Wednesday, October 27, 2010

      स्त्री शोषण और साम्प्रदायिकता ('कितने पाकिस्तान' के संदर्भ में)

"जरा गौर से इस तर्क पर ध्यान दीजिए- गोधरा में जब कोई हिन्दू स्त्री मर रही थी, तब वह स्त्री पहले थी और हिन्दू बाद में। व्यक्ति स्त्री के अस्तित्व का सवाल पहले है और उसका धर्म और जाति बाद में। पर यहाँ स्त्री होने के कारण वह उत्पीडित, शोषित, हिंसा की शिकार है और आततायी पुरुष है। यह पुरुष तंत्र है, उसकी सत्ता जो अपना नाम, धर्म और जाति बदलता रहता है। मगर हमेशा उसके पास सत्ता रहती, ताकत है, हथियार रहते हैं जिसका उपयोग वह अधीनस्त स्त्री के खिलाफ करता है।"१
                    प्रभा खेतान का यह वक्तव्य वास्तव में साम्प्रदायिक दंगों में स्त्री पर हो रहे अन्याय को व्यक्त करता है। साम्प्रदायिक दंगों के समय जो भी़ड़ इकठ्ठा होती है, उसका कोई चरित्र नहीं होता, खासकर उसमें कुछ उदंडी शामिल हो जाएँ तो मार-काट आगजनी- तोडफोड का यह खेल एक उत्सव की तरह खेला जाने लगता है। मगर यह भी सत्य है कि साम्प्रदायिक दंगों के समय यह भीड़ छांट-छांटकर विरोधी धर्म की औरतों को अपनी मर्दानगी का शिकार बनाते हैं। ऐसे समय वह किसी जाति,धर्म,सम्प्रदाय, वर्ग की नहीं होती है, वह केवल पुरुषों के लिए उपभोग्य वस्तु होती है। अनेक नाबालिग लडकियों पर बलात्कीस होते हैं। इनसे पीडित स्त्रियाँ अनेक बर आत्महत्या भी करती हैं।
                    साम्प्रदायिक दंगों के समय तो स्त्रियों पर अत्याचार तो होते ही हैं। लेकिन प्राचीन काल से लेकर आज तक फुरुष  स्त्री पर एकाधिकार जमाऐ हुए है। वह उसे केवल एक वस्तु के रुप में देखता आया है। आज भी स्त्री का वही स्थान है। स्त्री और दलितों की समस्या एक ही है। दोनों पर प्राचीन काल से अत्याचार हो रहे हैं। जाति,धर्म के आधार पर हमें बाँटा गया है, उसी तरह स्त्री और पुरुषों को लिंग के आधार पर बाँटा गया है। यह भेद सम्प्रदाय भेद के सम्प्रदाय के समान ही है। इसके द्वारा भी एक सम्प्रदाय (पुरुष) द्वारा दूसरे सम्प्रदाय (स्त्री) पर अत्याचार किया जा रहा है। उपन्यासकार इंद्र और ऋषि गौतम के प्रसंग के द्वारा स्त्री शोषण की कहानी हमें  बताता है। इंद्र गौतम ऋषि का रुप धारण करके अहिल्या का बलात्कार करता है।जब गौतम ऋषि को इस बात का पता चलता है तो वह दोनों को सजा सुनाता है। वह अपनी पत्नी से कहता है-तू कैसी पतिव्रता पत्नी है.... तुझे किसी के कपट का पता नहीं चला.... तू पर-पुरुष और अपने पति का भेद नहीं जान पाई। रुपगर्विता ह्रदयहीना!....जा तु पत्थर की शिला बन जा।2
      गौतम ऋषि ने तो इंद्र और अहिल्या दोनों को सज़ा दी। हालाँकि इसमें अहिल्या का दोष नहीं था। आज के समय में बलात्कार करनेवाले कसूरवार होकर भी समीज में इज्जत से घुमते हैं। स्त्री बेकसूर होने पर भी समाज द्वारा ठुकराई जाती है क्योंकि उसका कुँवारापनटूट जाता है यै इज्जत चली जाती है। लेकिन पुरुषों के कई औरतों के साथ संबंध होने पर भी न कुँवारापन टूटता है न इज्जत जाती है। ऐसे इन्द्र और गौतम ऋषि आज भी हमारे समाज में मौजूद है।
गौरतलब बात है कि वक्त चाहे दंगो,जंग या अमन का हो, नारी हमेशा शिकार होती है। जंग के संदर्भ में यह अत्याचार किस हद तक अमानवीयता के तमाम सरहदों को पार करते हैं, इसका एक उदाहरण बांग्लादेश की जंग के परिप्रक्ष्य में चित्रित है-एकाएक उन्हें यह घर भी मिल गया एक औरतवाला घर! मुल्की अफसर ने अपने सिपाहियों को अनुशासन में रखते हुए बाहर जाने का हुक्म दिया और उस औरत के साथ वही सब किया और उसके बाद उसके फौजियों ने भी उसके साथ वही कुछ किया, जो दुश्मन फौज का पराजित अफसर और उसके सिपाही उसके साथ करके भाग गए थे।3








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