमारे समाज में स्त्री की पहचान उसके पिता या पति से होती है। इसी कारण प्रभा खेतान जैसी सफल उद्यमी को हमार समाज अपमानित करता रहता है। प्रभा खेतान विधवा भी होती तो शायद इतनी बदतर जिन्दगी उनके हिस्से में नहीं आती। सरोजिनी बाबर के किसी पुरुष के संबंध न होने के कारण उन्हें प्रभा खेतान की तरह अविवाहित होने पर भी किसी ने उनका अपमान नहीं किया। 3.12 विवाह विच्छेद सामान्यतः विवाह विच्छेद वैवाहिक सम्बन्धों का वैधानिक अंत है, यद्यपि यह अंत अदालत के हस्तक्षेप के बिना भी संभव होता है। परम्परागत हिन्दी सामाजिक संगठन में हिन्दू धर्म विवाह को जन्म-जन्मांतर का सम्बन्ध मानता है और विवाह विच्छेद को मान्यता प्रदान नहीं करता है। परन्तु, हिन्दू समाज में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के तहत विवाह विच्छेद को कानूनी अधिकार के रुप में मान्यता दी गई है। इस कानून के भारतीय समाज पर सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। एक तरफ इसने तलाक की दर में वृद्धि कर पारिवारिक विघटन एवं बच्चों के पालन पोषण की समस्या को उत्पन्न किया है, तो वहीं दूसरी तरफ स्त्रियों को विवाह-विच्छेद की स्वतंत्रता देकर उनकी स्थिति में सुधार किया है। विवाह विच्छेद के लिए उचित आधार इस प्रकार है, “हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार व्यभिचारिता, क्रूरता, धर्म-परिवर्तन, मानसिक खराबी, यौन-रोग, संसार-परित्याग, नपुसंकता, सात वर्ष तक लापता तथा न्यायिक अलगाव की स्थिति आदि ऐसे अनेक आधार हैं जिस वज़ह से विवाह-विच्छेद हो सकता है।” तलाकशुदा औरतों का जीवन भारतीय समाज में भयानक होता है। तलाकशुदा औरतों को हमारे समाज में बहुत नीची नज़र से देखा जाता है। तलाकशुदा स्त्री की तरफ हमारा समाज शक की नज़र से देखता है। पिता को अपनी बेटी के विवाह के बाद जिम्मेदारी से मुक्ति मिलने का अहसास होता है, लेकिन वही बेटी जब तलाक लेकर घर आती है, तो उसके लिए भी समस्या ख़ड़ी हो जाती है। इसलिए ज्यादातर मामलो में स्त्रियाँ अन्याय होने पर भी चुप्पी साध लेती हैं। उनसे कहा जाता है कि, “घर व बाहर दोनों ओर से मुझ पर यही दबाव था कि यदि मैं अच्छी औरत हूँ तो मुझे कानपुर ही मैं बर्तन मांजकर तिरस्कृत होकर मरना चाहिए।” हमारे समाज की आज भी यही मानसिकता है, पति चाहे मारे-पीटे उसे अपना घर नहीं छोड़ना चाहिए, पति का घर छोड़ने वाली औरतें चरित्रहीन होती हैं। कृष्णा अग्निहोत्री के पति ने शादी के बाद से मानसिक और शारीरिक हिंसा करनी शुरु की थी। मारपीट तो रोज की बात थी। कृष्णा अग्निहोत्री के मर्जी के बिना उनके साथ शारीरिक संबंध बनाना आम हो गया था, उन्हें अपने पति का इस तरह संबंध बनाना बलात्कार के समान लगता था। उनके पति को नौकरी से निकलने के बाद कृष्णा अग्निहोत्री का जीवन और भी बदत्तर होता चला गया। इन सबसे छुटकारा पाने के लिए अगल होना ही अंतिम उपाय था। वे अगल हो जाती हैं, तब तक वे तलाक नहीं लेती है। माता-पिता के लिए जीवन में सबसे बड़ी जिम्मेदारी बेटी की शादी होती है। वे अपनी इस जिम्मेदारी से मुक्ति के बाद अपनी बेटी को फिर से अपने घर में लेना नहीं चाहते हैं। कुछ दिनों के लिए मेहमान बनकर आये, तो खुशी भी होती है। लेकिन हमेशा के लिए आना उनके लिए ग़म का पहाड़ टूटने के बराबर है। कृष्णा अग्निहोत्री के पिता इस नई आई हुई मुसीबत का सामना नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि पहले से एक बेटी घर आकर बैठी हुई है। वे कहते हैं, “सोचा था कि तुम दोनों का ब्याह हो गया है, चलो कुछ तो मुक्ति मिली परन्तु तुम दोनों तो फिर से छाती पर मूंग दलने वापस आ गई।” हमारे समाज में एक बार लड़की की शादी हो जाये तो मायके के जायदाद पर लड़की का अधिकार नहीं होता है। कृष्णा अग्निहोत्री के साथ भी ऐसा ही हुआ, जब उन्होंने अपना हिस्सा माँगा तो उनकी माँ ने जवाब देते हुए कहा, “मैं नहीं चाहती कि मेरे बेटे के हिस्से में कोई भी बाहर का व्यक्ति भागीदार हो, बेटी भी नहीं।” अपना घर छोड़ आई बेटी की जिम्मेदारी लेने में भी माता-पिता आना-कानी करते हुए नज़र आते हैं। पति द्वारा छोड़ी औरत या पति को छोडकर आई औरत का हर कोई इस्तेमाल करना चाहता है, बस इस्तेमाल के तरीके अलग-अलग होते हैं। राजेन्द्र अवस्थी चाहते थे कि कृष्णा जी उनके साथ रहे, लेकिन कृष्णा जी उनके साथ किसी संबंध के बिना रहना नहीं चाहती थीं, वे लिखती हैं, “मैंने उन्हें कहा था कि “बिना ब्याह मैं किसी के साथ नहीं रहना चाहती। बुढ़ापा मेरा चैन से बीतना चाहिए।” अवस्थी जी व हम एकदम टूट गये थे। उनकी यह बात अब भी याद है कि वर्तमान को नकार बुढ़ापे की चिंता करना नादानी है” दूसरी तरफ थे श्रीकांत जोग जो एक युवक की तरह उनकी राह में पलके बिछाएं राह देखते रहते थे। कृष्णा जी से विवाह करना चाहते थे, लेकिन अभी तक कृष्णा जी को अपने पति से तलाक नहीं मिला था। इसलिए जोग को कृष्णा जी घर आने-जाने में दिक्कत हो रही थी। इसी कारण “हमने इन सब वायदों के पश्चात अन्नपूर्णा मन्दिर इन्दौर में माला बदलकर औपचारिक विवाह कर लिया, ताकि भविष्य में हम कानूनी विवाह तलाक के बाद कर सकें!” इनका शुरुआती समय काफी अच्छा बीता, वे लिखती हैं, “ जो कुछ भी मुझे पूर्व में नहीं मिला था वह मिल रहा था। मैं व श्रीकांत एक साथ एक-दूसरे के समीप रहकर अधिक खुश रहते। मेरे साथ श्रीकान्त ने ढ़ेरों अंग्रेजी मूवी तक देखीं। श्रीकान्त कृष्णामय थे। मेरा उस समय का तेज़ गुस्सा वे बर्दाश्त कर जाते और वही सब करना चाहते जो मुझे पसंद था।” तलाक के बाद फिर से आर्य समाज के मन्दिर में विवाह होता है, लेकिन जोग साहब अपनी जायजाद को पहली पत्नी और बच्चों के नाम कर देते हैं। कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि जोग ने धोखा दिया है। जोग कृष्णा जी का इस्तेमाल प्रमोशन के लिए करता है। अंत में कृष्णा जी के हिस्से में कुछ नहीं आता। अगर एक तलाकशुदा स्त्री लड़ना नहीं जानती है, तो उसकी हालत हमारे समाज में बहुत भयानक होती है। इसके बाद बहुत सारे धोखे कृष्णा अग्निहोत्री ने खाये हैं। रमणिका गुप्ता को अपने राजनीतिक जीवन के लिए अपना पारिवारिक जीवन दाँव पर लगाना पड़ा। रमणिका गुप्ता के तलाक को लेकर घर और पार्टी में चर्चा चल रही थी। उस समय की एक घटना के बारे में रमणिका गुप्ता ने अपनी आत्मकथा ‘हादसे’ में लिखा हैं, “अन्त में एक मिसाल देकर समाप्त करती हूँ। एक दिन एक सज्जन दनदनाते हुए मेरे कमरे में आए, फिर इधर-उधर ताक कर बड़े हितैषी बनकर धीमे से बोले- “सुना है आपके पति ने तलाक दे दिया है।” मैं भी मुस्कुराती हुई उसी लहज़े में बोली,- “जी हाँ। उन्होंने तलाक देते वक्त आप ही से शादी करने की राय दी थी , क्या आप तैयार हैं?” वह सज्जन ऐसे बिदके जैसे बिच्छू काटने पर बैल। वे यह कहते हुए उठ गए- “गज़ब की ढीठ औरत है।”” एक तलाक देनेवाली स्त्री को सबके लिए ‘अवलेबल’ माना जाता है। इस घटना में भी वही मानसिकता काम कर रही थी। यहाँ पर एक बात तो साफ हो जाती है कि भारतीय समाज में पति का घर छोड़ना, किसी स्त्री के लिए कितना भयानक होता है। बाहरी लोगों का भी नजरियाँ तलाकशुदा स्त्री के प्रति बदला हुआ होता है, ऐसी स्त्री को हीन चरित्र वाली औरत माना जाता है, जिसके साथ कोई भी आसानी से संबंध बना सकता है। ऐसे लोगों के लिए रमणिका गुप्ता जी जैसा करारा जवाब देनेवाला होना चाहिए। माधवी देसाई ने रणजीत देसाई के साथ अपने पहले पति के मृत्यु के बाद विवाह किया। रणजीत देसाई माधवी जी ने इसी विश्वास के साथ विवाह के बाद रणजीत देसाई की बेटियों को तो अपनाया ही, उनकी पहली पत्नी जिनकी दिमागी हालत खराब थी, उनके ईलाज करवाने में प्रमुख भूमिका भी निभाई। ये सब और भी बहुत सारे कार्य रणजीत देसाई के लिए माधवी जी ने किये, पर अंत उनके हिस्से में निराशा ही आई। रणजीत देसाई लोगों के बहकावे में आकर माधवी देसाई से दूर होते चले गये और अंत में बात तलाक पर आकर रूक जाती है। रणजीत देसाई ने माधवी देसाई का साथ भी बहुत दिया, वे उनकी इस सहायता के बारे में लिखती भी है। वे लिखती हैं, “हरेक घटना में दादा मेरे पीछे होते थे, किसी और स्त्री को यह सब करते नहीं बनता था। पर मैं उस गाँव की थी, रणजीत देसाई की पत्नी थी, इसी कारण यह संभव था।” रणजीत देसाई ने माधवी देसाई के लिए बहुत कुछ किया और माधवी देसाई ने भी उनके बिखरे हुए घर को, खर्चे को , खेत, पहली पागल पत्नी को सम्भाला था। विवाह विच्छेद के लिए कोई बहुत बड़े कारण नहीं थे, लोग रणजीत देसाई को भड़काने की भाषा में कहते, “ हमने क्या कहा था? यह मुंबई की औरत! ये क्या कोवाड में रहेगें? बेचारे दादा! क्या पैसे लुटाते है बेलगाँव में?” यह सब सुनकर माधवी जी को लगता था कि रणजीत देसाई लोगों का मुँह बंद करे पर रणजीत देसाई को इस तरह की सहानुभूति पसंद थी। इसी तरह के बातों के कारण रणजीत देसाई और माधवी देसाई के संबंधों में दरारें आई थी। माधवी देसाई की बेटी गीता अपने माता-पिता के संबंधों के बीच दरारे न आये इसलिए दसवीं पास होने के बाद कहती हैं, “ मैं होमसायन्स लूँगी। मेरे कारण तुम दोनों में दूरियाँ होंगी। मैं मुंबई जाऊँगी।” माधवी जी की बेटी भी नहीं चाहती के उनके कारण माँ-पिताजी के बीच कोई खट्टास निर्माण हो। माधवी देसाई ने भी बेलगाँव के घर को ताला लगाया और कोवाड चली आई। उन्हें लगा उनके लोग उन्हें अपना आदमी कहेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। माधवी और रणजीत देसाई के बीच संवाद कम होने लगा था, माधवी जी समझ नहीं पा रही थी, रणजीत देसाई के साथ संवाद कैसे स्थापित करें, उन्हें क्या चाहिए। यह उनकी समझ के बाहर हो गया था, तभी वे सुनीता देशपांडे से कहती हैं, “दीदी, तुम्हारे और मेरे वैवाहिक जीवन में अंतर है। वह वैवाहिक जीवन और वह पति मेरा है क्या? यह बड़ा सवाल है। वैवाहिक जीवन चाहिए या दिखावा? माधवी चाहिए या उनके लोग? क्या चाहिए एक बार मुझसे कहे। पति-पत्नी में एक संवाद होता है, एकरूपता होती है-वही कब होगी?” माधवी देसाई और रणजीत देसाई के इस तरह के संवादहीन और तलाक तक आये हुए संबंधों का परिणाम उनकी बेटी पर भी पड़ता है। माधवी की बेटी गीता जिसने अपने माता-पिता के संबंधों को दृढ करने के लिए मुंबई में रहने का सोचा कहती है, “माँ, मुझे विवाह नहीं करना है। पिताजी ने तुम्हारे बारे में कितना सोचा है? तुम्हारा पारिवारिक जीवन सुखमय होने के लिए मैं मुंबई गयी, हास्टेल में रही; पर अंत में क्या हुआ? उन्होंने पल भर के लिए भी मेरे बारे में सोचा है क्या? मेरा भी पति कारण न बताते हुए मुझे तलाक क्यों नहीं देगा। इसीलिए कहती हूँ, पहले तुम इस सदमें से बाहर आओ, फिर मेरे विवाह के बारे में देखो।” बच्चों पर माता-पिता के बीच के संबंधों में आयीं दरारों का प्रभाव पड़ता है। केवल पति-पत्नी ही तलाक के परिणामों को भुगतते नहीं है बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों पर भी इसका असर पड़ता है। माधवी देसाई तलाक लेना नहीं चाहती है, वे भी एक आम भारतीय स्त्री की तरह सबकुछ सहना चाहती थीं। क्योंकि वे जानती थीं कि, एक तलाक शुदा स्त्री के बारे में समाज का नज़रिया कैसा होता है। वे लिखती हैं, “लोग कहनेवाले थे, ‘पति द्वारा छोड़ी हुई औरत’ मेरे आँचल में विवाह योग्य लड़की, माता-पिता थके हुए और ऐसा मेरा रक्षणकर्ता, पति-परमेश्वर! वही मुझे घर से बाहर करनेवाला था, फिर भी मैं बाहर नहीं जा रही थी। क्योंकि उस बंदिस्त जीवन की, उस वर्तुल की मुझे आदत पड़ गयी थी। ये सब मेरे सौभाग्य के अलंकार माँग रहे थे और मैं देने वाली नहीं थी। मैं अपने सिंदूर और मंगलसूत्र के लिए कुछ सहूँगी, पर तलाक नहीं दूँगी। यह मेरी जिद्द थी।” लेकिन माधवी देसाई से ज्यादा जिद्दी रणजीत देसाई थे। यही रणजीत देसाई और माधवी देसाई थे, जो कहते थे लड़कियों की अर्थी ससुराल से निकलनी चाहिए, वे ही दोनों आज तलाक लेने के लिए अदालत आये हुए थे। तलाक शुदा स्त्री को पति के दिये निर्वाह-व्यय पर जीना पड़ता है। माधवी जी को लगता है, “माधवी काटकर बी.ए., बी.एड. वेतनधारी स्त्री का रूप समाप्त कर माधवी देसाई- पति के दिए निर्वाह-व्यय पर जीनेवाली...यही मेरा ही रूप है ना?” इस एक तलाक ने माधवी देसाई की पहचान ही बदल दी थी। जो माधवी विधवा का जीवन जीते हुए भी, स्वाभिमान से जी रही थी, उनके आगे अब तलाकशुदा नाम की तख्ती लगी थी। माधवी देसाई दूसरे विवाह से पहले भी आर्थिक और मानसिक रूप से अपने बच्चों के भविष्य सुधारने के लिए सक्षम थीं। माधवी देसाई ने रणजीत देसाई के शब्दजाल में आकर उनसे विवाह किया था। यह विवाह उनके जिन्दगी में आये अन्य सैलाबों से कहीं अधिक बड़ा था। इस आने वाले सैलाब को रोकने के लिए किसी भी कीमत पर तलाक देना नहीं चाहती थी। माधवी देसाई जिनको पैसे की कमी नहीं थी, पहले पति की जायदाज भी मिली थी, खुद भी एक स्कूल में पढ़ाकर घर चला रही थी। उसी माधवी देसाई को रणजीत देसाई ने सपनों को महल दिखाकर विवाह किया था और तलाक देकर दुख की खाई में ढकेल दिया। तलाक के बाद भी माधवी देसाई के दिल की प्रेम बेल सूखी नहीं थी, जिस दिन यह प्रेम बेल सूख जायेगी, माधवी जी भी उसी दिन मुरझा जायेगी। विवाह का भारतीय स्त्री के जीवन में जैसा महत्वपूर्ण स्थान है, उसी के ठीक विपरीत स्त्री के जीवन में विवाह विच्छेद का। हमारा समाज चाहता है कि पिता के घर से डोली निकले और पति के घर से अर्थी। यानी लड़की की एक बार शादी हो जाये, तो पति के घर से वह मरने बाद ही बाहर निकले। जो स्त्रियाँ अपने पति को छोड़कर रहती हैं, उनको हमारा समाज हिकारत की नज़र से देखता है। भारतीयों लोगों का तलाकशुदा औरतों के प्रति एक विचित्र ही नज़रिया होता है, भारत में अकेली स्त्री का मतलब है कि ‘अव्हलेबल’, लोग ऐसा अर्थ निकालते हैं। अगर किसी तलाकशुदा औरत ने कॉफी या खाना खाने आदि के लिए बुलाया, तो धारणा और पक्की हो जाती है। कुछ लोग उसके प्रति सहानुभूति दिखाने जाते हैं, तलाक होने के कारण पति था या पत्नी, इसकी खोजबीन शुरु करते हैं। तलाकशुदा स्त्री के बारे में हमारा समाज एक और धारणा बनाये हुए है, एक तलाक शुदा स्त्री चिढ़ने वाली, निराश, हताश या आक्रमक या मारने-पिटने वाली होगी या गरीब-बेचारी, जिस पर अन्याय हुआ है, इस प्रकार का चरित्र हम लोग गढ़ लेते हैं। 3.13 विधवा स्त्री भारतीय समाज विधवा स्त्री को सफेद कपड़े पहनाकर उसे समाज से अगल रखना चाहता है, जैसे वह कोई सामान्य जीव न हो। ऐसी स्त्री को समाज शुभ कार्यो में स्थान नहीं देता। भारत में एक समय ऐसा भी रहा है कि विधवा स्त्री को सती होने के लिए प्रवृत्त किया जाता था। राजाराम मोहन राय के प्रयत्नों के कारण अंग्रेजों ने कानून बनाकर सती प्रथा को बंद किया। विधवा और तलाकशुदा स्त्री को तरह हमारा समाज एक डिटेक्टीव की तरह देखता है। उस स्त्री की सारी जानकारी वह निकालना चाहता है। उसके प्रति सहानुभूति रखता है, पर साथ ही उस विधवा से कुछ अपेक्षाएँ भी रखता हैं। विधवा होने के बाद स्त्री का शारीरिक शोषण करने का भी प्रयत्न किया जाता है। विधवा स्त्री के आर्थिक रूप से सक्षम न होने पर उसका जीना दुश्वार हो जाता है। माधवी देसाई को पति नरेन्द्र काटकर के मृत्यु के पश्चात कुछ समय तक विधवा बनकर रहना पड़ा। माधवी देसाई जानती हैं कि विधवा होना एक भयंकर शाप है, और हमारा समाज मानता भी है कि जो स्त्री पुण्यवान है, वह सुहागन होते हुए मरती है। मरते समय उसके माथे पर सिंदूर होता है। और विवाहित स्त्रियाँ भी पूजा-अर्चना कर इसी तरह की मौत माँगती हैं। पति के लम्बी उम्र की कामना करती है। लेकिन माधवी के पति आकस्मात छोड़कर चले जाते हैं। वे इसमें अपना दोष नहीं मानती हैं। विधवा स्त्री को समाज किस नज़रियें से देखता है, इसके बारे में माधवी देसाई लिखती हैं, “फिर उस स्त्री को समाज विकृत नज़र से क्यों देखता है?” सहानुभूति दिखाते हुए उसे निगलने के लिए भेडिया बनकर क्यों तैयार रहते हैं ? उसकी जवानी, दौलत, सौंदर्य पर इस तरह की अभिलाषा क्यों रखी जाती है। गले में काले मणियों की माला डालकर अपनी मर्जी से जीने वाली ‘सुवासिनी’ बन सकती है। पर....केवल बदनसीबी के कारण जिनके माथे का सिंदूर पोछा गया हो वह ‘कुलटा’ कैसी बनेगी.....अथवा उसे कुलटा बनाने के लिए शिकारी निशाना लगाकर क्यों तैयार रहते हैं? और वह कमनसीबी स्त्री...जिसे बचपन से कहा जाता है कि, पुरुष ही उसका सर्वस्व..उसका आधार! ऐसे संस्कारों में पली-बढ़ी स्त्री पर ऐसा आघात होता है, उस समय उस स्त्री के मन जो चक्रवात रोद्र रूप ले रहा था, उसमें मैं चक्कर खा रही थी। गोल घूम रही थी। पुरुष का आधार? नहीं, मनुष्य को आधार होता है, आत्मविश्वास का!” माधवी देसाई विधवा होने पर भी किसी पुरुष का सहारा न लेते हुए अपने आत्मविश्वास के बल पर परिवार को संवार पायीं। विधवा स्त्री को सहानुभूति दिखाकर उसका फायदा उठाने वाले भी होते हैं, कुछ पुरुष तो जवान विधवा स्त्री को सबके लिए उपलब्ध समझते हैं। ऐसी ही एक घटना माधवी देसाई के साथ घटी, माधवी देसाई के पति के एक मित्र ने माधवी देसाई से कहा, “मैं नरेंन्द्र का दोस्त हूँ। कुछ भी जरूरत होने पर किसी और को मत बुलाईये। मुझे बुलाईये। कोई भी जरूरत....” माधवी देसाई को इन शब्दों ने जख्मी किया था। माधवी देसाई को लगता है, अकेली स्त्री को सार्वजनिक संपत्ति क्यों समझा जाता है। स्त्री दुर्बल होने पर भी , समय आने पर शेरनी बनती है। माधवी इन जैसो से बचने के लिए अकेली रहने लगी और किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी, इस कारण लोगों का उनके प्रति रवैय्या बदल गया था। इसीलिए माधवी देसाई सवाल करती है, “माथे पर की सिंदूर की लाल लकीर और गले की काली मणियों की माला गुम जाने पर समाज में उसका कितना स्थान बदलता है? ऐसा क्यों है?” इन सबके कारण माधवी देसाई को लगता था, इस तरह का दुख किसी भी स्त्री के हिस्से में न आये। क्योंकि हमारा समाज स्त्री का अस्तित्व पुरुष के होने से ही मानता है। एक अकेली स्त्री को पुरुष रूपी भेड़िया नोंचकर खाने के लिए तैयार रहता है । हमारा समाज उस विधवा स्त्री को भी बर्दाश्त नहीं करता है, जो अपने ग़म को भूलकर हँस-बोल रही है, ठीक तरह से खा-पी रही है, या अच्छे कपड़े पहन रही है। हमारे समाज को लगता है कि विधवा स्त्री को हमेशा निराश रहना चाहिए, किसी से हँसकर बोलना नहीं चाहिए, जो भी रुखा-सुखा मिलता है, उसी को अच्छा समझ कर खा लेना चाहिए। आर्थिक रूप से पराई विधवा की हालत तो और भी बदतर होती है। माधवी देसाई को उनके साथ काम करनेवाली औरतों ने सम्भाला, उन्होंने माधवी देसाई को स्कूल आने के लिए कहा। इस तरह के दुख से बाहर निकलने के लिए अपने आप को किसी काम में डूबो देना ही बेहतर होता है। माधवी देसाई ने विधवा होने का दर्द भुगता था, अकेली होने का दर्द भुगता था। माधवी देसाई रणजीत देसाई को तलाक के लिए मना करने का यह भी एक कारण था। तलाक होने के बाद अकेली औरत को समाज की नज़रे और कई तरह की बातों का सामना करना पड़ने का भय भी था। 3.14 दलित स्त्री दलित महिलाओं को विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को दोहरा शोषण झेलना होता है। वे सवर्णो के सामंती आचरण की शिकार होने के साथ ही दलितों की पुरूषवादी आचारसंहिता को भी झेलने के लिए विवश होती हैं। सुशीला टाकभौरे ने भी अपनी आत्मकथा में इस प्रकार दलित स्त्री के होने वाले दोहरे शोषण के बारे में लिखा है, उनके अनुसार, “ दलित पुरुष ब्राह्मणवादी दासता से मुक्ति के लिए आन्दोलन कर रहे हैं, समता, स्वतंत्रता और सम्मान का अधिकार पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मगर दलित स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए दोहरा संघर्ष करती हैं – मनुवादी पुरुष सत्ता से और मनुवादी जाति व्यवस्था से। मनुवादी मानसिकता वाले सवर्ण लोगों से मिली पीड़ा की तरह, यह पीड़ा भी मुझे असहनीय लगी थी। पत्नी के साथ मारपीट करना आम बात मानी जाती है, मगर यह भी सच है, सभी दलित पुरुष ऐसे स्वभाव के नहीं होते हैं।” लेकिन सुशीला जी ने अपने पति के बारे में जो लिखा है, उससे तो लगता ही है, कि उनके पति की अपने पत्नी के प्रति मनुवादी मानसिकता थी। इस कारण वे अपनी पत्नी को मारते-पीटते भी थे, गाली-गलोज तो आम बात थी। इस आत्मकथा के बारे में सरजू प्रसाद मिश्र ने कहा है, “सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ एक दलित नारी की दारूण यातना की कहानी ही नहीं कहती, उस वर्ण-व्यवस्था के अमानवीय स्वरूप के रेशे-रेशे से पाठकों को परिचित कराती हैं, जिसने करोड़ों इंसानों की जिंदगी में जहर घोल रखा है। ऊपर-ऊपर तो मानवतावाद और समता का सूरज चमकता दिखाई देता है लेकिन थोड़ा-सा खुरचते ही वर्ण श्रेष्ठता का लिजलिजा घृणास्पद दलदल झलक मारने लगता है। लेखिका ने मुस्कराहट की नकाब के तले छिपे नफरत भरे चेहरों की असलियत दिखाई है। सहते-सहते जब इंतिहा हो गई तो इस दबी घुटी नारी ने अपनी खुदी को बुलन्द किया और फिर बाधाएँ काँपते हुए दूर भागने लगीं।” सुशीला टाकभौरे का जीवन ग्रामीण और शहरी दलित स्त्री का चित्र प्रस्तुत करता है। सुशीला टाकभौरे को एक स्त्री होने के कारण जितनी समस्याओं का सामना करना पड़ा, उतनी ही समस्याओं का सामना एक दलित होने के कारण भी। सुशीला टाकभौरे के शिक्षा और बचपन के विषय में पहले ही चर्चा की जा चुकी है। दलित स्त्री एक तरफ पितृसत्तात्मक समाज के नियमों के कारण त्रस्त होती है, तो दूसरी ओर वर्णव्यवस्था के कारण उसे बहुत सारे अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है। उसका दलित स्त्री होने के कारण कार्यस्थल पर अपमान होता है। सुशीला जी इन्हीं सारे अनुभवों से गुजरी हैं, सुशीला जी की शादी अपने से उम्र में बड़े व्यक्ती से हुई। इस बात का सुशीला जी को कभी दुख नहीं था। उनको खुशी इस बात की हो रही थी कि शादी के बाद पति ने पढ़ाने की बात कही थी। लेकिन शादी के बाद जिन समस्याओं से सामना करना पड़ा उसके बारे में सुशीला जी ने सपने में भी नहीं सोचा। शादी से पहले जो प्रगतिशील रुप पति ने दिखाया था, वह शादी के बाद ऐसे गायब हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग। सुशीला जी शादी के बाद अपने पति के सामंती विचारों से परिचय होता है। सुशीला जी के पति अपनी पत्नी से एक नौकरानी की तरह व्यवहार करते थे, एक तरफ यही महोदय दलित अधिकारों को लेकर आन्दोलनों में हिस्सा भी लेते हैं। लेकिन अपनी पत्नी के साथ एक सवर्ण स्त्री की तरह ही व्यवहार करते हैं, सुशीला जी ने अपने पति के इस तरह के व्यवहार के बारे में इसी अध्याय में चर्चा हो चुकी हैं। सुशीला जी के पति अपना स्वामित्व दिखाने के लिए पत्नी से अपने जूते और मौजें उतरवाते थे। इस तरह की घटनाएँ भारतीय समाज में आम है। सुशीला जी के पति केवल उनसे इस तरह के काम ही नहीं करवाते , बल्कि उनके साथ शारीरिक हिंसा भी करते हैं। इस तरह का अपमान सुशीला जी के लिए असहनीय होता है। किसी भी छोटी से छोटी गलती के लिए सुशीला जी को अपने पति से माफी माँगनी पड़ती थी। लेकिन यह माफी केवल शब्दों के द्वारा न माँगकर पति के पैरों पर अपना सर रखना पड़ता था। सुशीला जी अपने पति के इस तरह के स्वभाव के विषय में लिखती हैं, “पता नहीं वे मेरे साथ ऐसा क्यों करते थे। सिर्फ हाथों से पैर छूकर माफी माँगना पर्याप्त नहीं होता था। वे मेरा सिर अपने कदमों पर रखवाने के बाद मुझे माफ करते थे। यह बात मुझे अजीब लगती थी, मगर मैं इनकी इतनी परवाह करती ही क्यों थी? इसका जवाब था भयंकर मारपीट से बचना, महीनों के मानसिक तनाव से छुटकारा पाना। इसके बदले मैं अपना सिर इनके कदमों में रख देती थी।” दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले सुशीला जी के पति अपने ही घर में सामंतों के जैसा व्यवहार पत्नी के साथ करते थे। यह दोहरापन दलित आंदोलन की सबसे बड़ी कमी है। इस तरह के दोहरेपन पर सुशीला जी ने आत्मकथा में जगह-जगह टिप्पणी की है। सुशीला जी के पति के इस तरह के व्यवहार के कारण उनकी यह समझ में नहीं आ रहा था कि उन्होंने विवाह ही क्यों किया, वे सवाल करते हुए कहती हैं, “मेरा हाल अलग था, मेरी दुनिया अलग थी। मेरा मन अजीब-सा महसूस करता-था शादी क्या है? पति क्या है? सुख क्या है? अपनापन क्या है? सब निरर्थक लगते थे। टाकभौरे जी मुझे एक अजनबी की तरह लगते। मन में कभी यह भाव नहीं जागा कि पति यानी अपना कोई होता है। मित्र या साथी होना तो बहुत दूर की बात थी।” पति से जो अपेक्षाएँ एक भारतीय स्त्री करती है, उनमें से किसी अपेक्षा की पूर्ति सुशीला जी को पति द्वारा होती नहीं दिखाई देती है। लगता ही नहीं है कि शादी हुई है और वे किसी की पत्नी है और कोई इनका पति है। पति भी अपनी माँ और बहन की बातें सुनता है, और पति-पत्नी के लिए जो एकांत समय चाहिए था, वह भी इनके हिस्से में ठीक तरह से नहीं आता है। दहेज न मिलने के कारण भी ननद द्वारा इनका अपमान होता है। घर का माहौल इतना त्रासद था कि जिसकी कमी को वे बाहर जाकर भी पूरा कर नहीं पायीं। घर में किसी की पत्नी और बहु होने के कारण जो अन्याय और अपमान हो रहा था, वही बाहर दलित होने के कारण सवर्णों की टिका-टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। सुशीला जी अपने घर में अपने अधिकारो के लिए संघर्ष करना प़ड़ा और बाहरी दुनिया के साथ दलित होने के कारण संघर्ष करना पड़ा। दलित होने के कारण कमरा भी किराये पर मिलता नहीं। अगर कहीं मुश्किल से कमरा किराये पर मिल भी जाये तो, पड़ोसी शिकायत करने लगते हैं। घर मालिक को सुशीला जी की जाति का पता लग जाता है, तो वे ही घर छोड़कर जाने के लिए कहते है, इस तरह के अनेक अनुभव उनके जिन्दगी में आये हैं। सुशीला टाकभौर अपने एक ऐसे अनुभव के बारे में लिखती हैं, “मकान मालिक ने हमसे जाति पूछी। हमने वाल्मीकि बताया। वह कुछ समझा नहीं। उसने कहा-“बाद में आओ।” दूसरे दिन प्रकाश हाईस्कूल की आठवीं कक्षा की एक लड़की ने मुझे बताया – “टीचर जी, कल आप जिस घर को देखने गये थे, वे कह रहे थे वाल्मीकि यानी भंगी होता है। वे आपको किराये से घर नहीं देंगे।” मैंने पूछा- “तुमको कैसे मालूम हुआ?” लड़की बोली- “मैं वहीं रहती हूँ।” तब मैं किसको क्या कहती? ऐसी स्थिति में हमें किराये का मकान कहीं भी नहीं मिल रहा था।” महाराष्ट्र में वाल्मीकि नाम से जाति का पता नहीं लगता है। लेकिन जैसे ही पता चल जाता है कि वाल्मीकि मतलब भंगी होते हैं, मकान मालिक साफ-साफ शब्दों कह देता है कि, “ “आप हमारे मकान मैं कैसे रह सकते हैं?” “वाल्मीकि कहकर आप हमें बेवकूफ बना रहे थे?” ” जाति प्रथा का यह दंश हर जगह मिला। सुशीला जी को जाति प्रथा का अमानवीय चेहरा अभी देखना बाकी था। जाति प्रथा का सबसे घिनौना चेहरा अपनी सास के मरने के बाद देखा। अक्सर हम अपने समाज में देखते हैं, किसी व्यक्ति के मरने के बाद हम उस व्यक्ति के सारे दोष भूल जाते हैं। या ऐसे समय उस परिवार की मदद करते हैं, जिसके यहाँ किसी की मौत हुई है। लेकिन सुशीला जी ने अपनी सास के देहांत के बाद जिन बातों का सामना किया, उसे पढ़कर ही मन में कई सवाल उत्पन्न होते हैं। क्या हम ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ मरने के बाद किसी व्यक्ति को जाति मुक्त नहीं किया जा सकता है? यही सवाल सुशीला जी के मन में आये जब उनकी घर मालकिन ने कहा, “यह सब तो ठीक है मगर आप इन्हें किसी रिश्तेदार के घर ले जाओ। वहाँ ले जाकर वह सब क्रिया कर्म करो। हमारे घर में यह सब नहीं होना चाहिए। आप लाश यहाँ से ले जाओ।” यह सब सुनकर किसी के मन में भी सवाल उठता है कि जिस महान भारतीय संस्कृति की दुहाई देते हुए हम नहीं थकते, उसी भारत में एक लाश के साथ उसकी जाति के कारण इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है। इस समय हमारी मानवतावादी सोच-भाईचारा सब गायब हो गया था, बची थी तो केवल उस लाश की जाति। जाति प्रथा को लेकर हम कहते या सुनते आये हैं कि हम तो पढ़े-लिखे हैं, हम छुआछूत को नहीं मानते हैं। लेकिन ये केवल शिक्षित समाज के हाथी के दाँत हैं। उसके स्वर्ण संस्कार समय देखकर बाहर आते हैं। ये स्वर्ण संस्कार जाने-अनजाने उस व्यक्ति को अपनी जातीय श्रेष्ठता का बोध कराते रहते हैं। मिसेस सोलंकी जाति से राजपूत है, सोलंकी सर की पत्नी है, जो सुशीला जी के सहकर्मी है। मिसेस सोलंकी को पता नहीं होता है कि सुशीला जी वाल्मीकि है, वे उनसे मिलने जाती है, वहाँ सुशीला जी के पड़ोसन से पता चलता है कि सुशीला जी वाल्मीकी हैं, ये बात सुनकर वे अपनी जाति के बारे में बताती हैं। सुशीला जी मिसेस सोलंकी के बदले हुए व्यवहार के बारे में बताती है, “उस दिन मिसेस सोलंकी हमारे घर बहुत कम समय रूकी थीं। बहुत आग्रह करने पर उन्होंने सिर्फ चाय पी। साथ ही बहुत अपनेपन के साथ मुझे समझाकर कहा था – “देखो, आप बुरा मत मानना। मैं छुआछूत नहीं मानती, मगर आप अपनी पड़ोसनों को और मोहल्ले में किसी को भी यह नहीं बताना कि मैं आपके घर खाती-पीती हूँ। ये लोग हमारी जाति के लोगों को यह बतायेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा।”” जिसे हम शिक्षित समाज कह रहे थे, वही समाज जाति प्रथा को मानता है, और एक प्रगतिशीलता का लबादा भी ओढा हुआ होता है। जो कहता है कि हम तो जाति प्रथा को नहीं मानते हैं, पर समाज में रहना भी तो है। इस तरह के अनेक उदाहरण इस आत्मकथा में मिलेंगे। जहाँ सुशिक्षित लोगों ने जाति प्रथा को खारीज करने की बजाय उसको बढ़ावा दिया है। हमारे समाज के भिखारी तक जाति प्रथा को मानते हैं, इसका भी एक उदाहरण सुशीला जी आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द’ में मिलता है। सुशीला जी के पड़ोसन ने सुशीला जी के घर की तरफ इशारा करते हुए भिखारी से कहा, “”महाराज जी, इस घर की भिक्षा नहीं लेना। यहाँ जमादारन रहती है।”यह सुनते ही मेरे कानों मैं जैसे बम फटा। मेरा सिर झन्ना गया, जैसे किसी ने कनपटी पर झन्नाटेदार चोट मारी हो। उसे पता था, मैं हाईस्कूल में शिक्षिका हूँ, फिर भी सवर्ण मानसिकता के कारण जाति से और ऊँच-नीच के जातिभेद से उसने मुझे बस यही समझा था। भिखारी से झूमते हुए सिर हिलाकर कहा – “अच्छा हुआ माताजी, आपने बता दिया। मैं भला उनके घर का आटा कैसे ले सकता हूँ?”” वर्ण व्यवस्था ने हमारे पूरे समाज को ग्रसित किया है। इसी कारण एक भिखारी भी दलितों के घर की भीख को नकारता है। दलितों की एक विशिष्ट छवि हमारे समाज में बनी हुई है। दलितों के प्रति बहुत तरह की धारणाएँ बनी हुई। दलितों का एक विशेष प्रकार का रहन-सहन होता है, दलित के कपड़ें ठीक-ठाक नहीं होते हैं। इसका उदारहण भी हमें सुशीला जी की आत्मकथा में देखने को मिलता है, जब सुशीला जी कामठी के केसरीमल पोरवाल कॉलेज में हिन्दी की प्राध्यापिका के रुप में आई, तब वहाँ पहले से मिसेस मुखर्जी हिन्दी पढ़ाती थी, दो साल बाद पता चलता हैं कि सुशीला जी एस.सी.है, तब उनकी प्रतिक्रिया इस प्रकार थी, ““मगर आप तो एस.सी. लगती ही नहीं हो। आपका रहन-सहन, पहनावा, आपकी भाषा, व्यवहार, बोलचाल कितना सौम्य और सुसंस्कृत है। मैं तो आपको एस.सी. मान ही नहीं सकती” मैडम ने आश्चर्य भरे तरीके से स्टाफ रू में उपस्थित प्राध्यापक-प्राध्यापिकाओं को भी इस विषय में बताया। मैं सोचती रही, क्या, एस.सी.इस तरह नहीं रह सकते? हमारे लिए लोग अपने दिल दिमाग में गन्दी छवि बनाकर क्यों रखते हैं? हमारी जाति को लोग बुरा क्यों समझते हैं? इसका स्पष्ट कारण है, हमारे लिए पहले से ही पूर्वाग्रह और दुराभाव रखा जाता है।” इस तरह के पूर्वाग्रहों से आज भी हमारा समाज मुक्त नहीं हुआ है। डॉ. देवेन्द्र चौबे ने ‘साहित्य में उत्कृष्टता और पवित्रता का सवाल’ पर लिखा है, “सामाजिक जीवन में जहाँ “जाति” उनके(दलित समाज) और अन्य समाज के बीच दहलीज का काम करती है, वहीं साहित्य में उनके जीवन का यथार्थ, अनुभव, संघर्ष और भाषा उनके पाठ की मान्यता के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। परिणामतः हम इसलिए कोई स्थान देने अथवा उनसे संबंध स्थापित करने से हिचकने लगते हैं कि भारतीय परंपरा और संस्कृति में न तो वह समाज(दलित) ही पवित्र है और न ही उसका पाठ “उत्कृष्ट”। फिर कैसी माँग और कैसी मान्यता तथा कैसा उनका संघर्ष? यहीं पर आकर सब कुछ गड़बड़ होने लगता है और शेष समाज (गैर-दलित समाज) तथा उसकी मान्यताएँ, इस वंचित समाज जिसे हम एक अन्य अर्थ में”हाशिये का समाज”(marginal society) भी कह सकते हैं, के खिलाफ आकर खड़ी हो जाती हैं।” दलित साहित्य को लेकर इस तरह की धारणाएँ हिन्दी विभागों में भी देखने को मिलती हैं। हिन्दी के बहुत सारे आलोचक और रचनाकार दलित साहित्य को साहित्य नहीं मानते है। दलित साहित्य में चित्रित समाज को ही जिन्होंने हाशिए पर सदियों से डाल रखा है, ऐसे समाज के बारे में उन्हीं की भाषा में, पारंपारिक साहित्य के मानदण्डों को तोड़ते हुए लिखे जाने वाले दलित साहित्य को मुख्यधारा के साहित्यिक कैसे स्वीकारते? इसी कारण सुशीला जी को दलित साहित्य छोड़कर ललित साहित्य लिखने के लिए कहा गया। उनके सहकर्मियों ने उनको पुरस्कारों का लालच भी दिया था। सहकर्मियों ने सुशीला जी से कहा, “मैडम, आप जाति से जा भी हैं, मगर हम आपको ब्राह्मण मानते हैं। आप अम्बेडकरवादी लोगों के साथ मिलकर विरोध-आक्रोश की बातें क्यों करती हैं? आप दलित साहित्य क्यों करती हैं? आप ललित साहित्य लिखिए, हमारे साथ रहिए। हम आपको बहुत सम्मान दिलायेंगे। ये दलित साहित्य को छोडिए, बड़े केनवास पर आइए।” सुशीला जानती थीं कि ललित साहित्य भले ही मान-सम्मान दे, पर दलितों को दासता की बेड़ियों से मुक्त नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने दलित साहित्य को चुना और इस साहित्य ने मान-सम्मान तथा विदेशा जाने के अवसर भी दिये। हिन्दी विभागों के अध्यापकों की मानसिकता भी दलित साहित्य के प्रति अच्छी नहीं है, आज भी कुछ अध्यापक भक्तिकाल, रीतिकाल और छायावाद के आगे की सोच ही नहीं पाते हैं। उनके अनुसार दलित साहित्य मुख्यधारा के साहित्य के मानदण्डों पर खरा नहीं उतरता है। इन्हीं सब कारणों के कारण सुशीला जी को पीएच.डी. में दलित साहित्य पर शोध करने से मना कर दिया था। दलित साहित्य पर शोध करवाने के लिए कोई भी अध्यापक शोध-निर्देशक बनना नहीं चाहता था। वे लिखती हैं कि,”मैं दलित साहित्य पर कार्य करना चाहती थी मगर सवर्ण प्राध्यापक कहते थे-“ऐसे विषय पर काम करने से आपको हिन्दी का गाइड नहीं मिलेगा, विषय सामग्री नहीं मिलेगी। नारी सम्बन्धी विषय लेकर काम करो, जल्दी पूरा हो जायेगा।”” दलित और दलित साहित्य के प्रति हिन्दी विभागों की मानसिकता भी वही है, जो गाँव के किसी सामन्त की होती है। श्रीलंका में रत्नाकर पाण्डे ने सुशीला जी का दलित साहित्य पर पर्चा सुनने के बाद उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था, “ ये साले दलित साहित्य वाले लोग अपनी-अपनी दुकान लगाकर बैठ गये हैं। इन्होंने हमारे तुलसीदास को और भगवान राम को बदनाम कर दिया है। ये सब अपने-अपने स्वार्थ में लगे हुए हैं।” इस तरह हम देखते हैं कि दलित साहित्य को इस तरह के अवरोधों के कारण हिन्दी साहित्य में प्रवेश करने के लिए संघर्ष करना पड़ा। दलित साहित्य की विषयवस्तु, भाषा को लेकर अनेक सवाल उठाए गये है। लेकिन देर-सवेर ही क्यों न हो इस साहित्य ने अपनी पहचान बना ली है। दलित आन्दोलन को दलित पुरुष चलाते हैं। दलित स्त्रियों की भूमिका इस तरह के आन्दोलन में नगण्य होती है। दलित पुरुष की दलित स्त्री के प्रति मानसिकता स्वर्ण पुरुषों के मानसिकता जैसी ही होती है। वे दलितों के अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन दलित स्त्री को भी अधिकार देने चाहिए, इस प्रश्न पर मौन रहते हैं। इस तरह के कुछ अनुभव भी सुशीला जी के हिस्से में आये हैं। सुशीला जी का जीवन दो पाटों के बीच पिसा जा रहा था। एक तरफ स्त्री होने के कारण घरेलू हिंसा का शिकार हो रही थीं, तो नौकरी और साहित्य के क्षेत्र में दलित होने के कारण हर समय अपमान को सहना पड़ता था। लेकिन सुशीला जी ने अपने-आप को कुछ समय बाद संभाला और उन्होंने दोनों मोर्चों पर संघर्ष करना शुरु किया। उन्होंने अपने पति के साथ झगड़ा कर अपने अधिकारों की रक्षा की तथा समाज और साहित्य की दुनिया में जीवनभर संघर्ष रत रहकर डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों का प्रचार-प्रसार किया। इस तरह वे दोनों जगह संघर्ष करती रही और कामयाब होती रही। दलित स्त्री को डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित होने कारण जातीय विषमता का बोध होता है। स्त्री होने के कारण उनके हिस्से में आया दोय्यम दर्जा भी समझ में आता है। उर्मिला पवार ने अपनी आत्मकथा ‘आयदान’ दलित स्त्री के दर्द को बखूबी रेखांकित किया है। उर्मिला पवार की यह आत्मकथा केवल उनकी अपनी आत्मकथा नहीं है, वरन् वह पूरी दलित जाति की है, दलित स्त्रियों की है। उर्मिला पवार का संघर्ष एक तरफ दलितों को मुक्ति दिलाने के लिए ब्राह्मणवादी विचारों को मानने वालों के खिलाफ है, तो दूसरा संघर्ष अपने ही दलित भाईयों के खिलाफ दलित स्त्री के अधिकारों के लिए है। जातिप्रथा, अस्पृश्यता किस हद तक हमारी मानसिकता में बसी हुई है, इसका एक बहुत अच्छा उदारहण हमें उर्मिला पवार की आत्मकथा में मिलता है। जाति क्या होती हैं, हमारे यहाँ का पागल भी जानता है। उर्मिला पवार की दीदी पागलों के अस्पताल में नर्स का काम करती है। एक दिन पागलों को कहीं से पता चलता है कि नर्स दलित है, तभी से पागल उसके हाथ से दवा लेने से मना करते हैं। उर्मिला पवार के जीवन को शिक्षा और समाज के अनुभवों ने काफी प्रभावित किया। उर्मिला पवार को स्कूली जीवन से ही अपने जाति के बारे में पता चलता है। स्कूल स्वर्ण लड़कियाँ खाने के लिए अनेक प्रकार के पदार्थ लाती हैं, उर्मिला पवार ने जिसके नाम तक सुने नहीं थे। इस तरह के पदार्थ मेरे घर में क्यों नहीं बनते हैं, इस तरह का सवाल उनके मन में कभी पैदा नहीं हुआ। वे इसके बारे में लिखती हैं, “ जिस जगह, जिस जाती-परिस्थिति में हम पैदा हुए उसके अनुसार हमें जीना है, रहना है। यह अहसास किसी के न सिखाते हुए भी हमें था।” बचपन से जिस माहौल में पली-बढ़ी उसी माहौल ने अपनी जाति और जाति का समाज में क्या स्थान है, यह किसी के बताये बिना भी समझ लिया था। जाति प्रथा ने दलितों का भी विभाजन किया है। दलितों में भी उपजातियाँ है। उर्मिला पवार की जाति महार थी। महार जाति में दो उपजातियाँ हैं – पाने महार और बेले महार। शादी के बाद उर्मिला के ससुराल की औरतें कह रही थी, इन्हें पाने महार की लड़की नहीं मिली, जो बेले महार की लड़की को लेकर आये। इन बातों को सुनकर उर्मिला जी लिखती हैं, “पान महार अगड़े और बेलमहार पिछड़े ऐसी समझ थी। इन उपजातियों के बीच बेटी व्यवहार नहीं होता था। हरिश्चन्द्र ‘पाने’ था और मेरे मायके, रत्नागिरी में इस तरह की उपजातियाँ नहीं थी, फिर वे औरतें हम सबको ‘बेले’ समझ रही थी और हमारी आलोचना कर रही थीं। ये देखकर मुझे हँसी आ रही थी।” हजारी प्रसाद का वह वक्तव्य यहाँ सही साबित होता हुआ नज़र आ रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि शूद्र से शूद्र जाति भी अपने से शूद्र जाति को खोज़ निकालती है। अपने आप को श्रेष्ठ समझने के लिए इस तरह की बातें लोग करने लगते हैं। उर्मिला पवार के भाई ने दलित जाति के दंश से बचने के लिए, अपना नाम और जाति बदला थी, पर लोग उनकी पुरानी पहचान से पहचानते थे। इससे यह भी साबित होता है, किस हद तक जाति प्रथा हमारे मानसिकता पर हावी हो चुकी है। दलित पुरुष भी अपनी पत्नी के साथ स्वर्ण पुरुषों जैसी मानसिकता रखते हैं। वे भी अपनी पत्नी के साथ सामंती व्यवहार करते हैं। उर्मिला पवार के पति का व्यवहार भी कुछ इस तरह का ही था। उर्मिला के पति उर्मिला के लेखन-बोलने की तारिफ तो बाहर करते पर घर में उनका व्यवहार विपरीत था, वे अपनी पत्नी से सीधे-सीधे तो कुछ नहीं कहते थे, पर अप्रत्यक्ष रुप में कहते हुए कहते थे, “ ‘हमारे देहात की औरतों की तरफ देखो। पति के कहने से उठती हैं, पति के कहने से बैठती हैं। वे किस तरह घर-परिवार शांति से , खुशी से चलाती हैं?’ उत्तर उनके इस सवाल में ही था।” उर्मिला जी के माँ ने पति के स्वभाव के बारे में समझाते हुए जो कहा था, “मुझे अपनी सुरक्षा की गैरंटी थी। मेरा पति प्यारा था, फिर भी माँ की एक बात याद थी, ‘पति ने कहा रांड तो दुनिया कहती है सांड’ इस कारण पति के साथ ठीक तरह से रहना है, यह बात मेरे मन में पक्की बसी हुई थी। कुछ भी होने पर।” माँ की यह बात हमेशा उनके जहन में रही, इसलिए उन्होंने मुँह पर हर बात बोली नहीं, पर स्वगत में बहुत कुछ बोल जाती है। उर्मिला पवार की माँ की बात को सब शादीशुदा औरतें जानती हैं, इसलिए बहुत बार पति का व्यवहार असहनीय होने पर भी ये औरतें चुप्पी साधे रहती हैं। उर्मिला पवार ने स्त्री मुक्ति आंदोलन की औरतों की तरह मंगलसूत्र पहनना छोड़ दिया था। उनको लगता भी था कि यह सब हिन्दू धर्म की निशानियाँ है, और उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया था, इसलिए भी हिन्दू धर्म की इन निशानियों को छोड़ना चाहती थी। मन में मंगलसूत्र को निकालने का विचार तो आया पर कृति में उतारने के लिए काफी समय लगा। फिर पति को समझाना पड़ा कि यह हिन्दू धर्म की के प्रतीक हैं, और हमने बौद्ध धर्म स्वीकारा। पति ने यह बात समझ भी ली थी। पर संस्कार में कहीं बातें रह जाती हैं, उर्मिला जी के पति के सामंती संस्कार जब उभरकर बाहर आते थे, वे अपनी पत्नी को मंगलसूत्र की बात को लेकर ताने मारते थे, इस के बारे में उर्मिला जी लिखती हैं, “कभी वो कहता था, ‘क्या करना है इन उपरी बातों का? क्या होता है उन काले मणियों में? उसे न पहनने से क्या फरक पड़ता है औरत में?’ तो कभी इस समझदार बातों से उल्टी बातें करने लगते। कहता था, ‘तुम क्यों पहनोगी मंगलसूत्र? मैं कब मरूँगा इसकी ही तुम राह देख रही हो’आदि। मेरे साथ कहीं मत आना और ‘तुम स्त्री मुक्तिवाली, तुम्हें क्यों चाहिए पुरुषों का साथ?’ ऐसे कहने में उसे बहुत संतोष मिलता था और मैं भी उस ओर जितना होता है, उतना नज़र-अंदाज कर, मुझे जहाँ जाना है, वहाँ जाती थी।” उर्मिला जी के लिए घर से बाहर निकलना इतना आसान भी नहीं था, बहुत सारी बातें होती थी। उर्मिला पवार ने पति को पूरी तरह खलनायक नहीं कहा है। वे अपने पति को अच्छा इन्सान भी मानती है। लेकिन जब गुस्से में आये तो वो सारी भड़ास उर्मिला जी पर निकालते थे। उर्मिला पवार दलित आंदोलनों में दलित स्त्री के स्थान को देखकर दलित आन्दोलन के नेताओं से सवाल करती हैं। दलित नेता दलित मुक्ति की बात तो करते हैं, लेकिन वे अपने घरों में औरतों के साथ उसी तरह का बर्ताव करते हैं, जैसे स्वर्ण पुरुष अपने घर की स्त्रियों के साथ करते हैं। इस प्रश्न को उर्मिला जी ने बार-बार सभाओं में उठाया है। दलित आंदोलन की इस विसंगति के बारे में वे लिखती हैं, “दलित आंदोलन से जुड़े लोग अपनी घर की औरतों के साथ दोय्यम दर्जे का बर्ताव करते थे।” दलित आंदोलनों में स्त्रियों की संख्या भी नगण्य होती थीं। दलित आंदोलनों में स्त्रियों के लिए आयोजित समारोह में भी स्त्रियों को स्टेज पर जाने और बोलने के मौके कम ही मिलते हैं, पुरुषों का कब्जा मंच पर होने के कारण वे खुलकर बोल नहीं पाती हैं। स्त्रियाँ केवल दर्शक बनकर रह जाती थीं, यह भी पता नहीं होता था कि तालियाँ कब बजानी है। स्वर्ण जाति के पुरुषों को जो व्यवहार अपने स्त्रियों के प्रति था, वही व्यवहार दलितों का अपने स्त्रियों के प्रति था। इस संदर्भ के अपने एक अनुभव के बारे में उर्मिला पवार लिखती हैं, “दलित आंदोलन में आयोजित किये जाने वाले स्त्रियों के समारोह में मंच पर की कुर्सीयाँ पुरुषों द्वारा ही काबीज़ की हुई होती हैं। इसी कारण स्त्रियाँ खुलकर बोल नहीं पाती।” यह विडम्बना केवल दलित आंदोलन की ही नहीं है, बल्कि स्त्री मुक्ति आंदोलनों में दलितों के प्रति दिखाई देती हैं। स्त्री मुक्ति आंदोलन वाले दलित मुक्ति के सवाल पर चुप्पी साध लेते हैं। उर्मिला पवार लिखती हैं, “मुझे एक बात अच्छी तरह समझ में आयी थी कि, दलित मुक्ति आंदोलन में स्त्री प्रश्नों के लिए कोई जगह नहीं थी और स्त्री मुक्ति आंदोलन दलित मुक्ति की तरफ उदासीनता भरी नज़र से देखता था। आज भी इसमें कोई फरक नहीं पड़ा।” उर्मिला पवार को आरक्षण के कारण मिलने वाली पदोन्नती को लेकर भी अपने सहकर्मियों से ताने सुनने पड़े। उर्मिला पवार ने भी अन्य दलित स्त्री की तरह दलित और स्त्री होने के कारण अपने दोनों गालों पर थप्पड़ खायें। उर्मिला पवार में शिक्षा के कारण चेतना आयी और स्त्रियों और दलितों के खिलाफ उठने वाले सवालों का जवाब देने लगी। उर्मिला ने केवल लेखन ही नहीं किया बल्कि वे आंदोलनों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगी थीं, घर-घर जाकर स्त्री मुक्ति के विचारों को फैलाने का काम किया। इस तरह के काम करने में घर और समाज दोनों के विरोधों को सामना करना पड़ा। उर्मिला पवार ने उन स्त्रियों की भी आलोचना की जो एक तरफ स्त्री मुक्ति की बातें करती हैं और पुरुषप्रधान समाज के नियमों को अपने पलकों पर सजाये हुए रखती हैं। उर्मिला पवार के लिए दलित मुक्ति केवल दलित पुरुषों की मुक्ति तक सीमित नहीं थी, वे दलित स्त्रियों को भी वे सब अधिकार देना चाहती थीं, जिसे दलित पुरुष आंदोलनों द्वारा प्राप्त करना चाहते थे। उर्मिला पवार ने धर्मान्तरण के बाद दलितों के जीवन में आये सकारात्मक परिवर्तन को भी अपनी आत्मकथा में रेखांकित किया है। उर्मिला पवार की आत्मकथा दलित स्त्री की समस्यायों को अभिव्यक्त करने में सफल रही हैं। 3.15 कामकाजी स्त्री स्त्रियाँ शिक्षा के कारण घर से बाहर निकलकर कामकाज करने लगी हैं। अपनी पहचान बनाने और पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए स्त्रियाँ घर से बाहर निकलकर ऑफिस, स्कूल, कॉलेज में काम करने लगी हैं। वैसे भी भारतीय संविधान के परिच्छेद IV राज्य के नीति-निर्देशक के सिद्धांतों के अनुसार महिलाओं को भी पुरुषों का भाँति कोई भी धंधा अपनाने का अधिकार है, जो समाज के नैतिक आचरण के विरुद्ध न हो। वैसे देखा जाए तो हर महिला कामकाजी होती है, क्योंकि जिसे हम गृहणी कहते हैं, वे भी घर के भीतर ऑफिस के घंटों से भी ज्यादा काम करती हैं, पर इनके काम की कोई दखल नहीं लेता है। न इन्हें इस तरह के काम का पैसा मिलता है। अक्सर हम गृहणीयों को कम कुशल मानने की भूल करते हैं। घर का कामकाज़ सम्भालना बच्चों का खेल नहीं होता है, यह रस्सी पर चलने के समान होता है। पर हमारे समाज में इस तरह के काम से स्त्रियों की कोई पहचान नहीं बनती है। हम भी ऐसी औरतों को कम पढ़ी-लिखी मानते हैं। घरों के अन्दर महिलाएं सबसे ज्यादा काम करती हैं और सबसे कम देखभाल मांगती हैं, वे पूरे परिवार की अकेले देखभाल करती हैं और अक्सर काम के अत्यधिक बोझ से दबी रहती हैं। कामकाज़ी स्त्रियाँ उन स्त्रियों को कहते हैं, जिनके काम करने से पैसा मिलता है। कामकाजी महिलाओं के ऊपर यह दबाव और बढ़ जाता है। ऐसी स्त्रियों को कामकाज़ के स्थल पर अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। स्त्री आत्मकथाकारों में कई महिलाएँ नौकरी या व्यवसाय करती है। वहाँ उनको कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पुरुष जहाँ केवल नौकरी या व्यवसाय की जगह काम करता है, तो स्त्री को घर और नौकरी या व्यवसाय की जगह काम करना पड़ता है। यानी स्त्रियों की जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है। स्त्रियों को कार्यस्थल पर स्त्री होने के कारण भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। प्रभा खेतान विदेश से आकर फिगरेट नाम का हेल्थ कल्ब खोलती है। सन् 1970 में इसी हेल्थ क्लब से 25-30 हजार महीने की आय हो जाती थी। यह उनके लिए बड़ी आर्थिक उपलब्धी थी। लेकिन यह काम धीरे-धीरे उबाऊ लगने लगता है। एक तरफ फिगरेट का काम देखती है, दूसरी तरफ डॉ.सराफ की भी देखभाल करती है। जब भी डॉ.सराफ के यहाँ पार्टी होती थी, उसकी सारी जिम्मेदारी प्रभा खेतान की होती थी। प्रभा खेतान के लिए काम केवल आर्थिक रुप से सक्षम होना ही नहीं था, वे इसे अपने अस्तित्व से जोड़कर देखती हैं, वे लिखती हैं, “ बाहरी दुनिया में कदम रखते ही मेरी कार्य-क्षमता दुगुणी हो गई। एक असह्य यथार्थ से पलायन कर रही थी, मैं केवल डॉक्टर साहब की होकर नहीं रह गई थी। लोगों से मैं कहना चाहती , डॉक्टर से अलग भी मेरी कोई हैसियत है। मैं भी कुछ हूँ।” प्रभा खेतान के लिए व्यवसाय अपनी पहचान बन जाती है। प्रभा खेतान के अन्दर एक फैक्ट्री के मालिक होने के सारे दोष मौजूद थे, वे खुद जानती हैं कि वे भी एक शोषित जाति की सदस्य हैं। वे लिखती हैं, “ स्त्री के रूप में चाहे दलित और शोषित थी मगर व्यापार की दुनिया में व्यापारी पुरूषों के मूल्य-बोध ही स्वीकार रही थी।” एक तरफ प्रभा खेतान व्यापार में प्रगति कर रही थीं, तो दूसरी तरफ प्रभा खेतान और डॉ. सर्राफ के बीच दूरियाँ बढ़ने लगी थीं। प्रभा खेतान के काम से कभी-कभी डॉक्टर चिढ़ते थे। उन्हें प्रभा खेतान का व्यापारियों के साथ हँसकर बात करना पसंद नहीं था। वे सिर्फ पुरूष को ही मालिक मानते थे। इसलिए प्रभा खेतान की प्रगति उनसे देखी नहीं जाती। डॉ.सराफ यह भी चाहते थे कि प्रभा खेतान व्यापार छोड़ दे, लेकिन प्रभा खेतान जानती हैं कि व्यापार है, इसलिए उनकी साँसे चल रही हैं। वे लिखती हैं, “ऑफिस के ये आठ-दस घंटे, यह व्यस्तता और भागदौड़ इसी के सहारे तो मैं जी पा रही हूँ। मेरे पास मेरा काम नहीं होता तो न जाने मैं क्या करती। कैसे अपने खाली क्षणों को भरती।” इस तरह हम देखते हैं कि प्रभा खेतान के लिए व्यापार केवल आर्थिक रुप से सक्षम होना भर नहीं है, अपनी पहचान भी है। समय काटने का जरिया भी है। जिसके कारण वे बिना शादी के जी पायी हैं। कृष्णा जी ने आर्थिक निर्भरता पाने के लिए प्रयत्न शुरु किये। उन्हें मध्यप्रदेश के तत्कालिन मुख्यमंत्री मंडलोई के सहयोग से गृहविज्ञान कला महाविद्यालय, खंडवा हिन्दी व्याख्याता की नौकरी मिली। लेकिन कुछ ही समय बाद नये मुख्यमंत्री डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। इसके बाद उनके कई जगह तबादले होते रहे। उन्हें गर्ल्स डिग्री कालेज, खंडवा में हिन्दी व्याख्याता के रूप में नौकरी मिली। दूसरे कॉलेजों में पुरूषों द्वारा अपमान सहना पड़ा, पर इस कॉलेज में स्त्रियों द्वारा भी अपमान सहना पड़ा। कृष्णा जी को महाविद्यालय में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अनेक संघर्ष करने पड़े। इसी कारण कृष्णा अग्निहोत्री कामगार महिलाओं के बारे में लिखती हैं, “कामगार महिलाओं को अपनी अस्मिता के लिए जो रोजमर्रा की लड़ाई सहनी पड़ती है....उसका अनुभव वे ही जानती हैं जो उसे भोगती हैं। सब कुछ योग्यता निष्ठा व ईमानदारी से नसीब नहीं होता। लेकिन बेईमानी व राजनीति मुझसे कोसों दूर है इसलिए संघर्ष की चकरघानी में मैं पिसती ही आई व पिसती ही रहूँगी।” यह केवल कृष्णा अग्निहोत्री की जिन्दगी का सच नहीं है यह तो तमाम कामगार महिलाओं की जिन्दगी का यथार्थ है। मन्नू भंडारी के जीवन का भी सच अन्य कामकाजी महिलाओं से अलग नहीं है। मन्नू भंडारी पढ़ाने का कार्य करती है, एक गृहणी की भाँति जिम्मेदारी को निभाती हैं। यह सब करते हुए वे रचनात्मक कार्य भी करती रहती हैं। इनके पति राजेन्द्र यादव ‘लेखकीय स्वतंत्रता’ के नाम पर ना कुछ काम करते हैं ना घर की जिम्मेदारियों को सम्भालते हैं। लेखक तो मन्नू भंडारी भी हैं, पर अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी लेखन कार्य करती हैं, वह भी स्तरीय होता है। दिल्ली की नौकरी के बारे में मन्नू भंडारी ने कुछ नहीं लिखा। चंद्रकिरण सौनरेक्सा का भी हाल मन्नू भंडारी जैसा ही था। पति की नौकरी छुटने के बाद चंद्रकिरण जी ही नौकरी करने के साथ-साथ घर को भी संभालती थी और लेखन कार्य से भी जुड़ी रही। चन्द्रकिरण जी लिखती हैं, “…मैं पाँच बजे उठकर, खाना-नाश्ता तैयार करने में जुट जाती थी। रात में ही दो अँगीठियाँ लगा लेती थी। एक पर सबेरे पानी गर्म होता रहता सबके लिये; दूसरी पर दाल, चावल, सब्जी, रोटी बनती।....शाम को आकर, मैं रसोई सँभाल लेती थी।” दिनभर आकाशवाणी केन्द्र में काम करती थी और शाम में आकर घर का काम भी संभालती थीं। दोनों जिम्मेदारियाओं को चंद्रकिरण जी ने बखुभी निभाया था। लगभग सभी विवाहित कामकाजी महिलाओं को अपना घर सँभालते हुए, नौकरी करनी पड़ती हैं। ऐसी स्त्री को घर के अन्य सदस्यों से सहायता मिलनी चाहिए। पद्मा सचदेव को रेडियो(आकाशवाणी) की नौकरी करनी अच्छी लगने लगती है, इस नौकरी से वे आर्थिक रूप से अपने आपको सक्षम मानने लगती हैं। उनके पति दीप जी तलाक के बाद उनकी हर जगह बदनामी करते फिरते हैं। रेडियों में जाकर कुछ लोगों ने कहा, “इसने अपने पति को तलाक दिया है, इसलिए इसे रेडियो में रखना ठीक नहीं है।” लोगों को लगता था कि रेडियों से निकाल दी जायेगी तो सहारे के लिए दीप जी के पास जायेगी। रेडियो के कुछ कर्मचारियों ने भी उनके खिलाफ षडयन्त्र रचा था। षडयन्त्र के तहत सभी कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाली एक चिट्ठी दिल्ली में डायरेक्टर जनरल के पास भेज दी गयी। जिसपर कुछ कर्मचारियों के जाली हस्तक्षार भी थे। पद्मा सचदेव को एक स्त्री होने के कारण इस तरह का अपमान अपने सहकर्मियों द्वारा सहना पड़ा। सुशीला टाकभौरे को दलित होने के कारण कार्य स्थल पर अपमान सहना पड़ा। उन पर किसी न किसी बात को लेकर छींटाकशी होती ही रही है। उनके सहकर्मि ब्राह्मणवादी होने के कारण उनको हर बार अपमान सहना पड़ा। वे लिखती हैं, “महाराष्ट्र प्रांत के कामठी के अपने महाविद्यालय से जुड़े लोगों द्वारा दिये गये जातिभेद के दंश मैंने कई बार सहे हैं। लोग शिक्षित हों या अनपढ़, इससे अधिक यह महत्वपूर्ण है कि वे कितने ब्राह्मणवादी हैं। मनुवादी-ब्राह्मणवादी होना ही वर्णभेद और जातिभेद की जड़ है। शिक्षित प्राध्यापक-प्राध्यापिकाओं का ब्राह्मणवादी व्यवहार मैंने अपने प्रति खुले रुप में देखा है।” यह तो सवर्ण सहकर्मियों द्वारा किया हुआ अपमान है। घर आकर उन्हें पति से भी अपमान सहना पड़ता है। घर आकर सुशीला जी स्त्री बन जाती है, यहाँ उन्हें स्त्री के हिस्से के शिंकजे का दर्द भुगतना पड़ता है। शुरुआत में वे अपनी पुरी तनख्वाह अपने पति को देती थीं, लेकिन रोज बस किराये के पैसे माँगने के लिए उनके सामने हाथ फैलाना पड़ता था। वे इस बारे में लिखती हैं, “1990 के बाद मुझमें साहस आ गया था। मैं अपनी चेकबुक और पासबुक अपने पास रखने लगी थी। तनख्वाह हो जाने के बाद किसी दिन सहकारी प्राध्यापिकाओं के साथ बैंक जाकर रुपये निकाल लेती। रूपये घर में लाकर टाकभौरे जी के हाथों में देती। उस समय कटौती के बाद हर माह मुझे 6-7 हजार रू. वेतन मिलता था। वे बड़े बेमन से रुपये लेकर बैग में या अलमारी में गुस्से से पटक देते। झगड़े भी होते थे, वे गुस्से में कहते थे – “तू मुझे समझती क्या है? तेरी हिम्मत कैसे हुई रूपये लाकर नहीं बताने की? तू अपने आप को समझती क्या है?” ऐसे अनेक प्रश्नों से मैं घबराती, माफी माँगती, अपना निर्दोष होना सिद्ध करती कि इस काम से या इस कारण से मैं घर में आते ही रुपयों की बात बताना भूल गई थी। वे मुझे अक्सर कहते थे- “तू मेरे सामने कुछ भी नहीं है। तेरी औकात सिर्फ एक बर्तन माँजने वाली नौकरानी के बराबर है।” न जाने क्यों वे मेरी शिक्षा, डिग्री, नौकरी, सम्मान और मेरे वेतन को कभी अहमियत नहीं देते थे। जानबूझकर ऐसा करते थे, मेरे महत्त्व और सम्मान को नकारते थे।” सुशीला टाकभौरे की तनख्वाह पर उनके पति पूरा अधिकार चाहते थे। सुशीला टाकभौरे के पति दलित अधिकारों के लिए आन्दोलन में हिस्सा लेते थे, पर अपने पत्नी के अधिकारों की तरफ अनदेखा करते हैं। यहाँ पर वे पितृसत्तात्मक सत्ता के नियमों का पालन करते हैं। क्योंकि ये नियम उनको स्त्री का शोषण करने का अधिकार देते थे। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन शोषण की बातें अक्सर हम सुनते हैं। कुछ इसी तरह का अनुभव कृष्णा अग्निहोत्री को भी आता है, वे लिखती हैं, “गुप्ता जी के साथी बहुधा मुझे अपने कमरे में गप्पें मारने या यह कहूँ कि फ्लर्ट करने आमन्त्रित करते थे तो मैं गलत नहीं लिख रही, जिसके कमरे में न जाऊं, वही नाराज- जैसे मुझ अकेली नौकरी करने वाली जवान सुन्दर महिला पर उन सबका अधिकार है। यदि उनकी इच्छापूर्ति नहीं होगी तो वे मेरी नींव खोदने की हिम्मत रखते हैं।” इस तरह की घटनाएँ कार्यस्थल पर आम हो गयी है। पुरुष सहकर्मी अपने स्त्री सहकर्मी का यौन शोषण करना चाहता है, इस कार्य में वह अगर बिना हिचकिचाहट के हामी भरती है, तो ठीक हैं, नहीं तो वह उस स्त्री की बदनामी करता है। कामकाजी महिला की स्थिति के बारे में माधवी देसाई ने बहुत सटीक लिखा है कि, “मेरी नहीं तो सभी कमाती स्त्रियों की यह शोकांकिका हैं। शिक्षा, कर्तव्य, जरूरत, सुख इसके मोह में वह पड़ती है। वह खुद होकर ही नौकरी की, अर्थार्जन की जंजीर गले में बाँध लेती है। शुरुआत में उसे लगता है कि पूरे घराने में वहीं कर्तबगार है, मायके में भी और ससुराल में भी! नौकरी की सुनहरी जंजीर उसे अच्छी लगने लगती है। वह चमकदार जंजीर बड़े शौक से अपने गले में बाँध लेती है; पर उस पागल को पता ही नहीं होता है कि, पहले के मंगलसूत्र के घेरे पर और एक घेरा उसने खुद होकर चढ़ा लिया है।” माधवी जी का कहना सही था, एक तरफ उसे पत्नी की भूमिका निभानी पड़ती है और दूसरी तरफ कामकाजी स्त्री की, इऩ दोनों पाटों के बीच वह पिसती रहती है। इसी कारण वे नौकरी को भी मंगलसूत्र की तरह एक जंजीर मानती हैं। स्त्री कार्यक्षमता को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते हैं। स्त्री की कार्यक्षमता को लेकर अनेक धारणाएँ भी बनी हुई है। स्त्री ज्यादा शारीरिक श्रम नहीं कर सकती, या उसका बौद्धिक स्तर कम होता है। वह जिम्मेदारी का काम नहीं कर सकती है। जो स्त्रियाँ सुंदर होती हैं, उन्हें कम दिमाग होता है। ऐसी अनेक तरह की धारणाएँ पुरुष सहकर्मी स्त्री सहकर्मी के प्रति रखता है। गिरिजा कीर को अपनी पहली ही नौकरी में इन अनुभवों से गुजरना पड़ा। गिरिजा कीर की पहली नौकरी लेबर कमीशन के ऑफिस में लगी थी। वे परीक्षा में प्रथम आई थीं और इनकी नियुक्ति इंटेलिजन्स ब्राँच में हुई थी। वहाँ के सुप्रिटेंडेंट ने आते ही कहा था, “हमें लड़कियाँ नहीं चाहिए, यहाँ जिम्मेदारी का काम होता है।” सुप्रिटेंडंट के कहने का साफ-साफ मतलब निकलता है कि लड़कियाँ जिम्मेदारी का काम कर नहीं पाती। यह बात उन्होंने गिरिजा कीर के काम को देखे बिना ही अपने स्त्री कर्मचारियों के प्रति के पूर्वग्रह के कारण कही थी। लेकिन वे वहाँ से गिरिजा कीर को निकाल नहीं पाये, क्योंकि गिरिजा कीर परीक्षा में प्रथम आने के कारण उन्हें वह पद मिला था। सुप्रिटेंडेंट की तरह स्त्री की कार्यक्षमता को लेकर उनके अन्य एक सहकर्मी के मन में इसी प्रकार की धारणा थी, गिरिजा कीर के सहकर्मी कांबले ने पहले दो दिन में ही कहा था, “सिर्फ गोरा चेहरा यहाँ कुछ काम का नहीं है, काम करना पड़ता है।” इस तरह की कमैंट का भी सामना स्त्रियों को कार्यस्थल पर करना पड़ता है। इसकी जड़े पुरुषसत्तात्मक समाज की सोच में है, ये संस्कार हमें बचपन से ही मिलते हैं। बचपन से ही लड़कियों को कुछ विशेष कार्यों के लिए तैयार किया जाता है। लड़कों को बार-बार बताया जाता हैं, कि ये तुम्हारा दायरा है, तुम्हें ये विशेष कार्य ही करने हैं। लड़कियों को घर के बाहर के कार्य तो छोड़ो उन्हें मैदानी खेल भी खेलने की मनाही होती है। ऐसे में बचपन से पुरुषों के मन में ये विचार बोये जाते हैं कि बड़े और जिम्मेदारी के काम केवल पुरुष ही कर सकते हैं। और ये विचार आगे चलकर फलने-फूलने लगते हैं। इसी के परिणाम स्वरूप गिरिजा कीर को अपने सहकर्मियों को कमेन्ट सुनने पड़े। कार्यस्थल पर स्त्रियों का यौन उत्पीड़न होते हुए भी देखा गया है। अगर स्त्री सहकर्मी यौन संबंधों को नकारती है, तो उसका अपमान पुरुष सहकर्मी द्वारा किया जाता है। गिरिजा कीर जब रेलवे में नौकरी कर रही थी, वहाँ पर उसके एक सिनीयर ने अपने घर पर अपने लड़के का ट्युशन लेने के लिए बुलाया था। गिरिजा कीर ने अपने सिनीयर की मंशा को भाँपकर, ट्यूशन लेने से पूरी तरह मना नहीं किया, लेकिन उन्होंने कहा कि ट्युशन मेरे घर पर होगा। पर साहब मानने को तैयार नहीं थे। तब साहब ने कहा, “तुम्हें शनिवार-रविवार को तो आना ही होगा, इस बात को मानोगी नहीं तो बुरा होगा।” इस बात से गिरिजा कीर डगमगायी नहीं, अपने नौकरी की चिंता किये बगैर अपने वेलफेयर ऑफिसर से गुस्से में कहा, “आप किस तरह का वेलफेयर करोगे? इस तरह के वरिष्ठ अधिकारियों के पाँव चाटकर जवान लड़कियों की बलि देने का वेलफेयर करोगे?” इस तरह की बातें सुनकर सहकर्मियों ने उस बड़े साहब के मुँह पर कालिख पोत दी। उस दिन से गिरिजा कीर को लगा कि इस दुनिया में जीना है तो हिम्मत और खुद पर जबरदस्त विश्वास होना चाहिए। कुचलनेवाले पाँव से ज्यादा अपना मन बलवान होना चाहिए। एक कामकाजी स्त्री को घर का कामकाज सम्भालते हुए उसे आफिस में भी काम करना पड़ता है। इन दोनों में जो स्त्री सतुंलन बना नहीं पाती है, उसे परिवार और समाज के तानों का शिकार होना पड़ता है। किसी-किसी घर में पति हिंसात्मक मार्ग भी अपनाता है। इस तरह के तानें माधवी देसाई के हिस्से में भी आये। वे लिखती हैं, “इधर कुछ दिनों से उनके स्वभाव में कुछ बदलाव नज़र आ रहा था। जब तक मैं घर में थी, तब तक वे सब संभाल लेते थे। मेरी गलतियाँ, मेरा आलस! पर जैसे ही मैं नौकरी करने लगी, वैसे ही वे मेरे बर्ताव-बोलने में कहाँ बदलाव आया है, इसकी ओर अत्यंत बारीकी से नज़र रखे हुए थे।‘घर की फर्श पर दाग है। बाथरूम साफ नहीं है। लड़कियों के युनिफार्म इस्त्री नहीं किये हुए हैं, आज मछली की सब्जी में मिर्च कम थी, डब्बे में चपातियाँ कड़क थी--’ आदि छोटी-छोटी शिकायतें होती रहती थीं।” कामकाजी महिलाओं को घर और कार्यस्थल पर काम करना पड़ता है, लेकिन पुरुष केवल कार्यस्थल पर ही काम करते हैं। माधवी देसाई सबेरे चार बजे उठकर घर का काम करती थीं, फिर स्कूल से चार बजे आकर घर को सम्भालती थीं। इतना सब करते हुए भी कोई-न-कोई नुस्क उनके काम को लेकर पति निकालता ही था। यह सारी आत्मकथाकार अपना कामकाज करते हुए घर सम्भाल रही थीं, साथ ही में वे लेखन कार्य से भी जुड़ी हुई थी। वे एक ही साथ इतनी सारी जिम्मेदारियों को निभा रहीं थीं। हम अपने समाज में देखते हैं कि जब पुरुष नौकरी करता है, तब वह केवल अपने कार्यस्थल पर ही कार्य करता है। घर का सारा काम पत्नी के जिम्मे होता है। लेकिन जब पत्नी और पति दोनों के नौकरी पेशा होते हैं, तो घर का काम पत्नी के जिम्मे ही होता है। हम कहते हैं कि नौकरी करने से स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाती है। सुशीला टाकभौरे के बारे में यह तथ्य झूठ साबित होता नज़र आता है। जिसमें उन्होंने बाद में सुधार किया। सुशीला जी अपना पूरा वेतन अपने पति को दे देती थीं, और कॉलेज जाने के किराये के लिए अपने पति के सामने हाथ फैलाने पड़ते थे। इस तरह आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर भी वे स्वतंत्र नहीं थी। कार्यस्थल पर भी इन स्त्रियों को स्त्री होने के कारण अपमान सहना पड़ता है। इनका इस तरह श्रीनगर रेडियो से कान्ट्रक्ट खतम हो गया। कार्यस्थल पर सुरिदंर जैसा दोस्त भी मिला, जिसने हर संकट में पद्मा जी की सहायता की और पद्मा जी के अतीत को जानते हुए भी उनके साथ विवाह किया। प्रभा खेतान के लिए उनका व्यापार पैसे से ज्यादा मायने रखता है, वे व्यापार की व्यस्तताओं के कारण ही जीवन की अन्य समस्याओं से कुछ समय के लिए दूर रहती हैं, इसलिए उनके लिए व्यापार केवल पैसा कमाने का माध्यम भर नहीं है। मराठी स्त्रियों को भी कार्यस्थल और कामकाजी स्त्री होने के कारण घर पर भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। स्त्री होने के कारण कार्यस्थल पर उसके कार्य क्षमता पर सवाल उठाये जाते हैं, उसका लैंगिक शोषण करने के लिए अनेक प्रकार के षडयन्त्र रचे जाते हैं। उनको ब्लैकमेल किया जाता है। कामकाजी स्त्री केवल कार्यस्थल पर ही काम नहीं करती है, तो उन्हें घर भी सम्भालना पड़ता है। यानी दो जगह काम करना पड़ता है। इतनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी पति और अन्य घर वालों से जिस सहायता की अपेक्षा होती है, वह मिल नहीं पाती है। इस तरह के माहौल में, दो पाटों के बीच पिसते हुए भी इन स्त्री लेखिकाओं ने अपना लेखन कार्य निरंतर जारी रखा। 3.16 राजनीति और स्त्री राजनीतिक गलियारों में महिलाओं की आवाज़ अभी गूंजनी है। भारत में स्त्रियों की संख्या लगभग पुरुषों के बराबर है, फिर भी राजनीति में आँकड़े स्त्री के विरुद्ध दिखाई देते हैं। केवल चार या पाँच प्रतिशत सीटों पर महिलाएँ दिखाई देती है। गाँव में स्त्री के सरपंच होने पर भी उसका पति ही सारा कार्य करता है। स्त्री सरपंच केवल रब्बर स्टैम्प बनकर रह जाती है। महिलाओं को राजनीति में लाने के वादे तो हर राजनीतिक पक्ष करता है, पर ये वादे पूरे कोई नहीं करता है। दिल्ली आजतक के अनुसार, “हकीकत ये है कि महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के दावे खोखले हैं। अगर कहा जाए दिल्ली की राजनीति काफी हद तक देश की राजनीति का आइना है तो गलत नहीं होगा। इसी आइने को देखकर ये तो पता चलता है कि दिल्ली की राजनीति में महिलाओं की लगातार उपेक्षा हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली की विधानसभा में इस समय महिलाओं की भागीदारी केवल 4.28 फीसदी है और इससे ज्यादा शर्मनाक बात ये है कि आज से 20 साल पहले भी विधानसभा में इनका प्रतिशत इतना ही था। महिलाएं हर चुनौती को मात देती आगे बढ़ रहीं हैं, लेकिन मात खा रही हैं राजनीति की बिसात पर। यही दिल्ली की राजनीति की कड़वी सच्चाई है।” यह हाल केवल दिल्ली की राजनीति का ही नहीं है, यह तो पूरे भारत की राजनीति का चित्र प्रस्तुत करता है। महिलाओं को कुछ पुरुष राजनीति के योग्य नहीं मानते हैं। वे उनका दायरा घर के चुल्हे तक ही सीमित रखना चाहते हैं। स्त्रियाँ निर्णय लेने में अक्षम होती हैं, उन्हें राजनीति के दाँव पेंच नहीं आते हैं। राजनीति में अपना घर-द्वार छोड़कर इधर-उधर दौडना पड़ता है, ये सब बातें स्त्रियों के बस की नहीं हैं। इस तरह के अनेक सवाल उनके खिलाफ खड़े करके स्त्रियों को राजनीति से हमारा समाज दूर ही रखता आया है। पुरुष सत्ता को छोड़ना नहीं चाहता है, जिसके परिणामस्वरूप संसद में महिलाओं के आरक्षण का विधेयक आज तक पास हो नहीं पाया है। इन स्त्री आत्मकथाकारों में रमणिका गुप्ता और सरोजिनी बाबर ने दिखा दिया है कि स्त्रियाँ भी राजनीति में सक्रिय रूप से हिस्सा ले सकती और सफल भी हो सकती हैं। रमणिका गुप्ता को स्त्री होने के कारण राजनीति में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने बहुत ही नजदीक से राजनीति के गलियारों में पुरुष राजनीतिज्ञों के व्यवहार को देखा है। वे लिखती हैं, “राजनीति में आए नेताओं का औरतों के प्रति अजीब-सा रवैया होता है। अगर स्त्री उनकी पेशकश को ठुकरा दे और उन्हें टका-सा जवाब दे दे तो वे उसके विरुद्ध चरित्रहीनता का प्रचार करने लगते हैं। राजनीति में औरतों को जलील करने की सोची-समझी परम्परा है कि जिसको इनकार करो वही यह कहते हुए घूमने लगता है- “ मेरे तो पीछे पड़ी थी, बड़ी मुश्किल से मैंने दूसरे को सौंपकर उससे पीछा छुड़ाया है।”” इस तरह की अनेक बातों का सामना करते हुए राजनीति में आगे बढ़ना पड़ता है। रमणिका गुप्ता अच्छी तरह जान गई थी कि पुरुष सदस्य जुझारू औरतों को बर्दाश्त नहीं करते हैं। ऐसी स्त्रियों को बेशर्म होकर अपनी माँगे रखनी पड़ती है। एक बार की ऐसी ही घटना को बताते हुए रमणिका गुप्ता ने लिखा है, “बहुत थेथर (बेशर्म) भी होना पड़ता है स्त्री सदस्य को। पुरुष सदस्य भीतर-भीतर जुझारू औरतों को बर्दाश्त नहीं करते। मुझे याद है एक बार पूरा विपक्ष सदन के ‘वैल’ मे था, कर्पूरी जी भी थे, मैं भी थी। मैं टेबल पर चढ़कर अपनी बात कह रही थी क्योंकि नीचे खड़े होने पर भीड़ में भिंच जाने का खतरा था। इसी बीच सत्तादल ने अपनी रणनीति बदली। वे भी सीटों से उठकर विपक्षी सदस्यों के गिर्द खड़े होकर नारेबाजी करने लगे। गर्मागर्म बहस शुरु हो गई और इसी बीच रघुनाथ झा(जो उन दिनों कांग्रेस पार्टी में थे। बाद में वे समता पार्टी के अध्यक्ष और सांसद बने और अभी राजद के सांसद हैं) मुझे सम्बोधित कर ताली बजा-बजाकर कहने लगे,”नाच नचनिया नाच।” ” यहाँ हम देखते हैं कि किस तरह एक पुरुष सांसद ने रमणिका गुप्ता के स्त्री होने को अपमानित किया है। होना यह चाहिए था कि अगर रमणिका गुप्ता ने कुछ सवाल किये हैं, तो उन सवालों को तर्कपूर्ण उत्तर दे, न कि उसके स्त्री होने को अपमानित करें। इस तरह के अनेक अपमानों को रमणिका गुप्ता ने सहा है। पर वे कभी पीछे नहीं हटी। रमणिका गुप्ता ने राजनीति में बहुत कुछ सहा है, उन्होंने अपना शरीर तक राजनीति में दाँव पर लगा दिया। वे इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं मानती है। वे लिखती हैं, “वैसे राजनीति में मुझे कई नेताओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध को लेकर काफी मतभेद हो जाता रहा है। मैंने भी डटकर उन परिस्थितियों का मुकाबला किया। मैंने कभी अपने यौन-शोषण का आरोप किसी पर नहीं लगाया चूँकि मैं या तो उसमें भागीदार रही या विरोध में डटी रही। कुछ हुआ भी तो मैंने अपनो को हतोत्साहित नहीं होने दिया।” रमणिका गुप्ता ने अपना शरीर तक राजनीति के नाम कर दिया था। रमणिका गुप्ता ने राजनीति में आनेवाली महिलाओं के लिए कुछ हिदायते दी हैं, ये उनके अपने जीवन के अनुभव ही है। क्योंकि राजनीति को गंदी क्यों कहा जाता है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव रमणिका गुप्ता को है, लेकिन वे कभी इस रण से भागी नहीं है। वे राजनीति में स्त्री की छवि और स्थिति को लेकर लिखते है कि, “राजनीति और समाज-सेवा में आत्मविश्वास, हौसला, निडरता और हठ जरूरी चीजें है। एक औरत को आगे बढ़ने के लिए ‘थेथर’ होना भी जरूरी है। ‘थेथर’ का मतलब संवेदनारहित नहीं बल्कि पूर्णतया संवेदनशील होते हुए विपरीत स्थितियों मे डटे रहना है – आरोपों, कलंकों और घटनाओं-दुर्घटनाओं तथा ज्यादतियों को झेलते हुए, अपने रास्ते चलते रहना और संकल्प-शक्ति तथा इच्छा शक्ति का बल बनाए रखना ही है। इसका मतलब खुद को अपनों की बेरूखी सहने को भी तैयार रखना, हँसते-हँसते कुत्सित व्यंग, कुटिल मुस्कानें, द्विअर्थी वाक्य पचाने की आदत डालना और कभी-कभी दूसरों के वाक्यों को देनेवाले भी बहुत मिलते हैं राजनीति में-खासकर औरतों को। उनकी नीयत को पहचानना और सब सुन-सुनकर, अपने फैसलों पर अडिग रहना ही अगर ‘थेथरपन’ है तो वह राजनीति में स्त्रियों के लिए लाजिमी है। ‘सुनो जग की, करो मन की’ सूक्ति को पूर तरह चरितार्थ करना जरूरी है।” इन कुटिल मुस्कानों, द्विअर्थी वाक्यों को सहते हुए जो औरत राजनीति में टिकी रहती है, वह उसकी अपनी सहनशक्ती के कारण ही। इस तरह उसे धीरे-धीरे प्रतिष्ठा मिलने लगती है। ऐसी औरतों के बारे में रमणिका गुप्ता ने लिखा है, “राजनीति में देर तक टिक जानेवाली औरतों को उनकी सहन-शक्ति के कारण ही एक प्रतिष्ठा मिल जाती है। वे एक ऐसे स्तर पर पहुँच जाती हैं जहाँ औरत का लिंग या व्यक्ति गौण हो जाता है। उसका सामाजिक रूतबा एक सामूहिक रूप ले लेता है। औरत का व्यक्तित्व अपने इर्द-गिर्द एक करिश्मा बनाए रखता है। इन करिश्मों का प्रभामंडल, आतंक अथवा भय दूसरों पर छा जाता है जो उसे सुरक्षित रखने में सहायक होता है।” रमणिका गुप्ता के यह अनुभव केवल उन तक सीमित नहीं रहते हैं, राजनीति में भाग लेने वाली स्त्री के हिस्से में इस तरह के अनुभव आते ही है। राजनीति में आने वाली स्त्री का अपमानित और हतोत्साहित करने के हुन्नर में हमारे पुरुष राजनीतिज्ञ माहिर हैं। इनके फिकरों को जवाब देते हुए, उसको वहाँ डटकर खड़ा होना चाहिए। तभी स्त्रियों की राजनीति में स्थिति सुधरेगी तथा इस तरह की जुझारू स्त्रियों को देखकर अन्य स्त्रियों का भी आत्मबल बढ़ेगा। आज भी हमारा समाज स्त्री के राजनीतिक क्षेत्र में जाने के पक्ष में नहीं है। पुरुष प्रधान समाज ने नारी के हिस्से में चुल्हा और बच्चा ही दिया है, वहीं तक उसका अधिकार क्षेत्र सीमित किया है। बाहरी काम स्त्री नहीं कर सकती है, बाहरी काम पुरुषों के लिए होते हैं। ऐसी मान्यताएँ भी हमारे समाज में हैं। लेकिन इन सब मान्यताओं के बावजूद भी आज राजनीति में आई स्त्रियों ने अपने कार्यों से सबको चौंका दिया। सरोजिनी बाबर भी इन्हीं स्त्री राजनितिज्ञों में से एक है। सरोजिनी बाबर को उनके पिता से हमेशा प्रोत्साहान मिला। जिसके कारण उनके भीतर हमेशा आत्मविश्वास पनपा। वे लिखती हैं, “अपने ही तरह अपनी लड़की को किसी एक काम में ध्यान देना चाहिए और हिस्से में आई जिम्मेदारी को निभाना चाहिए, यह हमारे अण्णा(पिता) की दिल से इच्छा होने के कारण मैं स्त्री हूँ तो ऐसा काम कैसे कर पाऊँगी? इस तरह का भय या शंका मेरे मन में कभी नहीं आयी। उसी तरह जो काम पूरा करने के लिए हाथ में लिया है, उसके बारे में कौन क्या बोलेगा इसकी भी मुझे चिंता करने का मन नहीं होता था।” सरोजिनी बाबर इसी सूत्र को लिए आगे बढ़ती हैं। सरोजिनी बाबर अपाहिज थीं। लेकिन इसकी उन्होंने कभी परवा नहीं की। वे पिता के कहने पर चुनाव में खड़ी हो जाती हैं। यह आज़ाद भारत का पहला चुनाव था। चुनाव जीतने के लिए अनेक हथकंडे इस्तेमाल किये जाते थे। जिसमें विरोधी पक्ष के नेता की जान भी लेने के लिए लोग तैयार बैठे हुए थे। सरोजिनी जी का एक पैर पोलियो के कारण अपाहिज हो चुका था, और उसपर प्लास्टर भी चढ़ा हुआ था, इस दशा में उनको रोज दूर-दराज़ के गाँव जाने के लिए सफर करना पड़ता था। रस्ते खस्ताहाल थे। वे लिखती हैं, “चुनाव के आरंभ में कोल्हापुर में एक स्टूल से गिर जाने से एड़ी की हड्डी टुट गयी थी और बायें पैर पर प्लास्टर चढ़ गया था। इस कारण यात्रा के लिए निकलते समय कोई तो मुझे उठाकर कार में रखता था और सभा में मंच पर कुर्सी में रखता था।” ऐसी विपरीत हालत में भी दूर-दराज के गाँवों जाकर सभाओं को सम्बोधित करती थीं। वे अपनी प्रचार सभाओं के बारे में लिखती हैं, “प्रचार सभाओं में भारी भीड़ जमा होती थी। एक तो मुझे सुनने के लिए और दूसरी बात पार्टी को समर्थन देने के लिए। मेरे शिक्षित होने के कारण लोगों में मुझे देखने की उत्सुकता होती थी। और स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण उनके मन में मेरे प्रति आदर भाव था।” इस तरह उन्होंने चुनाव के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। अचानक एक दिन प्लास्टर टूट गया और दर्द से कराह उठीं। ऐसी हालत में भी चुनाव के प्रचार में नियमित जाती रही। सरोजिनी बाबर चुनाव जीतकर विधायक बन जाती हैं। यहीं पर उनकी परीक्षा समाप्त नहीं होती है, अभी तो राजनीति का एक पड़ाव पार किया था। विठ्ठल भगवान के दर्शन लेने के लिए उन्हें व्ही.आई.पी. ट्रीटमेंट मिली थी, लेकिन उनको अपनी यह भूल जल्द ही समझे में आती है और उन्होंने उसी समय ठान लिया था कि वे जनता के सुखदुख के लिए इस तरह अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं करेगीं। इन्होंने लोगों के बीच जाकर काम किया। अपने पार्टी के लोगों को गलत काम करने पर डाँटा। वे आगे चलकर सांसद भी बनी। राजनीति के कारण उनके अपने रचनात्मक कार्य की उपेक्षा हुई, पर राजनीति के कारण ही वे लोकसाहित्य की किताबों का प्रकाशन और लोकार्पण भव्य समारहों में कर पाईं। वे खुद जानती हैं कि राजनीति में न होती तो, केवल लेखिका सरोजिनी को कोई नहीं पहचानता। न वे साहित्य संस्कृति मंडल की अध्यक्षा बनती। इस तरह हम देखते हैं कि सरोजिनी बाबर एक स्त्री और वह भी अपाहिज होने पर राजनीति में तब आती जब भारत के राज्यों में प्रथम बार चुनाव होने लगता है। चुनाव में गलाकाट प्रतिस्पर्धा थी। इन सबका सामना धैर्य से करते हुए वे चुनाव जीत जाती हैं। केवल चुनाव ही नहीं जीतती हैं, लोगों के लिए काम भी करती हैं। स्त्री को राजनीति में आने का मौका दे, तो वह अपने आपको सिद्ध करने की क्षमता रखती हैं। इन दोनों स्त्रियों में रमणिका गुप्ता को राजनीति में अपनी नींव को मजबूत करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा, सरोजिनी बाबर को राजनीति में उतना संघर्ष इसलिए नहीं करना पड़ा क्योंकि वह जिस मराठा जाति से आती हैं, उस जाति के ज्यादात्तर बड़े नेता महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय हैं। रमणिका गुप्ता को राजनीति के लिए अपना शरीर तक दाँव पर लगाना पड़ा। निष्कर्ष इस तरह इन सभी हिन्दी-मराठी स्त्री रचनाकारों की आत्मकथाओं का अध्ययन करने पर कुछ निष्कर्ष निकले हैं। वे इस प्रकार हैं- बहुत सारी स्त्रियों के जीवन में उनके बचपन की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। बचपन के कुछ अच्छे प्रसंग जो इनको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं, वहीं बचपन की कुछ ऐसी घटनाएँ जिन्होंने इनके जीवन को नकारात्मक रुप से प्रभावित किया, वे उनका साये की तरह जिन्दगी भर पीछा करती हुए नज़र आती हैं। स्त्री शिक्षा को लेकर हमारा समाज आज भी उदासीन है। स्त्री शिक्षा को लेकर उदासीन मानसिकता पूरे देश भर में है। कुछ लोगों ने अपनी लड़कियों को शिक्षा का अधिकार केवल अच्छा वर पाने के लिए ही दिया। स्त्री को शिक्षित करने का मतलब केवल विवाह योग्य बनाना है, उसको शिक्षित कर उसका विकास करना नहीं है। स्त्रियों को उच्च शिक्षा के लिए कभी प्रेरित नहीं किया जाता हैं, क्योंकि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियों को विवाह के लिए लड़के नहीं मिलते हैं, या लड़के ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की से शादी नहीं करना चाहते हैं। इसलिए लड़की के घरवालों के सामने लड़की की शिक्षा से ज्यादा उसके विवाह की फिक्र होती है। स्त्रियों को शिक्षा के स्तर पर भी लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। जहाँ लड़कों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजा जाता हैं, वहीं स्त्रियों को अपना कोर्स चुनने की आज़ादी भी नहीं होती है। आचार्य अत्रे जैसे कुछ पिता अपनी लड़की को पढ़ने के लिए विदेश भेजना चाहते हैं। लेकिन स्त्री शिक्षा के बारे में ऐसा सोचने वाले कम ही लोग मिलते हैं। गाँधी जी और आर्य समाज का योगदान स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में देखने को मिलता है। गाँधी और आर्य समाज से प्रभावित घरों में स्त्री शिक्षा को महत्व दिया गया। स्त्रियों का मानसिक अनुकूलन केवल घर के लोग ही नहीं करते हैं, पूरा समाज एक लड़की के भीतर स्त्रियोचित गुण भरने में लगा रहता है। पुरुष सापेक्ष मूल्य के अनुसार स्त्रियों को बनाया जाता हैं। इस प्रक्रिया में स्त्रियाँ प्यार से मान जाती हैं, तो ठीक नहीं तो मारपीट का भी सहारा लिया जाता है। जिस स्त्री में स्त्रियोचित गुण नहीं होते हैं, उस स्त्रियों को समाज द्वारा अपमानित किया जाता है। उस पर व्यंग्य बाणों का चारों ओर से हमला होने लगता है। इन्हीं सब बातों से बचने के लिए स्त्रियाँ न चाहते हुए भी वह सब करने लगती हैं, जो पितृसत्तात्मक समाज के अनुकूल हो। इस तरह के अनुकूलन के उदाहरण बच्चों के खेल में भी देखने को मिलते हैं। स्त्रियों को बचपन से ही लैंगिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। लैंगिक भेदभाव भारत के ग्रामीण क्षेत्र से लेकर शहरी क्षेत्र तक और अनपढ़ से लेकर पढ़े-लिखे लोगों तक फैला हुआ है। यह हर जगह दिखाई देता है। लैंगिक भेदभाव घर, स्कूल, कामकाज की जगह, खान-पान, खेल, शिक्षा हर कहीं दिखाई देता है। भेदभाव करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। मासिक धर्म को लेकर हमारे धर्म में अनेक धारणाएँ बनी हुई है। मासिक धर्म के समय स्त्री को घर से बाहर बिठा दिया जाता है, उसे अचार छूने की मनाही होती है, मासिक धर्म के समय अचार छूने से खराब हो जाता है, ऐसी धारणाएँ हमारे समाज में बनी हुई है। इससे बड़ी भ्रामक धारणा यह है कि इस समय पुरुष के स्पर्श मात्र से स्त्री गर्भवती हो जाती है। इस तरह की अनेक भाम्रक धारणाओं के कारण कई बार हास्यस्पद स्थितियाँ निर्मित होती हैं। स्त्री शरीर में उम्र के साथ होने वाले बदलाव के कारण होने वाली प्राकृतिक क्रिया को स्त्री के सर पाप बनाकर मढ़ देना, हमारे ही महान समाज में हो सकता है। मासिक धर्म के समय जो बंधन स्त्री पर कसे जाते हैं, उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं हैं। यह बस पितृसत्ताक समाज में स्त्री को बंधन में रखने के अनेक प्रकारों में से एक प्रकार है। हमारा पढ़ा-लिखा समाज अभी-अभी इसे मात्र एक स्त्री शरीर में होनेवाला स्वाभाविक बदलाव मान रहा है। इन सब भ्रामक धारणाओं से बचने के लिए सही समय पर सही सेक्स ऐज्यूकेशन देना जरूरी है। मलिका अमर शेख ने मासिक धर्म के बारे में पढ़ा था, इस कारण मासिक धर्म के समय वे एकदम सामान्य थी। स्त्री आत्मकथाकारों में से कुछ ने प्रेम किया और प्रेम विवाह भी किया। इन सभी प्रेमकहानियों में स्त्रियों का पूरा समर्पण देखने को मिलता हैं। स्त्रियों ने अपने प्रेमी के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ कोई संबंध नहीं रखा, लेकिन कुछ पुरुषों के एक से ज्यादा स्त्रियों के साथ संबंध थे। अपनी प्रेमिका से प्यार भरे संबंधों को जीवनभर निभाने का वादा करने वाले प्रेमी विवाह के बाद पति की भूमिका निभाते हुए दिखाई देता हैं। प्रेमी के रूप में मुक्ति की बातें करने वाला पुरुष पति बनते ही पितृसत्तात्मक समाज के नियमों का पाठ पढ़ाने लगता हैं। इस तरह प्रेम जो बंधनों से मुक्ति की बात करता है, वही प्रेम, विवाह के बाद पितृसत्तात्मक बंधनों में जकड़ता है। जिन स्त्रियों ने प्रेम नहीं किया उन्होंने भी विवाह और अपने भावी पति को लेकर बहुत सारे सपने संजोये थे। कुछ एक स्त्रियों के इस तरह के सपने पूरे हो पाये हैं। पुरुष पढ़ा-लिखा या साहित्यकार होने पर भी अपने पुरुषवादी संस्कारों को भूला नहीं था। ज्यादात्तर पुरुष अपने जिम्मेदारियों से भागता हुआ नज़र आता है। स्त्रियाँ कामकाजी ही होती हैं, क्योंकि घर संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं की होती हैं। कामकाजी स्त्रियों को कार्यस्थल पर अनेक समस्याओं का सामना स्त्री होने के कारण करना पड़ता है। पुरुष सहकर्मी स्त्री की कार्य क्षमता पर सवाल उठाने लगते हैं। उनका लैंगिक शोषण करने के लिए लालायित होते हैं। कई जगह स्त्रियों को ब्लैकमेल करने का भी प्रयत्न किया जाता हैं। कुछ नौकरी पेशा स्त्री का अपने कमाये हुए पैसों पर भी अधिकार नहीं होता है। उनको अपना वेतन पति को देना पड़ता है, और खर्चे के लिए रोज़ पति के सामने हाथ फैलाना पड़ता है। कुछ समय तक सुशीला टाकभौरे के साथ भी ऐसा ही हुआ, लेकिन बाद में सुशीला जी ने अपना वेतन पति को देना बंद कर दिया। कामकाजी स्त्रियाँ केवल कार्यस्थल पर ही कार्य नहीं करती अपितु, घर की भी जिम्मेदारियों को निभाती हैं। सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर रात में बचे हुए समय में रचनात्मक कार्य में जुट जाती हैं। राजनीति से जुड़ी स्त्री को कलेवा कहा जाता है। जिसका कोई भी उपभोग कर सकता है। राजनीति से जुड़ी रमणिका गुप्ता को अपना शरीर तक दाँव पर लगाना पड़ा। सरोजिनी बाबर को स्त्री होने के कारण किसी ने अपमानित नहीं किया, क्योंकि उनको मराठा जाति के बड़े नेताओं का साथ था। लेकिन रमणिका गुप्ता पर हमले तो हुए ही, साथ ही स्त्री होने के कारण पार्टी के लोग अपनी वासना पूर्ति के लिए इस्तेमाल करना भे चाहते थे। इसीलिए रमणिका गुप्ता ने कहा था कि राजनीति में स्त्री को थेथर यानी बेशरम होकर जीना पड़ता है। लगभग सभी हिन्दी और मराठी महिला आत्मकथाकारों के पति अच्छे पढ़े-लिखे थे। कुछ तो साहित्यकार भी थे। इन पुरुषों ने अपनी पत्नियों के साथ घरेलू हिंसा के अंतर्गत केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं कि बल्कि मानसिक और आर्थिक रुप से कमज़ोर करने की हर संभव कोशिश की है। कुछ पुरुष अपनी पत्नियों को समाज के सामने बदमान करने या अपनी पत्नी का किसी अन्य पुरुष के साथ नाम जोड़ने से भी बाज़ नहीं आये। जहाँ कहीं लगा कि स्त्रियाँ उनसे ज्यादा प्रगति करने वाली है, वहाँ किसी न किसी प्रकार की हिंसा द्वारा उनके कदमों को पीछे खिंचने का काम पतियों ने किया। कहीं-कहीं तो पुरुष अपने पौरूष्य को दिखाने के लिए भी उनके साथ हिंसा करता हुआ नज़र आता है। कृष्णा अग्रिहोत्री के साथ उनके पहले पति ने ही कई बार बलात्कार किये। इस तरह की हिंसा हर वर्ग और वर्ण के स्त्रियों के साथ हुई है। कुछ पुरुषों में समय के साथ बदलाव आये भी हैं, ऐसे पुरुषों ने अपने पत्नियों के कार्य को सराहा भी है। इस तरह के उदाहरण हमारे समाज में कम ही दिखाई देते हैं। इस तरह के बर्ताव के कारण स्त्रियों के जिन्दगी को अकेलापन,अवसाद, भय आदि बातें घेर लेती हैं। लगता हैं कि अकेलापन भारतीय स्त्री जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गया हैं। इसकी जड़े पितृसत्तात्मक समाज में हैं। पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों को खुलकर जीने की या कुछ कहने की आज़ादी नहीं देता हैं। इस तरह वे घुटन का शिकार होती ही जाती हैं। इस अवस्था में ज्यादात्तर स्त्रियाँ आत्महत्या करने का प्रयत्न करती हैं। इस तरह की अवस्था से उबरने के लिए स्त्रियाँ रंगमंच, लेखन, नौकरी या व्यापार में अपना समय बिताने लगी। अपनी भावनाओं को रचना में अभिव्यक्त कर मुक्ति का अहसास होने लगा। इस तरह व्यापार, लेखन या रंगमंच से जुड़कर अपने अकेलेपन को कुछ समय के लिए दूर कर पायी। हमारे पितृसत्तात्मक समाज को लगता हैं कि पिता के घर से लड़की की डोली उठे और पति के घर से अर्थी। अर्थी से पहले अगर वह स्त्री किसी कारणवश पति का घर छोड़ती है, तो उसके साथ हमारा समाज बदसलूकी करता है। पितृसत्तात्मक समाज चाहता है - विवाह के बाद स्त्री पर कितने भी अत्याचार हो, वह पति का घर न छोड़े, चाहे उसे अपनी जान क्यों न देनी पड़े। तलाकशुदा स्त्री को साथ हमारा समाज एक विचित्र नज़र से देखता है। जितना पवित्र विवाह बंधन को माना जाता है, उतना ही अपवित्र इस बंधन को तोड़ने को माना जाता है। चाहे इस विवाह बंधन में स्त्री घुटन भरी जिन्दगी जीते हुए अपनी जान ही क्यों न दे दे। तलाकशुदा स्त्री के प्रति दो तरह का बर्ताव किया जाता हैं। वह अगर जवान है, तो उसे सबके लिए ‘अव्हलेबल’ माना जाता है। तलाक शुदा स्त्री के प्रति कुछ लोग ज्यादा ही सहानुभूति दिखाते हैं। तलाकशुदा स्त्री के बारे में हमारा समाज एक और धारणा बनाये हुए है, एक तलाक शुदा स्त्री चिढने वाली, निराश, हताश या आक्रमक या मारने-पिटने वाली होगी या गरीब-बेचारी, असहाय, जिस पर अन्याय हुआ है, ऐसी होनी चाहिए। उसका इस तरह का चरित्र हम लोग गढ़ लेते हैं। इन सबके कारण उसका एक मनुष्य के रूप में जीना मुश्किल हो जाता है। तलाकशुदा स्त्री को उसके मायके में भी इज्जत नहीं मिलती है। माता-पिता के लिए अविवाहित बेटी बोझ होती हैं, उसका विवाह कर माता-पिता अपने आपको धन्य मानते हैं। वही बेटी विवाह के बाद तलाक लेकर घर आती हैं, विधवा स्री का हाल भी लगभग तलाकशुदा स्त्री की तरह ही होता है। विधवा अगर जवान है, तो हमारे समाज के पुरुष उसकी हर तरह से मदद कर उससे शारीरिक संबंध स्थापित करना चाहते हैं। जिसका अनुभव माधवी देसाई को होता है। माधवी देसाई के पति के मित्र मदद के नाम पर हर तरह की मदद देने की बात करते हैं। जिसके बाद से माधवी किसी मदद लेना नहीं चाहती हैं। माधवी देसाई ने विधवा होने का और कुछ समय बाद तलाक शुदा होने का दोहरा दुख भी भोगा है। माधवी देसाई को पता था कि तलाक के बाद की जिन्दगी कितनी बदत्तर होगी, समाज ऐसी स्त्री को स्वीकारेगा नहीं, पिता की इज्जत भी मिट्टी में मिल जायेगी, इन सब बातों को ध्यान में रखकर कि तलाक न हो, इसका वह भरसक प्रयत्न करती हैं। दलित स्त्री को अपने दोनों गालों पर थप्पड़ खानी पड़ती है। एक गाल पर स्त्री होने के कारण तो, दूसरे गाल पर दलित होने के कारण। सुशीला टाकभौरे और उर्मिला पवार के जीवन में काफी समानताएँ है। दोनों के माता-पिता को लगता हैं कि अपनी बेटी पढ़े। दोनों के माता-पिता ने अपनी बेटियों को हमेशा पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। शुरुआत में दोनों ने भी अभावों भरा जीवन जिया। इन दलित स्त्रियों को बचपन से ही दलित होने के कारण अपमानित होना पड़ता है। दलित होने के कारण जातियता का दंश आजीवन झेलना पड़ता है। दलित स्त्रियाँ पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करने लगी, फिर भी इन दोनों को सम्मान की दृष्टि से सह कर्मचारी नहीं देखते थे। घर पर स्त्री होने के कारण सुशीला जी के साथ उनके पति शारीरिक और मानसिक हिंसा भी करते हैं। उर्मिला पवार ने हरिश्चन्द्र के साथ प्रेम विवाह किया था, लेकिन हरिश्चन्द्र विवाह के बाद प्रेमी न रहकर पति बन जाता है, और वही सब चाहता है, जो एक पितृसत्तात्मक समाज में पति अपनी पत्नी से अपेक्षा करता है। इन दोनों स्त्रियों के पति दलित मुक्ति की बात करते हैं, दलित आंदोलनों में हिस्सा भी लेते हैं, पर घर की स्त्री की मुक्ति के बारे में कभी सोचते नहीं है। इन सब विपरित परिस्थितियों का सामना करते हुए, ये स्त्रियाँ अपने बलबुते पर विदेश की यात्राएँ भी करती हैं, और इनके साहित्य को विभिन्न पुरस्कारों द्वारा नवाज़ा भी जाता है। इस तरह इन सभी स्त्री आत्मकथाओं में पुरुष सापेक्ष मूल्यव्यवस्था का दर्शन होता हैं। लड़की होने के कारण हमारा समाज उस पर विशेष संस्कार बचपन से थोपता आता है। स्त्री के हिस्से में आया दोयम दर्जे का बर्ताव भी इन आत्मकथाओं में रेखांकित किया गया है। स्त्री को पुरुष सापेक्ष बनाने की हर संभव कोशिश की जाती हैं, उसके हिस्से में भी पुरुष सापेक्ष भूमिका ही आती हैं। आज भी जहाँ स्त्री मुक्ति और समानता की बात की जाती हैं, उसी समाज में पति-पत्नी संबंधों में मित्रता की जगह श्रेष्ठता और कनिष्ठता का बोध किया जाता है। पति अपने अधिकारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से ज्यादा सजग दिखाई देता है। जिस स्त्री को अपने मनुष्य होने का अहसास होने लगता है, या अपने अस्तित्व का ज्ञान होता है, उस स्त्री को समाज घुटन भरी जिन्दगी जीने के लिए मजबूर करता है, जिससे पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध कोई आवाज़ न उठाये। जो पति-पत्नी संबंध मित्रता, एक दूसरे के सहकार्य पर टीका हुआ है, वह जीवन संतुष्ट होता है। दलित स्त्री का व्यक्तिगत और जाति गत स्तर पर शोषण होता है। इन दलित स्त्रियों ने अपनी शिक्षा का उपयोग दलितों का जीवन सुधारने में किया है। पद्मा सचदेव और सुशीला टाकभौरे का महाराष्ट्र के दो शहर मुंबई और नागपुर में आकर अपने मनुष्य होने का अहसास होता है। पद्मा सचदेव के शब्दों में कहे तो, मुंबई में आकर खुली हवा में जीने का अहसास होता है। वे मुंबई के बारे में लिखती हैं, “पहली बार मनुष्य होने का अहसास मुझे बंबई में ही हुआ। पुरुष भी मित्र हो सकता है, उससे बात की जा सकती है, ये भी मैंने बंबई में ही जाना। इस शहर ने मेरे लिए सफलता के द्वार खोले थे। यहाँ मैंने बहुत अच्छे दिन बिताये। सम्मान, स्नेह सभी मिला। बंबई की सबसे बड़ी खासियत है, यहाँ स्त्री को भी मनुष्य समझा जाता है। रात को बारह बजे भी जरूरी जाना पड़े तो अकेली जा सकती है। किसी मोड़ पर भी कोई ठिठककर खड़ा नहीं होता। न कोई घूरकर देखता है। उत्तर भारत में इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। सड़क पर जाओ तो कई जोड़ी आँखें सर्चलाइट की तरह आपका पीछा करती हैं। ये आँखें जोकों की तरह जिस्म पर चिपक जाती हैं। इससे मुझे कोफ्त होती है और नफरत से भर उठने के साथ-साथ अपमान का बोध भी होता है कि स्त्री ने ऐसा क्या किया है, जिससे ये लोग इस तरह का व्यवहार करते हैं।” इस तरह मुंबई ने पद्मा सचदेव को एक मनुष्य के रूप में पहचान दिलाई, वे यहाँ खुलकर जीवन जीने लगी थी। पद्मा सचदेव की तरह ही सुशीला टाकभौरे ने नागपुर आकर ऐसा ही महसूस किया, क्योंकि उनके व्यक्तित्व निर्माण में उनके पति और नागपुर का बहुत बड़ा योगदान है। नागपुर शहर ने उनमें आत्मविश्वास जगाने का काम किया , वे लिखती हैं कि “नागपुर आने के बाद धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया। अब इतना आत्मविश्वास है कि बड़े से बड़े काम करने की हिम्मत रहती है। आत्मविश्वास ने मुझे सबलता दी है। इस भावना के साथ मैं अकेली यात्राएँ करने लगी।...मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश की अपेक्षा महाराष्ट्र में महिलाओं का अकेले घूमना, अकेले रहना और जरूरत पड़ने पर गलत आचरण करने वाले पुरुषों को धिक्कारकर-फटकारकर आगे बढ़ जाना या सबक सिखा देना आम बात है। इसी हिम्मत के साथ मैं भी यात्राएँ करने लगी।” इन दो उदाहरणों के आधार पर हम यह नहीं कह सकते हैं कि महाराष्ट्र में स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया हैं, यह सुधार केवल शहरों तक सीमित है। क्योंकि गाँव के स्त्रियाँ, स्त्री वाद और स्त्री मुक्ति आंदोलन से कोसों दूर हैं। सुशील पगारिया ने अपनी आत्मकथा में महाराष्ट्र के गाँव की स्त्रियाँ और स्त्री मुक्ति के बारे में इस प्रकार लिखा हैं कि, “स्त्री मुक्ति-स्त्री स्वतंत्रता की संकल्पना आयी, पर वह भी पढ़े-लिखे लोगों तक ही सीमित थी। अगल-बगल के गाँव-देहातों या अर्धनागरी गावों में शोषण अब भी चल रहा है।” इस तरह हमारे पूरे भारत में स्त्रियों की एक जैसी ही स्थिति हैं, जहाँ स्त्रियों का पुरुषसत्तात्मक समाज की परम्परा और मान्यताओं के आधार पर शोषण होता है। शहरों में स्त्री मुक्ति की लहर अब चलने लगी है। जिसे गाँव तक पहुँचने में काफी समय लगेगा। इस तरह इन स्त्रियों में स्त्री मुक्ति और स्त्री-पुरुष समानता के इस समय में कुछ स्त्री आत्मकथाएँ स्त्रीवाद से प्रभावित दिखाई देती हैं। इसी फलस्वरूप वे पितृसत्तात्मक समाज की परम्पराओं और मान्यताओं से सवाल करती हुई नज़र आती हैं। बधिया स्त्री, ले.जर्मेन ग्रीयर, पृ.सं.15 जो कहा नहीं गया, ले. कुसुम असंल, पृ.सं.17-18 वही, पृ.सं.28 लगता नहीं दिल मेरा, ले.कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.28 वही, पृ.सं.29 एक कहानी यह भी, ले.मन्नू भंडारी, पृ.सं.18 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ.,सं 264 वही, पृ.सं.31 वही, पृ.16 वही, पृ.सं.22 वही, पृ.सं.26 पिंजरे की मैना, चन्द्रकिरण सौनेरेक्सा, पृ,सं. 69 कस्तूरी कुंडल बसै, ले. मैत्रेयी पुष्पा, पृ.सं.42 वही, पृ.सं.42 वही,पृ.सं.53 बूँद-बावड़ी, ले. पद्मा सचदेव, पृ.सं.112 शिकंज़े का दर्द, सुशीला टाकभौरे, पृ,सं.14-15 वही, पृ.स.17 कुछ कही कुछ अनकही, ले. शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.17 वही, पृ.सं.17 नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं.22 वही, पृ.सं.23 वही, पृ.सं.26-27 माझ्या आयुष्याची गोष्ट, ले.गिरिजा कीर, पृ.सं.17 माझ्या खुणा माझ्या मला, ले. सरोजिनी बाबर, पृ.सं.4 वडिलांच्या सेवेशी, ले.शिरीष पै, पृ.सं.178 मला उदध्वस्त व्हायचंय्, ले.मलिका अमर शेख, पृ.सं स्त्री:उपेक्षिता ले. सीमोन द बोउवार, अनुवादक- डॉ. प्रभा खेतान, पृ.सं.02 वही, पृ.सं.136 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ.सं.17 वही, पृ.सं.18 पिंजरे की मैना, ले. चंद्रकिरण सौनेरेक्सा वही, पृ.सं.97 कुछ कही कुछ अनकही, ले. शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.307 वही, पृ.सं.307 माझ्या आयुष्याची गोष्ट, ले. गिरिजा कीर, ले.35 वही, पृ.सं.79 वही, पृ.सं.79 नाच ग घुमा, ले.माधवी देसाई, पृ.सं.40 आयदान, ले. उर्मिला पवार, पृ.सं.62 http://www.tahalkanews.com/?q=node/124 आयदान, ले. उर्मिला पवार, पृ.सं.180 बूँद-बावड़ी, ले.पद्मा सचदेव, पृ.सं.40 लगता नहीं दिल मेरा, ले. कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.31 वही, पृ,सं.31-32 जो कहा नहीं गया, ले. कुसुम असंल, पृ.सं. 72-73 एक कहानी यह भी, ले. मन्नू भंडारी, पृ.सं.19 जो कहा नहीं गया, ले. कुसुम अंसल, पृ.सं. 27 वही, पृ.सं.46 कुछ कही कुछ अनकही, शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.22 वही, पृ.सं.22 वही, पृ.सं.52 वही, पृ.सं.14 माझ्या खुणा माझ्या मला, ले. सरोजिनी बाबर, पृ.सं.50 नाच ग घुमा, ले.माधवी देसाई, पृ.सं.121 वही, पृ.सं.121 http://hindi.in.com/showstory.php?id=91114 भारत में नारी शिक्षा, ले. जे.सी. अग्रवाल, पृ.सं.11 से उद्धृत दस्तक जिंदगी की.ले.प्रतिभा अग्रवाल, पृ.सं.34 वही,पृ.सं.90 जो कहा नहीं गया, ले. कुसुम असंल, पृ.सं.25 एक कहानी यह भी, ले. मन्नू भंडारी, पृ.सं. 21 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ.सं.17 कुछ कही कुछ अनकही, ले.शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.30 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.16 वही, पृ.सं.21 आहे मनोहर तरी, ले. सुनीता देशपांडे, पृ.सं.18 माझ्या आयुष्याची गोष्ट, ले.गिरिजा कीर,पृ.सं.35 माझ्या खुणा माझ्या मला, ले. सरोजिनी बाबर, पृ.सं.18 वही, पृ.सं. वही, पृ.सं.50-51 आठवले तसे, ले. दुर्गा भागवत, पृ.सं.08 वडिलांच्या सेवेशी, ले. शिरीष पै, पृ.सं.182 आयदान, ले.उर्मिला पवार, पृ.सं.24 मृदगंध, ले.इंदिरा संत, पृ.सं.131 वही, पृ.सं.131 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ,सं. 39 वही, पृ.सं.40 http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ.सं.215 वही, पृ.सं.215 आयदान, ले.उर्मिला पवार, पृ.सं.102 वही, पृ.सं.103 वही, पृ.सं.105 मला उद्धवस्त व्हायचंय्.ले. मलिका अमर शेख, पृ.सं.23 बिहारी का नया मूल्यांकन, ले. बच्चन सिंह, पृ.सं. 31 जो कहा नहीं गया, ले. कुसुम असंल, पृष्ठ सं.32 वही, पृ.सं. 110 एक कहानी यह भी, ले. मन्नू भंडारी, पृ.सं.40 वही, पृ.सं.56 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ. सं. 65 वही, पृ. सं. 71 हादसे, ले. रमणिका गुप्ता, पृ,सं,24 वही, पृ,सं.25 कुछ कही कुछ अनकही, ले. शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.65 वही, पृ.सं.68 वही, पृ.सं.68 बूँद-बावड़ी, ले. पद्मा सचदेव, पृ.सं.123 शिकंजे का दर्द, ले.सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.116 वही, पृ.सं.116 वही, पृ.सं.126-127 मला उद्धवस्त ह्वायचयं..ले. मलिका अमर शेख, पृ.सं.26-27 वही,पृ.सं.38 वही, पृ.सं.40 वही, पृ.सं.44 वडिलांच्य सेवेशी, ले.शिरीष पै, पृ.सं.102 वही, पृ.सं.103 आयदान, ले. उर्मिला पवार, पृ.सं110 वही, पृ.सं.115 माझ्या आयुष्याची गोष्ट, ले. गिरिजा कीर, पृ.सं.154 http://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9 प्रतिरोध का दस्तावेज़ : महिला आत्मकथाएँ, ले. नीरू, पृ.सं.13-14 एक कहानी यह भी, ले. मन्नू भंडारी, पृ.सं.53 वही, पृ.सं.53 वही, पृ.सं.56 वही, पृ.सं.57-58 वही, पृ.सं.60-61 पिंजरे की मैना, ले.चंद्रकिरण सौनरेक्सा, पृ.सं. 219 वही, पृ.सं. 220 वही, पृ.सं. 224 कुछ कही कुछ अनकही, ले. शीला झुनझुनवाला, पृ.सं.307 वही, पृ.सं.151 दस्तक जिन्दगी की, ले. प्रतिभा अग्रवाल, पृ.सं.68-69 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.127 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.129 वही, पृ.सं.129 वही, पृ.सं.143 वही, पृ.सं 213 वही, पृ.सं.216 जो कहा नहीं गया, ले. कुसुम असंल, पृ.सं.49 वही, पृ.सं.60 वही, पृ.सं.61 वही, पृ.सं.76 लगता नहीं दिल मेरा, कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.86 वही, पृ.सं.78 वही, पृ.सं.90 वही, पृ.सं.159 कस्तूरी कुंडल बसै, ले.मैत्रेयी पुष्पा, पृ.सं.117 वही, पृ.सं.247-248 मृदुगंध, ले. इंदिरा संत, पृ.सं.129 मला उद्धवस्त ह्वायचयं..ले. मलिका अमर शेख, पृ.सं.26-27 वही, पृ.सं.65 वही, पृ.सं.67 वही, पृ.सं.124 वडिलांच्या सेवेशी, ले.शिरीष पै, पृ.सं.234 वही, पृ.सं.132 वही, पृ.सं.132 वही, पृ.सं.176 आहे मनोहर तरी, ले. सुनीता देशपांडे, पृ.सं.215 नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं.148 वही, पृ.सं.261 अन्या से अनन्या, ले.प्रभा खेतान, पृ.सं.72 वही,पृ.सं.251 वही,पृ.सं.253 वही,पृ.सं.253 कस्तूरी कुंडल बसै, ले. मैत्रेयी पुष्पा, पृ.सं.250 लगता नहीं है दिल मेरा, ले. कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.174 वडिलांच्या सेवेशी, ले. शिरीष पै, पृ.सं.169-170 मला उद्‍धवस्त व्हायचंय्, ले. मलिका अमर शेख, पृ.सं.43 वही, पृ.सं.45-46 मी नाही कुणाची, ले.सुशील पगारिया, पृ.सं.94 आयदान, ले. उर्मिला पवार, पृ.सं.155 http://www.mediaforrights.org/infopack/hindi-infopack/551-%E0%A4%98%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%82-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE मनोविज्ञान और सामाजिक समस्या, ले. मोहम्मद सुलेमान एवं दिनेश कुमार, पृ.सं.122-123 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.196-197 वही, पृ.सं.200 वही, पृ.स.196 बूँद-बावड़ी, ले. पद्मा सचदेव, पृ.सं.221 लगता नहीं दिल मेरा, ले. कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.131 वही, पृ.सं.252 पिंजरे की मैना, ले. चंद्रकिरण सौनरेक्सा, पृ.सं. 411 वही, पृ.सं.220 मला उद्धवस्त ह्वायचयं, ले. मलिका अमर शेख, पृ.सं.55 वही, पृ.सं. 67 नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं.190 जा कहा नहीं गया, ले. कुसुम असंल, पृ.सं.75 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ.सं.174 वही, पृ.सं.174 नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं224 मला उद्धवस्त व्हायचंय्, ले. मलिका अमर शेख, पृ.सं 69 वही, पृ.सं.69 वडिलांच्या सेवेशी, ले. शिरिष पै, पृ.सं.133 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ. सं. 75 वही, पृ.सं.176 वही, पृ.सं.12 वही, पृ.सं.14 माझ्या खुणा माझ्या मला, ले. सरोजिनी बाबर, पृ.सं.167 अपराधशास्त्र एवं दण्डशास्त्र तथा सामाजिक विघटन, ले. रामनाथ शर्मा एवं राजेन्द्र नाथ शर्मा, पृ.सं.197 लगता नहीं दिल मेरा, ले.कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.166 लगता नहीं दिल मेरा, ले. कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.152 वही, पृ.सं.152 वही, पृ.सं.223 वही, पृ.सं.223 वही,पृ.सं.224 हादसे, ले. रमणिका गुप्ता, पृ.सं.267 वही, पृ.सं. 215 वही, पृ.सं202 वही, पृ.सं.212 वही, पृ.सं.236 वही, पृ.सं.262 वही, पृ.सं.289 वही,पृ.सं.292 वही, पृ.सं.136 वही, पृ.सं.141 वही, पृ.सं.141 शिंकजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.224 हिन्दी लेखिकाओं की आत्मकथाएँ, ले. सरजू प्रसाद मिश्र,पृ.सं.128 शिकंजे का दर्द, ले.सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.144 वही, पृ.सं.149 वहीं,पृ.सं.165 वही,पृ.सं.165 वही,पृ.सं.171 वही, पृ.सं.169 वही, पृ.सं.167 वही, पृ.सं.230 आधुनिक साहित्य में दलित विमर्श, ले.देवेन्द्र चौबे, पृ.सं.72 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.234 वही, पृ.सं.186 वही, पृ.सं. 285 आयदान, ले. माधवी देसाई पृ.सं.77 वही, पृ.सं150 वही, पृ.सं.208 वही, पृ.सं.164 वही, पृ.सं.213 वही, पृ.सं.199 वही, पृ.सं.217 वही, पृ.सं.218 अन्या से अनन्या, ले. प्रभा खेतान, पृ. सं. 210 वही, पृ. सं. 211 वही, पृ. सं. 243 लगता नहीं दिल मेरा, ले. कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.242 पिंजरे की मैना, ले.चंद्रकिरण सौनरेक्सा पृ.स.311 बूँद-बावड़ी, ले.पद्मा सचदेव, पृ.सं235 शिंकजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.245 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं. 200 लगता नहीं दिल मेरा, ले.कृष्णा अग्निहोत्री, पृ.सं.172 नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं.117 माझ्या आयुष्याची गोष्ट, ले. गिरिजा कीर, पृ.सं.186 वही,पृ.सं.186 वही, पृ.सं.188 वही, पृ.सं.188 नाच ग घुमा, ले. माधवी देसाई, पृ.सं.116 http://aajtak.intoday.in/story/women-in-indian-politics-1-744282.html हादसे, ले. रमणिका गुप्ता, पृ.सं.245 वही, पृ.सं.257 वही, पृ,सं.54 वही, पृ,सं.54 वही, पृ.सं.263 माझ्या खुणा माझ्या मला, ले. सरोजिनी बाबर, पृ.सं.27 वही,पृ.सं.28 वही, पृ.सं.29 बूँद-बावडी, ले.पद्मा सचदेव, पृ.सं.345 शिकंजे का दर्द, ले. सुशीला टाकभौरे, पृ.सं.216 मी नाही कुणाची, ले.सुशील पगारिया, पृ.सं.118